फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर-रवीश कुमार

 (चेतावनी- स्टाररहित ये समीक्षा काफी लंबी है समय हो तभी पढ़ें, समीक्षा पढ़ने के बाद फिल्म देखने का फैसला आपका होगा )

डिस्क्लेमर लगा देने से कि फिल्म और किरदार काल्पनिक है,कोई फिल्म काल्पनिक नहीं हो जाती है। गैंग्स आफ वासेपुर एक वास्तविक फिल्म है। जावेद अख़्तरीय लेखन का ज़माना गया कि कहानी ज़हन से का़ग़ज़ पर आ गई। उस प्रक्रिया ने भी दर्शकों को यादगार फिल्में दी हैं। लेकिन तारे ज़मीन पर, ब्लैक, पिपली लाइव,पान सिंह तोमर, विकी डोनर, खोसला का घोसला, चक दे इंडिया और गैंग्स आफ वासेपुर( कई नाम छूट भी सकते हैं) जैसी फिल्में ज़हन में पैदा नहीं होती हैं। वो बारीक रिसर्च से जुटाए गए तमाम पहलुओं से बनती हैं। जो लोग बिहार की राजनीति के कांग्रेसी दौर में पनपे माफिया राज और कोइलरी के किस्से को ज़रा सा भी जानते हैं वो समझ जायेंगे कि गैंग्स आफ वासेपुर पूरी तरह एक राजनीतिक फिल्म है और लाइसेंसी राज से लेकर उदारीकरण के मछलीपालन तक आते आते कार्पोरेट,पोलिटिक्स और गैंग के आदिम रिश्तों की असली कहानी है।

रामाधीर सिंह, सुल्तान, सरदार जैसे किरदारों के ज़रिये अनुराग ने वो भी दिखा दिया है जो इस फिल्म में नहीं दिखाई गई है। हिन्दू मुस्लिम अपराधिकरण के इस गठजोड़ का इस्तमाल राजनीति में सांप्रदायिकरण की मिसालों के रूप में खूब हुआ है। मगर उसके पहले तक यह गठजोड़ सिर्फ धंधा पानी में दावेदारी तक ही सीमित था। गैंग्स आफ वासेपुर एक राजनीतिक दस्तावेज़ है। इस फिल्म को इसलिए नहीं देखा जाना चाहिए कि किस समीक्षक ने कितने स्टार दिये हैं। इस फिल्म को इसलिए भी देख आइये कि ऐसी फिल्में बनने लगी हैं और सेंसर बोर्ड उन्हें पास भी करने लगा है( सेंसर बोर्ड के अफसरों को बधाई,पंकजा ठाकुर से मिला हूं तो उनका नाम लेकर लेकिन बाकी को भी बधाई)। गालियों के लिए नहीं बल्कि उन दृश्यों के लिए जिनके बिना यह फिल्म वास्तविक नहीं बन पाती। बड़े बड़े मांस के लोथड़ों के कटने की जगह से जो आपराधिक मिथक बनते हैं,यह सीन अगर सेंसर बोर्ड काट देता कि लोगों की भावना आहत हो सकती है तो फिल्म आइना बनने से रह जाती। संवादों में कोइलयरी की राजनीति और अपराधिकरण में टाटा थापर का नाम लेकर उस प्रक्रिया को बता देना आसान फैसला नहीं होगा। नूझ लैनल( मैं न्यूज़ चैनल नहीं कहता क्योंकि मुझे ये लैनल ही लगते हैं) में यह औकात है तो बता दीजिए।

अच्छा निर्देशक वो होता है जो अपनी कहानी के समय और उसके रंग को जानता हो। कैमरे की लाइटिंग, दिन और रात के शेड्स,बारिश के क्लोज अप्स,मोहल्ले की गलियां,गलियों के ढलान, कोने, पुराने अखबारों की कटिंग,धूल,बाल इन सबको एक निरंतरता में रखते हुए दृश्य रचता हो। अनुराग मिलते तो पूछता कि मनोज वाजपेयी के लिए गमछा तो मिल गया होगा लेकिन ईनार(कुआं) पर नहाने के वक्त जो अंडर वियर पहना है वो ब्रांडेड है या पटरी से खरीदा था। ईनार पर बाल्टी में फुले हुए कपड़े और गमछा लपेट कर मनोज का चलना कमाल का है। कट्टा का विवरण और चित्रण बेजोड़ है। फट के फ्लावर हो जाता है। ये संवाद रिसर्च से ही आ सकता है। गुल और ज़र्दे के डिब्बे में बम बनाना और फेंकना वास्तविक है। लुंगी पहनने का तरीका और पीछे फंसी हुई लुंगी को हल्के से खींचना यह सब डिटेलिंग पर्दे के दृश्यों को यादगार बनाते हैं। कलाकार को अभिव्यक्ति देते हैं। जिसने भी इस फिल्म की लाइटिंग की है वो कमाल का बंदा या बंदी होगी। अंधेरा कितने शेड्स में उभरता है,लाजवाब है।

