फिल्‍म समीक्षा : एक था टाइगर

फार्मूलाबद्ध फिल्म है एक था टाइगर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
भारत,आयरलैंड,तुर्की,क्यूबा और थाईलैंड से घूमती-घुमाती एक था टाइगर तुर्की में खत्म होती है। माशाल्लाह गाना तुर्की में ही फिल्माया गया है। यह गाना फिल्म के अंत में कास्टिंग रोल के साथ आता है। यशराज फिल्म्स ने यह अच्छा प्रयोग किया है कि कास्ट रोल स्क्रीन को छेंकते हुए नीचे से ऊपर जाने के बजाए दाएं से बाएं जाता है।
हम सलमान खान और कट्रीना कैफ को नाचते-गाते देख पाते हैं। इसके अलावा फिल्म में ठूंस-ठूंस कर एक्शन भरा गया है। हाल-फिलहाल में में दक्षिण भारतीय फिल्मों से आयातित रॉ एक्शन देखते-देखते अघा चुके दर्शकों को एक था टाइगर के एक्शन में ताजगी दिखेगी। इस फिल्म में हीरोइन के भी एक्शन सीन हैं। कॉनरेड पाल्मिसैनो की सलाह से किए गए एक्शन में स्फूर्ति नजर आती है और वह मुमकिन सा लगता है। वैसे इस फिल्म में भी हीरो का निशाना कभी खाली नहीं जाता, जबकि दुश्मनों को शायद गोली चलाने ही नहीं आता। फिल्में हिंदी की हों या किसी और भाषा की। हीरो हमेशा अक्षत रहता है।
कबीर खान निर्देशित एक था टाइगर जासूसी टाइप की फिल्म है। मिशन पर निकला हीरो दुश्मनों की एजेंट बनी हीरोइन से प्यार कर बैठता है। यहां एक फर्क है कि दोनों देशों के खुफिया एजेंसी उनके पीछे पड़ जाती है। फिल्म खत्म होने तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां हीरो-हीरोइन को पकड़ने में नाकामयाब रही हैं। लेखक-निर्देशक ने तर्क दिया है कि लगातार ठिकाना बदल रहे हीरो के पास उसके वेतन के 23 लाख रूपए हैं, जो उसने 12 सालों में जमा किए हैं। यह भी बताया गया है कि हीरो हमेशा मिशन पर सरकारी खर्चे पर रहता है। सचमुच हमारे रॉ एजेंट कितनी कम सैलरी में जान जोखिम में डाल रहे हैं। शायद हीरोइन के पास भी कुछ पैसे हैं। सलमान खान की फिल्म में तर्क,अभिनय और संजीदगी खोजने में कोई तुक नहीं है। यहा सिर्फ भावनाएं रहती हैं। ज्यादातर प्यार की भावना।
एक था टाइगर में फर्ज और मोहब्बत के बीच दहाड़ता हीरो है,जो मोहब्बत का दामन थाम लेता है। फिल्म के शुरू में हीरो के बॉस ने बताया है कि मोहब्बत के बजाए फर्ज निभाने की कचोट से वे उबर नहीं पाए हैं। हमारा हीरो अपने सीनियर की तरह प्यार के विषाद में नहीं जीना चाहता। हिंदी फिल्मों में वैसे भी प्यार सबसे बड़ा धर्म होता है। एक था टाइगर में यह मोहब्बत देशों के बीच की दीवार तोड़ देती है। यश चोपड़ा की वीर जारा में भी ऐसा ही कुछ हुआ था,उसकी पूष्ठभूमि अलग थी।
यह फिल्म सलमान खान के प्रशंसको को ध्यान में रख कर बनायी गई है। उसकी वजह से कबीर खान ने पिछली दो फिल्मों में जो उम्मीद दिखाई थी,वह बुझती नजर आती है। कहानी से ज्यादा सलमान खान और कट्रीना कैफ के सिक्वेंस पर मेहनत की गई है। फिल्म के ओपनिंग और इंट्रो सीन में लगता है कि हम अलग लेवल की फिल्म देखने जा रहे हैं। पर्दे पर सलमान खान के किरदार के उजागर होने और कट्रीना कैफ की हाजिरी के बाद जाहिर हो जाता है कि एक था टाइगर का लेवल आम मसाला हिंदी फिल्मों से अलग या ऊपर नहीं है। वही प्रेम कहानी। हीरो-हीरोइन के प्रेम का विरोध। यहां विरोध के लिए परिवार नहीं देश हैं। विरोधी के तौर पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का नाम लेते ही लेखक-निर्देशक को पुश्तैनी दुश्मनी दिखाने का शॉर्टकट मिल जाता है। एक था टाइगर फार्मूलाबद्ध फिल्म है।
कलाकारों में पहले कट्रीना कैफ की बात करें। निर्देशक ने उन पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर लिया है। उन्हें सिर्फ सुंदर दिखाने की हद से आगे जाकर एक्शन और इमोशन के सीन दे दिए हैं। एक्शन सीन में तो फिर भी डुप्लीकेट या कंप्यूटर इमेजेज के सहारे वह प्रभावित करती हैं, लेकिन इमोशनल सीन में अपने गिने-चुने एक्सप्रेशन से वह निराश करती हैं। और हां,कोई कट्रीना कैफ को बताए कि दर्शक उनका लेफ्ट प्रोफाइल देख-देख का ऊब चुके हैं। वह जैसे ही पर्दे पर स्थिर होती है। उनका बायां प्रोफाइल साने आ जाता है। सलमान खान ने कसर नहीं छोड़ी है। पहले सिक्वेंस से अखिरी सिक्वेंस तक उनकी भागीदारी स्पष्ट है। एक्शन दूश्यों में वे दक्ष हो चुके हैं। फिल्म के चेज सिक्वेंस में उनकी फुर्ती रोमांचक आनंद देती है। खूब सीटियां बजेंगी। वे रोल के मुताबिक फिट और स्मार्ट हैं। उन्हें कुछ वन लाइनर भी मिले हैं, जिन पर तालियां भी बजेंगी। आजादी की 66 वीं वर्षगांठ और ईद के मौके पर सतमान खान ने अपने प्रशंसकों और आम दर्शकों को मनोरंजक तोहफा दिया है। अन्य कलाकार सामान्य हैं। गिरीश कर्नाड और रणवीर शौरी के लिए अधिक गुंजाइश ही नहीं थी।
कैमरामैन असीम मिश्रा ने सभी देशों और शहरों को खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। गानों का फिल्मांकन सुंदर और आकर्षक है। गीत-संगीत सामान्य है। एक माशाल्लाह गीत ही याद रह पाता है। पाश्‌र्र्व संगीत अवश्य प्रभावशाली है। दृश्यों के रोमांचक प्रभाव में उससे मदद मिली है।
अवधि-132 मिनट
*** तीन स्टार

Comments

बहुत बढ़िया समीक्षा. पढ़कर मजा आया. आलोचना, व्यंग्य, तारीफ़ सबकुछ. सलमान के सितारे बुलंदी पर हैं. उनकी रेडी जैसी फिल्म भी सौ करोड़ का कारोबार कर लेती है. शो बिजनेस का यही फार्मूला है कि जो बिकता है वो चलता है. ऐसा लगता है कि प्रशंसक फिल्म से ज्यादा सलमान को देखने आते हैं सो फिल्म चल निकलती है.

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