दरअसल... धनुष की टंकार

-अजय ब्रह्मात्मज
    आनंद राय की ‘रांझणा’ प्रदर्शित होने के पहले से साउथ के स्टार धनुष के आने की टंकार सुनाई पड़ रही थी। एक तो ‘कोलावरी डी’ ने उन्हें अप्रत्याशित लोकप्रियता दे द थी और दूसरे वे दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत के दामाद हैं। हिंदी फिल्मों के दर्शकों को यह तो एहसास हो गया था कि धनुष दक्षिण के पापुलर स्टार हैं, लेकिन रजनीकांत और कमल हासन के बरक्श वे उनका स्टारडम आज भी नहीं समझते। हम बताते चलें कि धनुष को अपने छोटे से करिअर में एक्टिंग के लिए नेशनल अवार्ड और फिल्मफेअर अवार्ड मिल चुके हैं। आनंद राय की ‘रांझणा’ हिंदी में उनकी पहली फिल्म है, लेकिन तमिल में वे पहले से एक सिद्धहस्त कलाकार की जिंदगी जी रहे हैं।
    ‘रांझणा’ आई और धनुष की टंकार एक बार फिर हिंदी दर्शकों ने अपने कानों से सुनी। उन्होंने बड़े पर्दे पर धनुष को तमिल लहजे में हिंदी बोलते सुना और प्यार किया। उन्हें ‘रांझणा’ का कुंदन भा गया। अंग्रेजी प्रेस में शहरी लेखक कुंदन के चरित्र को लेकर ‘रांझणा’ का छीछालेदर कर रहे हैं। सचमुच, हम अपने ही देश की सच्चाइयों और स्थितियों से कितने अनजान हो गए हैं। 21वीं सदी के 2012 से हम देश के सभी शहरों और गांवोंको आंकने लगे हैं, जबकि आधुनिक विकास की सारी सुविधाएं पूरे देश में एक समान नहीं है। फिर भी हम सोचते हैं कि देश बात-व्यवहार में एकरूप हो जाए।
    विषयांतर से बचते हुए हम फिर से धनुष पर लौटते हैं। ‘रांझणा’ की अपेक्षित कामयाबी के बाद धनुष के अनेक शुभचिंतक नजर आने लगे हैं। उनमें से कुछ हिंदी फिल्मों में सफल पारी की संभावनाएं जताने लगे हैं। उन्हें लग रहा है कि धनुष अपनी अगली हिंदी फिल्मों से लोकप्रियता की अगली कतार में नजर आएंगे। उनके श्वसुर रजनीकांत और उनके समकलीन कमल हासन को हिंदी में जो स्थान और लोकप्रियता हासिल नहीं हो सकी, वहां तक पहुंचेंगे। वास्तव में यह एक खामखयाली है। हिंदी फिल्मों के और उसके नायकों के रूप में परिचित सहज ही बता सकते हैं कि हिंदी फिल्मों में धनुष की स्थायी सफलता की संभावना कम है। ऐसा हो जाए तो चमत्कार होगा, लेकिन हम सभी जानते हैं कि चतत्कार सिर्फ फिल्मों में होते हैं। वास्तवित जिंदगी के समीकरण अलग होते हैं।
    सबसे पहले यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि आनंद राय ने अपनी फिल्म ‘रांझणा’ के नायक कुंदन के लिए परफेक्ट कास्टिंग कर ली थी। बनारस में पला-बढ़ा तमिल कुंदन। उसकी हिंदी किसी अन्य बनारसी की तरह ही साफ है, लेकिन तमिल लहजे में पुट से शब्दों की ध्वनियां अलग सुनाई पड़ती हैं। फिल्मा रिलीज के पहले अधिकांश की आशंका थी कि धनुष बनारसी किरदार में कैसे लगेंगे? यह कैसे लगना उनके हिंदी उच्चारण को लेकर थे। फिल्म रिलीज होने पर आशंकाएं निर्मूल हो गईं। धनुष सहज और स्वाभाविक लगे।
    इसे कुछ लोग धनुष की सफलता मान रहे हैं। यह कतई नहीं है। दरअसल, यह कुंदन की सफलता है। यह आनंद राय का कौशल है। उन्होंने कुंदन की भूमिका के लिए धनुष का सटीक चुनाव किया। हिंदी फिल्मों में कई बार ऐसे किरदार दिखाई देते हैं, जो आंतरिक रूप से इतने सबल और होनहार होते हैं कि कोई भी कलाकार उन किरदारों में जंच सकता है। वास्तव में यह किरदार की विशेषता होती है। कलाकारों और उनके पिछलग्गुओं को यह लगता है कि कलाकार चल गया है, जबकि किरदार चल रहा होता है। ऐसी ही गलतफहमी धनुष के बारे में फैल रही है। हिंदी फिल्मों में उनके करिअर की संभावनाओं की भविष्यवाणी कर रहे पंडित भूल जा रहे हैं कि हिंदी फिल्मों में स्टार की वास्तविकताएं अलग हैं।
    याद करें ‘एक दूजे के लिए’ के बाद कमल हासन के लिए भी ऐसी बातें कही जा रही थी। आखिरकार उन्हें दक्षिण लौटना पड़ा। बेहतर होगा कि धनुष चेन्नई में ही सक्रिय रहे। हां, कभी-कभार बेहतरीन भूमिकाओं के साथ हिंदी में नजर आएं तो उनकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता बरकरार रहेगी। हम रजनीकांत और कमल हासन की संभावनाएं देख चुके हैं।


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