दरअसल:नवोदित नही है प्रकाश राज


-अजय ब्रह्मात्मज


यह प्रसंग वांटेड से जुड़ा है। पिछले दिनों प्रदर्शित हुई इस फिल्म में प्रकाश राज ने खलनायक की भूमिका निभाई है। गनी भाई के रूप में वे दर्शकों को पसंद आए, क्योंकि उस किरदार को उन्होंने कॉमिक अंदाज में पेश किया। इस फिल्म को देखने के बाद मुंबई में एक मनोरंजन चैनल के पत्रकार की टिप्पणी थी कि इस नए ऐक्टर ने शानदार काम किया है। मुझे हंसी आ गई। कुछ ही दिनों पहले प्रकाश राज का नाम लेकर सभी चैनलों ने खबर चलाई थी कि उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार में आमिर खान और शाहरुख खान को पछाड़ा। पिछले दिनों प्रकाश राज को कांजीवरम के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है।
दरअसल, हम अपने ही देश की दूसरी भाषा की फिल्में और फिल्म स्टारों से नावाकिफ रहते हैं। चूंकि सभी भाषा की फिल्में हिंदी में डब होकर नहीं आतीं, इसलिए हिंदी फिल्मों के सामान्य दर्शक समेत फिल्म पत्रकार भी उन फिल्मों से अपरिचित रहते हैं। अगर हम तमिल के मशहूर ऐक्टर रजनीकांत और कमल हासन को जानते हैं, तो उसकी वजह हिंदी फिल्मों से उनका पुराना संबंध है। दोनों ने ही करिअर के आरंभिक दौर में हिंदी फिल्में की थीं। इन दोनों के अलावा छिटपुट रूप से हम नागार्जुन, ममूटी, व्यंकटेश, चरणराज और मोहनलाल के नाम जानते हैं। ये कभी हिंदी फिल्मों में दिख गए या फिर अपनी लोकप्रियता की वजह से हिंदी-अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में तस्वीरों के साथ छपते रहते हैं। बाकी भाषा के कलाकारों को हम बिल्कुल नहीं जानते।
क्या इस विडंबना पर हिंदी दर्शकों को शर्मिदा नहीं होना चाहिए कि वे देश की दूसरी भाषा की फिल्मों के बारे में नगण्य जानकारी रखते हैं? इसके विपरीत हॉलीवुड की फिल्में और उनके कलाकारों को हम एक हद तक जानते और पहचानते हैं। इन दिनों हॉलीवुड की ज्यादातर फिल्में हिंदी में डब होकर रिलीज होती हैं और उन्हें संतोषजनक दर्शक भी मिलते हैं। यहां हम हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों के संदर्भ में ही बातें कर रहे हैं। देश में संभ्रांत और अभिजात दर्शकों का एक तबका हिंदी समेत सभी भारतीय भाषा की फिल्मों को नीची नजर से देखता है।
कभी-कभी हिंदी की तेलुगु और तमिल जैसी भाषा में डब होती हैं और वे अच्छा व्यापार भी करती हैं। दूसरी भाषा से हिंदी में डब करने का चलन लगभग खत्म-सा हो गया है। अश्लील और सस्ती कोटि की फिल्में अवश्य ही डब होकर हिंदी प्रदेश के कस्बों और छोटे शहरों में चलती हैं। वहां की मेनस्ट्रीम और लोकप्रिय फिल्मों को हिंदी में डब करने की परंपरा लगभग नहीं है। यही वजह है कि हिंदी फिल्मों के आम दर्शक देश के अन्य भाषा की फिल्मों से अनभिज्ञ रहते हैं। प्रकाश राज जैसे लोकप्रिय और श्रेष्ठ अभिनेता को भी नवोदित अभिनेता समझा जाता है।
अगर दूसरी भाषा की फिल्में हिंदी में डब हों और हिंदी की फिल्में अन्य भाषा में डब हों, तो निश्चित रूप से फिल्मों का बाजार बढ़ेगा। सभी भाषाओं की फिल्मों को नए दर्शक मिलेंगे। हम अपने ही देश को थोड़ा और करीब से समझ पाएंगे। हर भाषा की फिल्म उस भाषा के समाज को किसी न किसी रूप में पेश करती है। उस समाज की रुचि और आकांक्षा फिल्मों के जरिए व्यक्त होती हैं। कैसी विडंबना है कि हम अपने ही देश के अन्य हिस्सों के बारे में कुछ भी नहीं जानते, जबकि दूर देश अमेरिका की फिल्मों के बारे मे ताजा जानकारियां रखते हैं। इस दिशा में पत्र-पत्रिकाएं भी कोशिश कर सकती हैं। दक्षिण भारत के राज्य से उत्तर भारत में आकर बसा या नौकरी कर रहा व्यक्ति हिंदी के अखबारों में अपनी भाषा के नायक और फिल्मों को देखकर पुलकित ही होगा।

Comments

Pravir said…
सही कहा आपने. प्रकाश राज करीब पंद्रह सालों से फिल्मों में हैं. दक्षिण भारतीय फिल्मों के अलावा हिन्दी में भी ख़ाकी, शक्ति, लिट्ल जॉन आदि फिल्में कर चुके हैं. बोम्मरिल्लु, पोक्किरि, अथिदि, इंद्रा, अननीयान, रक्षक, इरुवर जैसी बीसियों फिल्मों में सशक्त पर्फॉर्मेन्स दे चुके हैं. अच्छा है कि ये फिल्में डब कर के केबल चॅनेल्स पर दिखा दी जाती हैं. आज के टीवी पत्रकारों का ज्ञान गजिनी के आमिर की याददाश्त के जितना है. ज़्यादा दूर तक जाने की ज़हमत नहीं फरमाते, और अपना फोकस पेज ३ और राखी सावंत को कवर करने में ही रखते हैं. क्या करें...
प्रकाश राज जी के योगदान को रेखांकित किया जाना चाहिये

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