दरअसल : फिल्मों में है चीन से दूरी


-अजय ब्रह्मात्मज
    कभी सोचा या गौर किया है कि हिंदी फिल्मों में चीनी किरदार क्यों नहीं आते? भारतीय दर्शकों के बीच चीनी फिल्में भी लोकप्रिय नहीं हैं। चीनी फिल्मों में भी भारतीय किरदार नहीं दिखाई देते, लेकिन चीन में भारतीय फिल्में पापुलर रही हैं। ‘आवारा’ से लेकर ‘डिस्को डांसर’ तक के चीनी दर्शक मिल जाएंगे। कुछ सालों पहले चीन में रिलीज हुई ‘3 इडियट’ ने संतोषजनक व्यापार किया था। दरअसल, चीन में फिल्मों की आयात नीति है। इस नीति के तहत केवल 20 फिल्में ही एक साल में आयातित की जा सकती हैं। इनमें से अधिकांश हालीवुड की फिल्में होती हैं। चीन ने अपने सिनेमा के बचाव और विकास के लिए यह नीति अपनाई है। भारत में आयात की ऐसी कोई नीतिगत सीमा नहीं है। फिर भी चीनी फिल्मों के आयात में किसी की रुचि नहीं है। हम जिन चीनी फिल्मों के बारे में जानते हैं, वे ज्यादातर वाया हॉलीवुड भारत में पहुंचती हैं।
    भारत और चीन के बीच फिल्मों के आदान-प्रदान और अन्य संभावनाओं के बीच भाषा सबसे बड़ी दीवार है। चीनी फिल्में भारत में प्रदर्शित करने के पहले उन्हें हिंदी में डब या सबटायटल करना पड़ेगा। अगर देश में आम दर्शकों तक उन्हें पहचाने के लिए इस अतिरिक्त खर्च के साथ यह भी चिंता रहेगी कि क्या प्रदर्शन के निमित्त किया गया निवेश वापस हो पाएगा। भारतीय बाजार में ‘मेड इन चाइना’ प्रोडक्ट धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं, लेकिन उनमें किसी का स्वरूप चीनी नहीं है। ज्यादातर इलेक्ट्रानिक आयटम ही चीन में बने या असैंबल किए रहते हैं।
    भारत और चीन की हजारों साल पुरानी दोस्ती है। बौद्ध धर्म के चीन जाने के पहले से दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध था। देश के पौराणिक ग्रंथों में चीनांशुक का उल्लेख मिलता है। बौद्ध धर्म के चीन पहुंचने के बाद वहां से आए श्वेन चांग (ह्वेन सांग) और फाश्येन (फाहयान) जैसे मशहूर बौद्ध यात्रियों ने दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंध को मजबूत करने का आधारभूत काम किया। उनकी यात्रा विवरणों से हमें अपने देश की अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। देश के विभिन्न शहरों के साथ उन्होंने पाटलिपुत्र और नालंदा के बारे में विस्तार से लिखा है।
    बीसवीं सदी में चीन के मुक्ति अभियान और भारत कें स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में फिर से संबंध बने। माओ त्से तुंग (माओ चतुंग) के लौंग मार्च के समय हताहत चीनियों की सेना के लिए डॉ अटल के नेतृत्व में चिकित्सकों का एक दल चीन गया था। इसमें डॉक्टर कोटनिस भी थे। डॉ ़ कोटनिस ने अपनी जान की परवाह किए बिना चीनियों की सेवा की और दिवंगत हुए। उनके जीवन पर ही वी शांताराम ने ‘डॉ कोटनिस की अमर कहानी’ नामक फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में मुक्ति के पहले चीन की झलक मिलती है। चीन में डॉ क़ोटिनस को बड़े आदर से याद किया जाता है। जब भी कोई चीनी प्रतिनिधि भारत या खास कर मुंबई आता है तो वह डॉ.काटनिस के पुश्तैनी घर जरूर जाता है।
    भारत की आजादी और चीन की मुक्ति के बाद दोनों देशों में संबंध सदृढ़ हुए। पंचशील के सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा। कुछ सालों तक मैत्री और भाईचारे का रिश्ता रहा। दुर्भाग्य से 1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय जनमानस में जख्म के अमिट निशान दे गया। इस युद्ध के संदर्भ में हम हमेशा चीन को धोखेबाज देश के रूप में याद करते हैं। मानते हैं कि चीन ने भारत की पीठ में चाकू घोंप दिया था। उसके बाद से चीन की छवि उभरे विवाद से यह छवि और मजबूत बनती है। भारतीय मीडिया में यह प्रचलित होता है कि चीन लगातार भारतीय सीमा का अतिक्रमण करता है। 1964 में आई ‘हकीकत’ में चीनी सैनिकों को दुश्मन सेना के रूप में ही दिखाया गया। बहुत सालों बाद आई 'चांदनी चौक टू चाइना' में चीन का मजाकिया चित्रण ही है।
    चीन के किरदारों को भारतीय फिल्मों में जरूरत नहीं पड़ती। हमारे फिल्मकार पूरी दुनिया में जाकर शूटिंग करते हैं, लेकिन चीन पर उनका ध्यान नहीं जाता। फिलहाल दोनों देशों के बीच संबंध प्रगाढ़ होने की संभावना नजर नहीं आ रही। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक विनिमय बढ़ा है, लेकिन संस्कृति और फिल्मों के मामले में अभी कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। वक्त आ गया है कि हमारे फिल्मकार चीन की तरफ थोड़ा ध्यान दें।

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