हमें भी महत्ता मिले-मनोज बाजपेयी



-अजय ब्रह्मात्मज

-‘सत्या’ से लेकर ‘सत्याग्रह’ तक के सफर में अभिनेता मनोज बाजपेयी के क्या आग्रह रहे?
0 सत्य और न्याय का आग्रह ही करता रहा हूं। हमलोगों की...मेरी हो चाहे इरफान की हो या नसीर की हो, ओमपुरी की हो हम सब की लड़ाई एक ही रही है। अभिनय में प्रशिक्षित अभिनेताओं को बराबर मौका मिले। अपने काम के जरिए हमलोगों ने यही कोशिश की है। लगातार कोशिशों के बावजूद अभी भी सेकेंड क्लास सीटिजन हंै हम सभी। अनुराग, दिबाकर, तिग्मांशु के आने के बाद हमरा महत्व बढ़ा है, लेकिन अभी भी मुझे लगता है कि दूर से आए लोगों की महत्ता या थिएटर से आए लोगों की महत्ता पर जोर देना चाहिए। अगर कमर्शियल हिट्स भी  सबसे हमारे हिस्से में आ रहे हैं तो महत्व देने में क्या जाता है? उचित स्थान देने में क्या जाता है? यही आग्रह हमेशा से रहा है। यह आग्रह हम अपने काम के जरिए करते रहे हैं।
- उचित श्रेय नहीं मिल पाने के लिए कौन जिम्मेदार है? इंडस्ट्री, मीडिया और दर्शक तीनों में कौन ज्यादा जिम्मेदार है?
0 सब जिम्मेदार हैं। थोड़े-थोड़े सब जिम्मेदार हैं। इंडस्ट्री पुराने पैमाने से ही जांचती है।
- इंडस्ट्री आपको इनसाइडर मानती है या आउटसाइडर?
0 हम तो अभी भी आउटसाइडर हैं। बीस साल हो गए। नसीर आज भी आउटसाइडर है। तीस साल हो गए। ओम पुरी और इरफान भी आउटसाइडर है।
- तब तो शाहरुख खान भी आउटसाइडर हैं?
0 नहीं शाहरुख आउटसाइडर से इनसाइडर हुए हैं। चूंकि हीरो बना। निश्चित ही मेहनत उसकी रही है। थिएटर एक्टर हमेशा ऑन द फ्रंट ही रखे जाते हैं। उससे हमें कोई एतराज नहीं होता है। हम बड़े ही स्वाभिमानी लोग होते हैं। हमलोगों कोई प्रॉब्लम नहीं होती है, लेकिन दर्शकों से और मीडिया से हमेशा से अपील करता रहा हूं कि आप कहीं उस पूरी भागमभाग में हम जैसे एक्टरों को दश्कों से इग्नोर करते आ रहे हैं। उस नजरिए को बदलने की जरूरत है। एक स्वस्थ और समान फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह बहुत जरूरी है। हॉलीवुड में टॉम क्रूज होता है तो साथ में रॉबर्ट डिनेरो भी होता है। अगर ब्रैड पिट होता तो डी कैपियो भी होता है। आप स्टारों के स्थान दीजिए मगर किसी को नीचे मत दबाइए। किसी के काम को अनदेखा मत कीजिए। जिसकी जितनी वैल्यू है उतनी वैल्यू आपको देनी चाहिए और दें क्योंकि वह भी अपने काम के जरिए बहुत भारी मात्रा में योगदान दे रहा है।
- बैंडिट क्वीन से लेकर अभी तक के सफर की पांच प्रिय फिल्में कोन सी हैं?
0 पांच फिल्में दर्शक ही बताएं। मेरे लिए बता पाना मुश्किल है। अगर मैं ‘बैंडिट क्वीन’ बोलूंगा तो ‘सत्या’ क्यों नहीं बोलूंगा? अगर ‘सत्या’ बोलूंगा तो ‘पिंजर’ क्यों नहीं बोलूंगा? ‘पिंजर’ बोलूंगा तो ‘1971’ क्यों नहीं बोलूंगा। ‘1971’ बोलूंगा तो ‘रोड’ क्यों नहीं बोलूंगा या अगर ‘रोड’ बोलूंगा तो ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ बोलना ही पड़ेगा।
- आप जैसे एक्टरों के लिए मजबूत जगह तो बनी है,लेकिन आप सभी की वैसी चर्चा नहीं होती?
