फ़िल्म समीक्षा : वन्स अगेन

फ़िल्म  समीक्षा 
वन्स अगेन 
-शोभा शमी
वो खट से फोन रखती थी....... तारा. 
वो फोन पर दूसरी तरफ आंखे मींचे टूं टूं टूं सुनता था........ अमर.

तारा हर बार जब यूं फोन रखती है तब बुरा सा क्यों लगता है? हर कॉल पर लगता है कि अरे इतनी छोटी बात. अभी तो कुछ कहा ही नहीं. कोई ऐसी बात जो कुछ जता सके. ये एक दूसरे से कुछ कहते क्यों नहीं! कुछ नहीं कहते ऐसा जो शायद उन्हें कह देना था. या शायद यही खूबसूरती है कि वो कुछ नहीं कहते. 
एक अजीब सी तसल्ली है उन दोनों के फोन कॉल्स में. जो प्रेम में पड़े किन्हीं दो लोगों में आसानी से दिख जाती है. एक इच्छा जो उनके चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती है. बहुत बारीक. बहुत महीन. उन फोन कॉल्स में ऐसी कोई बात नहीं है सिवाए उस चाहना के जो बिना कुछ कहे सबकुछ कहती जाती है. 
दरअसल पूरी फिल्म ही ऐसी है जो कुछ नहीं कहती. जो प्रेम, चाहत और इच्छाओं की बात आखिर में करती है और बीच सारा वक्त उस प्रेम को बुनती रहती है. 
और ये असल जीवन के इतनी करीब महसूस होता है कि ऐसा लगता है कि अपनी एक किश्त की डायरी पलट ली हो पूरी. 

फिल्म जैसे स्मृतियों के रंग में है. हमारी अपनी स्मृतियों में भी मुलाकातों के अलावा कुछ नहीं है. कोई शोर नहीं है. कोई आवाज नहीं है. ऐसा जैसे प्रेम की स्मृति में होता है. सिर्फ रंग और अहसास में. वो सारा शोर और बाहरी दुनिया कहीं गुम जाती है हमेशा. 

मुम्बई की भीड़भरी सड़कों और शोर से फिल्म कितनी मोहब्बत से खेलती है. नीरज कबि खुद कहते हैं कि, ‘फिल्म में मुम्बई तीसरा और स्टैटिक कैरैक्टर है’. 

तारा अपने भीड़ भड़ाके वाले कैफे में है. अचानक अमर का फोन आता है और सारा शोर एकबारगी थम जाता है. उस फोन कॉल के बाद वो अपनी दुनिया में लौटती है और शोर भर जाता है. 


तारा का मच्छी बाज़ार जाना... मछलियां कट रही हैं. मसाले कुट रहे हैं. एक पैकेट मसाला पैक हो रहा है. तारा के आस पास शोर ही शोर है और अगले ही फ्रेम में धक्क सी चुप्पी है. कोई आवाज़ नहीं है. तारा हाथों पर सिर रखे बैठी है. सामने फोन रखा है. तारा की दो दुनियाएं, दो फ्रेम में खट से हमारे भीतर उतरती हैं. 



बहुत सुंदर पैटर्न है. जिस तरह से फिल्म के बहुत से फ्रेमों में बिना किसी डॉयलॉग और म्यूजिक के सिर्फ शोर है. और अचानक अगले फ्रेम में चुप्पी. और संगीत की वो सुंदर धुन जब वो दोनों साथ होते हैं या मिलकर लौट रहे होते हैं. 

दोनों के उस प्रेम में एक बहुत सहज सा सुचकुचाहट है. एक कौतुक. एक दूसरे को ना जानने का आश्चर्य औऱ इच्छा.  
“जैसा सोचा था आप वैसे ही हैं.”
“आप हमेशा यहां आते हैं?” 
एक दूसरे को न जानने का भाव. दो जीवन का अंतर जहां एक बहुत शिद्दत है. रिश्ता भी है. लेकिन एक अंतर, एक दूरी भी है. एक दूसरे को न जानने की. जो बहुत इंटेंस है.  
“आप किसके साथ आते हैं?”
“पहली बार किसी के साथ आया हूँ.”


जब दूर छोर पर वो उसे एकटक देखती है और बस देखती रह जाती है तो आपको अपनी एक बहुत अधूरी सी मुलाकात याद आती है. बहुत बारीक. महीन.

चाह किसी तड़कती भड़कती सी पार्टी या गुलाब के फूल लिए नहीं है. वो अपने किस्म की सादगी में है. जिसमें शिद्दत है. जुम्बिश है. धड़कन है. और बहुत मासूम बातें हैं जिनपर प्यार आ जाता है.


“अच्छा आप जिद भी करते हैं?”
“मैं ज़िद ना करता तो आप मिलतीं?”

“मुझे देखकर चलेंगी तो गिर जाएंगी आप.” (तारा सच में अमर को देखकर चल रही है)
“बाकी लोगों को आपको घूरना अच्छा लगता होगा पर मुझे कोई शौक नहीं है आपको देखने का” “लेकिन मुझे आपको देखना बहुत पसंद है” (अमर तारा को देख रहा है).

अमर: “आपको तो अगली फ़िल्म में कास्ट करना चाहिए.”
पहले तो आप मुझे अफोर्ड नहीं कर पाएंगे और दूसरा मैं आपके साथ एक्टिंग नहीं करना चाहती..
अमर पूछता है वो क्यों? उस क्यों का कोई जवाब नहीं आता.. बैकग्राउंड में एक खूबसूरत गाना बजता है. और एक लॉन्ग शॉट में दोनों कार में हंस रहे हैं.

फिल्म के सारे हिस्से इतने असल हैं. प्रेम कहानी के इतर दो परिवारों के बीच की धुकधुकी. उनका आपसी सामंजस्य. हर कैरैक्टर का अपने किस्म का अकेलापन या उलझन. जो अपनी अपनी लेयर लिए चलता है. और उस सब का बैलेंस. जो कि अद्भुत है. जो कहीं भी डिगा या इधर उधर नहीं होता. बिल्कुल वैसा जैसे फ़िल्म में तारा कहती है कि एक वक्त पर पता चल जाता है कि सबकुछ कैसा होगा. अच्छा, बुरा या बहुत अच्छा.
 ये बात भी तारा फोन पर कहती है. फिर कुछ कहकर खट से फोन रखती है और अमर सुनता है..टूं टूं टू.!

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