शूजित सरकार की नायिकाएं : उर्मिला गुप्ता

शूजित सरकार की नायिकाएं

(उर्मिला गुप्ता)
ओटीटी प्लेटफार्म पर “गुलाबो-सिताबो” की रिलीज ने सबको एक साथ समीक्षक बना दिया. सभी ने पहले ही दिन फिल्म देख भी ली, और चटपट इतनी सारी समीक्षाएं भी लिख डालीं. कहना न होगा कि काफी ‘समीक्षाएं’ स्पोइलर हैं, और एक ही झटके में पूरी कहानी खोलकर रख देती हैं. वैसे “गुलाबो-सिताबो” फिल्म समीक्षा के मामले में एक नया ही रिकॉर्ड बना ले, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.
मैं यहाँ गुलाबो-सिताबो की समीक्षा नहीं करुँगी. शूजित ऐसे निर्देशक हैं, जिनका अपना एक अलग दर्शक वर्ग है. वो उनकी फिल्म किसी समीक्षा की वजह से नहीं देखता, तो जो शूजित का काम पसंद करते हैं, वो उनकी फिल्म जरूर देखेंगे, भले ही वो किसी भी प्लेटफार्म पर रिलीज हो.
इस फिल्म ने मेरा ध्यान विशेष रूप से शूजित के महिला किरदारों की तरफ आकर्षित किया. फिर “पीकू” और “पिंक” को याद करके सोचा कि शूजित की तो फिल्मों में अक्सर महिला किरदार मुखर होते ही हैं. पर फिर भी कुछ तो बात थी, उन किरदारों में जिसने मुझे उनके बारे में और जानने के लिए प्रेरित किया.
शूजित सरकार का जन्म बैरकपुर, कोलकाता में हुआ था. बंगाली हिन्दू परिवार में जन्में शूजित में कला के प्रति एक ख़ास समझ रही है. इनकी निर्देशित फ़िल्में ‘यहां’, ‘मद्रास कैफे’, ‘विकी डोनर’, ‘रनिंग शादी’, ‘अक्टूबर’ सभी के किरदार बहुत सशक्त हैं. उनकी अपनी एक आवाज़ है. वो किरदार योद्धा नहीं है, लेकिन दृढ़ता से अपनी बात कहना जानते हैं. एक और ख़ास बात, शूजित के महिला किरदार ‘वर्किंग’ होते हैं, या उनमें काम करने की महत्वाकांक्षा होती है. वो हमारे बॉलीवुड की नाजुक लड़कियों से अलग हैं. उनका सपना सिर्फ हीरो के दिल पर राज करना ही नहीं होता, बल्कि वो समाज में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं, वो भी बिना किसी क्रांति के. अगर हम हमारे यादगार महिला किरदारों पर नज़र डालें, तो पाएंगे कि उनमें प्रोफेशनल लाइफ की भूख नहीं रही है. फिर वो चाहे जब वी मेट की ‘गीत’ हो या हम आपके हैं कौन की ‘निशा’. गीत को अपनी शर्तों पर जिंदगी तो जीनी थी, लेकिन उन शर्तों में कभी खाना-कमाना प्रमुख नहीं रहा. बाद में भी जब वो आपको टीचर बनी दिखती है, तो तब तक वो जीना छोड़ चुकी होती है, और पहला मौका मिलते ही, वापस अपनी प्यार भरी दुनिया में लौट जाती है. निशा के पापा प्रोफेसर हैं, और दोनों बेटियां पढ़ी-लिखी ज़हीन हैं, लेकिन न तो पापा, और न ही बेटियों के मन में काम करने का ख्याल आता है. यश चोपड़ा या करण जौहर की नायिकाएं तो ख्यालों से भी खूबसूरत हैं, और 9 से 5 के रूटीन में तो उनके डिजाइनर कपड़े भी फिट नहीं होंगे. हाँ कुछ अपवाद हर जगह मौजूद होते हैं. लेकिन काम करने की जैसी ललक हमें शूजित की नायिकाओं में मिल रही है, वो जल्दी से और कहीं नज़र नहीं आती. इसे आप आधुनिक काल का प्रभाव नहीं कह सकते, क्योंकि महिलाएं बहुत पहले से ही हर मोर्चे में झंडे गाड़ती आ रही हैं.    
शूजित की फिल्मों में सिर्फ मुख्य नायिका ही नहीं, बल्कि दूसरे महिला किरदार भी उभरकर आते हैं. ‘पीकू’ में सिर्फ पीकू ही नहीं, बल्कि माशी और काकी भी उतनी ही सशक्त हैं. वो दोनों ही महिलाएं जिद्दी भास्कोर दा के सामने बेझिझक अपनी बात रखती हैं. अपनी बात पर स्टैंड लेती हैं. पीकू का लोहा तो खैर आलोचकों ने भी माना था. कोई आम लड़की भास्कोर के सामने नहीं टिक सकती थी.
‘अक्टूबर’ की श्यूली बेफिक्र दानिश से अधिक स्ट्रोंग थी. बिना कुछ कहे भी वो अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है. फिल्म की शुरुआत में ही होटल मैनेजमेंट कोर्स में वो अपने पुरुष प्रतिद्वंदियों से अधिक प्रतिभाशाली दिखती है. श्यूली ही नहीं उसकी मां विद्या भी सशक्त और मजबूत महिला हैं. वो सिंगल पेरेंट हैं और खुद कमाते हुए अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं.
‘रनिंग शादी’ की निम्मी भी अपना प्रोफेशनल कैरियर देखती है, भले ही वो कितना अजीब हो, लेकिन अपना खुद का काम तो शुरू करती है. ‘मद्रास कैफे’ से हमें मिलती हैं जया साहनी, जो युद्ध पत्रकार हैं. हमारी फिल्मों में और भारतीय समाज में भी कितनी महिला पत्रकार रही होंगी, जिन्होंने सीमा पर जाकर खबर लिखी हैं. यहाँ हम न्यूज़ रीडर की बात नहीं कर रहे. वास्तविक महिला युद्ध पत्रकारों को अभी हम शायद उँगलियों पर गिन सकते हैं.
‘विक्की डोनर’ यकीनन विक्की की फिल्म है, लेकिन क्या आप विक्की की दबंग दादी और आत्मनिर्भर माँ की अनदेखी कर पाते हैं. क्या विक्की की पत्नी आशिमा अपनी आवाज़ उठाने में समर्थ नहीं थी. वो पहले से तलाकशुदा थी, लेकिन फिर भी वो दूसरी शादी में चुप करके एडजस्ट होने वालों में से नहीं थी. आशिमा भी एक वर्किंग महिला थी, विक्की की मम्मी की तरह ही. वो अपने घर के मर्द पर निर्भर नहीं थीं.
‘पिंक’ के बारे में कहने की जरूरत नहीं है, पिंक के किरदार मिनल, फलक और एंड्रिया ने तो समाज में लम्बे समय तक बहस छेड़ दी थी, और अनेकों तर्कों व कुतर्कों के बावजूद सभी ने उन्हें मजबूत किरदार मान लिया था.
अब आई है ‘गुलाबो-सिताबो’. इस पर तो पहले से ही जोरों से चर्चा हो रही है, लेकिन चर्चाओं का दौर थमने के बाद भी आपको फत्तो बेगम, गुड्डू, बांके की माँ, फौजिया इत्यादि का संदर्भ जहाँ-तहां देखने को मिलेगा. ये निर्देशक का कलेजा ही है, जिसने छह फुट के कालजयी नायक के सामने इन किरदारों को उभरने का मौका दिया, और न सिर्फ उभरने का, बल्कि खुद को बेहतर साबित करने का भी.
तो शूजित के चित्र-पटल पर आगे भी यूं सशक्त नायिकाएँ हमें मिलती रहें, और नायिका का महिमामंडन करने के लिए हमें उन्हें ‘मर्दानी’ न कहना पड़े. नारी अपने सहज स्वभाव में भी उतनी ही अदम्य है. 

