रिश्तों से वजूद है चुलबुल पांडे का - सलमान खान


-अजय ब्रह्मात्मज
    सलमान खान की लोकप्रियता  का अंदाजा इस से भी लगाया जा सकता है कि वे मुंबई में जहां मौजूद रहें, उस इमारत के बाहर खबर लगते ही भीड़ लगने लगती है। मुंबई में बाकी स्टार भी हैं, लेकिन उनके साथ हमेशा ऐसा नहीं होता। भाई (मुंबई और इंडस्ट्री में सभी उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं) की एक झलक पाने के लिए बेचैन इस भीड़ को उनकी एक मुस्कान या हाथ हिलाने से ही सुकून मिल जाता है। बहरहाल, ‘दबंग 2’ की रिलीज के ठीक पहले हुई उनसे हुई बातचीत ...
-  क्या कहेंगे ‘दबंग 2’ के बारे में?
0 ‘दबंग’ और ‘दबंग 2’ एक ही फिल्म है। पहली फिल्म फस्र्ट हाफ थी, यह सकेंड हाफ हे। बड़ी जगह,  बड़ा विलेन, बड़ा एक्शन और हीरोइज्म ...हमने तगड़ी नजर रखी है कि यह ओवर बोर्ड न चली जाए। चुलबुल पांडे अपना ही कैरीकेचर न बन जाए। इस बार चुलबुल पांडे के इनहेरेंट हयूमर पर ज्यादा प्ले नहीं किया है। उसकी रियल लाइफ क्वालिटी को सुपर हीरो में नहीं बदलना था। फर्स्‍ट दबंग में चुलबुल पांडे के साथ अनेक परेशानियां थी। सेकेंड दबंग में सब ठीक हो गया है। भाई से सुलह हो गई है, पिता से सहज हो गए हैं चुलबुल और उनकी शादी हो चुकी है। ऐसी खुशी के बीच जब उसे अपने परिवार पर खतरा नजर आता है तो वह रिएक्ट करता है। वह अपनी मां की आखिरी ख्वाहिश पारिव7ार के बचाव के लिए कुछ असाधारण काम करता है।
- मतलब फिल्म रिश्तों और परिवार पवर केंद्रित है?
0 चुलबुल पांडे का वजूद ही रिश्तों से है। मां, सौतेले भाई, सौतले पिता और बीवी के बीच वह गाढ़े इमोशन से जुड़ा है। हम ने कोशिश की है कि दर्शकों को पहली फिल्म से यह अलग न लगे। इसे लिखने और बनाने में सभी की बैंड बज गई थी। सिंपल फिल्म लिखना मुश्किल काम है। बच्चों से बुजुर्गों तक मेरे दर्शक हैं। कोशिश यह भी रहती है कि जो दर्शक अभी तक प्रशंसक नहीं हैं, वे भी प्रशंसक बन जाएं।
- पूरी यूनिट और ट्रेड सर्किल में ‘दबंग 2’ को लेकर जोश बना हुआ है?
0 फस्र्ट लुक, ट्रेलर, गाने और डॉयलांग सबकुछ लोगों को पसंद आता गया है। इससे कंफीडेंस बढ़ा है। 21 दिसंबर को पता चलेगा कि हमारा कंफीडेंस ठीक था या नहीं? हम पास हुए कि नहीं?
- ‘वांटेड’ से आप की फिल्मों की दिशा बदल गई है?
0 मैंने तो ‘वीर’ में ही कोशिश की थी। तब अड़ नहीं पाया। मैंने 115 मिनट की फिल्म फायनल की थी, लेकिन उन्होंने 178 मिनट की फिल्म रिलीज कर दी थी। उसके बाद मैंने सबक लिया। अब अड़ जाता हूं, क्योंकि दर्शक मुझे ही देखने आते हैं। यहां अरबाज खान निर्देशक हैं। इस बार सब सही है अभी तक। हम जो फिल्म देखना चाहते हैं, वही बनाई है। फिल्म दर्शकों में देखने की जल्दबाजी पैदा कर दे तो हिट होती है।
- इस कामयाबी के पीछे कितनी मेहनत लगती है?
