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Tuesday, August 31, 2010

हिंदी सिनेमा में खलनायक-मंजीत ठाकुर

मंजीत ठाकुर

हिंदी फिल्मों का एक सच है कि अगर नायक की को बड़ा बनाना हो तो खलनायक को मजबूत बनाओ। उसे नायक जैसा बना दो। यह साबित करता है कि रामायण और महाभारत केवल राम और कृष्ण की वजह से ही नहीं, रावण और दुर्योधन की वजह से भी असरदार हैं।

हिंदुस्तानी सिनेमा के पहले दशक में धार्मिक कथाओं और किंवदंतियों पर सारी फ़िल्में बनीं। इन कथाओं के नायक देव थे और खलनायक राक्षसगण।

हिंदुस्तानी सिनेमा में गांधी जी असर बेहद खास था और शायद इसी वजह से पहले चार दशक तक खलनायक बर्बर नहीं थे और उनके चरित्र भी सुपरिभाषित नहीं थे। उस दौर में प्रेम या अच्छाई का विरोध करने वाले सामाजिक कुप्रथाओं और अंधविश्वासग्रस्त लोग थे।

अछूत कन्यामें प्रेम-कथा के विरोध करने वाले जाति प्रथा में सचमुच विश्वास करते थे। इसीतरह महबूब खान की नज़मामें पारंपरिक मूल्य वाला मुसलिम ससुर परदा प्रथा नामंजूर करने वाली डॉक्टर बहू का विरोध करता है और 1937 में दुनिया ना मानेका वृद्ध विधुर युवा कन्या से शादी को अपना अधिकार ही मानता है।

पचास और साठ के दशक में साहूकार के साथ दो और खलनायक जुड़े- डाकू और जमींदार। खलनायक का ये चरित्र साहूकारी पाशका सूदखोर महाजन मंटो की लिखी किसान हत्यासे होते हुए अपनी बुलंदियों पर महबूब खान की औरतमें पहुंचा और कन्हैयालाल ने इसी भूमिका को एक बार फिर1956 में मदर इंडियामें प्रस्तुत किया।

भारत में डाकू की एक छवि रॉबिनहुडनुमा व्यक्ति की भी रही है और समाज में मौजूद अन्याय और शोषण की वजह से मजबूरी में डाकू बनने वाले किरदार लोकप्रिय रहे हैं। सुनील दत्त की सतही मुझे जीने दोके बाद यह पात्र दिलीप कुमार की गंगा-जमुनामें 'क्लासिक डायमेंशन' पाता है।

सत्तर और अस्सी के दशक में तस्कर और व्यापारी विलेन बन गए और अब वे अधिक सुविधा-सम्पन्न और खतरनाक भी हो गए थे। चूंकि स्मगलिंग विदेशों में होती थी, इसलिए खलनायक के साथ एक अंग्रेज-सा दिखने वाला किरदार भी परदे पर आने लगा, जो दर्शर्कों की सहूलियत के लिए हिन्दी बोलता था।

यह उस युग की बात है जब अर्थनीति 'सेंटर' में थी और आज जब अर्थनीति की रचना में लेफ्टशामिल है, ‘गुरूजैसी फ़िल्म बनती है जिसमें पूंजीपति खलनायक होते हुए भी नायक की तरह पेश है और आख़िरी रील में वह स्वयं को महात्मा गाँधी के समकक्ष खड़ा करने का बचकाना प्रयास भी करता है।

पाँचवे और छठे दशक में ही देवआनंद के सिनेमा पर दूसरे विश्वयुद्ध के समय में अमेरिका में पनपे (noir) नोए सिनेमा का प्रभाव रहा और खलनायक भी जरायमपेशा अपराधी रहे हैं जो महानगरों के अनियोजित विकास की कोख से जन्मे थे।

फिर समाज में हाजी मस्तान का उदय हुआ। सलीम-जावेद ने मेर्लिन ब्रेंडो की वाटर फ्रंटके असर और हाजी मस्तान की छवि में दीवारके एंटी-नायक को गढ़ा जिसमें उस दौर के ग़ुस्से को भी आवाज़ मिली।

