दरअसल : ...इसलिए नहीं चली ‘जय हो’


-अजय ब्रह्मात्मज
    लोकप्रिय सितारों की हल्की पड़ती चमक के भी कारण कहीं और खोज लिए जाते हैं। बता दिया जाता है कि दर्शकों और सितारों के बीच किसी वजह से धुंध आ गई थी,इसलिए चमक धुधली हुई है। ये वजहें अतार्किक और बचकानी भी हो सकती हैं। दो हफ्ते पहले सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ रिलीज हुई अपेक्षा के मुताबिक इस फिल्म के कलेक्शन नहीं हुए। स्वयं सलमान खान भी हैरान रहे। वे फिल्म चलने की वजह खुद खोजें या बताएं, इसके पहले ही कुछ ट्रेड पंडितों ने उनके स्टारडम के बचाव ढूंढ निकाले। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निमंत्रण पर सैफई महोत्सव में शरीक होना और अहमदाबाद जाकर वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ पतंग उड़ाना ‘जय हो’ के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
    कहा जा रहा है कि मुस्लिम संगठनों और नेताओं की अपील पर देश के मुसलमान दर्शकों ने ‘जय हो’ और सलमान खान का बहिष्कार कर दिया। वे फिल्म देखने ही नहीं गए। इस तर्क का एक अव्यक्त पहलू है कि सलमान खान की कामयाब फिल्में कथित मुसलमान दर्शकों की वजह से ही चलीं। देश के दर्शकों का यह विभाजन ट्रेड सर्किल करता रहा है। पहले ये विचार और मीमांसा ट्रेड पंडित, वितरक और प्रदर्शकों के बीच रहते थे। पहली बार किसी फिल्म की नाकामयाबी की वजह सार्वजनिक तौर पर ‘मुसलमान’ दर्शकों में खोजी जा रही है। ट्रेड विश्लेषण का यह सही तरीका नहीं है। इसके परिणाम और निष्कर्ष भयंकर हो सकते हैं।
    देश के लोकप्रिय खानत्रयी नाम और धर्म से अवश्य मुसलमान हैं, लेकिन व्यवहारिक तौर पर उनके दर्शक सभी धर्मों, संप्रदायों, जातियों और अब तो गैरहिंदी भाषियों के बीच भी हैं। दर्शकों की पसंद-नापसंद में अभी तक धर्म के दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष विचार नहीं किया गया था। ‘जय हो’ की असफलता में ‘मुसलमान’ कारक को लाकर ट्रेड पंडितों ने विश्लेषण को जटिल आयाम दे दिया है। मुझे नहीं लगता कि किसी संगठन या नेता के आह्वान से अभी तक किसी फिल्म की कामयाबी या नाकामयाबी पर भारी असर पड़ा है। ‘जय हो’ का कलेक्शन आधे से कम रहा। पहले शो या प्रदर्शन में विघ्न आने से अवश्य कलेक्शन के कुछ प्रतिशत घट जाते रहे हैं, जैसा कि हम ने ‘फना’ पर गुजरात में लगी पाबंदी और मुंबई में हुए ‘माई नेम इज खाऩ’ के विरोध के समय देखने को मिला था।
    दरअसल, ट्रेड पंडितों ने सलमान खान के स्टारडम को बचाए रखने का यह तोड़ निकाला है। उनके दिए तर्क से सलमान खान की लोकप्रियता पर आंच नहीं आती। फिल्म के न चलने की कोई और वजह बताकर वे सलमान खान के स्टारडम और पॉपुलैरिटी को अक्षुण्ण रखने की कोशिश कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि सोहेल खान निर्देशित ‘जय हो’ बुरी फिल्म है। ‘वांटेड’  के बाद से लगातार सफल रहे सलमान खान को लग रहा था कि उन्हें कामयाबी का फार्मूला मिल गया है। और सिर्फ उन्हें ही क्यों? बाकी सितारों का भी यह भ्रम मजबूत हुआ कि ऐसी मसाला फिल्में दर्शक पसंद करते हैं। इस तरह की फिल्में चलीं और खूब चलीं। खुद सलमान खान ही ‘एक था टायगर’ के समय से कह रहे हैं कि इस फार्मूले का अतिरिक्त दोहन हो चुका है। उनकी सोच सही निकली, लेकिन नतीजा उनकी ‘जय हो’ से समाने आया। यह बात उन्हें अखर रही होगी।
    हिंदी फिल्मों के आम दर्शक आज भी मसाले-फार्मूले में पगी, प्यार, बदला और रोमांस की लार्जर दैन लाइफ स्टोरी पसंद करते हैं। मसालों के हेरफेर और फार्मूले के उलटफेर से 1932 से हम ऐसी ही सफल फिल्में देखते आ रहे हैं। बीच-बीच में कभी कोई नया ट्रेंड बनाना और मजबूत होता दिखाई पड़ता है, लेकिन कुछ सालों में ही यह दम तोड़ देता है। अभी स्वतंत्र निर्माताओं, सीमित बजट, नॉन स्टारर और नए विषयों की फिल्में पसंद की जा रही हैं। पिछले कुछ सालों से हर साल 4-6 ऐसी फिल्मों को पुरस्कार और व्यापार दोनों मिल रहा है। इसके बावजूद इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सता कि हिंदी फिल्में ज्यादातर स्टार और फार्मूले के दम पर ही चलती हैं। हां, स्टार लगातार बदलते रहते हैं।
    खानत्रयी पिछले 20-25 सालों में इस पोजीशन में पहुंची है, लेकिन अब उनके स्टारडम के दिन गिने हुए हैं। नई पीढ़ी ने दस्तक दे दी है। दर्शक नए सितारों को विश्वास और प्यार दे रहे हैं। यह भी एक सच्चाई है कि हिंदी फिल्मों में शीर्ष की जगह पर 5-6 सितारे ही रहते हैं। कोई नया आता है तो किसी पुराने को जगह खाली करनी पड़ती है। संकेत मिलने लगे हैं, लेकिन बुझते दीयों की लपलपाती लौ की तरह इन सितारों की कुछ फिल्मों की सफलता भ्रम पैदा करती है कि उनके दिन लदे नहीं हैं।

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