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Friday, November 19, 2010

लता मंगेशकर को मिले सम्मान के बहाने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले सप्ताह बुधवार की शाम को मुंबई में एक पुरस्कार समारोह में लता मंगेशकर को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें उनकी छोटी बहन आशा भोसले और ए आर रहमान ने सम्मानित किया। इस अवसर पर रहमान ने अपनी मां का बताया एक संस्मरण सुनाया कि उनके पिता रोज सुबह लता मंगेशकर की तस्वीर का दर्शन करने के बाद ही संगीत की रचना करते थे। उन्होंने प्रकारांतर से लता मंगेशकर की तुलना सरस्वती से की। सम्मान के पहले समारोह में आए संगीतकारों ने उनके गीत एक प्यार का नगमा है.. गाकर उन्हें भावभीनी स्वरांजलि दी। शंकर महादेवन ने गीत गाया, तो शांतनु मोइत्रा और उत्तम सिंह ने गिटार और वायलिन बजाकर संगीतपूर्ण संगत दी। दर्शक भी भावविभोर हुए। सम्मान के इस अवसर पर भी आशा भोसले ने अपनी शिकायत दर्ज की। उन्होंने कहा कि दीदी कभी मेरे गाने नहीं सुनतीं। आज भी वे देर से आई। आशा की शिकायत पर हंसते हुए लता ने पलट कर कहा कि तू हमेशा झगड़ती है, लेकिन मैं तुम्हें पहले की तरह आज भी माफ करती हूं। आशा ने तुरंत जवाब दिया कि माफ तो करना ही पड़ेगा। मां तो माफ करती ही है। इस नोकझोंक में थोड़ी देर के लिए लगा कि मामला तूल पकड़ेगा और दोनों बहनों की लड़ाई सार्वजनिक हो जाएगी, लेकिन लता जी ने बड़प्पन दिखाते हुए प्रसंग बदल दिया।

लता मंगेशकर ने कहा कि लाइफटाइम अचीवमेंट अवश्य दें, लेकिन उसके बाद आर्टिस्ट को भूल न जाएं। उसे काम दें और उसे विकास करने के नए अवसर दें। कहीं लता मंगेशकर अपने दर्द का बयान तो नहीं कर रही थीं? दशकों से हिंदी फिल्मों की गायकी में उनका एकछत्र साम्राज्य रहा। उनके सामने किसी और गायिका को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। केवल उनकी छोटी बहन आशा भोंसले ही उनके आसपास नजर आती हैं। संगीत के गलियारे में लोग दबी आवाज में दोनों बहनों के मनमुटाव की बातें करते हैं। आज लता मंगेशकर गायकी की जिस ऊंचाई पर बैठी हैं। वहां तक पहुंचने का सपना भी नई गायिकाएं नहीं देख सकतीं। किसी में न उतनी वैरायटी है और न वे लगातार गा पा रही हैं। सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल के बाद किसी गायिका की पहचान नहीं बन पाई है। ऐसे माहौल में नई से नई गायिकाओं के प्रति संगीतकारों के रुझान को देखते हुए ही लता मंगेशकर ने यह बात कही होगी। कहीं न कहीं वे आज फिल्मों में न गा पाने की अपनी तकलीफ जाहिर कर रही थीं।

गौर करें, तो हिंदी फिल्मों में गायकी तेजी से बदली है। अभी संगीतकार किसी एक गायक पर निर्भर नहीं करते। यह भी देखा जा रहा है कि एक गायक फिल्म के सभी गाने नहीं गाता। गायकों को पहचान के संकट से गुजरना पड़ रहा है।

अभी पॉपुलर स्टारों के साथ गायकों का एसोसिएशन नहीं होता है। वे दिन गए, जब मुकेश का गाना सुनते ही एहसास हो जाता था कि इसे पर्दे पर राज कपूर ने ही गाया होगा। इसी प्रकार दिलीप कुमार की आवाज मोहम्मद रफी और देव आनंद की आवाज किशोर कुमार थे। अभी किसी पॉपुलर सितारे के लिए किसी खास गायक की जरूरत महसूस नहीं होती। जो गायक पॉपुलर हो जाए, उसकी आवाज सभी सितारों के लिए इस्तेमाल की जाने लगती है। उदाहरण के लिए, राहत फतेह अली खान सभी की आवाज बन चुके हैं। उन्हें किसी एक स्टार से नहीं जोड़ा जा सकता।

लता मंगेशकर या आशा भोसले की तरह आज किसी गायिका या गायक को मौका नहीं मिल सकता। अभी स्वर से ज्यादा ध्यान धुन पर रहता है और आर्केस्ट्रा इतना ज्यादा व ऊंचा होता है कि गायकों की आवाज दब जाती है। गायक भी अधिक मेहनत करते नजर नहीं आते। उनके हिंदी और उर्दू के उच्चारण में सफाई नहीं रहती। इधर अंग्रेजी बोलों का चलन बढ़ा है। गौर करें, तो सारे गायक अपनी अंग्रेजी के सही उच्चारण पर बहुत ध्यान देते हैं और हिंदी-उर्दू के प्रति बेपरवाह रहते हैं। अगर ये गायक लता मंगेशकर जैसा नाम और काम करना चाहते हैं, तो निश्चित ही उन्हें लगन बढ़ानी होगी।

लता मंगेशकर को मिले सम्मान के बहाने


Monday, November 15, 2010

मुझे आड़े-टेढ़े किरदार अच्छे लगते हैं-संजय लीला भंसाली

-अजय ब्रह्मात्‍मज

संजय लीला भंसाली की 'गुजारिश' में रहस्यात्मक आकर्षण है। फिल्म के प्रोमो लुभावने हैं और एहसास हो रहा है कि एक खूबसूरत, संवेदनशील और मार्मिक फिल्म हम देखेंगे। संजय लीला भंसाली अपनी पीढ़ी के अलहदा फिल्ममेकर हैं। विषय, कथ्य, क्राफ्ट, संरचना और प्रस्तुति में वे प्रचलित ट्रेंड का खयाल नहीं रखते। संजय हिंदी फिल्मों की उस परंपरा के निर्देशक हैं, जिनकी फिल्में डायरेक्टर के सिग्नेचर से पहचानी जाती हैं।

- आप की फिल्मों को लेकर एक रहस्य सा बना रहता है। फिल्म के ट्रेलर और प्रोमो से स्पष्ट नहीं है कि हम रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन को किस रूप और अंदाज में देखने जा रहे हैं। क्या आप 'गुजारिश' को बेहतर तरीके से समझने के सूत्र और मंत्र देंगे?

