फ़िल्म समीक्षा:फ़िराक

अस्मिता व विश्वाद्य से टकराती सच्चाइयां
थिएटर और अलग किस्म की फिल्मों से पहचान बना चुकी नंदिता दास ने निर्देशन में कदम रखा तो स्वभाव के मुताबिक गंभीर सामाजिक मुद्दा चुना। फिराक का विचार उनके व्यक्तित्व से मेल खाता है। फिराक में मनोरंजन से अधिक मुद्दे पर ध्यान दिया गया है।
गुजरात के दंगों के तत्काल बाद के अहमदाबाद में छह कथा प्रसंगों को साथ लेकर चलती पटकथा एक-दूसरे का प्रभाव बढ़ाती है। नंदिता ने मुश्किल नैरेटिव चुना है, लेकिन कैमरामैन रवि चंद्रन और अपने संपादक के सहयोग से वह धार्मिक अस्मिता, दोस्ती, अपराध बोध, खोए बचपन व विश्वास को ऐसे टटोलती हैं कि फिल्म खत्म होने के बाद सभी किरदारों के लिए हमें परेशानी महसूस होती है। यह फिल्म तकनीशियनों के सामूहिक प्रयास का सुंदर उदाहरण है। नंदिता दास ने फिल्म शुरू होने पर तकनीशियनों की नामावली पहले देकर उन्हें यथोचित सम्मान दिया है। नीम रोशनी और अंधेरे के बीच चलती फिल्म के कई दृश्य पारभासी और धूमिल हैं। रवि चंद्रन ने फिल्म में प्रकाश संयोजन से कथा के मर्म को बढ़ाया है। फिल्म में कुछ भी लकदक और चमकदार नहीं है। दंगे के बाद की उदासी महसूस होती है। सांप्रदायिकता का डर उभरता है और अस्मिता के प्रश्न से किरदार टकराते हैं। फिल्म का पाश्‌र्र्व संगीत भी उल्लेखनीय है।
फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और रघुवीर यादव की मौजूदगी आनंदित करती है। मामूली दृश्यों को भी उत्तम अभिनेता कारगर व प्रभावी बना देते हैं। शहाना गोस्वामी व संजय सूरी अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं।

Comments

फिल्म देखने की योजना है और इसके लिए मुझे मालूम है कोई साथ नहीं मिलेगा इसलिए अकेले ही जाना पड़ेगा...जो इस फिल्म के देखने के आनंद को दुगना कर देगा...
नीरज
chavannichap said…
koi saath ho to bhi film akekle hi dekhne par anandit karti hai.saath to bus seat tak pahunchne aur nikalne ka hota hai.
I agree with you CHAVANNI CHAP.

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