हारे (सितारे) को हरिनाम

कोई कहीं भी आए.जाए... चवन्नी को क्या फर्क पड़ता है? इन दिनों संजय दत्त हर प्रकार के देवतओं के मंदिरों का दरवाजा खटखटा रहे हैं. उन्हें अमर्त्य देवताओं की सुध हथियार मामले में फंसने और जेल जाने के बाद आई. आजकल तो आए दिन वे किसी न किसी मंदिर के चौखटे पर दिखाई पड़ते हैं और हमारा मीडिया उनकी धार्मिक और धर्मभीरू छवि पेश कर खुश होता है. हाथ में बध्धी, माथे पर टीका और गले में धार्मिक चुनरी डाले संजय दत्त से सभी को सहानुभूति होती है. उन पर दया अ।ती है. चवन्नी को लगता है कि संजय दत्त इन धार्मिक यात्राओं से अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं. अगोचर देवता तो न जाने कब कृपा करेंगे? संसार के गोचर प्राणियों की धारणा है कि बेचारा संजू बाबा नाहक फंस गया. उसने जो अवैध हथियार रखने का अपराध किया है, उसकी सजा ज्यादा लंबी होती जा रही है.
चवन्नी ने गौर किया है कि कानून की गिरफ्त में अ।ने के बाद संजू बाबा ने अपनी हिंदू पहचान को मजबूत किया है. उन्होंने मुसलमान दोस्तों से एक दूरी बनाई और सार्वजनिक स्थलों पर नजर आते समय हिंदू श्रद्धालु के रूप में ही दिखे. बहुत लोगों को लग सकता है कि यह कौन सी बड़ी बात हो गई. बड़ी बात है... इस देश के बहुसंख्यक के साथ जुड़ना या अल्पसंख्यक पहचान कायम करना हमारी सामाजिक अस्मिता का हिस्सा बनता जा रहा है. सलमान खान कोर्ट में पेशी के समय कटोरी छाप सफेद टोपी पहन लेते हैं. संजय दत्त अपनी पेशियों के समय ललाट पर लाल-काला टीका लगा लेते हैं.
किसी की श्रद्धा और अ।स्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकत।, लेकिन अ।स्थाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन हो और उसके पीछे कोई निहित मंशा हो तो चवन्नी चौंकता है.. क्या वजह है कि अचानक तीर्थाटन में रुचि बढ़ गई फिल्मी हसितयों की... अमिताभ बच्चन दिन-रात मंदिरों के फेरे लगाते रहते हैं, संजय दत्त का हम जिक्र कर ही रहे हैं, बाकी सब भी निजी और सार्वजनिक तौर पर भगवान की शरण में माथा टेकते हैं. चवन्नी सोचता है कि जब ऐसे कामयाब लोग धर्मभीरू और अंधविश्वासी हो सकते है तो इनको अपना आदर्श मानने वाले बेचारे दर्शक और अ।मजन क्या सोचते और करते होंगे?

Comments

Anonymous said…
सितारे भी इंसान होते हैं.उन्हें भी डर लगता होगा.
ePandit said…
चवन्नी भाई आप अपने ब्लॉग की नाम हिन्दी में (चवन्नी छाप) क्यों नहीं रखते। रोमन में जँचता नहीं। :)

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