फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर-गौरव सोलंकी

गौरव सेलंकी के ब्‍नॉग रोटी कपड़ा और सिनेमा से साभार

वासेपुर की हिंसा हम सबकी हिंसा है जिसने कमउम्र फ़ैज़लों से रेलगाड़ियां साफ़ करवाई हैं 

मैं नहीं जानता कि आपके लिए गैंग्स ऑफ वासेपुर गैंग्स की कहानी कितनी है, लेकिन मेरे लिए वह उस छोटे बच्चे में मौज़ूद है, जिसने अपनी माँ को अपने दादा की उम्र के एक आदमी के साथ सोते हुए देख लिया है, और जो उस देखने के बाद कभी ठीक से सो नहीं पाया, जिसके अन्दर इतनी आग जलती रही कि वह काला पड़ता गया, और जब जवान हुआ, तब अपने बड़े भाई से बड़ा दिखता था। फ़िल्म उस बच्चे में भी मौज़ूद है, जिसके ईमानदार अफ़सर पिता को उसी के सामने घर के बगीचे में तब क्रूरता से मार दिया गया, जब पिता उसे सिखा रहे थे कि फूल तोड़ने के लिए नहीं, देखने के लिए होते हैं। थोड़ी उस बच्चे में, जिसकी नज़र से फ़िल्म हमें उसके पिता के अपने ही मज़दूर साथियों को मारने के लिए खड़े होने की कहानी दिखा रही है। थोड़ी उस बच्चे में, जो बस रोए जा रहा है, जब बाहर उसके पिता बदला लेने का जश्न मना रहे हैं। थोड़ी कसाइयों के उस बच्चे में, जिस पर कैमरा ठिठकता है, जब उसके और उसके आसपास के घरों में सरदार ख़ान ने आग लगा दी है। फ़िल्म मेरे लिए उस कोयले की खदान में भी जाकर ठहर गई है, जिसमें बारह घंटे से पहले रुकने पर खाल उधेड़ दी जाएगी, जिसमें रोशनी कम है या हवा, यह ठीक से बताना मुश्किल है, और तब कभी-कभी चमकती रोशनी में काले पड़े शरीर हैं, उस आदमी का चेहरा है, जिसे उस समय के बाद हमेशा के लिए क्रूर हो जाना है, अपने लोगों को मारना है, उनके घर जलाने हैं और शक्ति पानी है। और जब मरना है, तो अपने बेटे को उस आग में छोड़ जाना है, जिसमें वह अपने बाल तभी बढ़ाएगा, जब अपने पिता के हत्यारे से बदला ले लेगा। और बदला नहीं लेगा, कह के लेगा उसकी।
कितनी फ़िल्में होंगी, जो किसी अपराधी की बिना शादी के पैदा हुए बेटे पर इतना भर ठहरेंगी कि जब अब्बू आएं तो वह पढ़ाई छोड़कर दरवाज़े तक दौड़ा जाए और कहे- सलाम अब्बू, और इतने में ही आपको अन्दर कहीं रोना आए। कितनी फ़िल्में होंगी, जो आपको कोयला खदानों के माफ़िया के बारे में बताते हुए उनका इतिहास और वर्तमान बताएंगी, कोयले और लोहे की चोरियां इतनी आम दिखाएंगी कि रात का इंतज़ार नहीं और उन्हीं रास्तों से छोटे छोटे बच्चे लोहा चुराकर लाते हैं जिनसे आईसक्रीम वाला जा रहा है। कितनी फ़िल्में टाटा बिड़ला और थापर में खदानों की बन्दरबाँट की बात करेंगी और कहेंगी कि अंग्रेज तनख़्वाह भी देते थे और छत भी, लेकिन आज़ादी के बाद के अंग्रेज छत तोड़कर-जलाकर सिर्फ़ तनख़्वाह देते हैं, फिर वे कहीं भी जाकर छत डालें। कितनी फ़िल्में उन गरीबों के घर जला रहे आदमी के चेहरे पर ठहरेंगी? उस आदमी के चेहरे की असहजता पर भी, जिसके हुक्म से अभी अभी उसके एक कारिंदे के परिवार को ख़त्म कर दिया गया है? 