0 'गुजारिश' मेरी आत्मा से निकली फिल्म है। मेरी फिल्मों में नाप-तौल नहीं होता। मैं फिल्म के बारे में सोचते समय उसके बाक्स आफिस वैल्यू पर ध्यान नहीं देता। यह भी नहीं सोचता कि समीक्षक उसे कितना सराहेंगे। मेरे दिल में जो आता है, वही बनाता हूं। बहुत मेहनत करता हूं। ढाई सालों के लिए दुनिया को भूल जाता हूं। फिल्म के विषय के अनुसार जो दृश्य और ध्वनियां दिमाग में आती हैं, उन्हें संयोजित करता रहता हूं।

'गुजारिश' आज के समय की फिल्म है। एक क्वाड्रोप्लेजिक व्यक्ति की कहानी है। गर्दन के नीचे उसे लकवा मार गया है। उसकी उंगलियां तक काम नहीं करतीं। चौदह सालों में उसकी स्थिति बिगड़ती ही जा रही है। इस बीमारी से ग्रस्त होने के पहले वह जादूगर था। वह शारीरिक रूप से बंध जाने पर भी अपने जीवन में जादू खोजने की कोशिश करता है। वह अपनी खोज से लोगों का जिंदगी के प्रति नजरिया बदल देना चाहता है। वह मशीनों के सहारे जीना नहीं चाहता, लेकिन उसने प्यार पा लिया है। वह उस प्यार को जीना चाहता है। चौदह सालों तक सेवा करने वाली नर्स से उसका एक रिश्ता बन चुका है। मेरा मानना है कि ट्रेलर में सिर्फ संकेत देना चाहिए। बता नहीं देना चाहिए कि क्या कहानी है? 30, 60, 90 सेकेंड के ट्रेलर में आप फिल्म का सार कैसे समझ सकते हैं? फिल्म का ट्रीटमेंट और टेंपरामेंट समझ में आ जाए तो काफी है। दर्शक खुद को फिल्म के लिए तैयार कर लेता है।

- क्या फिल्मों का फर्क ट्रीटमेंट से ही होता है?

0 बिल्कुल ट्रीटमेंट ही डायरेक्टर का पर्सनल स्टेटमेंट होता है। आप 'देवदास' को ही देखें। पीसी बरूआ ने एक तरह से बनायी। बिमल राय ने उससे अलग बनाई। मेरी देवदासउन दोनों से अलग है और अनुराग कश्यप की मुझ से अलग है। हमारे बीच ट्रीटमेंट का फर्क है। बिमल राय जी हमेशा श्रेष्ठ रहेंगे। हम उनके पैर छुएंगे, लेकिन हमारा ट्रीटमेंट अलग है। वी.शांताराम, राज कपूर, महबूब खान...सभी की स्टाइल अलग है। ट्रीटमेंट ही डायरेक्टर की पहचान होती है। ट्रीटमेंट में कैमरे की प्लेसिंग, सौंग की रिकार्डिंग और पिक्चराइजेशन, कैरेक्टर पेश करने का एटीट्यूड...इन सब से सिग्नेचर तय होता है। मुझे आड़े-टेढ़े किरदार अच्छे लगते हैं, जिनमें तेवर होता है, जिंदगी के प्रति गुस्सा होता है, लेकिन प्यार भी होता है। मुझे रंगीन और रंगीले किरदार चाहिए। 'ब्लैक' की मिशेल देख नहीं सकती, लेकिन बात और तेवर मजबूत हैं। मेरे कैरेक्टर टेंपरामेंटल होते हैं।

- ऐसा लगता है कि आप अपनी फिल्मों को दृश्यों और ध्वनियों में पहले सजा लेते हैं। आम दर्शक मुख्य रूप से कहानी और एक्शन पर ध्यान देता है, जबकि आप संवेदनाओं और दृश्यात्मक विधानों में ज्यादा मन लगाते हैं। कई बार यह सवाल उठता है कि संजय प्रचलित किस्म और शैली की फिल्में क्यों नहीं बनाते?

0 मुझे लगता है कि किसी भी कहानी को अपने ढंग से कहूं तभी तो मेरे कुछ बनाने और कहने का मतलब है। दोस्तोवस्की की कहानी को मैंने अपनी तरह से सांवरियामें रखा। दोस्तोवस्की की कहानी टाइमलेस है। मैं उसे समय में कैसे बांधूं। वह स्टोरी हर समय प्रासंगिक रहेगी। समय के साथ चलना क्या होता है? 'सांवरिया' में मुझे आज की कहानी कहनी थी। आप किसी पेंटर पर कैसे दबाव डाल सकते हैं कि उसकी हर पेंटिंग समय के साथ चले और उसके बारे में बताए। वास्तव में यह हमारे देखने का नजरिया है। हम अपनी सीमाएं फिल्मों और रचनाओं में खोजने-लादने लगते हें। लता जी का गाया 'आएगा आने वाला' आज भी ताजा है। फिल्म हमारा इंटरपटेशन है। समय के साथ फिल्म, संगीत, पेंटिंग को बांधना या देखना ठीक नहीं है। गुजारिशबिल्कुल आज की फिल्म है। लोगों को लगता है कि मेरी रूह बूढ़ी हो गई है या मैं बुजुर्ग व्यक्ति हूं। मैं समय के पार चला गया हूं। अस्सी-नब्बे साल का हो गया है। यह इंप्रेशन बन गया है। सच यही है कि मेरे कैरेक्टर कंफर्टेबल जोन में नहीं रहते। मेरी वॉयस अलग है। मेरे गाने भी पापुलर फार्मेट के नहीं होते। मैं हिट होने के लिए म्यूजिक नहीं चुनता। हम दिल दे चुके सनमका अलबम दो महीनों तक नहीं बिका था। उसके बाद उसकी बिक्री को रोकना मुश्किल हो गया। मेरी फिल्मों में गुब्बारे, पोमपोम, डिस्को डांस नहीं दिखेगा। लेकिन क्या आज का समय यही सब है। मेरी फिल्म में टाइमलेस इमोशन रहता है। पुराने वैल्यू और वर्चुज मिलेंगे। अच्छे आर्ट के गुण मिलेंगे। मुझ पर जिन मूल्यों और गुणों का असर है, वह आर्ट डायरेक्शन, डॉयलॉग, म्यूजिक में आता है। मुझे पर बिमल राय और वी.शांताराम का बहुत असर है। मैं उनकी तरह की विजुअल फिल्में बनाना चाहता हूं। उनकी लिगेसी को मैं चलाए रखना चाहता हूं। मैं इसकी कोशिश जरूर करता हूं। औकात है कि नहीं, यह लोग बताएंगे। शायद उस लिगेसी की वजह से लोगों को लगता है कि मैं पुराने किस्म का डायरेक्टर हूं। मैं पीरियड में थोड़े ही जीता हूं। गुजारिशका संगीत आप को पुराना लगता है क्या? '100 ग्राम जिंदगी' का एक्सप्रेशन देखें? सारा संगीत गिटार पर आधारित है।

- आप के कटु आलोचक भी मानते हैं कि आपकी फिल्मों में विजुअल ट्रीट मिलता है। सौंदर्य का वैभव दिखता है...

