दरअसल : कब बदलेगी वितरण प्रणाली (डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सिस्‍टम)


-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्मों के बाजार के विकास के साथ इसकी वितरण प्रणाली तालमेल नहीं बिठा पा रही है। मल्टीप्लेक्स आने के बाद प्रदर्शन में सुधार हुआ है। अब वितरण में सुधार आवश्यक है। दर्शकों तक फिल्म पहुंचाने के तीन चरणों में निर्माण, वितरण और प्रदर्शन में वितरण ही वह कड़ी है, जो फिल्मों को थिएटर तक ले जाती है। फिल्मों के प्रदर्शन का विस्तार हो चुका है। अब केवल थिएटर ही माध्यम नहीं रह गया है। रिलीज होने के बाद हर फिल्म देर-सबेर सैटेलाइट, टीवी, इंटरनेट, मोबाइल, डीवीडी आदि के जरिए दर्शकों तक पहुंच रही है। आम दर्शक विभिन्न माध्यमों से फिल्में देख रहे हैं, जबकि पुरानी वितरण प्रणाली अभी तक थिएटर को ही ध्यान में रख कर रणनीति बनाती है। थिएटर रिलीज में भी बड़ी और महंगी फिल्में छोटी फिल्मों के शो निगल जाती हैं। सम्यक सोच और व्यवस्था के अभाव में छोटी फिल्में दर्शकों के बावजूद थिएटर से उतार दी जाती हैं। वक्त आ गया है कि निर्माता और फिल्मकार वितरण के आवश्यक सुधार पर ध्यान दें और पहल करें।
    थिएटर में वीकएंड कलेक्शन पर जोर दिया जाता है। बड़ी फिल्मों के अधिकतम प्रिंट एक साथ जारी किए जाते हैं। कोशिश रहती है कि जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा दर्शक देख लें। इन दिनों कोई भी फिल्म दो हफ्ते से च्यादा थिएटर में नहीं टिकती। 100 करोड़ का जादुई आंकड़ा पार करने वाली फिल्मों मं दर्शकों की धारा भी दो हफ्ते के बाद सूख जाती है। निर्माता मांग करते रहे हैं कि थिएटर रिलीज के साथ ही अन्य माध्यमों से फिल्में रिलीज कर दी जाएं ताकि दर्शक पायरेटेड डीवीडी न खरीदें। अभी मल्टीप्लेक्स के महंगे होने और अन्य सस्ते माध्यमों पर फिल्म उपलब्ध न होने से मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय दर्शक पायरेटेड डीवीडी खरीद लेते हैं। ऐसा वे लाचारी में ही करते हैं, क्योंकि मल्टीप्लेक्स में प्रति व्यक्ति कम से कम 200 रुपए के टिकट खरीदना सस्ता सौदा नहीं है। निर्माता मानते हैं कि फिल्मों का जिस तरह से जोरदार प्रचार किया जा रहा है, उसका समुचित लाभ एक साथ अनेक माध्यमों से फिल्मों के प्रदर्शन से ही हो सकता है।
    फिल्मकार आग्रह कर रहे हैं कि अब सभी माध्यमों पर एक ही दिन फिल्में रिलीज हों। एक तो इस से पायरेसी कम होगी और दूसरे अधिकाधिक दर्शक मिलेंगे। सभी को मालूम है कि दर्शकों का बड़ा हिस्सा अवैध डाउनलोड या पायरेसी का सहारा ले रहा है। अगर उसे किफायती दर पर अपनी पहुंच के माध्यम से फिल्में पहले ही दिन से देखने को मिल जाएं तो वह क्यों विकल्पों की तलाश करेगा? बड़े शहरों में मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने सिंगल स्क्रीन थिएटर खत्म कर दिए हैं। दर्शकों का बड़ा समूह इन इलाकों में थिएटरों से बहिष्कृत हो गया है। वह बदले की भावना से भी पायरेसी का सहारा लेता है। किसी भी शहर के मल्टीप्लेक्स के इलाके के दर्शकों का सर्वेक्षण कर इसे जांचा जा सकता है?
    एक मांग यह भी चल रही है कि क्यों न सोमवार को ही पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म टीवी पर दिखा दी जाए। पिछले सालों में कुछ छोटी फिल्मों ने जल्दी टीवी टेलीकास्ट के तरीके से अपना नुकसान कम किया। बड़ी फिल्मों के लिए भी यह किया जा सकता है। अभी सहज आकलन या अनुमान नहीं किया जा सकता कि शुक्रवार या सोमवार को फिल्मों को टेलीकास्ट हो जाए तो निर्माता किस अनुपात में फायदा बढ़ा सकता है? समाज में बाजार के बढ़ते प्रभाव की वजह से फिल्मकार केवल सर्जक नहीं रह गया है। कुछ समय पहले तक फिल्मकार केवल फिल्म बनाने के बारे में सोचता था और अपनी मजदूरी से संतुष्ट रहता था। अब वह मुनाफे में हिस्सा चाहता है। उसे मालूम हो चुका है कि उसके सृजन से निर्माता और वितरक कितना लाभ उठा रहे हैं?
    सोचने की जरूरत है कि सिनेमा की मेकिंग सस्ती होने से उसका लोकतंत्रीकरण हुआ है। सस्ते कैमरे और एडीटिंग इंतजाम से युवा फिल्मकारों को फायदा हुआ है। वे  कम लागत में अपनी सोच को फिल्म का रूप दे देते हैं। समस्या उनके वितरण और प्रदर्शन की है। तकनीकी सुधार से यह संभव है। डिजिटाइजेशन या ऑन लाइन के उपयोग से फिल्मों के वितरण में भारी बदलाव लाया जा सकता है। अब फिल्में किसी एक भौगोलिक सीमा की कलावस्तु नहीं रह गई हैं। सभी देशों के नागरिक सभी देशों में निवास कर रहे हैं। वे अपने देश और भाषा की फिल्म रिलीज के तुरंत बाद देखना चाहते हैं। अगर कोई भी फिल्म एक ही दिन सभी प्लेटफॉर्म से विश्व भर में रिलीज की जाती है तो दर्शकों के साथ ही निर्माताओं को भी फायदा होगा। इस से वितरण प्रणाली से जुड़े व्यक्तियों को भी लाभ होगा।
    जरूरत है कि पुरानी पड़ चुकी वितरण प्रणाली को बदलने के बारे में हम सोचना आरंभ करें।

Comments

Anonymous said…
मुझे कभी भी सिनेमाघर पसंद नहीं आये| तीन घंटे लगातार एक आसन पर बैठे रहने को मजबूर मुझे तो पतंजलि जी की साजिश लगती है| आसन करो पैसा भी दो|
भावुक हूँ थोड़ा सा, जब भावना में बहने लगता हूँ तब तक फिल्म रफ़्तार से भाग जाती है और मैं कदमताल नहीं मिला पाता|
अगर डीवीडी और यु – ट्यूब जैसे विकल्प हो तो ठीक है, जब मन आये जितना आये देखो, मन चाहे अल्प-विराम और विराम ले लो|
सीधे फिल्मकार से दर्शक (बी2सी) का भी कुछ रास्ता निकालिए|

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