मैं कहानी में नहीं जाना चाहता। कसाई के मोहल्लों के बहाने अनुराग ने  पीयूष मिश्रा के नैरेशन से ज़ाहिर कर दिया है कि एक समय था जब ये बस्तियां ठेकेदारों के गुर्गों की खदानें हुआ करती थीं। जिनका नब्बे के दशक में सांप्रदायिक अफवाहों में इस्तमाल किया गया। बिना इस डायनमिक्स के आप इस फिल्म को नहीं पढ़ सकते। फिल्म बनती है वासेपुर में। आज़ादी के पहले से, अंग्रेज़ों के आने और जाने के बीच, ट्रेन के लूटने का लंबा सीन, सरदार के बाप का मरना, सरदार का बनना,उसकी शादी,बच्चे। वो एक सामान्य मर्द है। मनोज वाजपेयी ने ऐसे किरदारों को अपने समाज में खूब देखा होगा,सुना होगा। सत्या में मनोज अपने बेहतरीन अभिनय से काल्पनिक हो जाते हैं तो वासेपुर में अपने शानदार अभिनय से वास्तविक। गिरिडिह गिरिडिह बोलने का अंदाज़, नली वाला मटन पीस चूसना, लड़की को ताकना,कुएं पर दुर्गा के साथ कपड़े धोते वक्त ताल से ताल मिलना,बंगालन का राजनीति में आना यह सब बिहार यूपी के आपराधिक होते समाज के वास्तविक किस्से हैं। आप इन्हें बिंदेश्वरी दूबे, सत्यदेव सिंह सूरजदेव सिंह बीपी सिन्हा जैसे असली नामों में सुन सकते हैं(जिसकी बेहतरीन चर्चा रंजन ऋतुराज ने अपने फेसबुक स्टेटस में की है) या फिर आप अपने स्थानीय मोहल्लों में उभरे ठेकेदारों और उनके गुर्गे की सुनी सुनाई कहानियों में खोज सकते हैं। कोयला माफिया के पनपने की प्रक्रिया के भीतर कितने उप-वृतांत हैं।

सरदार का अभिनय कमाल का है। मनोज वाजपेयी ने जितना बेहतरीन गुंडई के किरदार को उभारने में किया है उससे कहीं ज्यादा उनका अभिनय औरतों के सापेक्ष एक मर्दाना कमीनगी में दिखता है। मनोज को काफी फोलो किया है। लेकिन इस बार मनोज ने अपने कारतूस से वही निकाले जो हम सब देख चुके हैं। अगर नया वाजपेयी उभरता है तो वो सिर्फ नगमा और दुर्गा के बीच के संबंधों में फंसा मक्कार मनोज है। दानिश को गोली लगते वक्त और अंतिम दृश्य में ठेले पर गिरने का अभिनय काफी अच्छा है। कुएं के पास वो जिस तरह से दुर्गा से बात करते हैं और घर की सफाई करते वक्त जिस तरह से नगमा से बात करते हैं उसका सांस्कृतिक अध्ययन कोई फिल्म वाला करता रहेगा लेकिन हम जिस भोजपुरी समाज से आते हैं उसे देखकर गदगद हो गए। निश्चित रूप से दुर्गा और नगमा के बीच के अवसरों पर मनोज वाजपेयी ने अपने अभिनय को नया मुकाम दिया है। एक सीन में जिस सफाई से मनोज पांव उठाते हुए उठ खड़े होते हैं पता चलता है कि फिल्म में अभिनेता नहीं निर्देशक अभिनय कर रहा है। और बहुत सारे गुमनाम सहायक निर्देशक अपने निर्देशक के साथ खड़े हैं, तैयारी के साथ।