0 मेहनत तो सभी करते हैं। मुझे तो नवाजा है उस ने। मैंने लोगों को मेहनत करते देखा है, वे मेरे जैसे मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। मैंने कट्रीना कैफ से सीखा है कि जब नवाजा गया हूं तो नाशुक्रापन न दिखाऊं। मेहनत करूं और सभी को खुश रखूं। मैंने अपनी मेहनत का लेबल दो पर्सेंट बढ़ा दिया है। ताकि देखते हुए लगे कि सलमान खान पर्दे पर कुछ कर रहा है। गोविंदा के सहज और स्वाभाविक अभिनय को लोग मानने लगे हैं कि वे मेहनत नहीं करते। इसलिए मेहनत करते हुए दिखना चाहता हूं।
- लेकिन कामेडी पर ही इतना जोर क्यों?
0 अपने यह चीखने-चिल्लाने, रोने-बिसूरने और चुप हो जाने को, एक्टिंग माना जाता है। कामेडी सबसे मुश्किल काम है। टेलरमेड रोल में क्या परफार्मेंस? परफार्मेंस तो वो है, जो स्क्रिप्ट के आगे जाती है।
- बिइंग सलमान खुद आप के लिए क्या है?
0 मेरे प्रेजेंट पर ही निर्भर करता है। अभी सब ऊपर की तरफ जा रहा है। इसका जो मतलब निकालें।
- आप ट्रेडसेटर हो गए हैं। अपने इस रोल पर क्या कहेंगे?
0 यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा। चार-पांच फिल्में और बनेंगी। यह कोई फार्मूला नहीं है। यह जोनर जल्दी ही सैचुरेट हो जाएगा। फिल्म में इमोशनल बेस हो। ‘दबंग’ बच्चों की फिल्म नहीं है, लेकिन वे उसे पसंद कर रहे हैं। ‘तेरी मेरी प्रेम कहानी’ बच्चों का गाना नहीं , लेकिन उसे देश-विदेश के बच्चे गुनगुनाते रहे। हमारी संवेदना बच्चों की हो गई है या बच्चे बड़े हो गए हैं।
- ‘दबंग’ के बाद एक अच्छी बात हुई कि उत्तर भारत के दर्शक थिएटरों में लौटे। उन्हें खास फिल्मों और फिल्मकारों में पहले थिएटर से बाहर कर दिया था ...
0 उन्हें अपनापन लगा। आप ठीक कह रहे हैं कि देश के दर्शकों को अपना सिनेमा नहीं मिल रहा था। ‘दबंग’ के समय ट्रेड पंडित कह रहे थे कि हम मर जाएंगे। वे खुद के साथ फिल्म इंडस्ट्री को भी डुबाएंगे। चुलबुल पांडे स्माल टाउन का हीरो पर्दे पर आया। मैं नार्थ का नहीं हूं, लेकिन मेरे इमोशन स्माल टाउन के हैं। मैंने ‘दबंग’ में अनोखे शब्द बोले हैं।
- इमेज शिफ्ट भी हुआ है आप का?
0 कुछ नहीं . अब मैं आसानी से ना बोल देता हूं। पहले कई तरह के प्रेशर में रहता था। सीधा मना कर देता हूं। जानता हूं कि कुछ लोग इस से नाराज हैं, लेकिन करोड़ों लोग खुश भी हैं। मैं खुश हूं। बिइंग हयूमन का काम कर पा रहा हूं।
- क्या अपने बारे में लिखा पढ़ते हैं?
0 मैं अब समझ गया हूं कि आर्टिकल में आप का पाइंट ऑफ व्यू रहता है। जर्नलिस्ट या लेखक का ... तारीफ या आलोचना से प्रभावित नहीं होता। अच्छी चीज से खुशी होती है, लेकिन पता तो रहता है कि तारीफ भी कितनी सही है? जैसे कि आलोचना गलत होती है कई बार, वैसे ही तारीफ भी गलत होती है। लेकिन आप सभी के लेखन से मेरे फैन प्रभावित होते हैं। मेरी पर्सर्नलिटी फेसबुक, ट्विटर और बिग बॉस में आ जाती है।
- अपनी कामयाबी को कैसे संभालते हैं?
0 कैसी कामयाबी... काम करो। बूढ़े आदमी को अपने अंदर घुसने नहीं देता। हमेशा जवान रहता हूं और जवांदिली से काम करता हूं।

Comments

Popular posts from this blog

लोग मुझे भूल जायेंगे,बाबूजी को याद रखेंगे,क्योंकि उन्होंने साहित्य रचा है -अमिताभ बच्चन

फिल्‍म समीक्षा : एंग्री इंडियन गॉडेसेस

Gr8 Marketing turns Worst Movies into HITs-goutam mishra