अमरपक्षी अमिताभ बच्‍चन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मादाम तुसाद के लंदन स्थित संग्रहालय में अमिताभ बच्चन का मोम का पुतला मौजूद है। इस पुतले को सुरक्षित रखने के लिए विशेष तापमान की जरूरत होती है। मोम के पुतले तो सुरक्षित रखे जा सकते हैं, लेकिन जिंदगी की तीखी और कड़ी धूप में हर तरह के पुतले पिघल जाते हैं। फिर भी हमारे साथ सभी मनुष्यों की तरह हाड़-मांस का बना एक ऐसा चलता-फिरता पुतला है, जो कई बार टूटता, गिरता, बिखरता और पिघलता दिखाई दिया ़ ़ ़ ऐसा लगा कि अब इस पुतले को नहीं बचाया जा सकता। आलोचकों ने श्रद्वांजलियां भी लिख डालीं, लेकिन एक अंतराल के बाद अपनी ही जीवनी शक्ति से यह पुतला अधिक ऊर्जा के साथ उठ खड़ा हुआ। पहले से ज्यादा वेगवान और ताकतवर नजर आया। हम जिस पुतले की बात कर रहे हैं, वे हम सभी के चहेते अमिताभ बच्चन हैं, जो सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति के दम पर अपने नाम को चरितार्थ कर रहे हैं। उम्र के साथ उनकी ऊर्जा बढ़ती जा रही है। हम चाहेंगे कि वे यों ही बढ़ते, दमकते और चमकते रहें।

[तीन चित्रात्मक प्रतीक]

पिछले हफ्ते ही उनका नया शो बिग बॉस आरंभ हुआ है। इसके विज्ञापन में उनकी तीन तस्वीरों की होर्डिग पूरे देश में लगी है। एक तस्वीर में वे कांच में बंद नाचती गुड़िया के सामने बैठे हैं। दूसरी तस्वीर में उनके सामने फिश बॉल में तैरती सोनमछलियां हैं और तीसरी तस्वीर में एक गिरगिट है। तीनों ही तस्वीरों में अमिताभ बच्चन सोचने की मुद्रा में कैमरे में देख रहे हैं। इन तस्वीरों के भाव और बिंब बिग बॉस के प्रतियोगियों के निमित्त हैं, लेकिन प्रतीकात्मक रूप में ये स्वयं अमिताभ बच्चन पर भी लागू होते हैं। पहली तस्वीर की कांच की गुड़िया की तरह ही चौबीसों घंटे दुनिया की नजर में रहते हुए भी वे अपना स्वाभाविक संतुलन नहीं खोते हैं। अमिताभ बच्चन ने अपनी प्रसिद्धि को हमेशा प्रशंसकों के प्रेम और आशीर्वाद के रूप में लिया। दूसरी तस्वीर की सोनमछलियों की तरह अमिताभ बच्चन को भी अब प्राकृतिक वातावरण से अलग विशेष माहौल में जीना पड़ता है। फिर भी गौर करें कि उनकी संवेदना और स्पंदन में कोई कमी नहीं आई है। इसकी बानगी उनके ब्लॉग पर व्यक्त हो रहे विचार हैं। तीसरी तस्वीर गिरगिट की है, जो सकारात्मक रूप में लें तो हर अभिनेता का स्वभाव होता है। हमारी अपेक्षा रहती है कि हर चरित्र के साथ उसका रंग और रूप बदले। अपने चालीस सालों के कॅरिअर में अमिताभ बच्चन ने अनगिनत चरित्रों को धारण करने के बावजूद अपनी वैयक्तिकता बरकरार रखी है। प्रकारांतर से तीनों विज्ञापन अमिताभ बच्चन के बारे में भी बताते हैं।

[पारिवारिक मूल्यों के पक्षधर]

हिंदी के कवि और गद्यकार हरिवंश राय बच्चन के मध्यवर्गीय परिवार में पले-बढ़े और भारतीय संस्कारों में समृद्ध अमिताभ बच्चन ने संयुक्त परिवार के मूल्यों को अपने व्यवहार से स्थापित किया। उन्होंने माता-पिता को अपने साथ रखा और अब उनके ख्यातिलब्ध बेटे-बहू उनके साथ रहते हैं। पिछले दिनों ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक मशहूर टीवी होस्ट ओपरा विनफ्रे के मेहमान थे। उस शो में दोनों का परिचय देते हुए ओपरा ने जोर देकर बताया और दो बार दोहराया कि दोनों अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। भारतीय संदर्भ में यह मामूली और साधारण बात लग सकती है, लेकिन पश्चिम के पूंजीवादी समाज में बिखर और टूट रहे परिवारों के बीच जब किसी भारतीय सेलिब्रिटी के संयुक्त परिवार में साथ रहने का उदाहरण सामने आता है तो उसका प्रभाव व्यापक और दूरगामी होता है। अमिताभ बच्चन ने नितांत वैयक्तिक छवि के लिए छटपटा रहे माहौल में आदर्श बेटे, पति और पिता की भारतीय छवि को मजबूत किया है। पिता की कृति और कृत्यों के आगे खुद को छोटा और तुच्छ बना कर वे अपने प्रशंसकों की निगाह में अधिक बड़े और महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

