एक आगाज है आस्कर

81वें अकादमी अवार्ड यानी आस्कर में स्लमडाग मिलिनेयर को नौ श्रेणियों में दस नामंाकन मिले थे। इस फिल्म ने आठ श्रेणियों में पुरस्कार हासिल कर इतिहास रच दिया। स्लमडाग मिलिनेयर को मिले आस्कर पुरस्कारों से कुछ लोग आह्लादित हैं तो एक समूह ऐसा भी है जो भारतीय खुशी को 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' समझ रहा है। उनका कहना है कि यह भारतीय फिल्म नहीं है, इसलिए हमारी खुशी निराधार है। तर्क के लिहाज से वे सही हैं, लेकिन प्रभाव, भावना और उत्साह की बात करें तो स्लमडाग मिलिनेयर की उपलब्धियों पर खुश होना किसी और के दरवाजे पर दीपक जलाना नहीं है। गीत, संगीत और ध्वनि मिश्रण के लिए भारतीयों को मिले पुरस्कारों से यह साबित होता है कि भारतीय प्रतिभाएं अंतरराष्ट्रीय मानदंड के समकक्ष हैं। जरूरत है कि विभिन्न प्रतियोगिताओं और समारोहों में उन्हें एंट्री मिले और उससे भी पहले जरूरी है कि देश में मौजूद प्रतिभाओं को नई चुनौतियां और अवसर मिलें ताकि वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। स्लमडाग मिलिनेयर के माध्यम से भारतीय प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान और सम्मान का अवसर मिला। आस्कर पुरस्कार श्रेष्ठता का अकेला मानदंड नहीं है। दुनिया में और भी मंच, फेस्टिवल, समारोह और आयोजन हैं, जहां मिली पहचान से हम गौरवान्वित होते रहे हैं। आस्कर के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना पालने के पहले हमें यह समझना चाहिए कि वहां की सामान्य श्रेणियों में भारत में बनी भारतीय भाषाओं की फिल्में शामिल नहीं हो सकतीं। पहले गांधी और फिर स्लमडाग मिलिनेयर मूल रूप से अंग्रेजी में बनी फिल्में हैं। आस्कर के लिए आवश्यक है कि फिल्म की भाषा अंग्रेजी हो और वह अमेरिका में भी रिलीज हुई हो। बहुत संभव है कि स्लमडाग मिलिनेयर की कामयाबी से प्ररित होकर शीघ्र ही कोई भारतीय निर्माता या निर्देशक इस तरह का प्रयास करे और आस्कर पुरस्कारों की दौड़ में शामिल हो जाए। फिलहाल हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में बनी फिल्में आस्कर की 'विदेशी भाषा की फिल्म' की श्रेणी में ही शामिल हो सकती हैं। इस वर्ग में आशुतोष गोवारिकर की लगान कुछ वर्ष पूर्व नामांकन सूची तक पहुंच सकी थी।
स्लमडाग मिलिनेयर भारतीय फिल्मकारों के लिए इस संदर्भ में प्रेरणा बन सकती है कि वे वास्तविक किस्म की फिल्मों के लिए प्रेरित हों। पुरस्कारों के लिए फिल्म के महंगा होने से ज्यादा जरूरी है कि वह मानवीय संवेदनाओं को छूती हो। उसका विषय गहरा और व्यापक हो। इस पर बहस चलती रहेगी कि स्लमडाग मिलिनेयर भारत की गरीबी का प्रदर्शन कर पुरस्कार बटोर रही है या मामला कुछ और है। इस फिल्म का बारीकी से अध्ययन करें तो यह भारतीय मानस की फिल्म है, जिसमें आस-विश्वास, भाग्य और कर्म का अनोखा मेल है। निश्चित ही स्लमडाग मिलिनेयर पश्चिमी नजरिए से बनी फिल्म है, लेकिन इसमें भारतीय मूल्यों और भावनाओं को समेटने और रेखांकित करने की कोशिश है। फिल्म अपने निहितार्थ में उम्मीद, जीत और प्रेम पर टिकी है। हां, पश्चिमी उदारता और वर्चस्व की अंतर्धारा भी फिल्म में मौजूद है, जो ढेर सारे राष्ट्रवादी दर्शकों को खल सकती है। पश्चिम की वर्चस्व ग्रंथि उनकी फिल्मों, साहित्य, संभाषण और नीतियों में साफ झलकती है। स्लमडाग मिलिनेयर में भी वर्चस्व ग्रंथि है।
इंटरनेशनल मार्केट, अवार्ड या दर्शकों को थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर हम आत्मावलोकन करें। क्या हमारे फिल्मकार विकास स्वरूप के इस उपन्यास पर फिल्म बनाने की हिम्मत करते? अगर कोई निर्देशक साहस दिखाता तो क्या उसे किसी प्रोडक्शन हाउस से सहयोग मिलता? उत्तार होगा, नहीं। हमारे निर्माता और प्रोडक्शन हाउस दकियानूस और लकीर के फकीर हैं। यही कारण है कि कोई भारतीय निर्देशक 'क्यू एंड ए' पर फिल्म बनाने की पहल नहीं करता। हमारे बहुविध समाज में अनेक विषय हैं, जिन्हें तराश कर सेल्युलाइड पर उतारा जा सकता है। स्लमडाग मिलिनेयर जैसी अनेक कहानियां रूपहले पर्दे पर आ सकती हैं, लेकिन हम अपनी पारंपरिक सोच और लाभ-हानि की चिंता के कारण इस दिशा में पहल नहीं कर पाते। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री चंद लोभी और मुनाफाखोर निर्माताओं के चंगुल में फंसी है। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे निर्माताओं और संबंधित व्यक्तियों का एक वर्ग नए प्रयोग की सफलता को अपवाद, आर्ट या आकस्मिक घटना बताकर ट्रेंड बनने से रोकता है। उसकी बड़ी वजह यह है कि अगर अपारंपरिक विषयों के नए प्रयोग ट्रेंड बन गए तो कल्पनाहीन निर्देशकों का वर्चस्व टूटेगा और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उनके हाथों से निकल जाएगी। स्लमडाग मिलिनेयर भारतीय फिल्मों के लिए एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है। हम युवा निर्देशकों, लेखकों और तकनीशियनों को सृजनात्मक आजादी देकर इसकी सफलता भारतीय फिल्मों में दोहरा सकते हैं।

