सिनेमालोक : 90 सालों की सुरयात्रा

 

सिनेमालोक

90 सालों की सुरयात्रा

-अजय ब्रह्मात्मज

इन दिनों हिंदी में सिनेमा पर किताबें लिखी जा रही हैं. व्यवसायिक प्रकाशन गृह तो बिकाऊ किताबों की योजना के तहत ज्यादातर लोकप्रिय फिल्म सितारों की जीवनियाँ छापने में रुचि लेते हैं. इसके अलावा वे पाठकों की तात्कालिक जरूरतों और जिज्ञासा(स्क्रिप्ट लेखन,फिल्म पत्रकारिता आदि) को ध्यान में रखकर प्रकाशन योजनाएं बनाते हैं. दिक्कत यह है कि इन प्रकाशन गृहों में साहित्य के संपादकों की तरह सिनेमा और अन्य साहित्यिक विषयों के संपादक नहीं है. वे इनके आउटसोर्सिंग भी नहीं करते. नतीजा यह होता है कि वे साहित्यकारों या अनुवादकों से ही फिल्मों की किताबें भी लिख पाते हैं. वे उनकी टिप्पणियों का संग्रह प्रकाशित करते हैं. उससे भी ज्यादा अफसोस की बात है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के निर्णायक ऐसी किताबों और टिप्पणियों के संग्रह को राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित कर शेष गंभीर और ईमानदार लेखकों को हतोत्साहित करते हैं.

इस विकट माहौल में राजीव श्रीवास्तव की पुस्तक ‘सात सुरों का मेला’ का आना एक सुखद घटना है. इसे सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया है. पुस्तक की भूमिका ‘माधुरी’ के संपादक रहे अरविंद कुमार ने लिखी है. फिल्म पत्रकारिता में अरविंद कुमार का विशेष योगदान ‘ना भूतो ना भविष्यति’ है. पिछले दिनों उनके संस्मरण डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘पिक्चर प्लस’ पर दिखाई पड़े. संजीव श्रीवास्तव ने बड़े यत्न से उन्हें संयोजित किया. अरविंद कुमार से आग्रह है कि वे इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करें. हिंदी में फिल्मों पर प्रमाणिक लेखन की भारी कमी है. ऐसा लेखन से चलन और प्रचालन से परे जाकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सटीक संदर्भों के तथ्यों का दस्तावेजीकरण होता है.

राजीव श्रीवास्तव की पुस्तक ‘सात सुरों का मेला’ यही मुश्किल काम करती है. 310 पृष्ठों की इस किताब में उन्होंने हिंदी फिल्मों के सुर(गीत –संगीत) के 90 सालों के यात्रा का सप्रसंग विवरण दिया है. उन्होंने स्वयं सालों की मेहनत से सारी जानकारियां बटोरी हैं. संबंधित गीतकारों, संगीतकारों और अन्य जानकारों से बातचीत की है. उन्हें समय, प्रवृत्ति और शैली के अनुसार विश्लेषित कर एक क्रम दिया है. इस पुस्तक से हिंदी फिल्मों के गीत-संगीत की यात्रा का सिलसिलेवार विवरण मिल सकता है.

अरविंद कुमार इस पुस्तक के आमुख में लिखते हैं, ‘फिल्म संगीत से संबंधित ढेरों किस्सों-कहानियों, मौखिक रूप से कहा और सुना गया था, उसे समेट कर एक पुस्तक का रूप दिया गया है. साल दर साल के कई महत्वपूर्ण और लोकप्रिय गीतों का उल्लेख करते हुए उसे इस पुस्तक में शब्द रूप में भी दिया गया है, जिसे संदर्भ के तौर पर मैं एक महत्वपूर्ण सूत्र मानता हूं.’ राजीव श्रीवास्तव ने इस पुस्तक के लिए दर्जनों गीतकारों और संगीतकारों से फर्स्ट हैंड जानकारी ली है. उनमें से अनेक अब जीवित भी नहीं है. ‘सात सुरों का मेला’ वास्तव में हिंदी फिल्मों के गीत-संगीत की यात्रा के सभी पड़ावों का जरूरी दस्तावेज है. हिंदी फिल्मों और फिल्मी संगीत के शोधार्थी और अधेय्ताओं के लिए आवश्यक संदर्भ पुस्तक है.

राजीव श्रीवास्तव निरंतर हिंदी फिल्मों के गीत-संगीत पर लिखते रहे हैं. संगीत से उनका निजी लगाव ही इस अध्ययन,शोध और संकलन के लिए प्रेरित करता होगा. इसके पहले गायक मुकेश पर उनकी एक किताब आ चुकी है. उनकी लेखन शैली सरल है. वे तथ्य और जानकारी से आतंकित नहीं करते हैं. साथ ही उनके लेखन में एक किस्म की सामाजिकता अन्तर्निहित रहती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है. राजीव श्रीवास्तव ने 10 अध्यायों में सुरयात्रा को समेटा है. पृष्ठभूमि, परंपरा और स्वरूप के 3 अध्यायों के बाद वे छठे दशक के गीत-संगीत के वर्णन में रमते हैं. सातवें दशक को गीत-संगीत का स्वर्णिम दौर मानते हैं. उन्होंने स्वर्णिम दौर की त्रिवेणी(शब्द, धुन और स्वर) का सुंदर विश्लेषण किया है. इस पुस्तक के परिशिष्ट में 1931 से 2020 तक की फिल्म संगीत यात्रा में मशहूर हुए गीतों की सूची भी है. आरंभिक दो दशकों के 10-10 गीतों के उल्लेख के बाद उन्होंने 1951 से हर साल के 10 गीतों की सूची दी है’

सात सुरों का मेला,

लेखक : राजीव श्रीवास्तव,

प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार

मूल्य ₹515

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