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Friday, March 22, 2013

संजय दत्‍त

-अजय ब्रह्मात्मज
 नि:स्संदेह संजय दत्त की लोकप्रियता में बीस सालों के बाद भी कोई कमी नहीं आई है। पिछली बार अप्रैल, 1993 में जेल जाने के समय वे अपने करियर के उत्कर्ष पर थे। साजन और यलगार जैसी हिट फिल्मों से पॉपुलर स्टार की अगली कतार में खड़े संजय दत्त की खलनायक रिलीज होने वाली थी। मुंबई बम धमाके में उनकी संलग्नता की खबर आने के बाद ही उनकी गिरफ्तारी की संभावना बढ़ गई थी। फिर भी उनके आशावादी मित्र सोच रहे थे कि पिता सुनील दत्त अपनी साख का इस्तेमाल करेंगे और उन्हें गंभीर सजा से बचा लेंगे। सुनील दत्त ने हमेशा संजू बाबा को सही राह पर लाने की कोशिश की। उनके दुर्गुणों को जानते हुए भी वे उनसे बेइंतहा प्यार करते रहे। 1993 में वे चाहकर भी अपने बेटे को जेल जाने से नहीं बचा सके क्योंकि तब उनका बेटा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया गया था।
फिर भी पिता होने के नाते उन्होंने संजय को जरूरी भावनात्मक संबल दिया। कोर्ट के चक्कर से लेकर जेल जाने के बाद उनकी रिहाई और उन्हें सामान्य जिंदगी में लाने की हर कोशिश की। कोर्ट में हथियार रखने का मामला साबित होने के बाद भी उनके प्रति फिल्म बिरादरी की सहानुभूति में कोई कमी नहीं आई थी। ज्यादातर यही मानते थे कि उन्होंने परिवार की सुरक्षा के लिए भावनात्मक जल्दबाजी में एक गलत निर्णय ले लिया था। पिछली बार जेल जाने से उनकी कई निर्माणाधीन फिल्में रुक गई थीं। उनमें से कुछ तो बन भी नहीं सकीं। एक अनुमान के मुताबिक तब फिल्म इंडस्ट्री को लगभग 60 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।
1995 में जमानत पर जेल से छूटने पर फिल्म इंडस्ट्री ने उनका जोरदार स्वागत किया। उन्हें धड़ाधड़ फिल्में मिलीं। अपनी इस दूसरी पारी में उन्होंने दाग: द फायर, वास्तव और मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसी फिल्में कीं। मुन्नाभाई एमबीबीएस ने उनकी धूमिल छवि को भी साफ किया। संजू बाबा फिर सभी के चहेते बन गए। वह अपनी पीढ़ी के उन गिने-चुने अभिनेताओं में हैं, जिनका बाजार अब तक बरकरार है। ताजा उदाहरण, उनकी पिछली रिलीज जिला गाजियाबाद है। सिर्फ उनकी मौजूदगी की वजह से इस फिल्म ने औसत से बेहतर कलेक्शन किया।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के वक्त उनकी चार फिल्मों की शूटिंग चल रही है। हाल में वे राजस्थान से राजकुमार हिरानी की फिल्म 'पीके' की शूटिंग कर लौटे थे। इस फिल्म में वे आमिर खान के साथ महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। सूत्रों के मुताबिक इस फिल्म के महत्वपूर्ण हिस्सों की शूटिंग अभी बाकी है। उनकी फिल्म 'पुलिसगीरी' में भी थोड़ा काम बाकी है। यह फिल्म 14 जून को रिलीज होने वाली है। हालांकि जंजीर के निर्माता बता रहे हैं कि उनकी फिल्म इस सजा से नहीं अटकेगी, लेकिन अंदरूनी खबरों के मुताबिक फिल्म में उनका काम बाकी है।
एक ही तरीका है कि एक महीने की मिली मोहलत में बचे हिस्सों को जल्दी-जल्दी शूट कर लिया जाए या फिर उनके किरदार में फेरबदल कर दिया जाए। राजस्त्रह्नमार गुप्ता की फिल्म 'घनचक्कर' में उनकी सिर्फ झलक दिखनी है। इसलिए ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। करन जौहर की 'उंगली' के बारे में कहा जा रहा है कि उसमें संजय दत्त का काम खत्म हो चुका है। पिछले दिनों मुन्नाभाई. सीरीज की तीसरी कड़ी के लिए जॉली एलएलबी के निर्देशक सुभाष कपूर के नाम की खबर आई थी। निश्चित ही यह फिल्म निकट भविष्य में फ्लोर पर नहीं जा पाएगी। सुभाष मानते हैं कि संजय के बगैर मुन्नाभाई. सीरिज की कल्पना नहीं की जा सकती।
संजू बाबा के अब जेल जाने से मोटे अनुमान के मुताबिक लगभग 130 करोड़ का निवेश अधर में अटकेगा। यह राशि उन फिल्मों में लगे पैसे पर आधारित है जिनकी शूटिंग चल रही है। उनके जेल जाने से कई प्रोजेक्ट तैयारी पर ही रोकने पड़ेंगे। पिछली बार जेल से लौटने के बाद संजय ने अपने जीवन को संवारा और जिम्मेदार पारिवारिक व्यक्ति के तौर पर उभरे। उन्होंने मान्यता से शादी की, जिनसे उनके दो बच्चे हैं।उन बच्चों को क्या पता था कि उनके पापा ने उनके जन्म के पहले ऐसा संगीन अपराध किया था, जिसकी सजा अब मिली। दोनों बच्चे फिल्म बिरादरी के किसी भी सदस्य से ज्यादा अपने पिता की कमी महसूस करेंगे।