- हम फूलझड़ी नहीं है। कमर्शियल फिल्मों में हम वैसे रोल करते हैं, जो कोई स्टार नहीं छूएगा। भलीभांति जानते हैं सब। जो रोल मैं ‘सत्याग्रह’ में कर रहा हूं या जो रोल ‘आरक्षण’ में  मैंने किया,उन्हें कोई स्टार नहीं करता। स्टार निगेटिव रोल नहीं छूता है। वह पॉजिटिव फोर्स के खिलाफ खड़ा नहीं होता। इसके लिए हम जैसे लोग हैं,क्योंकि हमारे पास खोने को कुछ है नहीं। हमलोग जाकर खड़े हो जाते हैं। घर पर बैठने से अच्छा है कि हम अभिनय करें। अभिनय से हम जैसे अभिनेताओं को बहुत लगाव है। जो काम आ रहा है,उसे भी छोड़ दें तो घर पर बैठेंगे भूखे मरेंगे।
- इतने सालों के बाद भी यह स्थिति है?
0 मुझे बीस साल हो गए। ‘सत्या’ से पंद्रह साल हो गए। स्थिति बदली नहीं है। थोड़ी स्थिति यह बदली है कि चार-पांच अच्छे डायरेक्टर आ गए हैं,जिनकी फिल्मों में हमारी जरूरत है। या उनकी जो नकल कर रहे हैं,उनकी फिल्मों में हमारी जरूरत है।
- आप जो श्रेय डायरेक्टर दे रहे हैं,मैं वह एक्टर को देना चाहूंगा कि उन डायरेक्टर को आप जैसे एक्टर मिल गए,जिनके जरिए वे अपनी बात कह पाए?
0 अगर उन डायरेक्टर की जिद नहीं होती तो शायद हम लोगों को वे काम नहीं मिलते। डायरेक्टर की जिद ही सिनेमा को कहीं लेकर जा सकती है। अनुराग कश्यप जैसा जिद्दी चाहिए। विशाल भारद्वाज जैसा अपने काम के प्रति अहम रखने वाला चाहिए। दिबाकर बनर्जी जैसा एक राह चलने वाला चाहिए। तभी ऐसा हो सकता है। नहीं तो बहुत सारे निर्देशक आए हैं,जिन्होंने शुरुआत हम जैसे लोगों के साथ की, लेकिन जाकर स्टार सिस्टम में फंसे हैं।
 मैं अनुराग कश्यप को देखता हूं, दिबाकर को देखता हूं तो मैं बड़ा खुश हो जाता हूं। क्योंकि मैं अनुराग को भलि-भांति जानता हूं। मैं उस से मिलूं या नहीं मिलूं। मरने के समय मिलूं तब भी हमारा व्यवहार एक-दूसरे के साथ वैसा ही रहेगा। वह अगर रणबीर के साथ काम कर रहा है तो इसलिए कर रहा है कि इसमें रणबीर ही चाहिए। इसके पहले उसने ‘अग्ली’ की है,बिल्कुल नोन स्टार कास्ट के साथ। उसके बाद भी जो बना रहा है वह भी मैं जानता हूं कि वह क्या बना रहा है और किसके साथ बना रहा है। ये कहीं न कहीं एक अच्छी राह दिखा रहे हैं अपने बाद के आने वाले पीढ़ी के निर्देशकों के लिए कि आप स्टार सिस्टम में बिना फंसे हुए अच्छी फिल्म बना सकते हैं। उसमें नफा थोड़ा कम होता है, लेकिन आप अच्छे से निकल जाते हैं। आप अपने शर्तों पर फिल्में बना लेते हैं।
- आपको क्या लगता है? आपकी प्रतिभा का दुरूपयोग हुआ है या सदुपयोग हुआ है?