0 सिनेमा एक विजुअल माध्यम है। मेरी कोशिश होनी चाहिए कि मैं विजुअली, सिनैमेटिकली और साउंड वाइज आपको एक इमोशन तक ले जाऊं। वही मेरी सफलता होगी। खुशी, गम, हंसी...सारे दृश्य आपके दिमाग में बैठ जाएं। 'ब्लैक' और 'हम दिल दे चुके सनम' के सीन लोगों को याद हैं। अगर मैं दर्शकों को विजुअली ओवरपावर नहीं करता, मोहित नहीं करता तो मुझे फिल्म नहीं बनानी चाहिए। मुझे कहानी लिखनी चाहिए। रेडियो पर जाकर सुनानी चाहिए अपनी कहानी। मेरी फिल्मों में स्टोरी तो रहती ही है। स्टोरी के बगैर फिल्म नहीं बन सकती।

- आप की फिल्मों में इमोशन और एक्सप्रेशन के लिए सिर्फ संवादों का सहारा नहीं लिया जाता। उसमें बैकग्राउंड, म्यूजिक, प्रापर्टी...बाकी चीजें भी बोल रही होती हैं। हम अचानक थोड़े अलर्ट हो जाते हैं ...

0 हमलोग ऐसी कद्र के भूखे होते हैं। अगर हर दर्शक इतना ध्यान दे तो उसे बहुत मजा आएगा। मैं अपनी तैयारी के बारे में बताऊं तो एक साल कहानी पर काम करता हूं। उस काम के समय भी म्यूजिक चालू रहता है। म्यूजिक मूड के हिसाब से बदलता है, लेकिन मुझे हमेशा म्यूजिक चाहिए। कहानी के सीन को म्यूजिक और दृश्य में सोचता हूं। उसमें आर्ट डायरेक्टर, कास्टयूम डिजाइनर, सिनेमेटोग्राफर मदद करते हैं। हमलोग बिल्डिंग बनाने वाले मजदूर से दस गुना ज्यादा मेहनत करते हैं। मैं स्टोरी बोर्ड में फिल्म को नहीं बांधता। मेरी फिल्म का एक ढांचा रहता है। स्टोरी बोर्ड पहले जरूर रहता है, लेकिन शूट पर जाते समय उसे फाड़ कर फेंक देता हूं। जब सेट पर सब मौजूद रहते हैं तो सब कुछ नया हो जाता है ।आप को बताऊं कि डेढ़-दो साल की सारी मेहनत और बातचीत किसी सीन को करते समय टक से याद आ जाती है। उस वक्त जो महसूस होता है, वही करता हूं। कई बार कैमरामैन से बहस होती है कि पहले कुछ और बताया था...अभी कुछ और कर रहा हूं। कैमरामैन को फिर से मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन उस से जान आ जाती है। मैं एक्टर को स्क्रिप्ट में नहीं बांधता। कुछ चीजें तैयार होती हैं, लेकिन कुछ चीजें साफ बदल जाती है। लाइट जलने, कॉस्ट्यूम पहनने, कैमरा ऑन होने और एक्टर के कैरेक्टर में आने के बाद कई चीजें बदल जाती हैं। जो क्रिएट होता है, वह उस क्षण में सोचा गया होता है। आप इमैजिन करें ना कि जब आप रितिक और ऐश्वर्या से कोई सीन आफिस में डिस्कस कर रहे हैं और उसे शूट कर रहे हैं...दोनों में बहुत फर्क आ जाता है। कोरियोग्राफी ऑफ सीन पर मेरा ज्यादा ध्यान रहता है। वह आप पहले से तय नहीं कर सकते। किरदार किधर से आया, कहां ठहरा और फिर से किधर गया। कैमरा घूमा...सीन एंड कैसे होगा।य़ह सब अहम है। गुरुदत्त की फिल्मों का हर सीन मुझे कोरियोग्राफ्ड लगता है। वे और वी शांताराम...दोनों का काम ध्यान से देखें। वे कैरेक्टर के मूवमेंट की अहमियत समझते थे। शॉट डिवीजन देखें उनका...शॉट का संयोजन - उनकी फिल्मों के हर सीन में एक बात रहती है। स्टेटमेंट रहता है।

- आप की फिल्मों को देखते हुए कई बार लगता है कि दृश्य में एक्टर चूक गए या मोमेंट ऑफ सीन को ठीक से छू नहीं सके। क्या आप को भी लगता है कि एक्टर कई बार आप की कल्पना को पर्दे पर नहीं उतार पाते। आप को मिले हुए शॉट से ही काम चलाना पड़ता है...

0 क्या आप को ऐसा लगता हे? मुझे जब तक अपनी पसंद का शॉट नहीं मिल जाता, मैं तब तक एक्टर को नहीं छोड़ता। कई बार ऐसा लगता है कि एक्टर ने सब कुछ दे दिया। अब उस से आगे नहीं जा सकता तो छोड़ देता हूं। कई बार यह भी होता है कि एक्टर बेहतर दे चुका होता है और हम गलत शॉट चुन लेते हैं। ब्लैकके एक सीन में रानी मां को फोन करती है कि मैं फेल हो चुकी हूं। उस सीन का रानी ने पहला टेक कमाल का दिया था, लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा। फिर मैंने छह टेक लिए। उसने छह टेक दिल लगा कर दिए, लेकिन मुझे लगा कि मजा नहीं आ रहा है। फिर रानी ने कहा कि मैंने पहले ही शॉट में सब दे दिया था, तुम देख नहीं पाए या कैसे नहीं देखा? मुझे छह टेक के बाद लगा कि और कुछ नहीं हो सकता। बाद में एडीटिंग टेबल पर देखा तो उसका पहला ही शॉट सबसे अच्छा था। कभी-कभी मैं नहीं देख पाता। मैं तो ज्यादा लालची हूं। मेरे असिस्टेंट पक जाते हैं और रिक्वेस्ट करते हैं कि अब अगला शॉट लो। कई बार मैं नहीं देख पाता। कई बार वे नहीं दे पाते और कई बार हम दोनों का सोचा नहीं हो पाता। बिल्कुल परफेक्ट काम हो जाए तो शायद मुझे रिटायर होना पड़ जाए। फिर खोज खत्म हो जाएगी। अभी तक की अपनी फिल्मों के हासिल से मैं संतुष्ट और खुश हूं। खामोशीसे पचास गुना ज्यादा मेहनत गुजारिशमें हुई है। मेरी मेहनत और बेहतर काम करने की ख्वाहिश बढ़ती जा रही है।

-तो कह सकते हैं कि आप अपने एक्टरों ये संतुष्ट हैं?