उर्मिला गुप्ता,:  पेशे से अनुवादक, संपादक, ब्लॉगर, स्क्रिप्ट राइटर हैं| पिछले दस सालों से किताबों की दुनिया में काम करते हुए अनेकों किताबों का अनुवाद किया, जिनमें अमीश त्रिपाठी की “सीता: मिथिला की योद्धा”, "इक्ष्वाकु के वंशज", रश्मि बंसल की "छू लो आसमान", "सात रंग के सपने", "मेरे देश की धरती", अनुजा चौहान की "बैटल फॉर बिटोरा (जिन्नी)" और विनीत बाजपेयी की “हड़प्पा” श्रृंखला की तीन किताबें शामिल हैं। आपने यात्रा बुक्स, राजकमल प्रकाशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादन और अनुवाद कार्य किया| जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के लिए आप ब्लोगिंग और हिंदी मीडिया सम्बंधित जिम्मेदारी संभालती हैं, और जयपुर बुकमार्क के iWrite में आने वाले नवोदित लेखकों का मार्गदर्शन ज्यूरी के रूप में किया है| अनुवाद और मौलिक लेखन पर आपने इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नेशनल बुक ट्रस्ट और भारतीय अनुवाद परिषद् में अतिथि लेक्चरार के रूप में अध्यापन कार्य किया है| आपकी कवितायेँ ‘Mother Tongue Twister’ सहित अनेकों ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित हुई हैं| इसके अलावा टीमवर्क, स्कोलास्टिक, हार्पर कॉलिन्स, जगरनॉट, वेस्टलैंड, ट्रीशेड्स और पेंगुइन के साथ स्वतन्त्र रूप से काम किया है। आपको अनुवाद कार्य के लिए भारतीय अनुवाद परिषद् से 'द्विवागीश पुरस्कार' प्राप्त हुआ है|

Comments

रोचक आँकलन। ऐसी महिला किरदारों की बॉलीवुड को जरूरत भी है। उम्मीद है दूसरे फिल्म निर्माता भी इस और ध्यान देंगे। यहाँ हमें ये देखना होगा कि इन सभी फिल्मों की लेखन एक स्त्री ने किया है जो कि इन किरदारों के साथ न्याय कर पाती हैं। इस कारण क्या हमे इंडस्ट्री में ज्यादा महिला किरदारों को प्रोमोट नहीं करना चाहिए।

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