दरअसल:न्यूयॉर्क की कामयाबी के बावजूद

-अजय ब्रह्मात्मज

26 जून को रिलीज हुई न्यूयॉर्क को दर्शक मिले। जॉन अब्राहम, कैटरीना कैफ और नील नितिन मुकेश के साथ यशराज फिल्म्स के बैनर का आकर्षण उन्हें सिनेमाघरों में खींच कर ले गया। मल्टीप्लेक्स मालिक और निर्माता-वितरकों के मतभेद से पैदा हुआ मनोरंजन क्षेत्र का अकाल दर्शकों को फिल्मों के लिए तरसा रहा था। बीच में जो फिल्में रिलीज हुई, वे राहत सामग्री के रूप में बंटे घटिया अनाज के समान थीं। उनसे दर्शक जिंदा तो रहे, लेकिन भूख नहीं मिटी। ऐसे दौर में स्वाद की बात कोई सोच भी नहीं सकता था।
न्यूयॉर्क ने मनोरंजन के अकाल पीडि़त दर्शकों को सही राहत दी। भूख मिटी और थोड़ा स्वाद मिला। यही वजह है कि इसे देखने दर्शक टूट पड़े हैं। मुंबई में शनिवार-रविवार को करंट बुकिंग में टिकट मिलना मुश्किल हो गया था। साथ ही कुछ थिएटरों में टिकट दोगुने दाम में ब्लैक हो रहे थे।
ट्रेड सर्किल में न्यूयॉर्क की सफलता से उत्साह का संचार नहीं हुआ है। ट्रेड विशेषज्ञों के मुताबिक यशराज फिल्म्स को न्यूयॉर्क से अवश्य फायदा होगा, क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम बजट की फिल्म है। अगले हफ्तों में आने वाली फिल्मों की लागत ज्यादा है और उन्हें ऊंचे मूल्यों पर बेचा गया है। कमबख्त इश्क और लव आज कल का उदाहरण लें, तो इसे वितरक कंपनी ने फिल्म इंडस्ट्री में आए उफान के दिनों में ऊंचे मूल्य देकर खरीदा था। चौतरफा मंदी के इस दौर में वितरक अभी मुनाफे की उम्मीद नहीं कर सकते। अगर लागत भी निकल आए, तो बड़ी बात होगी। वैसे खबर है कि दोनों ही फिल्मों के निर्माता ने तय रकम से कम राशि लेने में इस शर्त के साथ राजी हो गए हैं कि अगर फिल्में सफल हो गई, तो उन्हें तय रकम दे दी जाएगी। ट्रेड विशेषज्ञों की राय में मुनाफे की संभावना कम है।
सप्ताहांत के तीन दिनों में सिने प्रेमी और वीकएंड आउटिंग के शौकीन दर्शकों की भीड़ रहती है। महंगे टिकट से उन्हें दिक्कत नहीं होती। सप्ताहांत में पहले दिन फिल्म देखने का रोमांच खर्च पर हावी रहता है। ट्रेड सर्किल में माना जाता है कि किसी भी फिल्म के हिट या फ्लॉप की परीक्षा सोमवार से आरंभ होती है। अगर सोमवार को दर्शकों का प्रतिशत नहीं गिरा, तो फिल्म के हिट होने की संभावना रहती है। निर्माता, वितरक और अब प्रदर्शक भी सोमवार के बाद के दिनों में दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने के प्रयास में रहते हैं। अगर सप्ताह के अंत में फिल्म हिट हो गई, तो सोमवार के बाद भी दर्शक मिलते हैं, अन्यथा दर्शकों की संख्या में अचानक गिरावट आती है। एक तरीका यह हो सकता है कि मल्टीप्लेक्स के टिकट दर सोमवार से गुरुवार के बीच कम कर दिए जाएं। अगर सप्ताहांत के तीन दिनों में टिकट दर सौ रुपए है, तो सोमवार से गुरुवार तक उसे घटा कर 60 से 75 रुपए के बीच रखा जाए। ऐसा सोचा और कहा जा रहा है कि घटे दर पर दर्शक आ सकते हैं।
फिल्मों के चलने या न चलने का समीकरण किसी की समझ में नहीं आता। पहले की तरह निर्माता-निर्देशकों की उंगलियां अब दर्शकों की नब्ज पर नहीं हैं, इसलिए वे दर्शकों का मिजाज नहीं समझ पाते। हालांकि प्रचार और अन्य तरीकों से दर्शकों को झांसा देने की कोशिश की जाती है, लेकिन दर्शक होशियार हो गए हैं। फिल्म इंडस्ट्री के लोग ही कहते हैं कि दर्शक फिल्मों को सूंघ लेते हैं। आप चाहे जितना प्रचार और विज्ञापन दे लें। दर्शक फिल्म रिलीज होने के पहले से मन बना चुका होता है। केवल पांच से दस प्रतिशत दर्शक ही फिल्म की समीक्षा या प्रदर्शन से प्रभावित होकर मन बदलते हैं। ऐसी स्थिति में निर्माता, वितरक और प्रदर्शक निश्चित हिट की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

Comments

Udan Tashtari said…
अच्छा विश्लेषण है. मैं समझता था कि विज्ञापन से ज्यादा प्रभावित होती है जनता.
विज्ञापन का बहुत प्रभाव पड़ता है

Popular posts from this blog

लोग मुझे भूल जायेंगे,बाबूजी को याद रखेंगे,क्योंकि उन्होंने साहित्य रचा है -अमिताभ बच्चन

खुद के प्रति सहज हो गई हूं-दीपिका पादुकोण