छोटी फिल्मों की रिलीज की पहल

-अजय ब्रह्मात्‍मज

बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां सामाजिक जिम्मेदारी के तहत धर्मार्थ कार्य करती हैं। इनमें टाटा सबसे आगे है। अभी तो सारी कंपनियों में एक डिपार्टमेंट ऐसा होता है, जो सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए अधिकारियों को सचेत करता है। उन्हें धर्मार्थ निवेश के कार्य बताता है और उन पर निगरानी भी रखता है।
मनोरंजन के व्यवसाय में व्यक्तिगत स्तर पर फिल्म स्टार ढेर सारे धर्मार्थ कार्य करते हैं। भारतीय दर्शन और सोच से प्रेरित उनकी यह कोशिश सामाजिक उत्थान और वंचितों के लिए होती है। हालांकि उनकी ऐसी गतिविधियों पर उंगलियां भी उठती रही हैं। कहा जाता रहा है कि अनगिनत पाप करने के बाद पुण्य कमाने के लिए ही धर्मार्थ कार्य किए जाते हैं। महात्मा गांधी ने हमेशा अपने समय के उद्योगपतियों को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। कुछ को तो राजनीतिक मंच पर भी ले आए।
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में ज्यादातर गतिविधि बिजनेस बढ़ाने के लिए रहती है। कोई भी स्थापित निर्माता या कॉरपोरेट कंपनी प्रयोगात्मक फिल्म के निर्माण के पहले पच्चीस बार सोचती है। हर तरह से अपने जोखिमों को कम करने के बाद ही वे ऐसी फिल्मों के लिए आगे बढ़ते हैं। इधर पीवीआर ने एक बेहतरीन पहल की है। उनकी ओर से सीमित बजट की ऑफबीट और प्रयोगात्मक फिल्मों की रिलीज की व्यवस्था की गई है। इस तरह उन्होंने प्रयोगशील निर्माताओं को एक मंच देने और सुधी दर्शकों को ऐसी फिल्में दिखाने का एक पंथ दो काज किया। उन्हें अच्छी प्रतिक्रिया भी मिल रहा है।
हिंदी में पैरेलल सिनेमा के दौर में प्रदर्शन एक बड़ी समस्या थी। फिल्में तो एनएफडीसी या दूसरी संस्थाओं की मदद से बन जाती थीं लेकिन उनका प्रदर्शन अटक जाता था। कुछ फिल्में दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण में जगह पाती थीं। बाकी चंद फेस्टिवल्स में दिखाए जाने के बाद गोदामों में रख दी जाती थीं। पैरेलल सिनेमा का हश्र हम जानते हैं। हिंदी फिल्मों की कलात्मक परंपरा की यह नदी सूख गई। पैरेलल सिनेमा के निर्माता बड़े स्टार्स को लेकर मेनस्ट्रीम फिल्में बनाने लगे और श्याम बेनेगल सरीखे फिल्मकारों ने सामाजिक विषयों में कॉमेडी का छौंक डाला। फिर भी स्थिति दयनीय ही बनी रही। पीवीआर की इस पहल से स्वतंत्र निर्माताओं, प्रयोगशील निर्देशकों और लीक से हटकर काम करने वाले सभी प्रकार के छोटे और युवा फिल्मकारों को एक मंच मिल रहा है। फिलहाल ये फिल्में मेट्रो शहरों के मल्टीप्लेक्स में दिखाई जा रही हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया से पीवीआर के अधिकारियों का उत्साह बढ़ा है। संभव है वे छोटे शहरों के दर्शकों के हित में वहां भी ये फिल्में रिलीज करें। इन फिल्मों को न तो सौ प्रतिशत ओपनिंग मिलती है और न उनके कलेक्शन की बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट में चर्चा होती है। उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है। उद्देश्य है फिल्में दर्शकों तक एक व्यवस्थित नेटवर्क के जरिये पहुंचे।
पिछले दिनों पीवीआर ने इसी कड़ी में करण ग्रोवर की क्षय रिलीज की। यह एक गुस्सल महिला की कहानी है। दस लाख से कम बजट में बनी यह फिल्म कंटेंट और क्राफ्ट के स्तर पर खास है। फिल्म अपना मंतव्य जाहिर करने में सफल रही है। पीवीआर में इस गतिविधि की देखरेख कर रहे शिलादित्य वोरा बताते हैं, हमने सुधीश कामथ की फिल्म गुड नाइट गुड मॉर्निग से इसकी शुरुआत की थी। उसके बाद से चौराहे, द फॉरेस्ट, लव रिंकल फ्री और क्षय रिलीज हो चुकी है। इनमें लव रिंकल फ्री दो हफ्ते तक चली। इस कड़ी में अगली फिल्म सुपरमैन ऑफ मालेगांव होगी। उन्होंने यह बताया कि अभी मुख्य रूप से मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, अहमदाबाद, बंगलुरु और चेन्नई के थियेटरों में फिल्में रिलीज हो रही हैं। हम जल्दी ही छोटे शहरों की तरफ बढ़ेंगे।

Comments

Santosh said…
सार्थक पहल ! पी.वी.आर . को निश्चित तौर पर मुनाफा होगा और प्रयोगधर्मी फिल्म निर्माताओं को एक मंच मिलेगा !
हर संदेश मनोरंजक नहीं हो सकता है, बाजार में खड़ा नहीं हो सकता, उन्हें ऐसे ही सहारों की आवश्यकता है।

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