मैं शोर क्यों मचाऊं -तब्‍बू

-अजय ब्रह्मात्‍मज

लंबे अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर लौट रही हैं तब्बू। इस साल वे इरफान के साथ फिल्म लाइफ ऑफ पी में दिखेंगी। उनसे बातचीत के कुछ अंश..

आजकल आप बहुत खामोश रहती हैं। कहीं कोई चर्चा नहीं सुनाई पड़ती?

यही मेरा नेचर है। मैं तो हमेशा खामोश रहती हूं। कभी मुझे नाहक या यों ही शोर मचाते देखा क्या?

? क्या मन में कभी द्वंद्व रहा कि कैसी फिल्में करनी हैं या कैसे रोल करने हैं?

मैंने कभी ऐसा कैलकुलेशन नहीं किया। मेरा सिर्फ यही आधार होता है कि मुझे कोई चीज भा गई, एक्साइट कर गई तो मैं कर लूंगी। मेरे लिए तो काम करने का एक्सपीरियंस अच्छा होना चाहिए। डायरेक्टर को खुशी होनी चाहिए कि मैंने कैरेक्टर को अच्छे से निभाया। वही मेरी सक्सेस है।

आप रिजल्ट पर ज्यादा ध्यान देती हैं या कुछ और?

फिल्म बनाने का प्रोसेस ही इतना इंगेजिंग होता है कि आप रिजल्ट के बारे में भूल जाते हैं। यदि रिजल्ट पर मैं ध्यान देती तो जो मैंने किया है, वह कर ही नहीं पाती। मैंने अपनी फिल्मों को बहुत इंज्वॉय किया है। यह सोच कर काम करेंगे कि हिट हो जाएगी तो फिर इंज्वॉय कर ही नहीं पाएंगे।

हिंदी सिनेमा में अपने कौन से कैरेक्टर आपको याद है?

चांदनी बार का याद है, अस्तित्व का याद है। माचिस का याद है। मकबूल और चीनी कम का याद है। क्योंकि सब अलग हैं एक-दूसरे से। सभी को मैंने बहुत इंज्वॉय किया।

आपकी हिंदी फिल्मों से सब वाकिफ हैं। दूसरी भाषाओं की कौन सी फिल्में उल्लेखनीय रही हैं?

एक बहुत बड़ी हिट है तेलुगु की सिसिन्द्री। मणिरत्‍‌नम की इरुवर तेलुगु में है जो अच्छी फिल्म है। राजीव मेनन की कंडदुकोंदेन कंदुकोंदेन, बंगाली की अभयारण्य गौतम घोष की, जो सत्यजित रे की फिल्म की सिक्वल थी। मलयालम में काला पानी। काला पानी हिंदी में डब हुई थी, लेकिन ओरिजनल मलयालम में बनी थी।

कुछ लोग कहते हैं कि आपकी एक्टिंग में एक मैथड और पैटर्न है? क्या आप भी महसूस करती हैं?

मैंने ऐसा कभी सोचा नहीं। पैटर्न तो स्क्रिप्ट के हिसाब से बनता है। जैसा स्क्रीन का रिक्वायरमेंट हो, कैरेक्टर का रिक्वायरमेंट हो और जो कहानी में उतार-चढ़ाव हो रहे हैं, आर्टिस्ट उसी हिसाब से परफॉर्म करता है।

कितना परसेंट आप डायरेक्टर की बात मानती हैं और कितना परसेंट अपनी तरफ से जोड़ती हैं कैरेक्टर में?

हर एक्टर अपनी समझ से, अपने ही परसेप्शन से किसी कैरेक्टर को समझता है। एक ही कैरेक्टर दो एक्टर करें तो उनके परफार्मेस अलग होंगे। मेरी जितनी समझ है कैरेक्टर की, मैं वैसे ही करूंगी। डायरेक्टर तो कैप्टन ऑफ द शिप है। उसे डिसाइड करना है, वो अगर समझे कि शॉट ठीक नहीं है तो फिर पचास बार करवाए, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं मेरे साथ।

नहीं लगता कि आपको जितना काम मिलना चाहिए, उतना नहीं मिला?

मैं हर काम को हाँ करती ही नहीं। सिर्फ वही करती हूं जो चीज मुझे अच्छी लगती है। हमेशा से ऐसी ही रही हूं। बीस-बाइस साल हो गए हैं। मैंने 60 या 65 फिल्में ही की है।

बॉलीवुड में किन अभिनेताओं के साथ काम का यादगार अनुभव रहा? कुछ नाम बताएंगी?

ऑफकोर्स, बच्चन साहब का साथ बहुत इंज्वॉय किया है। सनी देओल के साथ मैंने बहुत इंज्वॉय किया है। सनी तो बहुत प्रोटेक्टिव हैं हमारे बारे में। अगर क्राउड में किसी लड़के ने छेड़ा तो मैं उनको बोल देती थी, वो जाकर फिर पिटाई करते थे। मेरे लिए वह हीरोइक चीज होती थी।

बच्चन जी को लेकर रोल लिखे जाते हैं, लेकिन तब्बू को लेकर रोल क्यों नहीं लिखे जाते?

मेरे मामले में तो आप यह बिल्कुल नहीं कह सकते। मैंने जितनी फिल्में की है वे मेरे लिए ही लिखी गई थी। सभी फिल्मों में फीमेल एक्टर ही मुख्य हो, यह जरूरी नहीं है। हाँ, जो कैरेक्टर आप औरत को दे रहे हैं, वह छिछला और कमजोर न हो। आप औरत को कैसे पोट्रे करते हैं अपनी स्क्रिप्ट में। वह जरूरी है बस!

Comments

Seema Singh said…
सिर्फ वही.....,जो चीजें ......।वाह ..तब्बू बहुत खूब -इसे कहते हैं , सोच और समझदारी की परिपक्वता के चिन्ह .......,बहुत दिनों से तुम्हारे अभिनय का जौहर नहीं देखा ..आशा है जल्द ही ....हमें इंतजार है .....।

Popular posts from this blog

लोग मुझे भूल जायेंगे,बाबूजी को याद रखेंगे,क्योंकि उन्होंने साहित्य रचा है -अमिताभ बच्चन

फिल्‍म समीक्षा : एंग्री इंडियन गॉडेसेस

तो शुरू करें