दरअसल:देसी दर्शकों से बेपरवाह फिल्म इंडस्ट्री

-अजय ब्रह्मात्मज
मल्टीप्लेक्स मालिकों और निर्माता-वितरकों के बीच फिलहाल कोई समझौता होता नहीं दिख रहा है। अपवाद के तौर पर 8 बाई 10 तस्वीर रिलीज हुई, क्योंकि उसकी रिलीज तारीख पूर्वनिश्चित थी और उसके निर्माता ने फिल्म के प्रचार में काफी पैसे खर्च किए थे। पिछले दिनों जब निर्माता और वितरकों की तरफ से आमिर और शाहरुख खान मीडिया से मिलने आए थे, तब यही तर्क दिया गया था। उस समय न तो किसी ने पूछा और न ही किसी ने अपनी तरफ से बताया कि आ देखें जरा क्यों मल्टीप्लेक्स में नहीं पहुंच सकी! एक आशंका जरूर व्यक्त की गई कि अगर शाहरुख, आमिर, यश चोपड़ा या यूटीवी की फिल्म अभी रिलीज पर रहती, तो क्या तब भी इतना ही सख्त रवैया होता?
इस आशंका में ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की दोहरी नीति का सच छिपा है। आमिर खान ने चलते-फिरते अंदाज में बताया कि लाभांश शेयरिंग का मामला गजनी के समय ही तूल पकड़ चुका था, लेकिन तब उन्होंने इसे टाला। वे नहीं चाहते थे कि कोई यह कहे कि आमिर अपनी फिल्म के लिए यह सब कर रहे हैं! दोनों पक्षों की ढील और जिद में तीन महीने गुजर गए। इन तीन महीनों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने हर तरह से दबाव बनाया, लेकिन फिर भी मल्टीप्लेक्स मालिकों की एकजुटता बढ़ती गई! फिलहाल देश भर के 240 मल्टीप्लेक्स के 750 स्क्रीन की कमाई की हिस्सेदारी के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने 11,000 सिंगल स्क्रीन थिएटरों के दर्शकों को नई फिल्मों से वंचित कर दिया है।
कथित मल्टीप्लेक्स संस्कृति के प्रसार के बाद से ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर यह आरोप लगता रहा है कि वह देसी दर्शकों से बेपरवाह हो चुकी है। चूंकि हिंदी फिल्मों को प्रमुख रूप से महानगरों के मल्टीप्लेक्स और ओवरसीज से आमदनी हो रही है, इसलिए कंटेंट भी मुख्य रूप से शहरी हो गया है। कुछ निर्देशकों की फिल्में विदेश्ी लोकेशन और पृष्ठभूमि की होने लगी हैं।
ऐसी फिल्मों के किरदार आप्रवासी भारतीय या भारतवंशी होते हैं। नतीजा यह है कि हाल-फिलहाल की हिंदी फिल्मों से देहात गायब हो गए हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की इसी सेच के विस्तार के रूप में हम सिंगल स्क्रीन थिएटर के दर्शकों के प्रति उनकी उदासीनता को देख सकते हैं। निर्माता और वितरकों ने सिंगल स्क्रीन के पारंपरिक दर्शकों की कोई चिंता नहीं की। उन्होंने एक झटके में बेकसूर देसी दर्शकों और सिंगल स्क्रीन थिएटरों के मालिकों को मनोरंजन और रेगुलर व्यवसाय से वंचित कर दिया। वंचित तो शहर के दर्शक भी हुए हैं, लेकिन उनके पास मनोरंजन के और भी साधन हैं। शहरी दर्शकों का आंशिक हिस्सा अंग्रेजी फिल्मों से काम चला रहा है। वर्तमान स्थिति में सबसे ज्यादा घाटे में देसी दर्शक ही हैं।
हालांकि निर्माताओं की तरफ से मुकेश भट्ट ने आश्वस्त किया था कि गतिरोध लंबा खिंचा, तो वे कोई और रास्ता खोजेंगे। उन्होंने सिंगल स्क्रीन थिएटरों के मालिकों को इंडस्ट्री का दोस्त बता कर फिलहाल साथ देने का आग्रह किया है। सवाल है कि जिसका कोई कसूर नहीं, उसे क्यों सजा दी जा रही है? स्पष्ट रूप से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मुख्य चिंता मल्टीप्लेक्स से होने वाली आमदनी है। अपने लाभ के लिए देसी दर्शकों की बलि चढ़ाने में वह नहीं झिझकी।
दरअसल, फिल्में एक प्रोडक्ट बन चुकी हैं और फिल्म वितरण और प्रदर्शन अब शुद्ध व्यवसाय बन चुका है। नई परिस्थिति में दर्शक ग्राहक हैं। जाहिर-सी बात है कि जो ग्राहक ज्यादा पैसे खर्च करता है, फिल्म इंडस्ट्री उसकी परवाह करती है। देसी दर्शक आज भी 20 रुपए में फिल्में देखते हैं, जबकि शहरी दर्शक औसतन 200 रुपए खर्च करने में भी नहीं कतराते!

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