फिल्मों से भी रिश्ता रहा पंडित रवि शंकर का


-अजय ब्रह्मात्मज
 रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी के अंत में कास्टिंग रोल के समय महात्मा गांधी का प्रिय भजन सुनाई पड़ता है। इस भजन को अनेक गायकों ने गाया है और अनेक संगीतज्ञों ने सुर में बांधा है,लेकिन भकित,आस्था और विश्वास की जैसी धुन रवि शंकर ने संजोयी है,वह दुर्लभ है। संगीतज्ञ और सितार वादक रवि शंकर की मौलिक प्रतिभा से हम सभी वाकिफ हैं। उन्होंने भारत के शास्त्रीय संगीत को पश्चिम में लोकप्रिय किया। जार्ज हैरीसन की संगत में वे पश्चिम की तत्कालीन नौजवान पीढ़ी के हप्रिय संगीतकारों में से एक रहे। सातवें दशक के बाद वे अमेरिका और भारत के बीच बंट कर अपने संगीत से रसिकों को भावविभोर करते रहे। उन्होंने सितार की शास्त्रीयता से विश्व को परिचित कराया। वे आधुनिक और खुले विचारों के संगीतज्ञ थे। अन्य शास्त्रीय संगीतज्ञों की तरह वे जड़ और रुढि़वादी नहीं थे।
    अपने बड़े भाई उदय शंकर की तरह इप्टा से उनका भी जुड़ाव था। संस्कृति के क्षेत्र में वामपंथी रुझानों के तहत उन्होंने संगीत का उपयोग किया। हिंदी फिल्मों से उनका निकट का ताल्लुक रहा। इप्टा की पहली फिल्म धरती के लाल के से वे जुड़े। ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में कृष्ण चंदर की कहानी अन्नदाता पर बनी यह फिल्म बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि में एक अकालग्रस्त परिवार के जीवन और संघर्ष की कहानी कहती है। उन्होंने उसी साल चेतन आनंद की फिल्म नीचा नगर में भी संगीत दिया। चेतन आनंद तब इप्टा के सक्रिय सदस्य थे। इप्टा से आए इन फिल्मकारों ने हिंदी में यथार्थवादी सिनेमा की नींव डाली थी। कम लोगों को याद होगा कि कान फिल्म फेस्टिवल ने चेतन आनंद की नीचा नगर को 1946 में पुरस्कृत किया था। फिल्मों से उनके जुड़ाव की एक उपलब्धि सत्यजित राय की पाथेर पांचाली है। पाथेर पांचाली में बंगाल के ग्रामीण परिवेश के अवसाद को रवि शंकर के सगीत से अभिव्यक्ति मिली थी। सत्यजित राय की पाथेर पांचाली के प्रभाव में रवि शंकर के संगीत का बड़ा योगदान है। इस फिल्म को अंतर्राष्ट्रीय सराहना मिली थी। 1961 में आई हृषिकेष मुखर्जी की फिल्म अनुराधा में भी रवि श्ंकर का सगीत था।
    रवि शंकर की एक उल्लेखनीय फिल्म गोदान है। मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर बनी इस फिल्म के अनेक गीत आज भी मन में हिलोर पैदा करते हैं। गोदान में मुंशी प्रेमचंद ने पूर्वी उत्तरप्रदेश के गांवों और किसानों के जीवन को समेटा था। रवि शंकर का संगीत वहां की लोकधुनों और ग्रामीण भावों को बहुत बारीकी और खूबसूरती से गोदान के गीतों में पिरोता है। मोहम्मद रफी की आवाज में पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा हो और बिरज में होरी खेलत नंदलाल सुनते हुए हम गोदान की धरती पर विचरण करने लगते हैं। इसी फिल्म में मुकेश का गाया हिया जरत रहत दिन रैन में किसान की व्यथा को शब्द और संगीत मिला है।    लगता मंगेशकर का गाया जाने काहे जिया मोरा डोले में भी स्थानीय भाव और शब्द हैं। रवि शंकर ने गोदान के महत्व को समझते हुए इस फिल्म में संगीत दिया था। अपनी व्यस्तता और शास्त्रीय संगीत के प्रति आवश्यक समर्पण के कारएा वे फिल्मों के संगीत से दूर हो गए,लेकिन चंद फिल्मों के संगीत से ही उन्होंने जाहिर किया कि वास्तविक संगीतज्ञ शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत में समान रुचि ले सकता है।
    ंिहदी फिल्म इंडस्ट्री से रवि शंकर का करीबी संबंध था। वे यहां की गतिविधियों की जानकारी रखते थे। अंतिम सर्जरी के लिए जाने से पहले उन्होंने अमिताभ बच्चन से बात करने की ख्वाहिश रखी थी। अमिताभ बच्चन ने उनसे बात की और बड़े आदर के साथ अपने ब्लॉग में उन्हें याद किया। रवि शंकर के देहांत के बाद ए आर रहमान ने सही कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत का मुख्य राजदूत चला गया। भारत ने अपना रत्न खो दिया।

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