फिल्‍म समीक्षा : हिम्‍मतवाला

बेमेल मसालों का मनोरंजन

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
1983 में आई के राघवेन्द्र राव की हिम्मतवाला की रीमेक साजिद खान की हिम्मतवाला 1983 के ही परिवेश और समय में है। कपिलदेव के नेतृत्व में व‌र्ल्ड कप जीतने की कमेंट्री के अलावा फिल्म का एक किरदार बाल कर बताता है कि यह 1983 है। इस प्रकार पिछले बीस सालों में हिंदी सिनेमा के कथ्य और तकनीक में जो भी विकास और प्रगति है, उन्हें साजिद खान ने सिरे से नकार और नजरअंदाज कर दिया है। मजेदार तथ्य है कि साजिद खान की सोच और समझ में यकीन करने वाले निर्माता, कलाकार, तकनीशियन और दर्शक भी हैं। निश्चित ही हमारा देश भारत कई स्तरों पर एक साथ चल रहा है। मनोरंजन का एक स्तर साजिद खान का है।
साजिद खान थैंक्स गॉड इटस फ्रायडे जैसा गीत सुनवाने और मॉडर्न फाइट दिखाने के बाद 1983 के गांव रामनगर ले जाते हैं। इस गांव में शेर सिंह, नारायण दास, गोपी, सावित्री आदि जैसे दुनिया से कटे किरदार रहते हैं। बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे ग्राम सभा होती है। यहां पुलिस भी 2000 किलोमीटर दूर से आती है। रामनगर की ग्राम पंचायत में एक ही सरपंच है। उसने सभी ग्रामीणों की जमीन-जायदाद गिरवी रख ली है। प्रतीकात्मक रूप से साजिद खान मनोरंजन जगत की पंचायत के ऐसे ही सरपंच हैं, जिन्होंने दुनिया से कटे दर्शकों के दिल-आ-दिमाग को गिरवी रख लिया है। उन्हें लगता है कि मनोरंजन के नाम पर वे जो भी परोसेंगे, दर्शक उसे चटखारे लेकर देखेंगे।
साजिद खान की पिछली फिल्मों करी सफलता ने उन्हें कुतर्क की गली में और अंदर और गहरे धकेल दिया है। हिम्मतवाला में वे पिछली फिल्मों से ज्यादा सरल, सतही, तर्कहीन और फूहड़ अंदाज में अपने किरदारों को लेकर आए हैं। साजिद खान की हिम्मतवाला शुद्ध मसालेदार फिल्म है। बस, मसालों को बेमेल तरीके से डाल दिया गया है। ऐसे बेमेल स्वाद इन दिनों पसंद किए जा रहे हें।यह कुछ-कुछ पायनीज भेल, चिकेन डोसा या जैन मंचूरियन की तरह है। न कोई ओर, न कोई छोर, लेकिन बिक्री बेजोड़। हिम्मतवाला पहले दिन पहले शो में दर्शकों के साथ देखने का संयोग बना। एक दर्शक ने इंटरवल में उच्छवास लेते हुए कहा-पका दिया। उसी दर्शक ने फिल्म खत्म होने पर टिप्पणी की, जो मन में आता है, बना देते हैं। इस लिहाज से हिम्मतवाला दर्शकों के मनोरंजन के बजाए साजिद खान का मनरंजन है।
साजिद खान ने अजय देवगन को उनके पॉपुलर इमेज में ही पेश किया है। अजय की प्रतिभा का ऐसा स्वार्थी उपयोग साजिद खान ही कर सकते हैं। अजय देवगन स्वयं पिछली कुछ फिल्मों से कॉमेडी और एक्शन के हिट फार्मूले में फंसे हैं। अपने संवादों और दृश्यों से भरोसा उठने पर साजिद खान अजय देवगन से आता माझा सटकली भी बुलवाते हैं। बम पे लात गाना गवाते हैं। पिछली फिल्म के गानों नैनों में सपना और ताकी रे ताकी को इस फिल्म में रखा गया है, लेकिन जितेन्द्र-श्रीदेवी का जादू जगाने में अजय देवगन-तमन्ना असफल रहे हैं। अमजद खान और कादर खान के किरदारों में इस बार महेश मांजरेकर और परेश रावल हैं। दोनों ने साजिद खान की मर्जी से किरदारों को नया अवतार दिया है। अपनी फूहड़ता से कभी वे हंसाते हैं और कभी हंसने पर मजबूर करते हैं कि बात बन नहीं रही है।
हिम्मतवाला साजिद खान का सिनेमा है। उन्हें भ्रम है कि वे मनमोहन देसाई की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। इस भ्रम में वे सिनेमा को कभी पीछे ले जाते हैं तो कभी तर्कहीन ड्रामा दिखाते हैं।
अवधि-150 मिनट,
*1/2 डेढ़ स्टार

Comments

अब आपने बोल दिया है, तो बिलकुल झांकेगे भी नहीं, वैसे तकनीक के जोर पर साजिद खान सब पर अंगूठा रख सकते है। लेकिन कादरखान की प्रतिभा पर नहीं, पुरानी वाली फिल्म में सबसे बडा जादू उनके द्वारा लिखे हुए संवाद थे।
ह कुछ-कुछ पायनीज भेल, चिकेन डोसा या जैन मंचूरियन की तरह है। न कोई ओर, न कोई छोर, लेकिन बिक्री बेजोड़। हिम्मतवाला पहले दिन पहले शो में दर्शकों के साथ देखने का संयोग बना। एक दर्शक ने इंटरवल में उच्छवास लेते हुए कहा-पका दिया। उसी दर्शक ने फिल्म खत्म होने पर टिप्पणी की, जो मन में आता है, बना देते हैं। इस लिहाज से हिम्मतवाला दर्शकों के मनोरंजन के बजाए साजिद खान का मनरंजन है। ....सार समझ गए सर जी , उम्मीद भी कुछ ऐसी ही थी ।
अजय की प्रतिभा का ऐसा स्वार्थी उपयोग साजिद खान ही कर सकते हैं।
ऐसी कोशिशें ओरिजिनल के प्रभाव को भी फीका करने का ही प्रयास साबित हो रही हैं.

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