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Sunday, August 16, 2009

दरअसल:आशुतोष की युक्ति, प्रियंका की चुनौती

-अजय ब्रह्मात्मज

आशुतोष गोवारीकर ने अपनी नई फिल्म ह्वाट्स योर राशि? के लिए अपनी गंभीर मुद्रा छोड़ी है। लगान के बाद वे लंबी और गंभीर फिल्में ही निर्देशित करते रहे। आशुतोष को करीब से जो लोग जानते हैं, वे उनके विनोदी स्वभाव से परिचित हैं। ऐसा लगता है कि हरमन बवेजा और प्रियंका चोपड़ा की इस फिल्म में लोग आशुतोष के इस रूप से परिचित होंगे।

फिल्म ह्वाट्स योर राशि? गुजराती के उपन्यासकार मधु राय की कृति किंबाल रैवेंसवुड पर आधारित है। मधु वामपंथी सोच के लेखक हैं। उन्होंने इस कृति में भारतीयता की खोज में भारत लौट रहे आप्रवासी भारतीयों की समझ का मखौल उड़ाया है। वे भारत के मध्यवर्गीय परिवारों पर भी चोट करते हैं। उपन्यास के मुताबिक योगेश ईश्वर पटेल पर दबाव है कि वह भारत की ऐसी लड़की से शादी करे, जो सुसंस्कृत और भारतीय परंपरा में पली हो। भारत आने के बाद योगेश को अहसास होता है कि भारत की लड़कियों का नजरिया और रहन-सहन बदल चुका है। योगेश की इन मुठभेड़ों पर ही कहानी रची गई है।

वर्षो पहले 1989 में केतन मेहता ने इसी उपन्यास पर मिस्टर योगी नाम का धारावाहिक बनाया था। धारावाहिक में मोहन गोखले ने योगेश की भूमिका निभाई थी। उसमें योगेश बारह राशियों की बारह लड़कियों से मिलता है। उनमें से कोई भी उसे पसंद नहीं आती। वह आखिरकार किसी और लड़की से शादी कर लेता है। केतन मेहता ने तब टीवी पर एक्टिव 14 लड़कियों को अलग-अलग भूमिकाएं सौंपी थीं।

पूरे बीस साल बाद आशुतोष ने उसी उपन्यास पर ह्वाट्स योर राशि? की स्क्रिप्ट लिखी है। इस बार उन्होंने थोड़ा परिवर्तन किया है। कास्टिंग में किया गया यह परिवर्तन कमाल कर सकता है। प्रियंका चोपड़ा को आशुतोष ने बड़ा मौका दिया है। उन्होंने इस फिल्म में बारह राशियों की बारह लड़कियों की भूमिका अकेले प्रियंका चोपड़ा को दे दी है। प्रियंका ने आशुतोष की दी गई चुनौती के अनुरूप मेहनत की है। वे काफी खुश हैं और ऐसी चुनौती की वजह से खुद को भाग्यशाली मानती हैं। लोगों को याद होगा कि इसी फिल्म के सेट पर मेहनत और थकान की वजह से प्रियंका अचेत हो गई थीं। पर्दे पर बारह किरदार को निभाने की चुनौती बड़ी है, क्योंकि हर किरदार को अलग रखना है। रूप-रंग और बात-व्यवहार के ढंग में कोई समानता नहीं होनी चाहिए। यह तो फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि प्रियंका इन किरदारों के साथ न्याय कर सकी हैं या नहीं? दरअसल, आशुतोष की भी मजबूरी रही होगी। उस मजबूरी के तहत ही उन्होंने कास्टिंग में यह प्रयोग किया होगा। एक फिल्म के लिए बारह हीराइनों को जुटा पाना फाइनेंशियली और क्रिएटिवली मुश्किल काम है। एक तो हर हीरोइन का इगो इतना बड़ा होता है कि वे दूसरे से कम फुटेज और लाइनों के लिए तैयार नहीं होतीं। दूसरे फिल्म की नायिका होने के लिए भी होड़ रहती है। लिहाजा इन सारी मुश्किलों से बचते हुए आशुतोष ने तरकीब निकाली। उन्होंने प्रियंका को एकमुश्त जिम्मेदारी दे दी। वैसे, कहा यह भी जा रहा है कि अभी के हालात में हरमन के लिए बारह हीरोइन खोज पाना मुमकिन ही नहीं था। चूंकि हरमन और प्रियंका ज्यादा करीब थे, इसलिए यह युक्तिपूर्ण समीकरण काम कर गया।