0 आधा सदुपयोग हुआ है और आधा कहूंगा कि दुरूपयोग हुआ है। हम ने कहा कि हमलोग वैसे रोल करते हैं कमर्शियल फिल्मों में,जो बाकी कोई स्टार नहीं करेगा। जो हमलोग करना चाहते हैं,उसमें वे किसी स्टार को लेना चाहते हैं। ये तो चलता रहेगा। मैं सिनिकल आदमी नहीं हूं,इसलिए हमेशा अपना एक तर्क निकाल लेता हूं। तर्क यह है कि काम तो मिल रहा है न। अभी मैंने नीरज घेवन की फिल्म के लिए हां कहा है। उसमेंं मेरा किरदार आधे घंटे का है,लेकिन मैं उस डायरेक्टर के साथ काम करना चाहता हूं। मुझे पता है कि मेरे होने से उसके प्रोजेक्ट को थोड़ा फायदा होगा। उसका थोड़ा बजट बढ़ जाएगा। वह आराम से फिल्म बना पाएगा।
- अभी शायद आप भी कोशिश कर रहे हैं प्रोडक्शन में आने की। अपने ढंग की फिल्में बनाने की। यह कितना जरूरी हो जाता है या यह सिर्फ कमर्शियल वेंचर है।
0 कमर्शियल वेंचर नहीं है। मैं खाली बैठ-बैठ कर थक गया। बीस साल मैं खाली बैठा रहा। अब जो भी अच्छी फिल्म आती है,उसे ले रहा हूं मैं अभिनय करने के लिए। मैं यह परवाह नहीं करूंगा कि मुझे सात दिन मिलेगा तैयारी करने के लिए या दस दिन मिलेगा। अमूमन मुझे दस दिन चाहिए होता है। अब मैं अपने आप पर ज्यादा बोझा डाल कर काम करने की दिशा में बढ़ रहा हूं। मैं देख रहा हूं कि अपने जीवन के अगले दस साल में सबसे ज्यादा व्यस्त समय बिताने वाला हूं। प्रोडक्शन उसी की कड़ी है। मैं अपने ढंग का फिल्म बना सकूं। मेरा प्रोडक्शन भी चलता रहे और मैं व्यस्त भी रहूं। काम करते रहने की ललक है।
- क्या आरंभ से ही मंजिल तय थी? या आप आगे बढ़ते गए और मंजिलें तय होती गई?
0 कभी कोई मंजिल नहीं रही। नौवें दशक के आरंभ में मेरे जैसे एक्टर की क्या मंजिल हो सकती है? वह इतना ही सोच सकता था कि चरित्र अभिनेता बन कर अपनी रोजी-रोटी कमाए। जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे लड़ाई की दिशा बदलती गई। काम बदलता गया। सोच की दिशा बदलती गई। उनके हिसाब से मंजिलें बदलती गई। ‘सत्या’ के बाद मुझे काम ही छोड़ देना चाहिए था। उस फिल्म ने मुझे अपनी तलाश की सारी चीजें दे दी थी। नाम, इच्जत, नेशनल अवार्ड, पहचान सब कुछ तो मिल गया था। फिर तो मुझे काम ही छोड़ देना चाहिए था। बार-बार कुछ नया होता रहा। एक समय तो टूट गया। फिल्में तक नहीं रहीं। लगभग तीन साल ऐसा गुजरा।
- क्यों ऐसा हुआ?
0 एक तो मैं बीमार हो गया था। दूसरे ‘1971’ फिल्म का जो हाल हुआ उसका सबसे बुरा खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा। तब मेरे पास कोई फिल्म नहीं रही। फिल्म इंडस्ट्री को मेरे विकल्प के रूप में इरफान और के के मिल गए। पहले मैं अकेला था अपने किस्म की एक्टिंग में, लेकिन इरफान और के के के आने से काम बंटे। जो फिल्में मुझसे छुटीं वे इन्हें मिली। उनकी फिल्में चलीं। किसी को फुर्सत नहीं थी कि वह मनोज बाजपेयी के बारे में सोचे। ‘राजनीति’ के बाद मैं फिर लौटा।
- क्या चमकदार मंजिलों की तलाश में आप खुद नहीं भटके? आपने गलत फिल्मों का चुनाव भी तो किया?
0 हां भटका। बड़े स्टार भी भटकते हैं। मेरे जैसा एक्टर तो बार-बार भटकता है। हमारी समझ में नहीं आता है कि किधर जाना चाहिए। कोई रेफरेंस नहीं रहता। छोटी गलतियों पर भी बड़ी गालियां मिलती है। अगर हिट फिल्म का हिस्सा हो जाए तो कोई गाली नहीं पड़ती। हमेशा कुछ पाने की ललक आसान नहीं होती। मैं खुद गिरा, उठा फिर चला।
- क्या माना जाए कि आपने खुद को रीइनवेंट किया?
0 तीन सालों के बाद हमेशा खुद को बदला है। फिर से खुद को बदलूंगा। नए तरीके से अप्रोच कर रहा हूं। समाज बहुत तेजी से बदल रहा है। दर्शक बदल रहे हैं। अभी अगर जल्दी-जल्दी न बदले तो बासी होते दे न लगेगी। मैं ढेर सारी फिल्में करना चाहता हूं। अब मैं चूजी नहीं रह सकता। हिट फिल्मों को भी लोग भुल जा रहे हैं। अभी लगातार दिखते रहने की जरूरत है। तभी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
- प्रकाश झा के साथ अपने एसोसिएशन के बारे में बताएं?
