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Monday, July 22, 2013

गायकी और एक्टिंग दोनों में चुनौती है-मोनाली ठाकुर


-अजय ब्रह्मात्मज
अब्बास टायरवाला की निर्माणाधीन फिल्म ‘मैंगो’ की नायिका मोनाली ठाकुर ने गायकी में तेजी से अपना स्थान और नाम बनाया है। उनकी खूबसूरती और प्रतिभा के कायल निर्देशकों ने पहले से ही उन्हें फिल्मों के लिए प्रेरित किया। आखिरकार उन्होंने हां कर दी? इन दिनों वह गोवा में ‘मेंगो’ की शूटिंग कर रही हैं।

- कहां की हैं आप?
0 मैं कोलकाता में पैदा हुई। वहीं पली-बढ़ी। छह साल पहले मैं मुंबई आई।
- मुंबई आने की योजना कब बनी?
0 इंडियन आयडल में भाग लेने के पहले से मुंबई आने का इरादा बन गया था। मुझे फिल्मों में पाश्र्व गायन करना था। उसके लिए तो मु़ंबई ही आना था। गाने तो कोलकाता में भी गाए जा सकते थे, लेकिन मुझे हिंदी फिल्मों में गाना था। हिंदी फिल्मों में गाने से राष्ट्रीय पहचान मिलती है।
- कोलकाता में कहां पढ़ती थीं?
0 मैं फ्यूचर फाउंडेशन स्कूल में पढ़ी हूं। वह पांडिचेरी से जुड़ी संस्था है। कॉलेज की पढ़ाई मैंने सेंट जेवियर्स से की। मैं अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी। मुझे पहले ही कुछ मौके मिल गए और उनके लिए मुझे मुंबई आना पड़ा। कोलकाता के टालीगंज में मेरा घर है।
- स्कूल के दिनों में किन गायकों के गाने गाती थीं?
0 मैं अपने गुरुजी और बड़े गुलाम अली खां के गाने गाती थी। पॉपुलर गानों में लता जी, आशा जी और किशोर कुमार के गाने गाया करती थी। मेरे पापा शक्ति ठाकुर स्वयं गायक रहे हैं। मेरे नाना क्लासिकल आर्टिस्ट थे। मां भी गाती थी। मैंने पंडित जगदीश प्रसाद जैन से गायकी सीखी। वे पटियाला घराना के थे।
- आपकी गायकी अच्छी चल रही है। फिर यह फिल्मों की तरफ आना कैसे हो गया? क्या गायकी तरह फिल्मों में भी आने की योजना थी?
0 मुझे अब्बास टायरवाला ने फिल्मों के लिए प्रेरित किया। और भी दूसरे निर्देशकों ने ऑफर दिए थे। वास्तव में मैं उनके सुझावों का अनादर नहीं करना चाहती थी। फिर भी मैंने वक्त लिया। मैं चाहती थी कि थोड़ी बड़ी हो जाऊं। एक्ट्रेस बनना आसान काम नहीं है। उसके साथ अनेक जिम्मेदारियां आ जाती हैं।
- कैमरे के सामने तो आप गायिका के तौर पर भी आती रही हैं। अभिनेत्री के तौर पर कैमरे के सामने आना कितना अलग रहा?
0 दोनों में थोड़ा फर्क है। पहले रूप में इमोशन नैचुरल और वास्तविक होते हैं। दूसरे रूप में सीन के हिसाब से इमोशन क्रिएट करना पड़ता है। दूसरा रूप अधिक मुश्किल है। मैंने एक्टिंग की अलग कोई पढ़ाई नहीं की है। एक्टिंग मेरे खून में है। मेरे पिता थिएटर एक्टर रहे हैं। दूसरे मैं हिंदी और अंग्रेजी की फिल्में लगातार देखती रही हूं। उन फिल्मों से बहुत कुछ सीखा है। अभी सीन करते समय मैं उन्हीं का अनुकरण करती हूं।
- ‘मैंगो’ कैसी फिल्म है?
0 यह हाई एनर्जी की इमोशनल फिल्म है। यह फन ओरिएंटेड और वायब्रेंट फिल्म है। युवा दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गई है। इस फिल्म की थीम के अनुसार मुझे हमेशा एनर्जी बनाए रखनी थी। कई बार देर रात को शूट करते समय सुबह की एनर्जी मेंटेन करने में दिक्कत आती थी। इस चुनौती के लिए मैं पहले से तैयार नहीं थी।
- गायकी और एक्टिंग दोनों में अधिक चुनौतीपूर्ण क्या है?
0 दोनों ही हैं।
- क्या आप मुंबई शिफ्ट कर गई हैं?
0 हां, मेरे माता-पिता मेरे साथ ही रहते हैं। उनके बिना मैं नहीं रह सकती। उन्हें भी लगता है कि मैं उनके संरक्षण में रहूं।
- हिंदी फिल्मों में अपनी गायकी के बारे में बताएं?
0 मेरा पहला हिट गाना ‘जरा जरा टच मी टच मी’ है। उसके बाद ‘ख्वाब देखे झूठे-मुठे’ था। ‘अंजाना अंजानी’ का टायटल सौंग गाया था। ‘गोलमाल’ का टायटल ट्रैक मैंने ही गाया था। अभी रिलीज हुई ‘लूटेरा’ का ‘संवार लूं’ गाना है।
- सिंगर एक्टर के तौर पर हिंदी फिल्मों में कौन सबसे अधिक प्रिय हैं?
0 किशोर कुमार।





