मुश्किल था इला को जीना- निम्रत कौर


-अजय ब्रह्मात्मज
 रितेश बत्रा की फिल्म ‘लंचबॉक्स’ के ट्रेलर आने के साथ निम्रत कौर के प्रति रूचि और जिज्ञासा बढ़ी है। इस फिल्म में वह इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ हैं। प्यार, अलगाव, अजनबियत और दांपत्य के महीन तारों से बुनी इस संवेदनशील फिल्म को करण जौहर पेश कर रहे हैं। सीमित बजट की ‘लंचबॉक्स’ अब रेगुलर थिएटर में रिलीज होकर दर्शकों के बीच पहुंचेगी। निम्रत कौर को दर्शक विज्ञापनों के माध्यम से जानते हैं। फिल्म में पहली बार उन्हें ऐसी बड़ी पहचान मिल रही है।
    निम्रत के पिता फौज में थे, इसलिए वह किसी भी शहर में तीन साल से ज्यादा नहीं टिक सकीं। उनका ननिहाल पंजाब में है और ददिहाल राजस्थान में। उनकी पढ़ाई के आखिरी साल दिल्ली में गुजरे। वहां से मुंबई आना हुआ। लगभग नौ साल पहले निम्रत मुंबई आ गई थीं।
-नौ साल से आप मुंबई में हैं। क्या करती रहीं?
मैंने ढेर सारे काम किए। यहां सबसे पहले विज्ञापन किए मैंने। फिर म्यूजिक वीडियो और रीमिक्स वीडियो में कुछ काम मिला। मैंने 80 के आसपास टीवीसी भी किए हैं। मुंबई में विज्ञापन बहुत बड़ा सहारा होता है। 6 साल पहले मैंने सक्रिय रूप से रंगमंच के लिए थोड़ा काम किया।
-रंगमंच में किस के साथ जुड़ीं?
सुनील शानबाग के साथ नाटक किया। मानव कौल और आकर्ष खुराना के साथ भी कुछ नाटक किए। यही इच्छा थी कि खुद को मांजा जाए और तैयार किया जाए।
-फिल्मों का सिलसिला कैसा बना? क्या शुरू से ही फिल्मों में आने का विचार था?
हम लड़कियां जिस पृष्ठभूमि से आती हैं, उनमें सबसे पहली बाधा तो यही रहती है कि घर पर कैसे बताया जाए कि हमें एक्ट्रेस ही बनना है। कैसे कोई आप की इच्छाओं को गंभीरता से ले। तब लगता है कि मेरा रुझाव इस तरफ नहीं है, उस तरफ है। इस तरफ के लिए ...यानी रेगुलर चीजों के लिए सपोर्ट मिलता है। उस तरफ में दिक्कत होती है। अब तो परिदृश्य बदला है। दस-बारह साल पहले गार्जियन अनुमति नहीं देते थे। मैं पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। परफॉरमेंस आट्र्स में कुछ करने के लिए ही मुंबई आई थी। बीस साल पहले मेरे पिता कश्मीर में मारे गए थे। मां अकेली थीं। उन्हें बताना और राजी करना थोड़ा मुश्किल था। परिवार में एक छोटी बहन है।
-बहरहाल, मुंबई में कैसे अवसर मिले? क्या रणनीति अपनाई?
यहां आने पर मेरी तो आंखें खुली रह गईं। सब कुछ समझना था। कुछ भी तो नहीं जानती थी। पहली बार अपूर्व असरानी के म्यूजिक वीडियो के सेट पर गई तो भौंचक्का रह गई। तब तो यही लगा था कि म्यूजिक वीडियो करते ही फिल्म मिल जाएगी। मैं शुरु से यह जानती थी कि क्या नहीं करना है। ख्याली  पुलाव कभी नहीं पकाए। मुझे सीखने-समझने में समय लगा। चुन-चुन कर या फूंक-फूंक कर आगे बढ़ती रही।
-फिल्मों में कैसे आना हुआ?
फिल्मों में ऑफर मुझे मिलते रहे थे। उनमें कुछ पसंद नहीं आई। कुछ करना चाहती थी तो चुनी नहीं जा सकी। मुझे चालू किस्म के रोल नहीं करने थे। इसमें कुछ हद तक परवरिश का असर था। सच तो यह है कि मुझे जो चीज नहीं भाती, उसकी तरफ जा नहीं सकती। खाने से लेकर व्यक्ति तक यही मेरा नजरिया है कि मुझे जिसमें मजा आता है, वही करनी है। मुझे जिसमें स्वाद आता है,वही करती हूं। पिछले साल वासन बाला की ‘पेडलर्स’ आई थी। वासन मुझे जानते थे। उन्होंने कतराते और झिझकते हुए फिल्म ऑफर की थी।