0 बहुत पहले उन्होंने मुझे ‘मृत्युदंड’ ऑफर किया था। वह मौखिक ऑफर था अयुब खान के रोल के लिए। दिल्ली रंगमंच में मैं मशहूर था और मैंने ‘बैंडिट क्वीन’ साइन कर ली थी। उस समय उन्होंने ऑफर दिया था। बाद में चीजें बदल गईं। उनसे भेंट मुलाकात होती रही थी। ‘राजनीति’ में हमलोग जुड़े। उसे मिला कर तीन फिल्में हो चुकी। वे मित्र की तरह है। उनसे मैंने स्पष्ट कहा है कि अब उनकी फिल्मों में राजनीतिक की भूमिका नहीं करूंगा। अगले एक के लिए उनकी फिल्म में कोई निगेटिव रोल भी नहीं करूंगा। भविष्य में नया कुछ करेंगे।
- और क्या नई फिल्में हैं?
0 अभी ‘सत्याग्रह’  आएगी। उसके बाद नीरज पांडे की ‘7 उचक्के’ आएगी। यह एक कामेडी फिल्म है। दिल्ली के चांदनी चौक के सात उचक्कों की कहानी है। आज की उपभोक्ता संस्कृति में हम जो भुगत रहे हैं। उसी को रोचक तरीके से दिखाया गया है। इसके निर्देशक संजीव शर्मा हैं। मलयालम फिल्म ‘ट्रैफिक’ का रीमेक इसी नाम से बन रहा है। राजेश पिल्ले ही उसका निर्देशन कर रहे हैं। 


फेसबुक पर मैं दोस्‍तों से सवाल मांगता हूं। कभी किसी से मिलने जाता हूं तो दोस्‍तों से भी पूछ लेता हूं। आम तौर पर बेहद साधारण सवाल आते हैं। ज्‍यादातर सवाल गॉसिप से जुढ़े होते हैं और उनमें अनादर भी रहता है। मनोज बाजपेयी से पूछे मैंने दोस्‍तों के सवाल.... 
-अभिनय की परिभाषा क्या है? (मनीष चैरसिया)
0 अभिनय की परिभाषा इसी शब्द में छिपी है। अभी जो नया करें वही अभिनय है। अभिनय का जीवन से गहरा ताल्लुक है।
- ब्लॉग अपडेट क्यों नहीं कर रहे हैं? (anand expt)
0 लंबे समय तक ब्लॉग लिखने के बाद मुझे लगा कि मै खाली हो चुका हूं। अभी के माहौल में मैं खुलकर राजनीतिक बातें नहीं कर सकता। हालांकि यह बात लोकतंत्र लगेगी, लेकिन यही सच्चाई है। अगर खुलकर नहीं लिख सकता तो लिखने का कोई मतलब नहीं है। यह वादा करता हूं कि वापस जरूर आऊंगा।
- आप अपने निभाए तमाम किरदारों को एक कैरी केचर आयडेंटिटी क्यों दे देते हैं? (प्रशांत कश्‍यप)
0  इसे कैरी केचर आयडेंटिटी न कहें। हर किरदार में व्यक्ति अलग होते हैं। व्यक्ति अलग होते हैं तो उनके अलग होने से उनके आचार-विचार, भाव-भंगिमा और बात-व्यवहार में तो फर्क आएगा ही। अगर वो फर्क नहीं करना है और सटल एक्टिंग के नाम पर दुनिया को बेवकूफ बनाना है तो अभिनय करने का कोई मतलब नहीं बनता है। अभिनय की मेरी शिक्षा-दीक्षा के दौरान मेरे टीचर ने कहा था कि अगर अपने किरदार की वजह से तुम जाने जाते हो तो तुम एक्टर नहीं हो। हमेशा एक्टर से किरदार की पहचान होनी चाहिए। हर कैरेक्टर को पहचान देने के लिए ऐसा करता हूं। आप जिसे कैरी केचर आयडेंटिटी कह रहे हैं वास्तव में वह उस कैरेक्टर को पहचान देना है।
- चंपारण में थिएटर एक्टिवीटी के लिए कुछ सोच रहे हैं क्या? (सौरभ संतोष)
0 इस सवाल से मैं सालों से जूझ रहा हूं कि कहां से शुरू करूं? बेतिया, बेलवा की अपनी यात्रा में कभी न कभी मुझे वहां कोई ऐसा समूह मिलेगा जो किसी ग्रुप के लिए तैयार होगा। मैं उनकी आवश्यकता के अनुसार हर प्रकार का सुझाव और निर्देश दूंगा। समस्या है कि छोटे शहरों में ऐसे ग्रुप का जल्दी ही राजनीतिकरण हो जाता है। मैं एक परिषद बनाना चाहता हूं। उस परिषद में साहित्य, नाटक और अन्य विधाओं की बातें हों।