आप ही बताएं न कि ब्लैकमें अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी मुझे और क्या दे देते? उनके परफार्मेंस की ऊंचाई है उसमें। ग्रेट परफार्मेंस। 'गुजारिश' में रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन का अभिनय... वे अमर हो गए हैं। वे हमेशा याद किए जाएंगे इस फिल्म के लिए। मेरी अपेक्षा से ज्यादा उन्होंने दिया है। सलमान खान ने खामोशीमें स्क्रिप्ट से ज्यादा मुझे दिया। वह सब पेपर पर था ही नहीं। सलमान और सीमा विश्वास खामोशीको अलग ऊंचाई पर ले गए। मुझे खामोशीमें सीमा का परफार्मेंस मेरे सारे एक्टरों में सबसे ज्यादा पसंद है। मैं तो कैमरे से देखता रहता था। वह नाना के पीछे आउट फोकस में खड़ी रहती थी, लेकिन वहां भी कुछ करती रहती थीं। कोई डर या असुरक्षा नहीं कि इस सीन में फलां मुझे खा जाएगा कि पी जाएगा कि घोल जाएगा। सलमान का छोटा सा रोल था, लेकिन उनका परफार्मेंस देखिए। मुझे हमेशा एक्टरों का सपोर्ट मिला। वे मुझे प्यार करते हैं। मैं उनसे और उनके किरदारों से बहुत प्यार करता हूं। सारे किरदार मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है। उन फिल्मों के समय में उन एक्टरों से गहरा प्यार करता था। वे मेरे लिए सिंहासन पर रहते हैं। मैं मनीषा कोईराला, रानी मुखर्जी, ऐश्वर्या राय, शाहरुख खान से और बेहतर की मांग नहीं कर सकता ...उन्होंने अपना श्रेष्ठ दिया है। मैं कभी असंतुष्ट नहीं रहा। असंतुष्ट रहने पर सीन शूट ही करता रहूंगा।

- आप की फिल्मों में डायरेक्टर और एक्टर का मिलन बिंदु ढलान की तरफ लगता है। मेरे खयाल में वह उठान की तरफ होना चाहिए। एक्टर आप की कल्पना को ऊपर ले जाए...

0 मेरे विचार से एक्टर और डायरेक्टर एक ही ऊंचाई पर रहे तो फिल्म बेहतरीन बनती है। किसी एक के ऊपर या नीचे होने पर फिल्म कमजोर हो जाती है। दोनों समान धरातल पर मिलें।

- 'गुजारिश' में इच्छा मृत्यु (मर्सी किलिंग) का सवाल है। इस पर कुछ आपत्तियां भी की जा रही हैं। क्या आप को लगता है कि अपने यहां अभिव्यिक्त की पूरी आजादी नहीं मिल पाती...

0 अभिव्यक्ति की आजादी और उसकी मर्यादा तय करना तो एक लंबी बहस है। मेरा कहना है कि सिर्फ विषय पर आपत्ति न करें फिल्म देखने के बाद बात करें। अभिव्यक्ति की आजादी में इरादा और उद्देश्य स्पष्ट हो। हमें उसी आधार पर तय करना चाहिए। मेरे लिए ड्रामा और कंफ्लिक्ट चाहिए। इस बीमारी से ग्रस्त बहुत सारे लोग नहीं जीना चाहते हैं या इस तकलीफ से निकलना चाहते हैं। उनमें से बहुत सारे जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे जिंदा रहना चाहते हैं। कुछ रितिक के दोस्त भी बन गए हैं। रितिक ने उनके लिए बहुत कुछ किया है। उनकी जिंदगी बदल दी है। गुजारिशमें इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के द्वंद्व को समझने की कोशिश है। और फिर किस लेवल की बीमारी है...आप क्या-क्या कर सकते हैं...कर पाते हैं? 'गुजारिश' में 'देवदास' की तरह का नैरेटिव है। ड्रामा है और उसका विस्फोट है। इसमें खुशी और आनंद है, क्योंकि हीरो को प्यार मिल गया है। वह जिंदगी से प्यार करता है। जिंदगी से मिली चीजों से प्यार करता है। हिंदी फिल्म में यह अब तक नहीं आया है। बगैर देखे ही लोग आरोप लगा रहे हैं या बता हरे हैं कि फिल्म में तो ये है, वो है...। मैं तो चाहूंगा कि इस विषय पर बहस हो। हैदराबाद की एक मां ने अपने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की है? उनकी अड़चनों को भी समझना होगा। इस मुद्दे पर बात तो हो। हमें बहस और बातचीत के लिए खुला होना चाहिए। यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए। किसी की भी जिंदगी के साथ ऐसा हो सकता है? रातोंरात जिंदगी बदल जाती है। यह सौ ग्राम जिंदगी है। मीठी है और मिर्ची है। जितनी मिली है, उसे ही संभाल कर खर्च करना है। जिंदगी को प्यार करना जरूरी है। गुजारिशराजेश खन्ना की आनंदजैसी फिल्म है। मेरे लिए यह बहुत बड़ी चुनौती रही। जब तक सांस और जोश है, तब तक मैं नई दीवारों पर चढ़ता रहूंगा।

- इस फिल्म का संगीत खास है। आप पहली बार संगीत निर्देशन में कदम रख रहे हैं?

0 संगीत तो मेरे जीवन का हिस्सा है। मैं उसके बगैर जिंदा नहीं रह सकता। आंख खुलने के साथ मुझे संगीत चाहिए। हर जगह। गाड़ी चलाते, नहाते, काम करते, मीटिंग करते, लिखते-पढ़ते...हर समय संगीत चाहिए। कोई भी संगीत सुनता हूं। मेरे लिए हर साज और आवाज अजीज है। मैंने कोई सीमा नहीं रखी है। मेरी फिल्मों में संगीत बहुत महत्वपूर्ण रहता है। इस फिल्म का निर्माण म्यूजिकल रहा है। फिल्म से जुड़ा हर व्यक्ति म्यूजिकल था। हमने आज के मूड की रिकार्डिंग की है तो बांबे टाकीज के समय की शैली भी अपनायी है। इस फिल्म के संगीत ने मुझे बंधनरहित कर दिया है। आप पा रहे होंगे कि मैं खुश हूं और खूब बातें कर रहा हूं।

- बिल्कुल आप खुले और खिले दिल से बातें कर रहे हैं?

0 पहले मैं थोड़ा डरा और सकुचाया रहता था। गाता था लेकिन जोर से नहीं गाता था। केवल गुनगुनाता था। अब मैं कहीं भी गा लेता हूं। मेरा गला खुल गया है। रितिक, ऐश्वर्या और आदित्य राय कपूर भी गाते हैं। इस फिल्म की म्यूजिक रिलीज में आप ने देखा होगा कि सभी गा रहे थे।

- आप की तारीफ करूंगा कि इस तरह का समारोह मैंने कई सालों के बाद देखा। पुराने जमाने का माहौल याद आ गया...