इसी वक्त नायक-खलनायक की छवियों का घालमेल भी शुरु हुआ। श्याम बेनेगल की अंकुरऔरनिशांतमें खलनायक तो जमींदार ही रहे लेकिन अब वे राजनीति में सक्रिय हो चुके थे। इसी क्रम में पुलिस में अपराध के प्रवेश को गोविंद निहलानी की अर्धसत्यमें आवाज मिली और पुलिस के राजनीतिकरण और जातिवाद के असर को देवमें पेश किया गया।

इसी दौरान खलनायक अब पूरे देश पर अपना अधिकार चाहने लगे। सिनेमा ने अजीबोगरीब दिखने वाले, राक्षसों-सी हंसी हंसने वाले, सिंहासन पर बैठे, काल्पनिक दुनिया के से खलनायकों को जन्म दिया। शाकाल, डॉक्टर डैंग और मोगेंबो इन्हीं में से थे।

इसी बीच 1975 में एक ऐसा खलनायक आया जिसके बुरा होने की कोई वजह नहीं थी। वह बस बुरा था। वह गब्बर सिंह था, जिसका नाम सुनकर पचास कोस दूर रोते बच्चे भी सो जाते थे। हिन्दी समझने वाला ऐसा भारतीय मुश्किल ही मिलेगा, जिसने अब तेरा क्या होगा बे कालियान सुना हो।

अमजद खान के बाद वैसा खौफ सिर्फ दुश्मनऔर संघर्षके आशुतोष राणा ने ही पैदा किया। इन दोनों फिल्मों का सीरियल किलर नब्बे के दशक के उत्तरार्ध के उन खलनायकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो मानसिक रूप से बीमार थे।

मानसिक अपंगता के साथ शारीरिक अपंगता भी बॉलीवुड में खलनायकों के गुण की तरह इस्तेमाल की जाती रही है। अपनी क्षतिग्रस्त आंख के कारण ललिता पवार सालों तक दुष्ट सास के रोल करती रहीं।डरके हकलाते शाहरुख और ओमकाराका लंगड़ा त्यागी भी इसी कड़ी में हैं।

इसी बीच हीरो हीरोइन के घर से भागकर शादी करने वाली फिल्मों ने उनके माता-पिता को ही खलनायक बनाना शुरु कर दिया। इसके उलट बागबानऔर अवतारकी संतानें अपने माता-पिता की खलनायक ही बन गईं। कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा तो रोजाने पाकिस्तान और आतंकवादियों के रूप में बॉलीवुड को एक नया दुश्मन दिया। इन्ही दिनों बॉलीवुड के चरित्न वास्तविक जीवन के चरित्नों की तरह आधे भले-आधे बुरे होने लगे। परिंदा’, ‘बाजीगर’, ‘डर’, ‘अंजामऔर अग्निसाक्षी जैसी फिल्मों ने एक नई परिपाटी शुरु की, जिनके मुख्य चरित्न नकारात्मकता लिए हुए थे।

लेकिन पहले सूरज बड़जात्या और फिर आदित्य चोपड़ा और करण जौहर ने अपनी फिल्मों से विलेन को गायब कर दिया। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में पिता शुरु में विरोध करते हैं और लगता है कि वे हीरो-हीरोइन के प्रेम में विघ्न पैदा करेंगे, लेकिन हीरोइन उनसे बगावत नहीं करती और हीरो मुकाबला नहीं करता। दोनों पिता का दिल जीतते हैं, इस कहानी में हीरोइन का मंगेतर हीरो के मुकाबले में आता है, लेकिन पूरी कहानी में उसकी जगह किसी प्यादे से ज्यादा नहीं है।

संयोग ऐसा रहा कि तीनों की फिल्में सफल रहीं। लिहाजा बाकी निर्देशकों को भी लगा कि अब फिल्मों में विलेन की जरूरत नहीं रह गई है। पिछले दस सालों में तनुजा चंद्रा की फिल्म दुश्मन का गोकुल पंडित ही ऐसा विलेन आया है, जिसे देखकर घृणा होती है। फिल्मों से खलनायकों की अनुपस्थिति का सबसे बड़ा नुकसान यही हुआ कि फिल्मों की कहानियों से नाटकीयता गायब हो गई है।

