बाबूजी के बेटे - अजय ब्रह्मात्‍मज



अमिताभ बच्चन से हुई यादगार साहित्यक बातचीत : 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अमिताभ बच्चन अपने बाबूजी की बातों का उल्लेख करते समय सिर्फ एक कवि के बेटे होते हैं। उन्हें अपनी विशाल छवि याद नहीं रहती। बाबूजी की रचनाओं के प्रति उनके कौतूहल और गर्व को उनके ब्लॉग और ट्वीट में पढ़ा जा सकता है। 

वर्ष 2008 की बात है। उनके बाबूजी हरिवंश राय बच्चन की जन्म शताब्दी का साल था। अचानक ख्याल आया कि क्यों न उनके बाबूजी हरिवंश राय बच्चन के बारे में बातें की जाएं। मैंने आग्रह के संदेश के साथ इंटरव्यू का विषय भी बता दिया। पूरी बातचीत उनके कवि और साहित्यकार बाबूजी हरिवंश राय बच्चन के बारें में होंगी। वह सहर्ष तैयार हो गए । स्थान, समय और तारीख निश्चित हो गई। 
हालांकि वह भी औपचारिक मुलाकात थी,लेकिन मैं परेशान था कि फिल्म इंडस्ट्री के ख्यातिलब्ध कद्दावर स्टार को इस मुलाकात में मैं क्या भेंट कर सकता हूं? ऊहापोह और असमंजस के बीच मैंने तय किया कि जेएनयू में अपने सीनियर और मित्र गोरख पांडे की कविता समझदारों का गीतले चलूं। दो पृष्ठों की इस कविता में गोरख पांडे ने कथित समझदारों के विरोधाभास और पाखंड को भावपूर्ण गहराई के साथ व्यक्त किया है। दो पृष्ठों की गोरख पांडे की कविता की वह भेंट मेरे लिए तब अमूल्य हो गई,जब मैंने देखा कि अगले दिन उनके ब्लॉग की 218वीं प्रविष्टि में उस कविता की स्कैन कॉपी लगी है। साथ में उस कविता का अंग्रेजी अनुवाद भी है। संभवत: किसी समकालीन हिंदी कवि का अमिताभ बच्चन द्वारा किया गया यह अकेला अनुवाद है। 
अमिताभ बच्चन से मेरी मुलाकातें पहले हो चुकी थीं। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार सुमंत मिश्र के इंटरव्यू में मैं भी उनके साथ जलसा गया था। उसके बाद भी दैनिक जागरण के फिल्म प्रभारी के तौर पर उनके अनेक इंटरव्यू किए। वे सारे इंटरव्यू पहले जलसा और बाद में उनके कार्यालय जनक में होते रहे। इस बार उन्होंने प्रतीक्षा में बुलाया था। प्रतीक्षा उनका जलसा से पहले का आवास है। वहां वे अपने माता-पिता के साथ रहा करते थे। उनके पिता और मां की मुंबई की सारी यादें प्रतीक्षा में रची- बसी हैं। उनके माता-पिता ने प्रतीक्षा में ही अंतिम सांसें ली थीं। बाबूजी का कमरा उनके मृत्यु के दिन की तरह जस का तस रखा हुआ है। प्रतीक्षा के आंगन के बरामदे में हमारी एक घंटे लंबी बातचीत में अमिताभ बच्चन की साहित्यक अभिरूचि और बाबूजी की रचनाओं के प्रति लगाव की झलक मिलती है। मैंने हरिवंश राय बच्चन के एक कथन की याद दिलाते हुए उनसे पूछा कि कभी उनके पुस्तकालय में  आग लग जाए तो वह क्या लेकर भागेंगे? अमिताभ बच्चन ने एक पंक्ति में जवाब दिया था- मैं तो उनकी रचनावली लेकर भागूंगा।
कम लोग जानते होंगे कि अमिताभ बच्चन के शयन कक्ष से लेकर कार्यालक तक बच्चन रचनावली का पूरा सेट रहता है।  वह कभी शूट पर कुछ दिनों के लिए बाहर जाते हैं तो बच्चन रचनावली का सेट भी निजी और आवश्यक सामग्री के तौर पर उनके साथ रहता है। जीवन के हर पहलू और प्रश्न पर उद्धरित करने के लिए अमिताभ बच्चन अपने बाबूजी की रचनाओं से उपयुक्त पंक्तियां खोज निकालते हैं। वह अपने बाबूजी की रचनाओं से प्रेम करते हैं। उनकी योजनाओं में बाबूजी की स्मृति में संग्रहालय स्थापित करना भी है। वह हरिवंश राय बच्चन से संबंधित सारी सामग्री एकत्र कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि हरिवंश राय बच्चन निरंतर पत्राचार करते थे। अभी उनके भेजे गए पत्रों को जहां तहां से एकत्र किया जा रहा है। आप कभी उनसे उनके बाबूजी के समय कवि सम्मेलनों और उनके समकालीनों की बातें करें तो वह घंटों अबाध बातें कर सकते हैं। बाबूजी के बारे में उनसे की गई बातचीत दो हिस्सों में दैनिक जागरण के साहित्यिक परिशिष्ट पुनर्नवामें छपी थी। स्वयं अमिताभ बच्चन ने 2012 में सालों बाद उस इंटरव्यू के लिंक अपने ब्लॉग 1608वीं प्रविष्टि में दिए थे और उनके बारे में लिखा था। फिल्म पत्रकारिता के लंबे प्रवास में अमिताभ बच्चन से की गई वह साहित्यिक बातचीत मेरे लिए अमूलय और विस्मरणीय है। 
उसदोपहर उन्‍होंने बाबूजी की यादों से संबंधित सारी चीजें उत्‍साह के साथ दिखाई थीं। उन्‍हें छूते और बताते हुए वे विह्वल हो रहे थे। पहली बार मैा सुपरस्‍टार अमिताभ बच्‍चन की कवि और साहित्‍यकार हरिवंश राय बच्‍चन के बेटे अमिताभ बच्‍चन से मिल रहा था।

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