आशुतोष ने अपनी अगली फिल्म की घोषणा कर दी है। वे चिटगांव प्रसंग के एक क्रांतिकारी पर फिल्म बनाना चाहते हैं, जिसमें अभिषेक बच्चन की मुख्य भूमिका होगी। फिलहाल हमारी नजर ह्वाट्स योर राशि? पर टिकी है। देखें आशुतोष दर्शकों को किस हद तक संतुष्ट कर पाते हैं?


Saturday, August 15, 2009

फ़िल्म समीक्षा:कमीने

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बैड ब्वाय के एंगल से गुड ब्वाय की कहानी

-अजय ब्रह्मात्मज

वह चलता है, मैं भागता हूं-चार्ली
(लेकिन दोनों अंत में साथ-साथ एक ही जगह पहुंचते हैं। जिंदगी है ही ऐसी कमीनी।)
समकालीन युवा निर्देशकों में विशाल भारद्वाज महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। अगर आपने विशाल की पिछली फिल्में देखी हैं तो कमीने देखने का रोमांच ज्यादा होगा। अगर उनकी कोई फिल्म पहले नहीं देखी है तो शैली, शिल्प, संवाद, दृश्य, दृश्य संयोजन, संरचना, बुनावट, रंग, प्रकाश और टेकिंग सभी स्तरों पर नवीनता का एहसास होगा। एकरेखीय कहानी और पारंपरिक शिल्प के आदी दर्शकों को झटका भी लग सकता है। यह 21वीं सदी का हिंदी सिनेमा है, जो गढ़ा जा रहा है। इसका स्वाद और आनंद नया है।
विशाल भारद्वाज ने जुड़वां भाइयों की कहानी चुनी है। उनमें से एक बैड ब्वाय और दूसरा गुड ब्वाय है। बचपन की एक घटना की वजह से दोनों एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। उनकी मंजिलें अलग हैं। बैड ब्वाय जिंदगी में कुछ भी हासिल करने के दो ही रास्ते जानता है-एक शार्टकट और दूसरा छोटा शार्टकट। जबकि गुड ब्वाय ने अपनी आलमारी के भीतरी पल्ले पर 2014 तक का अपना लाइफ ग्राफ बना रखा है। नएपन के लिए जुड़वां भाइयों की इस कहानी में एक तुतलाता और दूसरा हकलाता है। कमीने बैड ब्वाय चार्ली के नजरिए से पेश की गई है।
कमीने में विशाल भारद्वाज की शैली, संवाद और शिल्प में पहले की फिल्मों की अपेक्षा निखार है। कलात्मक सृजन के हर क्षेत्र में नए और युवा सर्जक को अपनी शैली साधने में वक्त लगता है। इस फिल्म में विशाल सिद्धहस्त होने के करीब पहुंचे हैं। उन्होंने कुछ दृश्यों को तीव्र अतिनाटकीयता और चुटीलेपन के साथ रचा है। इन दृश्यों में हम रमते हैं, जबकि ये दृश्य मुख्य कहानी का हिस्सा नहीं होते। विशाल की फिल्मों में अनेक किरदार होते हैं और उनकी सुनिश्चित भूमिकाएं होती हैं। गौर करें तो पाएंगे कि उनकी फिल्मों में एक्स्ट्रा या जूनियर आर्टिस्ट की जरूरत नहीं होती। उनकी फिल्मों पर टरनटिनो (रिजर्वायर डाग, पल्प फिक्शन और किल बिल के निर्देशक) की फिल्मों का स्पष्ट प्रभाव है। भारतीय फिल्मकारों में वे एक स्तर पर जेपी दत्ता के करीब लगते हैं।
विशाल कलाकारों से काम निकालने में माहिर हैं। उनकी फिल्मों में स्टार अपना चोगा उतार कर कलाकार बन जाते हैं और फिर पर्दे पर किरदार के रूप में नजर आते हैं। कमीने में शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा अपने करिअर की उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय भूमिकाओं में हैं। जुड़वा भाइयों चार्ली और गुड्डू का चरित्रांकन इतना अलग है कि शाहिद कपूर की मेहनत रंग लाती है। प्रियंका चोपड़ा मराठी मुलगी के रूप में प्रभावित करती हैं। लेकिन जब वह हिंदी बोलने लगती हैं तो संवाद अदायगी में मराठी असर खत्म हो जाता है। अमोल गुप्ते समेत छोटी-मोटी भूमिकाओं में आए सभी कलाकारों को निर्देशक ने पूरे मनोयोग से कहानी में गूंथा है। सभी कलाकारों ने अभिनय से अपने हिस्से आए दृश्यों को प्रभावशाली बना दिया है।
फिल्म में पुराने पापुलर गानों के रेफरेंस सार्थक एवं उपयोगी हैं। विशाल को सामान्य और पापुलर रेफरेंस से परहेज नहीं है। बल्कि यूं कहें कि इनके उपयोग से वह अपने कथ्य और भाव को अधिक सघन एवं संप्रेषणीय बना देते हैं। संगीत पर उनकी उम्दा पकड़ है। चूंकि गुलजार फिल्म में सक्रिय विशाल भारद्वाज के मनोभाव समझते हैं, इसलिए उन्हें सही शब्द दे देते हैं।
कमीने में अभिनय, दृश्य संयोजन, संवाद, लोकेशन, टेकिंग आदि उत्तम है, लेकिन फिल्म का समन्वित प्रभाव थोड़ा कमजोर है। फिल्म के क्लाइमेक्स में विशाल उलझ गए हैं। यह कमी उनकी पिछली फिल्मों में भी रही है।वे उम्दा किस्म के मजबूत और रंगीन धागों का इस्तेमाल करते हैं,डिजाईन भी आकर्षक चुनते हैं,किंतु बुनावट में कसार रह जाती है.