बहरहाल, सिनेमा अपने एकआयामी चरित्रों और कथानकों के साथ जी रहा है, लेकिन तय है कि खलनायकों की वापसी होगी, क्योंकि खलनायकत्व उत्तेजक है।


Monday, August 30, 2010

मल्टीप्लेक्स में क्षेत्रीय फिल्में

मुंबई में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के तौर-तरीकों से सहमत नहीं हुआ जा सकता। मराठी अस्मिता की लड़ाई के लिए देश की दूसरी संस्कृतियों की बढ़ती पहचान को जबरन रोकना असांविधानिक और गलत है। फिर भी राज ठाकरे ने मल्टीप्लेक्स मालिकों पर मराठी फिल्मों के शोज प्राइम टाइम पर रखने का जो दबाव डाला है, वह मराठी सिनेमा के अस्तित्व और विकास के लिए जरूरी पहल है। न सिर्फ महाराष्ट्र में, बल्कि दूसरे प्रांतों में भी हमें मल्टीप्लेक्स मालिकों पर दबाव डालना चाहिए कि वे अपने प्रांत और क्षेत्र विशेष की फिल्मों का प्रदर्शन अवश्य करें। राजस्थान में राजस्थानी, हरियाणा में हरियाणवी और छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा में बनी फिल्मों का प्रदर्शन अनिवार्य करने पर निश्चित ही उन भाषाओं में सक्रिय फिल्म निर्माताओं को संबल मिलेगा।

फिल्मों के वितरण और प्रदर्शन के तंत्र से दर्शकों का सीधा रिश्ता नहीं बनता। उन्हें सामान्य रूप में लगता है कि जो फिल्में चलती हैं या जिनकी चलने की उम्मीद होती हैं, थिएटरों के मालिक उन फिल्मों का ही प्रदर्शन करते हैं। ऊपरी तौर पर यह सच है, लेकिन भीतर ही भीतर वितरकों की लॉबी और निर्माताओं के प्रभाव से गंदे खेल खेले जाते हैं। अगर बड़े प्रोडक्शन हाउस या कॉरपोरेट हाउस की चर्चित और अपेक्षित फिल्म रिलीज हो रही हो, तो पहले से चल रही फिल्मों के शोज आगे-पीछे कर दिए जाते हैं। कई बार उन्हें उतार भी दिया जाता है, ताकि नई फिल्म को ज्यादा से ज्यादा शो मिल सकें। सिंपल लॉजिक है कि अगर नई फिल्म अस्सी प्रतिशत बिजनेस दे सकती है, तो क्यों पहले से चल रही फिल्म के 30-35 प्रतिशत के बिजनेस से संतुष्ट हुआ जाए। एक व्यापारी के लिए यह फैसला फायदेमंद है, लेकिन छोटे निर्माताओं को दर्शकों का नुकसान होता है। एक इंटरव्यू के दौरान गोविंद निहलानी ने बताया था कि उनकी फिल्म द्रोहकाल मुंबई के मेट्रो थिएटर से एक हफ्ते के बाद उतार दी गई थी, जबकि उसे दर्शक मिल रहे थे। वास्तव में अगले हफ्ते एक बड़ी कॉमर्शियल मसाला फिल्म रिलीज हो रही थी, इसलिए वितरक और प्रदर्शक ने द्रोहकाल को उतारने में जरा भी देर नहीं की। मल्टीप्लेक्स थिएटरों के दौर में ऐसी फिल्मों का प्रदर्शन चलता रहता है, लेकिन शोज की टाइमिंग ऐसी कर दी जाती है कि कई बार चाह कर भी दर्शक फिल्म नहीं देख पाते। इस समस्या पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि छोटी फिल्मों के प्रदर्शन को कैसे नियमित किया जा सके? कैसे उनके शोज प्राइम टाइम पर एडजस्ट किए जा सकें?

