दरअसल:नहीं दिखेंगी नई फिल्में


हिंदी फिल्मों के दर्शकों के लिए अगले दो महीने मुश्किल में गुजरेंगे। कोई नई या बड़ी फिल्म रिलीज नहीं होगी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मल्टीप्लेक्स मालिकों और निर्माताओं के बीच लाभांश को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। अगर बात नहीं बनी, तो घोषणा के मुताबिक अप्रैल के अंत तक कोई नई फिल्म मल्टीप्लेक्स में नहीं लगेगी। फिलहाल 8बाई10 तस्वीर के बाद अक्षय कुमार की 29 मई को फिल्म कमबख्त इश्क का रिलीज होना तय है।
खास बात यह है कि अभी से लेकर 29 मई के बीच कोई भी बड़ी फिल्म रिलीज नहीं हो रही है। ज्यादातर निर्माता आईपीएल की वजह से अपनी फिल्मों की रिलीज आगे बढ़ा चुके थे। हालांकि आईपीएल अब भारत की भूमि से निकल चुका है, फिर भी निर्माता इस दरम्यान अपनी फिल्में रिलीज नहीं कर रहे हैं। माना जा रहा है कि आईपीएल दुनिया में कहीं भी आयोजित हो, उसका सीधा प्रसारण भारत में होगा ही।
पिछले साल का अनुभव बताता है कि दर्शक आईपीएल के सीजन में सिनेमाघरों का रुख नहीं करते। इसके अलावा, इस बार चुनाव भी है। अप्रैल के मध्य से चुनाव आरंभ होंगे और अलग-अलग तारीखों को विभिन्न प्रदेशों के मतदाता बॉक्स ऑफिस के बजाए पोलिंग बूथ पर नजर आएंगे।
राजनीति, क्रिकेट और फिल्म.., इन तीनों क्षेत्र में देश के तमाम नागरिकों की रुचि रहती है। जाहिर है कि अगर दो क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ेगी, तो तीसरे क्षेत्र पर नागरिकों का ध्यान कम ही जाएगा। इसलिए निर्माताओं ने चुनाव और क्रिकेट के सीजन में फिल्म रिलीज कर नुकसान उठाने से बेहतर समझा कि रिलीज की तारीखें आगे बढ़ा दी जाएं। पहले भी विशेष अवसरों पर फिल्मों की रिलीज आगे-पीछे की जाती रही हैं! पिछले साल आईपीएल की लोकप्रियता से फिल्म निर्माताओं को भारी झटका लगा था। चूंकि पिछला साल आईपीएल का पहला साल था, इसलिए नए प्रकार के क्रिकेट के प्रभाव से निर्माता अनभिज्ञ थे। कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है। इसलिए इस बार निर्माता और वितरक सावधान हैं। 0
अब अहम सवाल यह है कि क्या दर्शक लगभग दो महीनों तक बगैर नई फिल्में देखे रह पाएंगे? वे आईपीएल या चुनाव में कितने दिन तक उलझे रहेंगे? फुर्सत मिलते ही उन्हें मनोरंजन के पारंपरिक माध्यम सिनेमा का सहारा चाहिए। हर किसी की रुचि क्रिकेट में नहीं होती। ऐसे दर्शकों का काम कैसे चलेगा? समस्या सिनेमाघरों के मालिकों को भी झेलनी होगी। दो महीनों तक नई फिल्मों के अभाव में वे सिनेमाघर के आवश्यक खर्च कहां से निकालेंगे? अगर नियमित आमदनी नहीं हो रही हो, तो उन्हें कर्मचारियों को दो महीने का वेतन देना भारी पड़ेगा। क्या ऐसे में पुरानी फिल्मों के प्रदर्शन से काम चलाया जाएगा?
स्तंभ के आरंभ में मल्टीप्लेक्स मालिक और निर्माताओं के बीच पैदा हुए गतिरोध का उल्लेख हुआ है। यह एक बड़ा मुद्दा है। लाभांश के मामले में फिलहाल कोई झुकता नहीं दिख रहा है। हमने देखा कि पिछले दिनों आ देखें जरा इसी विवाद के कारण मल्टीप्लेक्स में रिलीज नहीं हो पाई। दोनों पक्षों के अपने तर्क और आग्रह हैं। फिल्म के ट्रेड पंडितों का एक समूह मानता है कि मल्टीप्लेक्स के मालिकों का स्टैंड गलत है। उन्हें लाभांश के मामले में निर्माताओं के 50-50 शेयरिंग का प्रस्ताव मान लेना चाहिए। यह दोनों के हित में है।
गौरतलब है कि अभी तक मल्टीप्लेक्स के मालिक हर फिल्म की रिलीज के समय निर्माताओं से लाभांश का सौदा करते हैं, लेकिन अब निर्माता चाहते हैं कि कोई सर्वमान्य फार्मूला तय हो जाए, ताकि हर हफ्ते की झंझट और अनिश्चितता से निजात मिले।
गतिरोध और नई फिल्मों के सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पाने की स्थिति में नुकसान दर्शकों का ही होगा। दर्शक सिनेमाघरों में नहीं जा सकेंगे। इसका सीधा प्रभाव फिल्म बिजनेस पर पड़ेगा और ऐसी स्थिति में सिनेमाघरों के मालिकों और निर्माताओं पर भी इसका असर पड़ेगा। कुल मिलाकर सभी के लिए घाटे की स्थिति है, लेकिन कोई भी समझने को तैयार नहीं है।

Comments

media narad said…
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