इसीलिए गैंग्स ऑफ वासेपुर में भले ही कितनी भी गालियाँ और गोलियाँ हों, कितने ही कटते हुए आदमी और भैंसे हों, लेकिन अपनी भीतर की परत में यह हमारी सामूहिक कहानी है। वासेपुर के अंश हम सबके बीच में हैं। वह हमारी माँ ही है, जो घर के पुरुषों द्वारा रचे जा रहे हत्या के षड्यंत्र के दौरान बैकग्राउंड में दबी आवाज़ में नौकर से कह रही है कि चीनी मिट्टी के बरतन में खाना परोसना, क्योंकि मेहमान मुसलमान है। वे हमारे पिता ही हैं, जो भले ही दुनिया भर का कत्ल करके लौटे हों, लेकिन अपने बेटे को कुछ छर्रे लगने पर पागल हुए जाते हैं। यह हम सब हैं यही है हमारी ज़िन्दगियों का दोहरापन और यह हमारी ही दुनिया की हिंसा है, उसके कसाईख़ाने जिनमें आँख के बदले आँख से पूरी दुनिया अंधी होनी है।
यह ज़रूर है कि बहुत बड़ी और बहुत सारे किरदारों की कहानी होने की वजह से या शायद सबसे इंसाफ़ करने और ख़ुद को कसने की कोशिश में फ़िल्म ऐसे कुछ लम्हे लापरवाही से छोड़ देती है, जो उसके मोती हो सकते थे। इसकी तेज रफ़्तार बहुत सारी डीटेल्स आपके दूसरी बार में देखने के लिए भी छोड़ देती है। लेकिन तब भी, जहाँ जहाँ फ़िल्म ठहरती है अपने किरदारों के दुखों और गुस्से में, वहाँ यह और भी अलग होती जाती है। वैसे पल, जहाँ यह धीमी होती है, कविता जैसी, जब वे कोयले से सिर तक सने लड़ रहे हैं।
यह अपनी घटनाओं के लिए नहीं, अपने किरदारों और हालात पर उनकी प्रतिक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण फ़िल्म है। यह इतनी स्वाभाविक है कि हत्या करके और लूटकर भागते इसके किरदारों की चप्पलें बीच में ही छूट जाती हैं और वे उन्हें लेने लौटते हैं। यह वासेपुर की गली ही है, जिसमें सरदार ख़ान एक पहलवान को दिनदहाड़े छुरे से मार रहा है और पीछे कुछ औरतें और बच्चे दूसरी दिशा में आराम से चले जा रहे हैं। फ़िल्म बार-बार उस हिंसा के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गवाह बन रहे बच्चों पर ठहरती है, उन बच्चों पर भी, जिन्हें बाद में यही सब करना है, और इसीलिए यह ख़ास है।
फ़िल्म अपने किरदारों, उनकी ज़िन्दगियों, उनके मोहल्लों और उनके शहर की विश्वसनीयता बार-बार अपनी हदों से आगे जाकर भी कायम करती है। कभी 'कसम पैदा करने वाले की', 'कुली' या 'गाइड' के पोस्टरों से, कभी पिस्तौल देखते ही चमत्कारिक ख़ुशी से भर जाने वाले अपने किरदारों के चेहरों से, कभी ऑटोमैटिक पिस्तौलों की उनकी चाह से, और कभी घर में फ़्रिज आने की ख़ुशी से अपने अलग-अलग समय को बताती हुई। कभी यह उन गाँव वालों के साथ बैठी है जो मंत्रीजी के स्वागत में उनके घर के बाहर फलों की टोकरियाँ लेकर बैठे हैं, कभी उनके साथ, जो उनके बेटे के पैरों में गिर रहे हैं। देखिए, क्या होना था लोकतंत्र और मज़दूर विकास पार्टी को क्या करना था?