Comments

आस्कर मिलने से खुशी तो सबको हुई है, मैं सिर्फ इस बात पर खुश हुआ कि आस्कर समारोह में भारतीय संगीत बजा और किसी भारतीय कलाकार को भारतीय संगीत के लिये आस्कर मिला। इस पुरस्कार से हमारे करोड़ो के कारोबार वाले भारतीय सिनेमा जगत पर भी एक प्रश्न चिन्ह लगा कि "वही भारतीय लेखक, वही भारतीय कलाकार और वही भारतीय लोकेशन्स, लेकिन डायरेक्टर विदेशी तो फिल्म आस्कर की झड़ी लगा देती है, लेकिन भारतीय डायरेक्टर होने पर वह बात क्यों नहीं आ पाती"
sushant jha said…
सर..बेहतरीन...
भाई, देखते रहिए अब स्लमडॉग की हवा चलेगी और हर कोई स्लमडॉग जैसी फिल्म बनाने की कोशिश करेगा। स्लम का बाजार सजेगा। गरीबी बिकेगी। जय हो।
फ़िल्म अच्छी है इस बात से ऐतराज़ नहीं है...मुझे खुशी इस बात की है कि ,रहमान,गुलज़ार,और रसूल को अवार्ड मिला.यह भारतीय संगीत और सिने-समझ का सम्मान है.यह वाकई हिन्दी फ़िल्म जगत का एक प्रस्थान बिन्दु साबित होगा,इसमें कोई शक नहीं पर यह भी कड़वी सच्चाई है कि यदि कोई भारतीय निर्माता-निर्देशक इस फ़िल्म को बनाता तो इसे भी चाट-मसाला फ़िल्म कहकर खारिज कर दिया जाता.'सलाम बॉम्बे' तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.बहरहाल, "जय हो जय हो जय हो"-के साथ ..
varsha said…
स्लमडाग मिलिनेयर भारतीय फिल्मों के लिए एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है। हम युवा निर्देशकों, लेखकों और तकनीशियनों को सृजनात्मक आजादी देकर इसकी सफलता भारतीय फिल्मों में दोहरा सकते हैं।

well said.

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