0 मुझे मजा आता है। इस फिल्म के दरम्यान जिंदगी से मेरी मुलाकात हुई है। म्यूजिक रिलीज के समय मैं लगातार गा रहा था। सभी एक्टर और सिंगर मंच पर गाने आए। मैं खुद गया। सचमुच म्यूजिकल समारोह हो गया था।

- आप लेखन, निर्देशन, कोरियोग्राफी, एडीटिंग, म्यूजिक सब कुछ कर रहे हैं। क्या आप भी सत्यजित राय की तरह फिल्म निर्माण के सभी पहलुओं पर अपना संपूर्ण नियंत्रण चाहते हैं? आप को टोटल जीनियसकहा जा रहा है

0 उनसे तुलना करना उचित नहीं होगा। मैं अपनी परेशानी या प्रक्रिया बता सकता हूं। अब संगीत निर्देशन लें...मैंने एक भाव और धुन बताया और निर्देशक से मांगा तो लोगों ने कहना शुरू किया कि तुम जानते हो कि तुम्हें क्या चाहिए तो खुद क्रिएट करो। 'ब्लैक' के समय भी गाता रहता था। अमित जी ने सावधान किथा कि म्यूजिकल मत बना देना। हमारे दिमाग में क्रिएटर के तौर पर पच्चीस बातें चल रही होती हैं। अपनी बात रखना और उसकी मांग करना किसी और के काम में हस्तक्षेप नहीं है। मैं अपने कलाकारों और तकनीशियनों को पूरा मौका देता हूं। मैं एडीटिंग सीख कर आया हूं...अभी नाचना और एक्टिंग करना बाकी है। हर कलाकार के लिए लयकारी जरूरी है। पूरी टीम की लयकारी एक साथ होनी चाहिए। थोड़ा ऊंचा-नीचा हो तो फिल्म में फर्क आ जाता है।

- टीम के चुनाव पर पूरा ध्यान देते हैं?

0 मैं अपनी टीम काफी सोच-समझ कर चुनता हूं। फिल्म के सुर के हिसाब से सभी तकनीशियन को चलना चाहिए। इस फिल्म में कलाकारों का सहयोग भरपूर मिला है। स्क्रिप्ट से परफार्मेंस तभी बढ़ता है, जब एक्टर फिल्म के सुर में आ जाता है। मेहनत तो सभी करते हैं, लेकिन मेहनत और समझ के साथ लय और पागलपन होना चाहिए। वर्ना सभी मैकेनिकल दिखेंगे। मैं स्पॉनटैनिटी पर बहुत जरूर देता हूं। कोई अचानक कुछ कर दे और चौंका दे तो खुश होता हूं।

- आप झल्लाते किन बातों पर हैं?

0 कोई ढंग से काम न करे, ढीला करे तो मुझे गुस्सा आ जाता है ...इनएफिसियेंसी बर्दाश्त नहीं कर पाता। मैं बेटर या बेहतर कर पाने की गुंजाइश नहीं छोड़ पाता। मैं चाहता हूं कि सभी अपनी जिंदगी और काम को भरपूर इज्जत दें। काम को सबसे बेहतर तरीके से पेश करें तो आप की पर्सनैलिटी और सोच उभर कर सामने आती है। आप का सिग्नेचर दिखता है। पेशगी का आर्ट बढऩा चाहिए। मुझे नकारात्मक अप्रोच के लोग पसंद नहीं हैं। कोई निगेटिव अप्रोच से परेशान करे तो अच्छा नहीं लगता। अभी मेरा गुस्सा कम हो गया है। वैसे गुस्सा करना बुरी बात नहीं है। हम प्यार करते हैं या सिखाना चाहते हैं, इसलिए गुस्सा करते हैं। विनोद चोपड़ा हम पर गुस्सा करते थे। उन्होंने सिखाया है। पहले उस्ताद कितना मारते थे...वे सिखाना चाहते थे। आप को श्रेष्ठता तक पहुंचाना चाहते थे। मन रम जाए तो कोई कष्ट ही नहीं होता। फिल्म बनाने की मुश्किलों में हमें कोई तकलीफ नहीं होती।

- मीडियोक्रेटी के इस दौर में भी आप अपने पैशन पर कायम हैं और बगैर समझौता किए अपने किस्म की फिल्में बना रहे हैं। यह ताकत कहां से मिलती हैं...

0 मुझे साथी मिल जाते हैं, मुझे निर्माता मिल जाते हैं। इस बार रोनी स्क्रूवाला ने पहले स्क्रिप्ट पढ़ी। फिल्म के महत्व, प्रभाव और बिजनेश को समझने के बाद उसने हां की। मुझे लगता है कि आप ईमानदारी से काम करें तो इनवेस्टर मिल जाते हैं। फिल्म के बजट पर चलने वाली बहस के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। मैं अपने ढंग से शूट करता हूं और पूरे दिल से करता हूं। मैं अपने काम को लेकर पैशनेट हूं और अपने सहयोगियों से पैशन मांगता हूं। नहीं मिल पाता तो गुस्सा होता हूं। कोई गलती करेगा तो क्या करूंगा? सूरज बडज़ात्या भी गुस्सा होते हैं। मैं तो अपने आप से गुस्सा हो जाता हूं। उसी गुस्से की वजह से अच्छा काम करना चाहता हूं। मैं फिल्म बना रहा हूं, कोई सत्संग थोड़े ही कर रहा हूं।

Saturday, November 13, 2010

हंसी और हिंसा के दौर में हिस्ट्री

हिंदी फिल्मों में हंसी और हिंसा का पॉपुलर दौर चल रहा है। कॉमेडी और वॉयलेंस की फिल्मों ने लव स्टोरी को भी पीछे छोड़ दिया है। जिसे देखो वही हंसने-हंसाने की तैयारी में लगा है या फिर मरने-मारने पर उतारू है। चूंकि ऐसी फिल्मों को दर्शक भी मिल रहे हैं, इसलिए माना जा रहा है कि दर्शक भी लव स्टोरी और सोशल फिल्मों से उकता गए हैं, इसलिए वे सिर्फ कॉमेडी और ऐक्शन में इंटरेस्ट दिखा रहे हैं। दर्शकों की बदलती रुचि के बावजूद संजय लीला भंसाली और आशुतोष गोवारीकर जैसे डायरेक्टर चालू ट्रेंड से अलग फिल्में बनाने की हिम्मत कर रहे हैं।