यूं तो आप इसे सिर्फ़ प्रतिशोध की कहानी भी समझ सकते हैं, लेकिन यह अलग इसलिए है कि अपने गैंगस्टर्स के घरों की रसोइयों में दाखिल होती है, उनके चौबारों पर टहलती है, उनके साथ चाट खाती है, लस्सी पीती है, उनके पास बैठती है जब वे अपनी प्रेमिकाओं के साथ नल पर कपड़े धो रहे हैं, उनके साथ शरमाती है, जब वे किसी पार्क में पहली बार उनके हाथ छू रहे हैं, उनके साथ उनकी शादियों के गीत गाती है और देसी कट्टे से किए फ़ायर से जब उनके हाथ झनझनाते हैं, तो हँसती है। यह आईसक्रीम की चोरी से लेकर कोयले, लोहे, मछली, तालाब, पैट्रोल और पैसे की, वह हर लूट दिखाती है जो वासेपुर में हो रही है।
'इक बगल में चाँद होगा' से 'कह के लूंगा' तक ‘वासेपुर का संगीत उसकी आत्मा है, जिसके बिना फ़िल्म संभव नहीं थी। इसके लिए स्नेहा खानवलकर और उनके साथियों पर अलग से एक लेख लिखा जाना चाहिए। वासेपुर के ऐक्टर उसकी साँसें हैं मनोज वाजपेयी इसलिए कि अपने किरदार की कमीनगी में इतना उतरते हैं कि आपको बार-बार बेहद विकर्षित करते हैं, लेकिन बस इतना ही कि जब वे अपना बदला ले रहे हों तो आप उनके बिल्कुल साथ खड़े हों। जैसा काम उन्होंने यहाँ किया है, वह दुर्लभ है। रिचा चड्ढा अपने उच्चारण, लहजे और रोने-हँसने में वही हैं जो शादी में ढेर सारा अतिरिक्त और फूहड़ मेकअप पुतवाकर आई कोई बेपढ़ी लड़की होगी। उनका किरदार खूब लिखा गया है और उन्होंने इसे खूब जिया भी है। नवाज़ुद्दीन जब आते हैं, फ़िल्म कोई और ही फ़िल्म लगने लगती है। इसी तरह जयदीप अहलावत, तिग्मांशु धूलिया, पीयूष मिश्रा, रीमा सेन, हुमा कुरैशी और बहुत सारे और भी ऐक्टर मिलकर हमें पूरा यक़ीन दिलाते हैं कि हम उनकी कहानी में नहीं, उनके जीवन में हैं।

अनुराग कश्यप इसलिए भी अलग हैं कि उनकी फ़िल्मों के स्त्री पात्र भले ही थोड़ी देर के लिए आएँ, मामूली जीवन जी रहे हों या कितने भी सताए जा रहे हों, लेकिन हमेशा अपने पूरे आत्मसम्मान और शक्ति के साथ आते हैं। वे हॉल में फ़िल्म देखते हुए सीटियाँ बजाती हैं, चिल्लाकर बच्चन को शादी का प्रस्ताव देती हुई, और बिना उनकी मर्ज़ी के छूने वाले प्रेमी को परमिशन लेने का कहती हैं। वे हमेशा गुस्से में रोती हैं, अबला होकर कभी नहीं। यह उनके यहाँ ही संभव है कि जब उनकी स्त्रियों का बस नहीं चलता कि अपने पतियों को वेश्याओं के पास जाने से रोक सकें, तो डाँटकर उन्हें खूब खाने को कहती हैं कि वहाँ जाकर कम से कम उनकी बेइज़्ज़ती तो न कराए। वे उनसे थप्पड़ खाती हैं और भले ही उल्टा मार न सकें, लेकिन उनके लिए दरवाज़े हमेशा के लिए बन्द कर देती हैं। और अपने गालों पर वे उंगलियाँ कभी भूलती नहीं।  

ट्रेन में, पटरियों पर, धर्मशालाओं-होटलों में, सड़क पर, मुहर्रम के मातम और बनारस के घाटों पर अनुराग कश्यप हमेशा की तरह बेहद सहजता से फ़िल्म को ले जाते हैं। वही उन्हें अलग करता है। पहली बार वे अपनी शहरी स्वभाव की फ़िल्मों से अपनी जड़ों की ओर लौटे हैं। और यह कैसी विडम्बना है कि उनका दबंग किरदार जब घायल होकर गिरता है, उसके लिए कोई एम्बुलैंस नहीं, कोई गाड़ी या मोटरसाइकिल भी नहीं, उसके लिए एक साइकिल रिक्शा है बस, जिस पर किसी दुकानदार जायसवाल का नाम लिखा है। उसे उसी पर गिरना है, रिक्शा को चल पड़ना है और ओझल होते जाना है। वही रिक्शा, जिसे उसके इलाके के कितने ही सरदार ख़ान देश के हर कोने में चलाते हैं और इस तरह देश चलाते हैं, लेकिन कोई कोना उनका नहीं।

यह वह जगह है, जहाँ किसी कलाकार या कलाकृति को अपना स्टैंड लेना होता है, अपने होने की वजह बतानी होती है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर यहीं कविता होती है और जिया तू बिहार के लाला का जयघोष करती है।
बात बदले की नहीं है, न वासेपुर की। बात उस हिंसा की है, जिसमें हमारी कितनी पीढ़ियां और नस्लें खप गई हैं, कितने फ़ैज़ल स्कूल छोड़कर ट्रेन के पाखाने साफ़ करने को मज़बूर किए गए हैं, बाद में नशे में डूब जाने को और उसके बाद बदले की आग में। यह उस हिंसा में डूबकर लगातार परेशान भी करती है और हँसती भी रहती है। ख़ुद पर और हम सब पर। यह इसीलिए डेढ़ इंच ऊपर है। 

 

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