मनोरंजन उद्योग में कोटा सिस्टम या रिजर्वेशन लागू नहीं किया जा सकता। फिल्में दर्शक अपनी पसंद से देखते हैं। साल में बन रही 100 से अधिक हिंदी फिल्मों में से 5-6 ही हिट हो पाती हैं। बाकी फिल्में अब तो वीकएंड के तीन दिनों में ही थिएटर से बाहर निकल जाती हैं। इस माहौल में कई बार छोटी और क्षेत्रीय फिल्मों को भी नुकसान उठाना पड़ता है। अगर मुंबई के मल्टीप्लेक्स थिएटरों में मराठी फिल्मों के शोज प्राइम पर सुनिश्चित किए जाएं, तो निश्चित ही मराठी फिल्मों के दर्शक बढ़ेंगे। भोजपुरी फिल्मों के निर्माताओं और कलाकारों को शिकायत है कि मल्टीप्लेक्स थिएटर भोजपुरी फिल्में प्रदर्शित नहीं करते। उन्हें ये फिल्में डाउन मार्केट लगती है और उनकी धारणा है कि मल्टीप्लेक्स के दर्शक भोजपुरी फिल्में नहीं देखते। यह मुंबई और दिल्ली में एक हद तक सच हो सकता है, लेकिन हिंदी प्रदेशों में बने मल्टीप्लेक्स थिएटर भी इसी पूर्वाग्रह के शिकार हैं। दरअसल, मल्टीप्लेक्स थिएटर की नेशनल चेन हैं। उनकी फिल्मों के चयन और प्रदर्शन के फैसले मुंबई या दिल्ली में बैठ कर लिए जाते हैं। उन्हें स्थानीय दर्शकों की पसंद की जानकारी नहीं रहती

Friday, August 20, 2010

फिल्‍म समीक्षा लफंगे परिंदे


गढ़ी प्रेमकहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

एक नंदू है और एक पिंकी। दोनों मुंबई की एक ही वाड़ी में रहते हैं। निम्न मध्यवर्गीय परिवार की इस वाड़ी में पिंकी का परिवार तो दिखता है, लेकिन नंदू के परिवार का कोई सदस्य नहीं दिखता। उसके तीन और लफंगे दोस्त हैं। बॉक्सिंग का शौकीन नंदू वन शॉट नंदू के नाम से मशहूर हो जाता है। दूसरी तरफ पिंकी स्केटिंग डांस के जरिए इस वाड़ी से निकलने का सपना देखती है। इन दोनों के बीच उस्मान भाई आ जाते हैं। अनचाहे ही उनकी करतूत से दोनों की जिंदगी प्रभावित होती है। और फिर एक प्रेमकहानी गढ़ी जाती है। परिणीता के निर्देशक प्रदीप सरकार की लफंगे परिंदे लुक और अप्रोच में मॉडर्न होने के बावजूद प्रभावित नहीं कर पाती।
लफंगे परिंदे के किरदार, लैंग्वेज, पहनावे और माहौल में मुंबई की स्लम लाइफ दिखाने में लेखक-निर्देशक असफल रहे हैं, क्योंकि सोच और दृष्टि का आभिजात्य हावी रहा है। फिल्म की जमीन स्लम की है, लेकिन उसकी प्रस्तुति यशराज की किसी और फिल्म से कम चमकीली नहीं है। फिल्म के नायक-नायिका अपने मैनरिज्म और लैंग्वेज में निरंतरता नहीं रख पाए हैं। कभी भाषा सुसंस्कृत हो जाती है तो कभी चाल-ढाल। इस वजह से लफंगे परिंदे वास्तविकता और फंतासी के बीच फड़फड़ाती रह जाती है। नील नितिन मुकेश और दीपिका पादुकोन अपनी मेहनत के बावजूद किरदारों को निभा नहीं पाते। अंधी दीपिका कुछ ज्यादा ही निराश करती हैं। अंधे होने के बाद भी उनके बोलने और चलने-फिरने में कोई फर्क ही नहीं आता। पीयूष मिश्रा तक अप्रभावी रहे, बाकी की क्या बात की जाए? प्रेमकहानी का द्वंद्व कमजोर है, इसलिए क्लाइमेक्स प्रभावशाली नहीं बन पाया है।
क्या वजह है कि यशराज फिल्म्स की हाल-फिलहाल की अधिकांश फिल्मों की कहानियां स्पोर्ट्स, डांस और कंपीटिशन से संबंधित हो गई हैं। किरदार बदलते हैं, लेकिन कथ्य लगभग एकजैसा रहता है। एक बड़े बैनर की फिल्मों में यह दोहराव चिंतनीय है।