Friday, May 18, 2012

फिल्‍म समीक्षा : डिपार्टमेंट

डिपार्टमेंट: कांचदार  हिंसा-अजय ब्रह्मात्‍मज
राम गोपाल वर्मा को अपनी फिल्म डिपार्टमेंट के संवाद चमत्कार को नमस्कार पर अमल करना चाहिए। इस फिल्म को देखते हुए उनके पुराने प्रशंसक एक बार फिर इस चमत्कारी निर्देशक की वर्तमान सोच पर अफसोस कर सकते हैं। रामू ने जब से यह मानना और कहना शुरू किया है कि सिनेमा कंटेंट से ज्यादा तकनीक का मीडियम है, तब से उनकी फिल्म में कहानियां नहीं मिलतीं। डिपार्टमेंट में विचित्र कैमरावर्क है। नए डिजीटल  कैमरों से यह सुविधा बढ़ गई है कि आप एक्सट्रीम  क्लोजअप  में जाकर चलती-फिरती तस्वीरें उतार सकते हैं। यही कारण है कि मुंबई की गलियों में भीड़ में चेहरे ही दिखाई देते हैं। कभी अंगूठे  से शॉट  आरंभ होता है तो कभी चाय के सॉसपैन  से ़ ़ ़ रामू किसी बच्चे  की तरह कैमरे का बेतरतीब इस्तेमाल करते हैं।
डिपार्टमेंट रामू की देखी-सुनी-कही फिल्मों का नया विस्तार है। पुलिस महकमे में अंडरव‌र्ल्ड से निबटने के लिए एक नया डिपार्टमेंट बनता है। संजय दत्त इस डिपार्टमेंट के हेड हैं। वे राणा डग्गुबाती को अपनी टीम में चुनते हैं। दोनों कानून की हद से निकल कर अंडरव‌र्ल्ड के खात्मे का हर पैंतरा इस्तेमाल करते हैं। डिपार्टमेंट में अपराधियों को मारने में कांच का प्रचुर इस्तेमाल होता है। खिड़की, टेबल,  आईना,  दीवार, बोटल आदि कांच की वस्तुओं पर अपराधियों को पटका जाता है। कांच के चमकने  और टूटने से हिंसक पाश्‌र्र्व संगीत भी बनता है। कह सकते हैं कि डिपार्टमेंट में कांचदार  हिंसा है।
डिपार्टमेंट में अमिताभ बच्चन  भी हैं। उनकी कलाई से घंटी बंधी हुई है। वह उनके साक्षात्कार की निशानी है। गौतम बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे आत्मज्ञान हुआ था। क्या अमिताभ बच्चन  भी आत्मज्ञान और साक्षात्कार शब्दों के भिन्न अर्थ नहीं जानते? उन्हें सही शब्द की सलाह तो देनी चाहिए थी? फिल्म में दो हिंसक किरदारों के रूप में अभिमन्यु सिंह और मधुशालिनी  हैं। दोनों का हिंसक प्रेम जुगुप्सा  पैदा करता है। उन्हें इसी जुगुप्सा के लिए रामू ने रखा होगा, इसलिए वे अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं। संजय दत्त और अमिताभ बच्चन  की बुरी फिल्मों में डिपार्टमेंट गिनी  जाएगी। राना डग्गुबाती  को अभी हिंदी उच्चारण  पर काफी काम करना होगा। घर और गर में फर्क होता है। रामू, अमिताभ बच्चन  और संजय दत्त के होने के बावजूद यह फिल्म पूरी तरह निराश करती है।
रेटिंग- * एक स्टार