सरदार और औरतों के बीच के संबंध को अलग से देखा जाना चाहिए। नगमा और पीयूष मिश्रा के बीच जो संबंध होते होते रह गया और उससे जो फैज़ल पर असर पड़ा उसके लिए अनुराग ने कैसे आसानी से वक्त निकाल लिया है, शाबासी देने का मन करता है। बिना उस दृश्य के फैज़ल का किरदार पैदा ही नहीं हो सकता था जो शायद दूसरे हिस्से में उभरेगा। मनोज वाजपेयी के पिता का किरदार जिसने भी किया है उसका अभिनय भी नोटिस में लिया जाना चाहिए। कहानी में शुरूआती जान वही डालता है। कोइलरी में पत्थर से मारपीट का सीन प्रभावशाली है।

कसाइयों के मोहल्ले का सुल्तान इस फिल्म में जम गया है। यहां कबूतर भी एक पंख से उड़ता है का संवाद कितनी आसानी से बिना किसी विशेष भाव भंगिमा के उतार देता है। चप्पल उतारकर दांत पीसते हुए दौड़ा कर मारने का सीन। उफ कैसे बताऊं कि एकदम वास्तविक है। मेरे पिताजी ठीक इसी तरह चप्पल खींच लेते थे मारने के लिए। हमारे गांव समाज में चप्पल निकालने का सामंती चलन कैसे आया होगा इसका ज़िक्र करूंगा तो सामंतवाद और जातिवाद में उलझ जाऊंगा। खैर मनोज वाजपेयी ने भी ऐसे वास्तविक दृश्य अपने गांव घरों में देखे होंगे।

सुल्तान को मैंने पहली बार रीमेक वाली अग्निपथ में नोटिस किया था। इस कलाकार का भविष्य उज्ज्वल है। भोजपुरिया ज़ुबान में कहूं तो खंचड़़ा गुर्गा लगा है। इसका किरदार बहुत उभरा नहीं क्योंकि सरदार की बराबरी में नहीं था। सरदार की बराबरी रामाधीर से हो रही थी। क्या आप उस प्रसंग को भूल सकते हैं जब सुल्तान रामाधीर के घर जाता है। पत्नी चीनी मिट्टी वाले बर्तन की बात करती है। मुसलमान आया है। तभी मैं कहता हूं कि इसे आपराधिकरण और सांप्रदायिकरण के बीच की यात्रा के प्रसंगों के रूप में देखा जाना चाहिए। सुल्तान ने क्या एक्टिंग की है।

आप समझ रहे होंगे कि मैं समीक्षा लिख रहा हूं या किताब। कुछ फिल्मों को ऐसे भी देखना चाहिए। इस फिल्म में पीयूष मिश्रा का किरदार बहुत नहीं उभरा। उनकी आवाज़ और गाने ने कमाल का अभिनय किया है। अनुराग पीयूष को और क्रूर बना सकते थे लेकिन शायद स्कोप नहीं रहा होगा। पीयूष का किरदार मनोज के साथ जो लड़का मार काट करता है, वो होना चाहिए था। लेकिन क्या पीयूष के नैरेशन के बिना यह फिल्म पूरी हो पाती। नहीं। हो सकता है कि अनुराग ही पीयूष के रोल को ठीक से समझ न पाये हों। गुलाल में उनके लिए पूरा प्लान था लेकिन गैग्स आफ वासेपुर में पीयूष को लेकर कोई योजना नहीं दिखती है। नगमा और दुर्गा का अभिनय लाजवाब रहा है। दीवार का प्रंसग देखकर लगा कि अनुराग ने सिनेमा के भीतर सिनेमा का इस्तमाल ओम शांति ओम टाइम के भौंडे गाने रचने से हटकर किया है। मुकद्दर का सिकंदर का गाना आहा। सिनेमा देखने की चाह और चाह में बनते किरदार। वाह।

