सिनेमालोक : फिल्म ‘मंडी’ का मजार


सिनेमालोक
फिल्म ‘मंडी’ का मजार
-अजय ब्रह्मात्मज
श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ में शबाना आज़मी और उनकी मंडली को शहर से निकलकर वीराने में अपना कोठा बनाना पड़ा था. कोठा बनने के बाद शहर के लोगों को ही आने-जाने लगते हैं और वह इलाका गुलज़ार हो जाता है. फिल्म देखी हो तो आपको याद होगा कि ‘मंडी’ में एक मजार भी था. बाबा खड़ग शाह का मजार. उस मजार का एक दिलचस्प किस्सा है.
सालों पहले एक इंटरव्यू में श्याम बेनेगल ने यह किस्सा खुद सुनाया था. हुआ यों कि ‘मंडी’ का सेट जिस स्थान पर लगाया गया था, वह वास्तव में पाकिस्तान चले गए एक मुसलमान परिवार की खाली जमीन थी. वह खाली जमीन मुसलमान परिवार के जाने के बाद स्थानीय रेड्डी परिवार के कब्जे में थी. उन्होंने ने ही श्याम बेनेगल को वह ज़मीं फिल्म का सेट लगाने के लिए दी थी. सेट लगना शुरू हुआ तो श्याम बेनेगल और उनके कला निर्देशक नीतीश राय ने कोने की एक ढूह को मजार का रूप दे दिया. फिल्म के हिसाब से बने सेट के लिए वह मजार माकूल था. कुछ जोड़ ही रहा था. ‘मंडी’ का यह मजार मलाली पहाड़ी तलहटी के पास की जमीन पर बना था. मलाली पहाड़ी बहुत ही पवित्र मानी जाती है, क्योंकि वहां 18वीं सदी में किसी को अली का विजन आया था.
‘मंडी’ की कहानी में शबाना आजमी ने वह मजार बाबा(अमरीश पुरी) के याद में बनवाया था. बाबा को भी अली का विजन आया था. फिल्म में अमरीश पुरी का नाम बाबा खड़ग शाह था. शूटिंग के दरमियन ही एक आदमी वहां आकर रोजाना नई चादर डाल जाता था. लोग भी आने-जाने लगे थे. चढ़ावा आने लगा था. लोग पैसे चढ़ा जाते थे. वह आदमी वहीं बैठा रहता था और साफ-सफाई करता था. यूनिट को कोई दिक्कत नहीं हो रही थी,इसलिए उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. लोग मजार पर आते,थोड़ी देर थोड़ी देर शूटिंग देखते और फिर चले जाते थे. दो-तीन हफ्ते की शूटिंग के बाद यूनिट किसी और जगह शूटिंग के लिए निकल रही थी. फिल्म के कला निर्देशक नीतीश राय ने पूछा भी कि क्या मैं इसे बराबर कर दूं? श्याम बाबू ने वहां लोगों की आमदरफ्त देखकर कहा कि रहने दो.
दूसरी जगह पहुंचकर यूनिट अपनी तैयारियों में जुट गई. श्याम बाबू को फुर्सत मिली तो वे थोड़ा आराम कर रहे थे और अपने कलाकारों के साथ मशगूल थे. अभी रात नहीं हुई थी थी कि साधे दस बजे एक फोन आया. फोन उस जमीन के वर्तमान मालिक का था. वह कह रहे थे कि आप लोगों ने जो मजार बनाई थी ना? उसे तोड़ दीजिए. श्याम बाबू ने उनसे पूछा कि वह तो आप की जमीन के एक किनारे पर है. उससे क्या दिक्कत हो सकती है? रहने दीजिए. उन्होंने बताया कि यह जिन लोगों की मूल जमीन है, उन्होंने हाईकोर्ट में रिट पिटीशन डाला है कि बाबा खड़ग शाह उनके पूर्वजों के पीर थे. मजार पर आ रहे लोग उनके मुरीद हैं. यह जमीन उन्हें वापस कर दी जाए. अगर आप लोग मजार नहीं तोडेंगे और इस बीच हाई कोर्ट से वहां जांच के लिए कोई आया तो मजार का नजारा देखकर पेटीशन को सही मान लेगा. भारी गड़बड़ होगी. मेरी जमीन चली जाएगी. अभी ही मजार की जमीन बढ़ती जा रही है.
श्याम बाबू के लिए यह दुविदा की स्थिति थी. उनकी समझ में तुरंत नहीं आया कि क्या करें? उन्होंने परिचितों से सलाह ली श्याम बाबू के एक क्लासमेट तब राज्य सर्कार में मंत्री थे, उनसे सलाह ली गई. मंत्री ने बताया कि यह यहां की आम बात है. जमीन कब्जा करने के लिए कहीं भी लोग धार्मिक स्थान बना देते हैं और फिर श्रद्धालुओं के आने-जाने से उसका महत्व बढ़ जाता है. कुछ समय के बाद उसे हटाना या तोड़ना मुमकिन नहीं होता. आपके लिए उचित होगा कि इसे तोड़वा दें. इसे दिन में हरगिज ना तोड़े वरना बवाल हो जाएगा. रात में तोडिये, जब वहां कोई नहीं होता. मजार पर बैठने वाले से बात कीजिए. उसे राजी-खुशी विदा कर दीजिए. श्याम बाबू ने ऐसा ही किया. इस तरह फिल्म सेट का मजार वास्तविक मजार बनते-बनते रुका.
सालों बाद डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी राजस्थान के मंडावा में अपनी फिल्म ‘जेड प्लस’ की शूटिंग करने गए. फिल्म की जरूरत के मुताबिक उन्होंने एक दरगाह बनवाई थी. यह दरगाह एक हवेली के प्रांगण में थी. शूटिंग के बाद उनकी यूनिट जब लौटने लगी तो हवेली के मालिक ने आग्रह किया कि आप लोग दरगाह तोड़कर जाएं. दरगाह रह गई तो लोग आने-जाने लगेंगे और फिर हमारी हवेली भी चली जाएगी.


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