रतलाम की गलियां

चवन्नी तो रवि रतलामी की वजह से रतलाम को जानता था.उसने अभी जब वी मेट फिल्म देखी.इसमें शाहिद कपूर के पीछे उतरी करीना की ट्रेन छोट जाती है तो वह शहीद पर ट्रेन पकड़वाने का दवाब डालती है.दोनों टैक्सी से रतलाम स्टेशन पहुँचते हैं.सामने प्लेटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी है ,लेकिन करीना पानी के बोतल की ज्यादा कीमत के लिए उलझ जाती है और कंज्यूमर कोर्ट में जाने तक की बात करती है.इस बहस में उसकी ट्रेन फिर से छोट जाती है.फिर रतलाम रात की बाँहों में दिखाई पड़ता है.कुछ मनचले दिखते हैं.ऐसे मनचले हर शहर में प्लेटफॉर्म और बस स्टैंड पर मिल जायेंगे.चवन्नी को याद है कि कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों की शामें स्टेशन पर ही गुजरती थीं.उन्हें ट्रेन के आने-जाने का पूरा आईडिया रहता था.यहाँ तक तो सब सही लगता है।
करीना प्लेटफॉर्म से बाहर आती है तो स्टेशन के बाहर उन औरतों के बीच अनजाने में खड़ी हो जाती है ,जो रात के ग्राहकों के इंतज़ार में हैं.तभी एक युवक मोटर साइकिल पर आता है और करीना से सौदा करता है.करीना उसे समझती है कि वह उस टाइप की नही है.वह युवक पीछे ही पड़ जाता है तो भागती है.संयोग से उसे फिर से शाहिद कपूर दिखता है.वह उस से जाकर चिपक जाती है.उसकी जान बचती है और जिस्म भी.अब दोनों रात भर के लिए एह होटल में जाते हैं.डिसेंट होटल में घंटों के हिसाब से कमरे मिलते हैं.रात में होटल पर छपा पड़ता है और पता चलता है कि हर कमरे में लड़कियां अपने ग्राहकों के साथ थीं।
इम्तियाज़ अली की इस खूबसूरत फिल्म में रतलाम की गलियों की खूब तारीफ होती है.ऐसा लगता है कि कोई शायर दिल्ली की गलियों के तर्ज पर रतलाम की गलियों की तारीफ कर रहा हो।शायद पहली बार किसी फिल्म रतलाम शहर का ऐसा जिक्र हुआ है।
चवन्नी को एक बात खटकी कि क्या रतलाम की रात दिखने के लिए धन्धेवाली औरतों को ही दिखाना ज़रूरी था.रवि रतलामी बता सकते हैं कि रतलाम स्टेशन के आसपास और डिसेंट होटल का क्या माहौल है?चवन्नी को तो रतलाम की रात का यह चित्रण नही जमा.

Comments

फ़िल्म देखी नही है मैने अभी लेकिन जिस तरीके से आप बता रहे हैं वो खटकने वाली बात है ही!!

शुक्रिया इस बात का कि आपने ब्लॉग का टेम्प्लेट बदल दिया, यह पहले से बेहतर लग रहा है!!
सही सवाल उठाया है आप ने.. मैंने अनदेखा कर दिया था इसे.. (देखिये ये फ़िल्म की ताकत ही तो है.. )
और टेम्पलेट बदल दिया.. अच्छा लग रहा है..
आपका सही कहना है. रतलाम को बहुत ही ग़लत तरीके से चित्रित किया गया है. स्टेशन पर छेड़ छाड़ करने वालों की नहीं, बल्कि झाबुआ निमाड से दिल्ली मुम्बई (यह इन दोनों स्थानों से ठीक बीचों बीच की दूरी पर है) खाने-कमाने जाने वाले आदिवासी यात्रियों की भीड़ रहती है, और रतलामी सेव बेचने वाले ठेले खोमचों का रेलमपेल रहता है. यहाँ के निवासियों को रतलामी नमकीन, समोसे कचौरी से ही फुरसत नहीं मिलती तो वे छेड़छाड़ क्या करेंगे!

अगर मैं कोई एक्टिविस्ट होता तो जरूर ही रतलाम का नाम बदनाम करने के नाम पर निर्माता निर्देशक को कोर्ट में घसीटता - परंतु रुकिए, शायद निर्माता निर्देशक भी यही चाहते हैं ताकि उनकी फ़िल्म चल निकले. मगर यकीन मानिए, हम सीधे सरल रतलामी ये काम नहीं करेंगे. कदापि नहीं करेंगे:)
Vikas Shukla said…
चवन्नीजी,
कल और परसों मै पूनामें था और वहा मैने ये फिल्म देखी. फिल्म एकदम मजेदार है. आजतक मुझे करीना किसीभी फिल्ममे पसंद नहीं आयी थी (मैने ओम्कारा और देव देखी नही है) मगर इस फिल्मसे मै उसे पसंद करने लगा. नायिका गीत का जो कॅरेक्टर करीना ने पकडा है वो केवल लाजवाब है. फिल्म गतिमान है, नेत्रसुखद है. संगीत बहुतही बढिया है विशेष कर "नगाडा नगाडा", "ये इश्क हाये बैठे बिठाये" और " मौजा हे मौजा" ये तीनों गीत जुबापे तुरंत चढ जाते है. अब रही रतलाम वालोंको खटकने वाली बात. रतलाम शायद आजतक किसी फिल्ममें आया ही नही है. कहानीमे रतलाम नही आता तो शायद कोई और स्टेशन आ जाता था. रेल्वे स्टेशन के बाहर वेश्याओंने खडा रहना या किसी लॉजपर वेश्याव्यवसाय चलना ये तो आम बात है. किसीभी शहरमें ये हो सकता है. रतलाम वालोंने इस बातको स्पोर्टिंग स्पिरिटमे लेना चाहिये ऐसा मुझे लगता है. मुझे पूरे फिल्म में बस एकही बात खटकी. रतलाम स्टेशनके बाहरके इस प्रसंगमें मराठी फिल्म पिंजरा का ’मला लागली कुणाची उचकी" ये मराठी गीत बजता हुवा सुनाई देता है. हिंदी भाषी प्रदेशमे मराठी गीतका बजना जरा आश्चर्यकारक लगता है. बस इतनाही.
अभयजी के ब्लागरोल के ज़रिये पहली बार आपके धाम आया हूं। मज़ा आया।

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