-‘लंचबॉक्स’ कैसे मिली?
रितेश बत्रा बर्लिन में थे। उन्होंने ‘पेडलर्स’ देखी थी। वहां गुनीत मोंगा से मिलने पर उन्होंने मेरे बारे में पूछा। उन्हें इस फिल्म के लिए एक्ट्रेस चाहिए थी। मुंबई में मेरी मुलाकात हुई। पहली मुलाकात में ही मैं उन्हें जंच गई। मुझे फिल्म की स्क्रिप्ट पसंद आई।
-क्या कोई संशय नहीं रहा। आप एक ऐसी फिल्म चुन रही थीं, तब जिसका कोई निश्चित भविष्य नहीं था। यह तो असुरक्षित चुनाव कहा जाएगा?
इसी का तो मजा है। ऐसी असुरक्षा में ही तो जिंदगी और करियर है। मेरा बचपन बहुत असुरक्षित रहा है। मेरी कोई स्थायी दोस्त नहीं रही। हर तीसरे साल स्कूल बदल जाता था। हमेशा नए दोस्त बनाना होता था। ‘लंचबॉक्स’ सिंपल स्टोरी है। इसमें कहने के लिए कुछ नहीं है। ऐसे किरदार को निभाने की चुनौती थी। डब्बा बदलने की घटना 10 लाख में एक होती है। फिर फर्नांडिस के प्रति प्यार होना। यह रियलिस्टिक नहीं लगती। उस टाइम और प्लेस में इला को जीना था।
-इस फिल्म में आप के ज्यादातर दृश्य अकेले ही हैं। सब कुछ स्वगत ही है। जीत के साथ बमुश्किल तीन सीन हैं। फर्नांडिस से तो आप की मुलाकात भी नहीं होती। कैमरे के सामने खुद को कैसे पे्रजेंट किया?
अपना काम शुरू करते समय सबसे ज्यादा वक्त स्क्रिप्ट के साथ बिताती हैं ताकि वह मेरे जहन में बैठ जाए। रितेश के साथ सारी संभावनाओं पर विचार किया। इला की दुनिया बनायी। उसकी पूरी पर्सनैलिटी मेरे सामने थी। फ्लोर पर आने के पहले मैं इला में ढल चुकी थी। इला को अपने पति का प्यार नहीं मिल पा रहा। फिल्म में उसकी वजह नहीं जाहिर होती। मैं स्पष्ट थी कि मुझे कैमरे के सामने क्या करना है? मैं इला को आत्मसात कर चुकी थी।
-स्क्रिप्ट से पर्दे तक की प्रक्रिया में आप शामिल रहीं। फाइनल प्रोडक्ट यानी फिल्म देख कर कितना संतोष हुआ?
पहली बार तो कुछ समझ में नहीं आया। मैं इरफान और नवाजुद्दीन का ही काम देखती रह गई। दूसरी बार कान फिल्म फेस्टिवल में देखने पर समझ में आया। वहां जो सराहना मिली, उससे संतुष्टि बढ़ गई। फिर लगा कि यह स्पेशल फिल्म है।
-करण जौहर इस फिल्म को पे्रजेंट कर रहे हैं। उनके आने से क्या फर्क पड़ा?
यही कि अब यह फिल्म दर्शकों के बीच पहुंच जाएगी। करण प्रेजेंट कर रहे हैं तो फिल्म के प्रति दर्शकों का भरोसा बढ़ गया होगा। यह बहुत अच्छी बात हुई है। ‘लंचबॉक्स’ जैसी अनेक फिल्में बन रही हैं। उन्हें सही डिस्ट्रीब्यूशन और थिएटर मिली तो सभी का फायदा होगा। यह बहुत अच्छी बात हुई है।

Comments

Unknown said…
मेरी आंटी ने वर्षों मेहनत के बाद जनम, मुंडन, उपनयन तथा विवाह संस्कार और त्यौहार गीतों का एक संग्रह तैयार किया है. बिहार मैं ऐसे गीत विलुप्त होने के कगार पर है. आज की पीढ़ी को लोकगीतों से कोई लगाओ नहीं है. खासकर लगन के अवसर पर गिरिह्देवी - देवता (गोसायं) के गीत, जो नितांत आवश्यक होते है. इसे गानेवाली एक्के दुग्गे लाचार बुजुर्ग महिला बची हुई हैं, जिन्हें भरपूर कास्ट दे कर लोग कम चला रहे है. यह समस्या गाँव और शहर दोनों जगह सामान रूप से पर्याप्त है. ऐसे गीत हमारे सांस्कृतिक धरोहर है. इसे सुरक्षित रखना अति आवश्यक है. आप विद्वानों से अनुरोध है कृपया इस गीत संग्रह को आम जनता तक पहुचने का कोई रास्ता सुझायें. tarun006@gmail.com

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