Thursday, August 19, 2010

दरअसल : लीला नायडू की आत्मकथा

लीला नायडू की आत्मकथाअनुराधा और त्रिकाल जैसी हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री लीला नायडू के बारे में हम बहुत कम जानते हैं। उनकी मृत्यु के बाद भी इस कम जानकारी की वजह से उनके बारे में ज्यादा नहीं लिखा गया। उन्होंने बाद में कवि मित्र डॉम मोरिस से शादी कर ली थी। डॉम के देहांत के बाद उनका जीवन एकाकी रहा। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने अधिक रुचि नहीं ली और लोगों से मिलने में भी वे परहेज करती थीं। अंतर्मुखी स्वभाव की लीला के जीवन की झलक उनके ही शब्दों में जेरी पिंटो ने प्रस्तुत की है। जेरी अंग्रेजी के लोकप्रिय गद्य लेखक और कवि हैं। फिल्मी हस्तियां उन्हें आकृष्ट करती रही हैं। इसके पहले उन्होंने मशहूर फिल्मी डांसर और अभिनेत्री हेलन की जीवनी लिखी थी। जेरी ने लीला-अ पैचवर्क लाइफ को आत्मकथात्मक शैली में लिखा है। दरअसल, उन्होंने लीला की कही बातों को करीने से सजाकर पेश किया है। इस पुस्तक के अध्ययन से हम आजादी के बाद की एक स्वतंत्र स्वभाव की अभिनेत्री के बारे में करीब से जान पाते हैं।

भारतीय पिता डा.रमैया नायडू और फ्रेंच मां मार्थ की बेटी लीला नायडू बचपन से ही परफॉर्मिग आ‌र्ट्स की तरफ आकर्षित थीं। उन्होंने नृत्य और नाटकों में हिस्सा लेकर खुद को मांजा और दुनिया के मशहूर फिल्मकारों के संपर्क में आई। आर्ट सिनेमा के इंटरनेशनल पायनियर हस्ताक्षरों की संगत में उन्होंने फिल्म की बारीकियां सीखीं और बहुत तेजी से हर तरह के अनुभव हासिल किए। देश-विदेश में पलीं लीला नायडू को भारत की ऐसी पहली अभिनेत्री कहा जा सकता है, जो इंटरनेशनल सिनेमा और फिल्ममेकर से परिचित थीं। हालांकि उन्होंने अधिक फिल्में नहीं कीं, लेकिन अपनी मौजूदगी से उन्होंने सभी को चौंकाया।

जिस जमाने में राज कपूर की तूती बोलती थी, उन दिनों लीला नायडू ने राज कपूर से मिले चार फिल्मों के प्रस्ताव ठुकरा दिए थे। फिल्मों में रुझान होने के बावजूद वे इसके ग्लैमर से दूर रहीं। पुस्तक में छपी एक तस्वीर में दिलीप कुमार और राज कपूर दोनों ही उनके प्रति मुग्ध नजर आते हैं। लीला नायडू की पहली शादी ओबेराय घराने के तिलक राज ओबेराय से हुई थी। दो बेटियों की मां बनने के बाद वे तिलक से अलग हो गई। संभ्रांत और आभिजात्य रुचि की लीला को दिखावा बिल्कुल पसंद नहीं था। वे चाहतीं, तो हिंदी फिल्मों में अपना स्थान और नाम बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने खुद के लिए अलग राह चुनी। फिल्मों का निर्माण किया। डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाई और कुमार साहनी को पहली फिल्म बनाने का मौका दिया। उन्होंने कुछ समय पत्रकारिता भी की। उन्होंने हिंदी फिल्मों के प्रवास पर विस्तार से नहीं लिखा है, लेकिन संक्षिप्त विवरणों में ही वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पाखंड, दिखावे और मुंहदेखी को उजागर करती हैं। उन्होंने बलराज साहनी पर भी एक टिप्पणी की है। वे कहीं न कहीं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तौर-तरीकों में खुद को मिसफिट पाती थीं, इसलिए मुंबई में रहने के बावजूद उनके संपर्क में नहीं रहती थीं।

