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Monday, March 4, 2013

क्या करीना और विद्या की लोकप्रियता बनी रहेगी?

शादी के साइड इफेक्ट्स

-अजय ब्रह्मात्मज
    करीना कपूर और विद्या बालन की शादी के बाद उनके प्रशंसकों के मन को यह प्रश्न मथ रहा होगा कि क्या दोनों पहले की तरह फिल्मों में काम करती रहेंगी? अगर उनका फैसला हुआ तो क्या उन्हें पहले की तरह दमदार और केंद्रीय भूमिकाएं मिलती रहेंगी? सच कहें तो दर्शकों के स्वीकार-अस्वीकार के पहले फिल्म इंडस्ट्री के निर्माता-निर्देशक ही शादीशुदा अभिनेत्रियों से कन्नी काटने लगते हैं। सीधे व्यावसायिक कारण हैं। पहला, शादी के बाद न जाने कब ये अभिनेत्रियां मां बन जाएंगी और उनकी फिल्में कुछ महीनों के लिए अटक जाएंगी। दूसरा, शादी के बाद उनके पति (फिल्मी और गैरफिल्मी दोनों) उनकी दिनचर्या और प्राथमिकता को प्रभावित करेंगे। परिवार और पति की जिम्मेदारियों की वजह से वे शूटिंग में अनियमित हो जाएंगी। तीसरा, कहा जाता है कि शादीशुदा अभिनेत्रियों में दर्शकों की रुचि खत्म हो जाती है। वे अपने सपनों में शादीशुदा अभिनेत्रियों को नहीं चाहते। उनकी चाहत खत्म होने से निर्माता शादीशुदा अभिनेत्रियों को फिल्में देने से बचते हैं।
    तीनों कारणों की जड़ में जाएं तो यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद पुरुष वर्चस्व, प्रधानता और मानसिकता है। अभिनेता की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। वह शादी के बाद पापा, दादा और नाना बन जाने पर भी फिल्मों में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है, लेकिन अभिनेत्रियां शादी के बाद ही अवांछनीय हो जाती हैं। किंचित अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास गवाह है कि उसने शादीशुदा अभिनेत्रियों को तरजीह नहीं दी। या तो उन्होंने घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से संन्यास ले लिया या फिर उनके पास ऑफर आने कम और खत्म हो गए। जिन अभिनेत्रियों ने गैरफिल्मी पति चुने, उन्हें पारिवारिक और सामाजिक दबाव में अभिनय का लोभ छोडऩा पड़ा। फिल्मी पति अगर लेखक, निर्माता या निर्देशक हुआ तो भी शादी के बाद हदें तय होने के साथ पाबंदियों का शिकंजा बढ़ता जाता है। एक दिन परेशान होकर अभिनेत्री स्वेच्छा से फिल्मों को टाटा-बाय-बाय कर देती है। आश्चर्य होता है कि अभिनेता पति भी अभिनेत्री पत्नियों की अभिनय आकांक्षाओं को महत्व नहीं देते। अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, अजय देवगन आदि के सहमति, असहमति और निर्णय की सही जानकारी मिले तो पता चलेगा कि जया बच्चन, नीतू सिंह और काजोल के जीवन में निष्क्रिय होने के समय कैसी उथल-पुथल रही। हम लगातार देख रहे हैं कि शादीशुदा अभिनेत्रियां पहले हाशिए पर जाती हैं और फिर पन्ना पलट जाता है। शादी न हो तो भी बहुत कम अभिनेत्रियां अपनी पीढ़ी के आगे-पीछे की पीढिय़ों के अभिनेताओं के साथ काम कर पाती हैं, जबकि श्रीदेवी से लेकर सोनाक्षी सिन्हा तक की लगभग चार पीढिय़ों की अभिनेत्रियों के साथ पिछले 25 वर्षों में सलमान खान काम कर चुके हैं।
    पिछले कुछ महीनों में करीना कपूर और विद्या बालन की शादियां हुई हैं। 32 वर्षीय करीना कपूर और 34 वर्षीया विद्या बालन अभी अपने करिअर की ऊंचाई पर हैं। दोनों की मांग बनी हुई है। करीना कपूर कमर्शियल सिनेमा और कंज्यूमर प्रोडक्ट की चहेती अभिनेत्री हैं। विद्या बालन ने आउट ऑफ बॉक्स सिनेमा के जरिए यह ऊंचाई हासिल की है। करीना कपूर अपने जीरो साइज की वजह से विख्यात रहीं तो विद्या बालन के गदराए बदन पर दर्शकों का एक समूह फिदा है। दोनों ही अभिनेत्रियों ने लगातार अपनी फिल्मों से साबित किया है कि उन्हें सही फिल्में और निर्देशक मिले तो अकेले अपने दम पर ही दर्शकों को सिनेमाघरों तक ला सकती हैं। उनकी फिल्में चर्चित और लाभप्रद रही है। किंतु यह सब शादी के पहले की बात है। अब देखना है कि शादी के बाद उनकी फिल्मों का क्या हश्र होता है। करीना कपूर ने प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’ के लिए हां कह रखा है। उस फिल्म में उनके साथ अमिताभ बच्चन और अजय देवगन होंगे। उसके अलावा कुछ फिल्मों की घोषणा जल्दी होगी। उधर विद्या बालन शादी के पहले से राज कुमार गुप्ता की ‘घनचक्कर’ की शूटिंग कर रही हैं। इमरान हाशमी के साथ उनकी यह फिल्म शादी के बाद पहली रिलीज होगी।
    हालांकि दोनों अभिनेत्रियां फिलहाल दावा कर रही हैं कि शादी से उनके करिअर में फर्क नहीं पड़ेगा। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बदले माहौल और वर्क कल्चर में यह उम्मीद बनती है कि प्रोडक्शन हाउस, निर्माता और निर्देशक उन्हें फिल्में ऑफर करते रहेंगे। इन उम्मीदों का वर्तमान भविष्य में नजर आएगा। अगर पिछले उदाहरण देखें तो काजोल की चाहत और मौजूदगी के बावजूद उनकी फिल्में कम हो रही हैं। करिश्मा कपूर ने शादी के बाद वापसी तो की, लेकिन उनका आधे मन से भी स्वागत नहीं हुआ। अन्य शादीशुदा अभिनेत्रियां फिल्मों के दूसरे क्षेत्रों में व्यस्त हो गईं हैं या किसी अन्य कारोबार में खुद को साध रही हैं।
    सवाल उठता है कि क्या शादी के बाद भारतीय समाज में महिलाओं की आकांक्षाओं का स्वरूप बदल जाता है? दरअसल,बचपन से उन्हें त्याग की ऐसी घुट्टी पिला दी जाती है कि करिअर में आए संकुचन को वे अपना फैसला मान बैठती हैं। पति, परिवार और संतान के नाम पर वे अपनी प्रतिभाओं का गला घोंट देती है। मजे की बात है कि इसमें उनके पति और परिवार को भी असंतुष्टि नहीं होती। विरले ही ऐसे पति और परिवार मिलेंगे जो शादी के बाद घर आई बहू की कामयाबी से खुश हों और उसे बढावा दें। आखिरकार अभी तक हम एक पुरुष प्रधान देश में ही तो हैं, जहां नारी को अपने अधिकारों के लिए दलितों और अल्पसंख्यकों की तरह जूझना पड़ता है। फिर अभिनेत्रियां अपवाद कैसे हो जाएंगी?


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