[अप्रतिम इच्छाशक्ति के धनी]

है कुछ बात उनमें ़ ़ ़ तभी तो अवसरों और स्थितियों से ठुकराए जाने के बाद मटियामेट होने की जगह पौराणिक अग्निपक्षी की तरह वे फिर से उठ खड़े होते हैं। सात हिंदुस्तानी जैसी गैरपारंपरिक और असामान्य फिल्म से शुरूआत करने और उसके बाद भी विभिन्न बैनरों, निर्माताओं और निर्देशकों द्वारा तिरस्कृत, अपमानित और नजरअंदाज किए जाने के बावजूद अमिताभ बच्चन ने मेनस्ट्रीम फिल्मों में अपनी जगह बनायी। बाक्स आफिस कलेक्शन और दर्शकों के बीच अप्रतिम लोकप्रियता की वजह से उन्हें 'वन मैन इंडस्ट्री' का खिताब दिया गया। याद करें कि हृषीकेष मुखर्जी और कुंदन कुमार की फिल्मों की चंद रीलों की शूटिंग के बाद फिल्म से हटा दिए जाने पर भी उन्होंने आत्मबल नहीं खोया। वे अपनी इच्छाशक्ति के दम पर टिके रहे। कुली की दुर्घटना से आए व्यवधान, खुदा गवाह के बाद फिल्मी करिअर में आए उतार, एबीसीएल के क्रिएटिव एडवेंचर से हुए आर्थिक नुकसान, राजनीति के संक्षिप्त प्रवास में लगे आक्षेप और बेटे की शादी के समय हुए सामाजिक और मीडिया बहिष्कार के बावजूद अमिताभ बच्चन आज भी एक्टिव हैं। वे आक्षेपों और आरोपों से बेदाग निकले। उन्होंने कॅरिअर की हर फिसलन को अगली छलांग और ऊंचाई की पींग के रूप में इस्तेमाल किया। अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे यश चोपड़ा से फिल्म मांगने गए थे और तब आदित्य चोपड़ा ने उन्हें मोहब्बतें फिल्म दी थी। कौन बनेगा करोड़पति होस्ट करने के उनके ऐतिहासिक फैसले से सभी परिचित हैं। वे इसी शो से ऐसे मापदंड बन गए कि शाहरुख खान अपनी अदम्य लोकप्रियता के बावजूद स्टार प्लस के इसी शो की तृतीय कड़ी के लिए वह टीआरपी नहीं ला सके।

सब कुछ छोड़कर आगामी फिल्मों में उनके चरित्र की विविधता पर ही नजर डालें तो पता चल जाएगा कि हिंदी फिल्मों का यह अद्वितीय अभिनेता जीवन के उत्तरकाल में ऐसी लकीर खींचता जा रहा है, जिसे पार करना भविष्य के अभिनेताओं के लिए बड़ी चुनौती होगी। वे अलादीन में जिन्न बने हैं तो पा में बारह वर्ष के बालक की भूमिका निभा रहे हैं। कुणाल में प्रियदर्शी अशोक की भूमिका निभाएंगे तो रण में मीडिया टायकून के रूप में नजर आएंगे। तीन पत्ती और बुद्धं शरणं गच्छामि में वे अभिनय को नया विस्तार देंगे।

[धर्म पर अटूट है विश्वास]

अभिनय की अमित आभा से संपन्न अमिताभ बच्चन तुलसीदास कृत रामचरितमानस के सुंदरकांड और गीता का नियमित पाठ करते हैं। धार्मिकता के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने एक बार कहा था, ''हमें नहीं मालूम कि हमारे साथ कुछ खास क्यों घटता है और हमें यह भी नहीं मालूम कि हम कैसे उस घटना पर विजय पा लेते हैं। मैं जैसी परिस्थितियों से गुजरा हूं और उनमें मेरे शरीर ने जिस ढंग से रिएक्ट किया है, वह अचरज का विषय है। निस्संदेह इस रहस्य ने मुझे धार्मिक बना दिया है।'' हमें याद है कि पिछले साल जन्मदिन की पूर्वसंध्या को उनकी तबियत बिगड़ी थी और अपने जन्मदिन के दिन वे अस्पताल में थे। यह उनकी विल पॉवर ही है कि वे असाध्य बीमारियों को पछाड़ कर हमारे बीच आ जाते हैं। ऊंचे कद के अभिनेता अमिताभ बच्चन चलते समय लंबे डग भरते हैं। हम यही चाहेंगे कि वे सफलता और लोकप्रियता की अधिकतम दूरी और ऊंचाई नाप सकें।