   

Saturday, October 23, 2010

फिल्‍म समीक्षा : झूठा ही सही

लंदन के मजनूं


झूठा ही सही: लंदन के मजनूं

अब्बास टायरवाला की झूठा ही सही के किरदार आधुनिक रंग-रूप और विचार के हैं। उनकी जीवन शैली में माडर्न मैट्रो लाइफ का पूरा असर है। अपनी बोली, वेशभूषा और खान-पान में वे पारंपरिक भारतीय नहीं हैं। वे लंदन में रहते हैं और उनके लिए भारत-पाकिस्तान का भी फर्क नहीं है। विदेशी शहरों में रह चुके दर्शक भारत और पाकिस्तान के मूल नागरिकों के बीच ऐसी आत्मीयता से परिचित होंगे। यह सब कुछ होने के बाद जब मामला प्रेम का आता है तो उनके किरदार लैला-मजनूं और शीरी-फरहाद की कहानियों से आगे बढ़े नजर नहीं आते। 21वीं सदी के पहले दशक के अंत में भी मिश्का को पाने के लिए सिद्धार्थ को तेज दौड़ लगानी पड़ती है और लंदन के मशहूर ब्रिज पर छलांग मारनी पड़ती है। नतीजा यह होता है कि यह फिल्म अंतिम प्रभाव में हास्यास्पद लगने लगती है।

सिद्धार्थ लंदन में गुजर-बसर कर रहा एक साधारण युवक है। वह सुंदर लड़कियों को देख कर हकलाने लगता है। उसमें रत्ती भर भी आत्मविश्वास नहीं है। दूसरी तरफ मिश्का को उसके प्रेमी ने धोखा दे दिया है। संयोग से दोनों की बातचीत होती है, जो बाद में दोस्ती में बदलती है और प्रेम हो जाता है। इस कहानी में पेंच है कि सिद्धार्थ का एक रूप फिदातो है, जो सिर्फ टेलीफोन पर ही मिलता है। फिदातो और सिद्धार्थ के एक ही होने का भेद खुलने पर कहानी टर्न लेती है और फिर उसे संभालने में निर्देशक का सुर बिगड़ जाता है। फिल्म फिसल जाती है।

गलत कास्टिंग का इतना सटीक उदाहरण नहीं मिल सकता। नायिका के तौर पर पाखी मिश्का के किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाती। वह पूरी तरह से अनफिट लगती हैं। सिद्धार्थ के रूप में हैडसम और स्मार्ट जॉन अब्राहम का चुनाव भी गलत है। दब्बू स्वभाव के किरदार को जॉन निभा नहीं पाते। वे विश्वसनीय नहीं लगते। अलबत्ता इस फिल्म में सहयोगी कलाकारों और किरदारों ने सुंदर काम किया है। ए आर रहमान और अब्बास टायरवाला की जोड़ी इस बार गीत-संगीत में जाने तू या जाने ना का जादू पैदा नहीं कर सकी है। अब्बास टायरवाला की लेखन और निर्देशन क्षमता पर यह फिल्म प्रश्न चिह्न लगाती है।

रेटिंग- *1/2 डेढ़ स्टार