सौमित्र चटर्जी का सम्मान

-अजय ब्रह्मात्मज

भारतीय फिल्मों में किसी व्यक्ति के योगदान का सबसे बड़ा सम्मान दादा साहेब फालके पुरस्कार है। इस वर्ष यह सम्मान सौमित्र चटर्जी को मिला है। सौमित्र चटर्जी ने मुख्य रूप से बांग्ला फिल्मों में अभिनय किया है। खास कर सत्यजित राय के प्रिय अभिनेता के रूप में वे मशहूर हुए।

उन्होंने सत्यजित राय की 17 फिल्मों में काम किया है। सत्यजित राय से उनका लगाव पुराना रहा है। थिएटर के माध्यम से अभिनय में सक्रिय हुए सौमित्र चटर्जी की कोशिश थी कि उन्हें फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले। बांग्ला की प्रचलित फिल्मों में काम पाने के लिए वे प्रयासरत भी थे, लेकिन पाथेर पांचाली देखने के बाद उनकी मंजिल बदल गई। उन्होंने तय किया कि जल्दी से जल्दी सत्यजित राय के साथ काम करना है। उनकी यह इच्छा 1959 में अपूर संसार से पूरी हुई। उसके बाद वे सत्यजित राय के फेवरिट ऐक्टर बन गए।

उन्होंने बंगाल के तपन सिन्हा, मृणाल सेन, असित सेन, अजय कार आदि के साथ भी काम किया। कहा जाता है कि मौलिक फिल्मकार सत्यजित राय ने अपनी कुछ फिल्में सौमित्र चटर्जी को ध्यान में रख कर लिखीं। उनकी फिल्मों में वे हर तरह की भूमिका में नजर आए। बाहर की फिल्मों में उन्होंने विलेन, रोमांटिक हीरो और दूसरे किरदारों को जीवंत किया। एक समय उन्हें बांग्ला फिल्मों के दिलीप कुमार के नाम से मशहूर उत्तम कुमार का प्रतिद्वंद्वी माना जाता था। सौमित्र चटर्जी के अभिनय की खासियत रही है कि उन्होंने कभी सहयोगी अभिनेता पर हावी होने की कोशिश नहीं की। उनके अभिनय में किसी नदी का आवेग रहा है, जो बहाव का रास्ता खोज लेती है। लगभग पचास सालों की अनवरत अभिनय साधना के बाद उन्हें यह सम्मान मिला है।

सौमित्र चटर्जी ने कभी नाम और दाम के लिए बंगाल से बाहर जाने की जरूरत नहीं समझी। आम तौर पर अन्य भारतीय भाषाओं के कलाकार बड़ी पहचान के लिए हिंदी फिल्मों का रुख करते हैं। सौमित्र चटर्जी ने हिंदी फिल्मों के ऑफर स्वीकार नहीं किए। हालांकि हर बार हिंदी फिल्में न करने की वजह उनकी अस्वस्थता बताई गई, लेकिन आप गौर करें तो उन्हीं दिनों में वे बंगाली फिल्मों में व्यस्त रहे।

मुझे लगता है कि सौमित्र दा स्पष्ट रहे होंगे कि उन्हें हिंदी फिल्मों के प्रलोभन में नहीं आना है। कलयुग के निर्माण के दौरान शशि कपूर ने उन्हें नायक करण की भूमिका देनी चाही थी। उनके मना करने के बाद यह भूमिका स्वयं शशि कपूर ने निभाई थी। हाल-फिलहाल में अनुराग बसु ने उन्हें लाइफ.. इन ए मेट्रो में धर्मेन्द्र वाली भूमिका देने की सोची थी। तब भी सौमित्र चटर्जी ने मना कर दिया था।

ऊपरी तौर पर लग सकता है कि केवल बंगाली फिल्मों तक खुद को सीमित रख कर सौमित्र चटर्जी ने अपनी संभावनाओं को बाधित किया। गौर करें तो इस भाषायी एकाग्रता और समर्पण से वे बेहतर काम कर सके। उन्होंने इधर-उधर भटकने के बजाए कोलकाता में रह कर बांग्ला फिल्मों में अपना सौ प्रतिशत दिया। किसी भी कलाकार का जीवन पलट कर देखने पर सुनियोजित और व्यवस्थित दिखता है, लेकिन हम सभी जानते हैं कि हर कलाकार अपने जीवन के सक्रिय दिनों में भयंकर किस्म से असुरक्षित रहता है।

उसी असुरक्षा में वह बेहतर की तलाश करता है। खुशी की बात है कि सौमित्र चटर्जी की फिल्में बेहतरीन रही हैं। उन्हें समय-समय पर इन फिल्मों के लिए पुरस्कृत भी किया गया है। जानकारों को मालूम है कि इस साल दादा साहेब फालके पुरस्कार के लिए कुछ और नामों की भी चर्चा थी। प्राण, मनोज कुमार और वैजयंती माला..। अगर यह पुरस्कार सौमित्र चटर्जी के बदले प्राण को मिलता तो भी बराबर की बात होती।

प्राण के योगदान को कई कारणों से अभी तक नजरअंदाज किया गया है। फिल्मों में खलनायक को किरदार और कलाकार के तौर पर अधिक सहानुभूति नहीं मिलती। प्राण साहब दादा साहेब फालके पुरस्कार के योग्य उम्मीदवार हैं। हमारी यह कामना है कि अगले साल अवश्य ही उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाए।

फिलहाल हम सौमित्र चटर्जी को मिले सम्मान से संतुष्ट हैं। हम चाहेंगे कि दादा साहेब फालके पुरस्कार से सम्मानित करने के बाद भारत सरकार संबंधित कलाकार की फिल्मों के प्रदर्शन और प्रसारण की भी व्यवस्था करे। पूरा देश उनकी प्रतिभा से परिचित हो।


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