महानायक अमिताभ बच्चन आज अपना 68वां जन्मदिन मना रहे है। उनके प्रशंसकों में बच्चों से लेकर हर आयु वर्ग के लोगों के साथ ही फिल्म जगत की शख्सियतें शामिल है-

[बच्चों को पढ़ाइए उनकी जीवनी: महेश भट्ट]

विवादास्पद फिल्मकार महेश भट्ट भी उनकी इच्छाशक्ति के प्रशंसक हैं। वे कहते हैं, ''अमिताभ हमारे समाज के रियल आइकॉन हैं। उनकी संक्षिप्त जीवनी बच्चों को पढ़ायी जानी चाहिए। उन्होंने विपरीत और प्रतिकूल परिस्थितियों में विल पॉवर की वजह से ही जगह बनायी। इंसान बाद में हारता और मरता है। सबसे पहले उसका विल पॉवर मरता है। अमिताभ बच्चन कई बार मंच से ओझल हुए, लेकिन हर बार वे नए अवतार में मंच पर उतरे। उन्होंने नए अंदाज में दर्शकों को दिल जीता। 1983 में कुली के सेट पर हुई घटना को याद करें तो किसी भी स्टार को अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता से ईष्र्या हो सकती है। और फिर लोकप्रियता की चरम ऊंचाई से गायब होने के बाद मोहब्बतें और कौन बनेगा करोड़पति से हुई उनकी धमाकेदार एंट्री की कल्पना कोई लेखक ही कर सकता है। रियल लाइफ में यह अविश्वसनीय लगता है।''

[अभिनय की जिंदा किताब हैं वे: अजय देवगन]

ज्यादातर अभिनेता और निर्देशक उनकी अभिनय क्षमता की विशेषताओं को परिभाषित नहीं कर पाते। सभी के लिए वे 'महान अभिनेता' हैं। अमिताभ बच्चन के बाद फिल्मों में आए सभी अभिनेता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनसे प्रभावित होने की बात स्वीकार करते हैं। अजय देवगन इस प्रभाव को बड़े अच्छे तरीके से रखते हैं, ''हमें नहीं मालूम कि हम किसी दृश्य में कब अमिताभ बच्चन की नकल कर जाते हैं। हमारी पीढ़ी के अभिनेता उनकी फिल्मों के साथ बड़े हुए हैं। अमित जी हमारे अंदर किसी संस्कार की तरह जिंदा हैं। फिल्मों में अभिनय करते समय मुझे अचानक एहसास होता है कि अरे ऐसा ही तो अमित जी ने फलां फिल्म में किया था। अपने अभिनय में उनके व्यक्तित्व के इस अप्रत्यक्ष प्रभाव को मैं निस्संकोच स्वीकार करता हूं। वे अभिनय की जिंदा किताब हैं

Comments

महानायक को आपके माध्यम से जन्मदिन की अनगिन बधाइयाँ.....बिलकुल ठीक लिखा है, आपने....
अजय जी,
अमिताभ जी को आपके ब्लाग के माध्यम से मैं भी जन्म्दिवस की हार्दिक शुभकामनायें भेज रहा हूं।
सच में उनके जैसे महानायक की छवि का इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा कि---
" जब कुली की शूटिंग के दौरान अमिताभ जी घायल हुये थे तो मेरे बाबा(85 वर्षीय) जी उनके जीवन रक्षा के लिये पूजाघर में लगातार बैठे रहते थे। सिर्फ़ एक ही वाक्य उनके मुंह से निकल रहा था ---हे प्रभु ,मेरे अमिताभ को ठीक कर दो।"
तो यह थी इस महानायक की लोकप्रियता । अमिताभ जी को पुनः हजारों वर्ष जीने की मंगल कामनाओं के साथ्।
हेमन्त कुमार
Ravi Shekhar said…
तुमने एक बार फिर सिद्ध किया - सितारों को चमक तुम्हारे जैसे पत्रकारों की कलम से मिलाती है - टीवी कैमरे ये काम नहीं कर सकते !

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