Friday, August 7, 2009

दरअसल:ब्लॉग से ट्विटर तक

-अजय ब्रह्मात्मज

अमिताभ बच्चन दुनिया में कहीं भी रहें, वे नियमित रूप से ब्लॉग लिखते हैं। बीमारी के चंद दिनों को छोड़ दें, तो वे रोजाना एक पोस्ट करते हैं। उनके पोस्ट में मुख्य रूप से घर-परिवार की बातें, शूटिंग चर्चा, मीडिया की आलोचना और दैनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार रहते हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग के पाठक को विस्तारित परिवार की संज्ञा दी है। वे उनकी राय, आलोचना और टिप्पणियों पर गौर करते हैं। अपने पाठकों के प्रति वे जितने मृदु हैं, मीडिया के प्रति उतने ही कटु। अगर किसी ने कुछ उल्टा-सीधा लिख दिया, तो वे ब्लॉग पर उसका जिक्र करते हैं। मीडिया के रवैये और व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। इसके बावजूद उनका ब्लॉग पठनीय होता है।
इधर रामगोपाल वर्मा नियमित हो गए हैं। उनकी फिल्में और व्यक्तित्व की तरह उनका ब्लॉग भी थोड़ा रहस्यपूर्ण और अनिश्चित है। उनके ब्लॉग की कोई निश्चित रूपरेखा नहीं है। अपने जीवन के अंश, अनुभव और फिल्मों के अलावा इन दिनों वे सिनेमा के तकनीकी पक्षों की भी बात कर रहे हैं। उनके ब्लॉग पर पाठकों के सवाल के दिए गए जवाब रूखे और बेलाग होते हैं। उन्हें पढ़ते हुए मजा आता है। साथ ही पता चलता है कि रामू वास्तव में विनोदी स्वभाव के व्यक्ति हैं। वे कठोर होने का दिखावा करते हैं।
शाहरुख खान पर टिप्पणी करने के बाद हुई आलोचना से आमिर खान संयमित हो गए हैं। वे चंद वाक्यों में तथ्यात्मक बातें करते हैं और पाठक से ज्यादा लाड़-प्यार नहीं दिखाते। वे अपने ब्लॉग पर नियमित नहीं हैं, लेकिन कई बार उनसे संबंधित ताजी जानकारियां उनके ब्लॉग से मिलती हैं। जैसे कि हाल ही में उन्होंने बताया कि किरण राव की फिल्म धोबी घाट में वे मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने हिलेरी से अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया है। सलमान खान भी अनियमित हैं। उनकी बातों और लेखन में उनके व्यक्तित्व की तरह ही निरंतरता नहीं रहती। शाहरुख ने खुद को इन दुनियावी संप्रेषणों से ऊपर मान लिया है। वे इन दिनों इंटरव्यू भी देते हैं, तो किसी ऋषि की मुद्रा में रहते हैं, जिसने जीवन के सत्य को समझ लिया है।
