समकालीन सिनेमा(2) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

-डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी


अभी जो लोग यह निर्णय कर रहे हैं कि फिल्म कौन सी बननी चाहिए, वे सौभाग्य या दुर्भाग्य जो भी कह लें,डीवीडी फिल्में देख कर ही निर्णय करते हैं। अभी तक हमारी फिल्में किसी और देश के सिनेमा पर आधारित हैं। कॉरपोरेट की बाढ़ आने से अधिकतर निर्देशकों को शुरू में यह विश्वास था कि नए सिरे कहानियों का मूल्यांकन शुरू होगा, जो बाद भ्रम साबित हुआ। उम्‍मीद थी कि नए सिरे से कथाओं का मूल्यांकन होगा और नए प्रयोगधर्मी  फिल्में बनेगी। आशा के विपरीत परिणाम दूसरा है। मैं कह सकता हूं कि इस प्रकार के निर्णय जो लोग लेते हैं, वे लोग बाबू किस्म के लोग होते हैं। उन्‍हें साल के अंत में एक निश्चित लाभ दिखाना होता है। इसलिए वे भी यही मानते और तर्क देते हैं कि बड़ा कलाकार, बड़ा निर्देशक और सफलता। वे उसके आगे-पीछे नहीं देख पा रहे हैं  ¸ ¸ ¸ 

 सबसे बड़ी बात हमारे पास लंबे समय से ऐसा कोई निकष नहीं रहा,जिसके आधार पर कह सकते हैं कि कॉरपोरेट के अधिकारी वास्तव में कथा के मूल्यांकन के योग्य भी है। हमारे यहां योग्यता का सीधा पर्याय सफलता है। जो सफल है,वही योग्य है। समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जो समर्थ है,वही योग्य है। यह दोषारोपण की बात नहीं है, यह विडंबना ही है कि इस देश में भाषा के स्तर पर, कला के स्तर पर, साहित्य के स्तर पर इतनी विविधता है,फिर भी इस देश में पिछले कुछ वर्षों में पुरस्कार के स्तर पर देख लें या तथाकथित ऑस्कर के लिए भेजी फिल्‍मों को देख लें, उनमें हिंदी सिनेमा का प्रतिनिधित्व नहीं होता है। राष्ट्रीय स्तर पर भी जो सिनेमा पुरस्‍कृत हो रहा है,वह हिंदी का सिनेमा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जो सिनेमा बाहर जा रहा है,वह भी हिंदी का सिनेमा नहीं है। कुल मिलाकर इस समय परिदृश्य ऐसा है कि हमारे यहां कथाओं में विविधता है ही नहीं। मैं तो कहूंगा कथाएं ही नहीं हैं हमारे पास। हम बिना कथा के कई कथाओं को जोड़ कर फिल्‍में बना रहे हैं। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा,भानुमति ने कुनबा जोड़ा के तर्ज पर मनोरंजक फिल्में बन रही हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि वह मनोरंजक फिल्म बनाए। कुछ लोग बना पाते हैं, कुछ नहीं बना पाते हैं। 

हमारे फिल्में साधारण और साधारण के नीचे की हैं। और मैं नहीं मानता कि यह दृश्य नहीं बदलेगा। फिलहाल मुझे नहीं दिखता कि भविष्य तुरंत बदलाव होने वाला है। आने वाले दिनों के सिनेमा का भी मापदंड यही रहने वाला है कि सफल निर्देशक और सफल कलाकार मिल जाएं तो सफलता संभावना और गारंटी हो जाती है।
  

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