Saturday, October 8, 2011

फिल्‍म समीक्षा : रासकल्‍स

रास्कल्स: बड़े पर्दे पर बदतमीजी-

बड़े पर्दे पर बदतमीजी

अजय ब्रह्मात्‍मज

सफल निर्देशक अपने करियर की सीढि़यां उतरते समय कितने डगमगाते और डांवाडोल रहते हैं? कम से कम डेविड धवन के उतार को समझने केलिए रास्कल्स देखी जा सकती है। उन्हें संजय दत्त और अजय देवगन जैसे लोकप्रिय अभिनेताओं के साथ कंगना रनौत भी मिली हैं, लेकिन फिल्म भोंडे़पन और अश्लीलता से बाहर नहीं निकल पाती। मुमकिन है डेविड धवन के निर्देशन में ऐसा उतार पहले भी आया हो, लेकिन वे साधारण किस्म की मनोरंजक कामेडी फिल्मों के उस्ताद तो थे।

चेतन और भगत दो ठग हैं। सचमुच पॉपुलर लेखक चेतन भगत फिल्म इंडस्ट्री में मजाक के पात्र बन चुके हैं। इन किरदारों का नाम सलीम और जावेद या जुगल और हंसराज रख दिया जाता तो भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता। चेतन और भगत एक-दूसरे को ठगते और क्लाइमेक्स में ठगी में पार्टनर बनते हुए अपने-अपने तरीके से कंगना रनौत को फांसने का प्रयास करते हैं। लतीफे, चुहलबाजी, छेड़खानी और ठगी को लेकर बनी यह फिल्म बड़े पर्दे पर जारी बड़े स्टारों की बदतमीजी का ताजा नमूना है। अनुभवी और सीनियर स्टार संजय दत्त और अजय देवगन की कंगना रनौत के साथ की गई ऊलजलूल और अश्लील हरकतें स्क्रिप्ट से अधिक वास्तविक रूप में नजर आती हैं। ताज्जुब होता है कि कंगना रनौत इस प्रकार की शारीरिक जोर-जबरदस्ती के लिए कैसे राजी हो गई?

रास्कल्स हिंदी में बनी ताजा फूहड़ फिल्म है। पता चलता है कि हमारे स्टारों और स्टार डायरेक्टर की कॉमेडी की सोच कितनी निरर्थक और अश्लील हो चुकी है। रास्कल्स जैसी फूहड़ भूल पर संबंधित व्यक्तियों को शर्मिदा होना चाहिए।

रेटिंग- * एक स्टार