- गांव के मनोज और आज के मनोज बाजपेयी में क्या अंतर है? (राकेश पाठक)
0 दस साल पहले और आज के मनोज में अंतर आ गया है। आप तो गांव की बात कर रहे हैं। पहले मैं बहुत ज्यादा रिएक्ट करता था। अभी ऐसा नहीं करता हूं। अभी मैं चीजों को देखता, समझता और सोचता हूं फिर संभल-संभल कर कुछ कहता हूं। शायद यह उम्र का भी असर है। अब मैं पहले की तरह जवान नहीं रहा। बीवी और बेटी के आने के बाद जिम्मेदारियों के एहसास से मैं अधिक परिपक्व हुआ हूं। आत्मा अभी भी गांव की है, लेकिन बाहरी तौर पर सबकुछ बदल गया है।
- क्या रोमांटिक फिल्में करेंगे? (देव तिवारी)
0 क्यों नहीं। मैं तो रोमांटिक और कॉमेडी दोनों फिल्में करना चाहता हूं। अभी जिस तक के रोमांटिक और कामेडी फिल्में बन रही हैं उनके लिए मैं सक्षम नहीं हूं। मेरे तरीके के रोमांटिक फिल्म मिले तो बात बने। रॉबर्ट डिनोरो और मर्लिन स्ट्रीक की फिल्म ‘फॉलिंग इन लव’ जैसी कोई फिल्म मिले तो बात बने। मैंने अपने जीवन में इससे अच्छी रोमांटिक फिल्म नहीं देखी है। ऐसी कोई फिल्म मिले तो अच्छा लगेगा मुझे।
- दो फिल्मों के प्रमोशन के समय उनकी अभिनेत्रियों ने आपके पांव छूए थे। यह सिर्फ दिखावटी था या कोई और बात थी? (अजीत मैर्या)
0 मुझे यह दिखावटी बात नहीं लगती। पहले से मुझे कुछ भी नहीं मालूम था। तब्बू ने मेरी फिल्म ‘सत्या’ देखी थी। आज से 14 साल पहले उन्होंने ऐसा व्यवहार किया था। कट्रीना कैफ ने ‘राजनीति’ के प्रचार के समय मेरे पांव छू लिए थे। दोनों ने फिल्में देखने के बाद ऐसा किया था। ‘सत्या’ के बारे में तो खैर सभी को मालूम है कि मुझे कैसी सराहना मिली थी। ‘राजनीति’ में कट्रीना साथ काम कर रही थी। कई शॉट्स में हमलोग साथ में थे। उन्हें शूटिंग के समय यह एहसास नहीं था कि सबकुछ पर्दे पर कैसा दिखेगा। फिल्म देखने के बाद वह चौंक गईं। उनकी समझ में आया कि अभिनय की यह अलग प्रक्रिया और आयाम है। यह उन दोनों का बड़पन है। उनका साहस है।
- सामाजिक दायित्वों का निर्वाह अब कैसे करते हैं? उसका स्वरूप कैसा है? (आलोक उपाध्‍याय)
0 थिएटर के दिनों में बच्चों के पुनर्वास के लिए रंगकर्म करता था। उन दिनों थिएटर का भावनात्मक और सामाजिक उपयोग करते थे। हम लोगों ने अनेक एनजीओ के लिए काम किया। मुंबई आने के बाद यह सब छूट गया। अभी फिर से अपनी क्षमता के अनुसार थोड़ा-बहुत कुछ करता हूं।
- आप और शाहरुख खान दोनों बैरी जॉन के शिष्य थे। अभी आप दोनों मुंबई में हैं। फिर भी न तो आप दोनों एक साथ कोई फिल्म की और न एक दूसरे के घर आते-जाते हैं। क्या बात है? (ठाकुर आशीष आनंद)
0 वैनकोवर में शाहरुख ने मुझ से पूछा कि तू घर क्यों नहीं आता है? मेरा यही जवाब था कि तू बुलाएगा तो मैं जरूर आऊंगा। शाहरुख बहुत बड़े स्टार हैं। हमारी मुलाकात के लिए जरूरी है कि वे बुलाएं। अब मैं मन्नत के आगे तो खड़ा नहीं रह सकता। वहां वॉचमैन मुझे अंदर ही नहीं जाने देगा। उसके लिए शाहरुख को शुरुआत करनी पड़ेगी। ऐसे संबंध में जहां पर एक स्टार और एक एक्टर है तो स्टार को ही कदम उठाने पड़ते हैं।


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