संजय लीला भंसाली की गुजारिश एक लव स्टोरी ही है, लेकिन इस फिल्म की प्रस्तुति हिंदी फिल्मों में प्रचलित हो रही नए किस्म की इमोशनलेस लव स्टोरी से भिन्न है। इसी प्रकार आशुतोष गोवारीकर की फिल्म खेलें हम जी जान से नाम, विषय और लुक के लिहाज से आज के पॉपुलर ट्रेंड की फिल्म नहीं है। यह 1930 में चट्टोग्राम (चिटगांव) में हुए विद्रोह की कहानी है, जिसे सूर्य सेन और कल्पना दत्ता ने लीड किया था। अफसोस की बात है कि आजादी के संघर्ष इतिहास में हम सूर्य सेन के योगदान के बारे में अधिक नहीं जानते। आशुतोष गोवारीकर ने मानिनी चटर्जी की पुस्तक डू ऐंड डाइ पर यह फिल्म आधारित की है। गौरतलब है कि मानिनी चटर्जी क्रांतिकारी कल्पना दत्ता की बहू हैं। इन दोनों फिल्मों के प्रति फिल्मों के ट्रेड पंडित के उद्गार अच्छे नहीं आ रहे हैं। ट्रेड पंडित इन दिनों उन फिल्मों को ही अच्छी मानते हैं, जो बिजनेस करे। फिल्म के कंटेंट, उद्देश्य और प्रभाव से उन्हें अधिक मतलब नहीं रहता। उनके लिए कॉमेडी और वॉयलेंस की फिल्में श्रेष्ठ होती हैं, क्योंकि ऐसी फिल्मों को देखने दर्शक आते हैं। ट्रेड पंडित फिल्मों के चलने या न चलने की भविष्यवाणी तो कर लेते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि कौन सी फिल्म कितने लंबे समय तक दर्शकों के बीच बनी रहेगी। अगर आशुतोष की फिल्मों से ही उदाहरण दें, तो उनकी स्वदेस और जोधा अकबर इस दशक की उल्लेखनीय फिल्मों में शुमार होगी। आज हमें याद नहीं कि इन दोनों फिल्मों ने कितना बिजनेस किया था। मुझे आशुतोष गोवारीकर की इस बात में दम लगता है कि हमें अपने इतिहास को नहीं भूलना चाहिए। सिनेमा में सामाजिकता रहेगी, तभी उसे स्थायित्व मिलेगा। वर्ना वह हवा में उड़ते बुलबुले की तरह थोड़ी देर के लिए सतरंगी आनंद देगा और फिर फूट जाएगा। पिछले दशक में हिट हुई अधिकांश फिल्मों का यही हश्र हुआ है। उन्हें लोग भूल चुके हैं या भूल रहे हैं। आमिर खान की तारे जमीन पर ने गजनी से कम बिजनेस किया, लेकिन तारे जमीन पर लंबे समय तक दर्शकों के बीच मौजूद रहेगी। गजनी को दर्शक अभी ही भूल चुके हैं और उसका बनाया रिकार्ड भी टूट चुका है।

अफसोस की बात है कि मीडिया भी स्टारों की चमक-दमक और प्रचार के दबाव में फूहड़, घटिया और तात्कालिक फिल्मों को बड़ी फिल्म के तौर पर प्रचारित करते हैं और पहले से ही उनकी कामयाबी की घोषणा कर देते हैं। पिछले हफ्ते रिलीज हुई गोलमाल-3 और ऐक्शन रीप्ले की ऐसी ही हवा बनाई गई थी। फिल्म रिलीज होने के बाद हमें पता चला कि दोनों ही कितनी चालू और साधारण फिल्में हैं। गुजारिश और खेलें हम जी जान से जैसी फिल्मों से दर्शकों को दूर भगाने में मीडिया आगे रहता है। वे भी हंसी और हिंसा के दौर में हिस्ट्री और संवेदना को नजरंदाज कर रहे हैं।


Tuesday, November 2, 2010

इंसानी दिमाग का अंधेरा लुभाता है मुझे: विशाल भारद्वाज

इंसानी दिमाग का अंधेरा लुभाता है मुझे: विशाल भारद्वाजमकडी से कमीने तक के सफर में ही विशाल भारद्वाज ने अपना खास परिचय दे दिया है। उनकी फिल्मों की कथा-भूमि भारतीय है। संगीत निर्देशन से उनका फिल्मी करियर आरंभ हुआ, लेकिन जल्दी ही उन्होंने निर्देशन की कमान संभाली और कामयाब रहे। उनकी फिल्में थोडी डार्क और रियल होती हैं। चलिए जानते हैं उनसे ही इस फिल्मी सफर के बारे में।

डायरेक्टर बनने की ख्वाहिश कैसे पैदा हुई?

फिल्म इंडस्ट्री में स्पॉट ब्वॉय से लेकर प्रोड्यूसर तक के मन में डायरेक्टर बनने की ख्वाहिश रहती है। हिंदुस्तान में फिल्म और क्रिकेट दो ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में हर किसी को लगता है कि उससे बेहतर कोई नहीं जानता। सचिन को ऐसा शॉट खेलना चाहिए और डायरेक्टर को ऐसे शॉट लेना चाहिए। हर एक के पास कहानी है। रही मेरी बात तो संगीतकार के तौर पर जगह बनाने के बाद मैं फिल्मों की स्क्रिप्ट पर डायरेक्टर से बातें करने लगा था। स्क्रिप्ट समझने के बाद ही आप बेहतर संगीत दे सकते हैं। बैठकों से मुझे लगा कि जिस तरह का काम ये कर रहे हैं, उससे बेहतर मैं कर सकता हूं। इसी दरम्यान संगीत के लिए फिल्में मिलनी कम हुई तो लगा कि इस रफ्तार से तो दो सालों बाद काम ही नहीं रहेगा। मेरा एटीट्यूड भी आडे आ रहा था। मैंने डायरेक्शन पर किताबें पढनी शुरू कीं। उन दिनों जी.टी.वी. के लोग गुब्बारे के संगीत के लिए मेरे पास आए। मैंने एक शर्त रखी कि म्यूजिक करूंगा, लेकिन इसके एवज में मुझे एक शॉर्ट फिल्म बनाने के लिए दो। एक तरह से उन्हें ब्लैकमेल किया और मुझे दो शॉर्ट फिल्में मिल गई। उन फिल्मों के बाद लगा कि मैं कितना खराब लेखक हूं। उत्तराखंड का मेरा एक दोस्त लव स्टोरी सिरीज कर रहा था। मैंने उसे दो अन्य कहानियों के बीच अपनी कहानी रख कर दी। उसे पसंद आई तो स्क्रीन प्ले और संवाद मैंने ही लिखे। बहुत पढने के बाद नए विषय की खोज में निकला। अब्बास टायरवाला के पास थ्रिलर कहानी थी मेहमान। मैं अपने दोस्त मनोज वाजपेयी से मिला। उन्हें वह बडी रेगुलर टाइप कहानी लगी। वह हिंदुस्तान-पाकिस्तान के दो सैनिकों की कहानी थी। उन्होंने कहा कि इस पर काम करते हैं। वे फिल्म के लिए राजी हो गए। इसी बीच रॉबिन भट्ट ने अजय देवगन से मिलवाया। उन्हें कहानी पसंद आई और वे फिल्म प्रोड्यूस करने को तैयार हो गए। तभी उनकी राजू चाचा फ्लॉप हो गई। एक महीने बाद मेरी फिल्म की शूटिंग थी, वह ठप हो गई। एक साल से ज्यादा की मेहनत धरी की धरी रह गई।

उन दिनों तो आपने संगीत निर्देशन छोड दिया था?