लिखते हुए सोच रहा हूं कि कुछ छूट तो नहीं रहा है। बहुत कुछ छूट रहा है। गानों पर बिल्कुल नहीं लिखा। लेकिन यह फिल्म इसलिए विवाद नहीं पैदा करेगी क्योंकि घटना के समय से बहुत बाद में बनी है। फिर इसका जवाब भी फिल्म में ही है। कैसे माफिया का काम कोयले का चूरा चुराने वाली महिलाएं करने लगीं और माफिया आखिरी दिनों में मछली मारने लगे और रंगदारी के धंधे में आ गए। कुछ नहीं हुआ तो उस रामाधीर सिंह का जिसके पास राजनीतिक सत्ता बची रह जाती है। वही रामाधीर सिंह आज रेड्डी ब्रदर्स लेकर ए राजा तक में बदल गया है।

माफी चाहता हूं बोर समीक्षा के लिए। इस तरह से कोई समीक्षा करे तो फिल्म ही न देखने जाए। मगर आप इस फिल्म को देखिये। काफी मनोरंजन है इसमें । मैं कमज़ोर दिल का आदमी हूं। सोचा था कि बहुत गोली चलेगी तो सिनेमा हाल से चला आऊंगा। बड़ा कलेजा कांपता है महाराज। लेकिन हत्या और गोलीबारी के दृश्य क्रूरतम तरीके से नहीं फिल्माये गए हैं। क्रूरतम से मेरा मतलब वल्गर भी है। सबसे बड़ी बात है कि पूरी फिल्म अनुराग कश्यप की है। निर्देशक ने कहानी पर बराबर की पकड़ बनाए रखी है। किसी किरदार को ज्यादा जगह नहीं दी है। इसीलिए इस फिल्म से आप मनोज वाजपेयी या नवाज़ या पंकज चतुर्वेदी नहीं चुन पायेंगे। जब भी चुनेंगे फिल्म को ही चुनेंगे। अनुराग ने कहानी की ज़रूरत को बहकने नहीं दिया है। हाथ और दिल पर नियंत्रण रखा है। जिसने संपादन किया है उसका नाम तो कोई नहीं जानेगा। उसके परिवारवाले भी स्क्रीन पर नहीं पढ़ पायेंगे मगर वो तारीफ के काबिल है। शायद उसका नाम श्वेता है। इसीलिए कहता हूं कि गैंग्स आफ वासेपुर फिल्म निर्देशकों के लिए चुनौती है। ऐसी बात नहीं है कि इस स्तर की फिल्में नहीं बनी हैं। बनी हैं। मगर आज के मोड़ पर यह फिल्म प्रस्थानबिंदु है। पाथब्रेकिंग।

Comments

ठीक है, कल जाते हैं, देखने, फिर यहां दोबारा कमेंट करने पहुंचेंगे...



पर मैं बिहार के आंचलिक वातावरण से कोसों दूर राजस्‍थान में बैठा हूं, मुझे यह फिल्‍म कितना अपील करेगी, यह देखने के बाद ही पता चल पाएगा...
रवीश जी के ब्लॉग में पढ़ आये हैं समीक्षा..
इस फिल्म को नहीं देख रहा हूं क्योंकि विश्वास नहीं हो रहा है कि वास्सेपुर (धनबाद स्टेशन से १ किलोमीटर दूर) कसबे की स्याह सच्चाई को वाकई अनुराग जी दिखा पाए होंगे... मुझे नहीं लगता.... मैं धनबाद के भूली में रहता था और वासेपुर से लगभग रोज़ ही गुज़ारना होता था.. स्कूल कालेज सब वही वहीँ से जाना आना होता था... शांत सा दिखने वाला यह वासेपुर वास्तव में भीतर ही भीतर उबलता था... यहाँ पुलिस को पहुचने की मनाही थी.... सूरजदेव सिंह के चर्चा के बिना यह फिल्म अधूरी रही होगी.. क्या अनुराग कश्यप यह बता पाए हैं कि सूरजदेव सिंह की पैरेलल सत्ता चलती थी कोयले के कारोबार में... देश भर में उनकी पीली पर्ची चलती थी... कोयले के काले बाज़ार का लाइसेंस हुआ करता था यह पीली पर्ची.... क्या मजाल कि देश भर के कोयले से लादे ट्रक ट्रेन जिसके पास पीली पर्ची हो उसे कोई हाथ लगा दे... पता नहीं यह सब है कि नहीं.... एक पूर्व प्रधानमंत्री और समाजवादी नेता का वरदहस्त प्राप्त था उन्हें... क्या कह पाए हैं अनुराग कश्यप... वरना यह एक अधूरी फिल्म होगी...

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