हां, मनोज बाजपेयी लगातार लिख रहे हैं। अच्छी बात है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के वे ऐसे अकेले कलाकार हैं, जो हिंदी में अपना ब्लॉग लिखते हैं। उन्होंने पिछले दिनों जिक्र किया था कि वे सिर्फ लिखते ही नहीं, पढ़ते भी हैं। वे पाठक के सवाल और जिज्ञासाओं के जवाब भी देते हैं। अन्य स्टार नियमित नहीं हैं। शिल्पा शेट्टी, बिपाशा बसु, मल्लिका शेरावत, सेलिना जेटली और कंगना राणावत ने भी अपने वेबसाइट आरंभ किए हैं, लेकिन वही ढाक के तीन पात.., दो-चार पोस्ट लिखने के बाद उन्हें कुछ नया लिखने की फिक्र नहीं रहती।
इधर ट्विटर का चलन तेजी से बढ़ा है। ट्विटर भी सोशल नेटवर्किंग का अच्छा माध्यम है। इसमें सिर्फ 140 अक्षरों में व्यक्ति कुछ लिख सकता है। यह सुविधा फेसबुक से थोड़ी अलग है। अभी प्रियंका चोपड़ा, करण जौहर, गुल पनाग और मल्लिका शेरावत इस पर काफी एक्टिव हैं। वे अपनी गतिविधियों की ताजा जानकारी देते हैं और कभी-कभार किसी फालोअर की जिज्ञासा भी शांत करते हैं। अपनी व्यस्त जिंदगी के कुछ ऐसे क्षणों का इस्तेमाल वे इस कार्य में करते हैं, जिसका कोई दूसरा उपयोग वे नहीं कर सकते। अमूमन गाड़ी में बैठकर कहीं जाते समय वे मोबाइल से ट्विटर पर अपने संदेश भेजते हैं। दरअसल, ब्लॉग लेखन हो या ट्विटर पर 140 अक्षरों की पोस्ट.., फिल्म स्टारों के लिए यह आत्मरति और प्रगल्भता ही है। वे इतने अकेले और सब से कट जाते हैं कि उनके लिए अपने उद्गार और भाव व्यक्त करने का यह सुंदर एकतरफा माध्यम हो गया है। यहां उनसे कोई बहस नहीं कर सकता और न ही कोई टोक या रोक सकता है। अफसोस की बात है कि अभी कोई भी स्टार कला और फिल्म पर गंभीर बातें नहीं करता। वे तो अपने अनुभव शेयर करने में भी संकोच करते हैं। ज्यादातर लेखन में साफ झलकता है कि वे अपने पाठकों से श्रेष्ठ हैं। यही वजह है कि ब्लॉग और ट्विटर लेखन के बावजूद स्टार और प्रशंसकों के बीच आत्मीय रिश्ता नहीं बन पा रहा है।

Thursday, July 2, 2009

तस्वीरों में 'कमीने'
















विशाल भारद्वाज की फ़िल्म 'कमीने' की चर्चा अभी से हो रही है.चवन्नी के पाठकों के लिए कुछ तस्वीरें.क्या ये तस्वीरें कुछ कहती हैं?