डायरेक्टर था तो उसी मूड में रहता था। हर डायरेक्टर को कहानी सुनाई। एक्टर भाग जाते थे, प्रोड्यूसर की समझ में कहानी नहीं आती थी। यहां ज्यादातर प्रोड्यूसर को नाम समझ में आता है, काम नहीं। एक साल के बाद चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी गया। वहां मकडी की स्क्रिप्ट जमा की। वह पसंद की गई। स्क्रिप्ट मजबूरी में मैंने खुद लिखी। मेरे दोस्त अब्बास टायरवाला व्यस्त थे। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि किसी लेखक को दूं। इसके साथ दूसरा हादसा हुआ। फिल्म बनी तो सोसायटी ने रिजेक्ट कर दी। मैंने गुलजार साहब और दोस्तों को दिखाई। सबको पसंद आई तो फिल्म रिलीज के बारे में सोचा। दोस्तों से पैसे लेकर चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी के पैसे वापस किए। फिल्म डेढ घंटे की थी। मल्टीप्लेक्स बनने लगे थे। फिल्म के लिए कोई स्लॉट नहीं था। उसे बेचने व रिलीज करने में पापड बेलने पडे। लेकिन बाद में यह कल्ट फिल्म बन गई।

बचपन कहां गुजरा? परिवार व परिवेश के बारे में कुछ बताएं?

पैदा बिजनौर में हुआ। बचपन मेरठ में गुजरा। पिता गवर्नमेंट ऑफिस में काम करते थे। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से उनकी दोस्ती थी। उनका नाम राम भारद्वाज था, शौकिया तौर पर फिल्मों में गाने लिखते थे। उन्होंने बिजनेस में भी हाथ आजमाया। फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन में उतरे तो नाकाम रहे। कर्ज हो गया। मेरा संगीत या फिल्म का इरादा ही नहीं था। क्रिकेट खेलता था, उसी में आगे बढना चाहता था। मैं स्कूल की टीम में खेलता था और उत्तर प्रदेश की ओर से खेलने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी भी गया। दिल्ली आने पर एक दोस्त की वजह से संगीत में इंटरेस्ट हुआ, जो बाद में इतना सीरियस हो गया कि क्रिकेट छूट गया।

उन दिनों आपके साथ और कौन दोस्त थे?

पत्नी रेखा थीं। उन्होंने क्लासिकल सीखा था। कुछ और दोस्त थे। हम गजल गाते थे। मैंने पेन म्यूजिक रिकार्डिग कंपनी जॉइन की। उसी जॉब में ट्रांसफर लेकर मुंबई आया। इसी बीच एक बार दिल्ली में गुलजार साहब से मुलाकात हुई। उनके साथ चढ्डी पहन के फूल खिला है गीत की रिकार्डिग की। उसके बाद माचिस का ऑफर मिला।

फिल्मों के प्रति झुकाव कब हुआ? तब की फिल्में याद हैं?

बचपन की देखी हुई पर्दे के पीछे याद आती है। उसमें विनोद मेहरा व नंदा थे। फिल्मों में असल रुचि शोले से जगी। पांचवीं-छठी कक्षा में था। इसके बाद तो अमिताभ बच्चन की अमर अकबर एंथोनी, नसीब, सुहाग जैसी हर फिल्म देखी। श्याम बेनेगल की एक-दो फिल्में भी देखीं। कालेज के समय में उत्सव, कलयुग और विजेता भी याद हैं।

फिल्में परिवार या दोस्तों के साथ देखते थे या अकेले?

ज्यादातर फिल्में दोस्तों के साथ देखीं। तब इतना सीरियस दर्शक नहीं था। संयोग से मुंबई में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हुआ। गुलजार साहब के साथ उसे देखने गया। वे मुझे साथ ले जाते थे। उसमें किस्लोवोस्की की फिल्म रेड, ब्ल्यू व व्हाइट देखी। अगले साल त्रिवेंद्रम में उनकी डे के लॉग देखी। तब पता चला कि सिनेमा इतना बडा ह्यूमन एक्सप्रेशन है। एक तरह से फिल्म फेस्टिवल ही मेरा स्कूल रहा।

अगर मैं कहूं कि फिल्म फेस्टिवल के अनुभव और उससे पैदा हुए रुझान ने ही आपको इस माध्यम के प्रति सचेत किया। उसके पहले के देखे, सीखे व समझे को भूलने की जरूरत है..।

भूला (अनलर्न) तो नहीं जा सकता। अवचेतन में सारे अनुभव जमा होते हैं। लेकिन सच में सिनेमा का पावर, एक्सप्रेशन और मीडियम की समझ इसके बाद ही आई। बहुत बडा कंट्रास्ट था। फिल्मों ने हिला कर रख दिया। कमर्शियल फिल्में मुख्य रूप से एंटरटेनमेंट होती हैं। विषय और प्रभाव के स्तर पर वे सतह पर होती हैं। अच्छी फिल्में सीने में जम जाती हैं। सत्यजित राय के बारे में कहा गया कि वे गरीबी बेचते हैं। हिंदुस्तान में गरीबी है तो क्यों न दिखाई जाए। हमें गरीबी पर शर्म नहीं आती, उन पर बनी फिल्मों पर शर्म आती है। उन्होंने 40-50 साल पहले जैसी फिल्में बनाई, वैसी फिल्में आज भी नहीं बन सकीं।

बाहर से आई प्रतिभाओं को अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पडता है। इस बारे में आपके अनुभव क्या थे?

मुझे लगता है कि विरोधियों से ज्यादा समर्थक हैं। मेरी बहुत कमाल की एक जगह बन गई है। फर्क नहीं पडता कि कौन क्या बोल रहा है? सच बाहर आ जाता है। यह नैचरल प्रोसेस है। बिना डरे ईमानदारी से अपनी सोच पर काम करने की जरूरत है। यदि सभी लोग सडक पर चल रहे हैं और आप कच्चे रास्ते पर हैं तो वे आपको इडियट समझेंगे, खींचकर सडक पर लाने की कोशिश करेंगे। मेरे लिए तो यह कच्चा रास्ता ही ज्यादा अच्छा है। एक बात गुलजार साहब ने समझाई थी कि अवसर टारगेट की तरह होते हैं। वह कब आपके सामने आ जाएगा, पता नहीं चलेगा। आपको हमेशा अपनी क्रिएटिविटी की बंदूक लोड करके रखनी होगी। अगर आप सोचते हैं कि अवसर आएगा तब गन साफ कर, गोली भरके फायर करेंगे तो टारगेट निकल जाएगा। इसलिए हमेशा तैयार रहना होगा और धैर्य भी बनाए रखना होगा।

मकडी और मकबूल ने आपको एक मजबूत जगह दी। उसके बाद आप अपनी मर्जी की फिल्में बना सके।

हां, ये मेरी मर्जी की फिल्में थीं। मकबूल के लिए पैसे नहीं थे। एक्टर भी तैयार नहीं थे। मैंने एनएफडीसी से संपर्क किया, लेकिन उन्हें बजट ज्यादा लगा। बैंक से लोन लेने की कोशिश की। संयोग से बॉबी बेदी मिले और इसे प्रोड्यूस करने को तैयार हो गए। फिल्म से आर्थिक लाभ नहीं हुआ, लेकिन डायरेक्टर के तौर पर मुझे स्वीकार किया गया।

आपने कहा, यहां सब निर्देशक बनना चाहते हैं। आप क्यों बने?

मेरी समझ में आ गया कि यह मीडियम डायरेक्टर का है। डायरेक्टर की बात सभी को माननी पडेगी। मुझे लगा कि फिल्ममेकिंग से बडा कोई क्रिएटिव एक्सप्रेशन नहीं है। यह सारे फाइन आर्ट्स का समागम है। म्यूजिक, पोएट्री, ड्रामा सब इसमें है।

आपकी फिल्में डार्क और इंटेंस होती हैं?

मुझे मानव मस्तिष्क में चल रही खुराफातें आकृष्ट करती हैं। ह्यूमन माइंड के डार्क साइड में जबरदस्त ड्रामा रहता है। हम सिनेमा में उसे दिखाने से बचते हैं। हम डील नहीं कर पाते। मुझे लगता है कि इस पर काम करना चाहिए। अगर मैकबेथ और ओथेलो चार सौ साल से पापुलर है तो उसकी अपील का असर समझ सकते हैं। यह लिटरेचर भी है। मैं कॉमेडी फिल्म बनाने की तैयारी कर चुका था। मिस्टर मेहता और मिसेज सिंह की स्क्रिप्ट तैयार थी, लेकिन वह फिल्म नहीं बन सकी।

बाहरी दुनिया से संपर्क रखने के लिए क्या करते हैं?

मुंबई से बाहर निकलता हूं। आम आदमी की तरह जीने की कोशिश करता हूं। टिकट की लाइन में लगता हूं। रेस्त्रां में बैठता हूं। मुंबई के सर्कल में सिर्फ फिल्मों की बातें होती हैं। बाहर निकलने पर आम लोगों से मिलता हूं तो अपनी खबर लगती है। पता चलता है कि क्या और कैसे हो रहा है? सूचना के ढेरों माध्यम हैं, लेकिन फ‌र्स्ट हैंड एक्सपीरिएंस का कोई विकल्प नहीं है।

अजय ब्रह्मात्मज

Monday, November 1, 2010

संजय लीला भंसाली की सपनीली दुनिया

-अजय ब्रह्मात्‍मज


संजय लीला भंसाली की सपनीली दुनिया

संजय लीला भंसाली की फिल्म गुजारिश के टीवी प्रोमो आकर्षित कर रहे हैं। इस आकर्षण के बावजूद समझ में नहीं आ रहा है कि फिल्म में हम क्या देखेंगे? मुझे संजय लीला भंसाली की फिल्में भव्य सिनेमाई अनुभव देती हैं। मैं उनके कथ्य से सहमत नहीं होने पर भी उनके सौंदर्यबोध और क्रिएशन का कायल हूं। यथार्थ से दूर सपनीली रंगीन दुनिया की विशालता दर्शकों को मोहित करती है। हम दिल दे चुके सनम और देवदास में उनकी कल्पना का उत्कर्ष दिखा है। गुजारिश एक अलग संसार में ले जाने की कोशिश लगती है।

फिल्म का नायक पैराप्लैजिया बीमारी से ग्रस्त होने के कारण ह्वील चेयर से बंध गया है। संभवत: वह अतीत की यादों और अपनी लाचारगी के बावजूद ख्वाबों की दुनिया में विचरण करता है। संजय की पिछली फिल्म सांवरिया भी एक काल्पनिक सपनीली दुनिया में ले गई थी, जिसका वास्तविक दुनिया से कोई संबंध नहीं था। इस बार एक अलग रंग है, लेकिन कल्पना कुछ वैसी ही इस दुनिया से अलग और काल्पनिक है। संजय लीला भंसाली के किरदार आलीशान घरों में रहते हैं। उनके आगे-पीछे विस्तृत खाली स्थान होते हैं, जिनमें सपनीली और सिंबोलिक सामग्रियां सजी रहती हैं। उनकी फिल्म हम दिल दे चुके सनम देखने के बाद एक समीक्षक ने लिखा था कि मानो दर्शक मक्खी हों, जो रूहआफ्जा की बोतल में फंस गए हों। इस टिप्पणी के अतिरेक को घटा दें तो हम संजय लीला भंसाली की फिल्मों के रूप विधान को समझ सकते हैं।

संजय लीला भंसाली का बचपन तंगहाली में गुजरा। छोटे कमरे में हुई परवरिश की वजह से उनमें बांहें फैलाने की छटपटाहट दिखती है। उन्होंने कहा था कि बचपन की ग्रंथियों को वे अब फिल्मों में व्यक्त करते हैं। जीवन में जो नहीं मिला और जिन चीजों से वंचित रहे, उन्हें फिल्मों में पाने की कोशिश करते हैं। निश्चित ही ऐसे दर्शक भी होंगे, जो अपने जीवन की दुर्दशा से तंग होंगे और उन्हें भंसाली की फिल्मों की भव्यता भाती होगी। संजय ने अपनी कल्पना और दृश्य संयोजन से पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया है। उनकी फिल्मों की दुनिया जीवन के स्पंदन के अभाव में सिंथेटिक लगती है, लेकिन इन दिनों टीवी चैनलों पर चल रहे सीरियलों और फिल्मों में उनके सेट के प्रतिरूप दिखाई पड़ेंगे। किसी भी फिल्मकार के लिए यह छोटी उपलब्धि नहीं होती कि उसके जीवन काल में ही उसकी शैली का अनुकरण होने लगे।

संजय लीला भंसाली की फिल्मों में काव्यात्मकता रहती है। उनके किरदार परफेक्ट किस्म के होते हैं। किरदारों की भाव मुद्राओं में भी परफेक्शन दिखता है। उनके साथ काम कर चुके कलाकार बताते हैं कि किसी खास दृश्य और भाव के लिए वे घंटों खर्च कर देते हैं। ऐसा समर्पण आज के निर्देशकों में नहीं दिखता। संजय की सृजनात्मकता पर संदेह नहीं किया जा सकता, फिर भी अगर यह फिल्मकार अपने समय और समाज से जुड़ कर चलता तो हमें सार्थक और मनोरंजक फिल्में दे पाता। अभी उनकी फिल्में मुख्य रूप से स्वांत:सुखाय लगती हैं। वे अपने दर्शकों की संवेदना की परवाह नहीं करते। अपने मायावी कल्पना लोक में विचरण करते हैं। उनके खयाल अधिकांश दर्शकों के लिए अमूर्त और अबूझ होते हैं। गुजारिश ऐसी ही एक पहेली लग रही है। संजय को अपनी फिल्मों के बारे में बताना चाहिए। उन्हें समझने का सूत्र और मंत्र देना चाहिए।