पांचवें दशक से सातवें दशक के आरंभ तक में भारत के सार्वजनिक जीवन की चंद खूबसूरत महिलाओं में से एक लीला नायडू का जीवन सामान्य नहीं रहा। उनका आभामयी व्यक्तित्व इतना मुखर था कि उनकी मौन उपस्थिति भी बोलती थी। लीला-ए पैचवर्क लाइफ पढ़ते हुए हम आजादी के बाद की एक अभिनेत्री के जीवन और तत्कालीन कुलीन समाज से परिचित होते हैं।


Wednesday, August 18, 2010

बी आर चोपड़ा का सफ़र- प्रकाश के रे

भाग- छह

1951 की फ़िल्म जांच समिति ने सिर्फ़ फ़िल्म उद्योग की दशा सुधारने के लिये सिफ़ारिशें नहीं दी थी, जैसा किपिछले भाग में उल्लिखित है, उसने फ़िल्म उद्योग को यह सलाह भी दी कि उसे 'राष्ट्रीय संस्कृति, शिक्षा और स्वस्थ मनोरंजन' के लिये काम करना चाहिए ताकि 'बहुआयामीय राष्ट्रीय चरित्र' का निर्माण हो सके. यह सलाह अभी-अभी आज़ाद हुए देश की ज़रूरतों के मुताबिक थी और बड़े फ़िल्मकारों ने इसे स्वीकार भी किया था.

बी आर चोपड़ा भी सिनेमा को 'देश में जन-मनोरंजन और शिक्षा का साधन तथा विदेशों में हमारी संस्कृति का दूत' मानते थे. महबूब, बिमल रॉय और शांताराम जैसे फ़िल्मकारों से प्रभावित चोपड़ा का यह भी मानना था कि फ़िल्में किसी विषय पर आधारित होनी चाहिए. अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिये उन्होंने ग्लैमर और मेलोड्रामा का सहारा लिया.

निर्माता-निर्देशक के बतौर अपनी पहली फ़िल्म एक ही रास्ता में उन्होंने विधवा-विवाह के सवाल को उठाया. हिन्दू विधवाओं के विवाह का कानून तो 1856 में ही बन चुका था लेकिन सौ बरस बाद भी समाज में विधवाओं की बदतर हालत भारतीय सभ्यता के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगा रही थी. सौ बरस बाद ही 1956 में विधवाओं को मृतकपति की संपत्ति पर अधिकार मिल पाया था. उसी बरस चोपड़ा ने यह फ़िल्म प्रदर्शित की. हालाँकि फ़िल्म में संपत्ति-संबंधी अधिकारों का उल्लेख नहीं था, किन्तु विधवाओं की नैतिकता और पवित्रता को लेकर समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाया गया था.

फ़िल्म की कहानी पंडित मुखराम शर्मा ने लिखी थी और गीत मजरूह सुल्तानपुरी के थे. सुप्रसिद्ध गायक और संगीतकार हेमंत कुमार ने संगीत दिया था. फ़िल्म के गीतों को तब काफ़ी सराहा गया था. मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया और लता मंगेशकर द्वारा गाया गया 'बेकस की आबरू को नीलाम कर के छोड़ा' औरत के दर्द को बड़े मार्मिक ढंग से बयान करता है. यह आज भी बेहद लोकप्रिय गीत है. एक अन्य गीत 'सो जा नन्हे मेरे' भी दर्द भरा गीत है जिसे हेमंत कुमार और लता जी ने गाया है. 'चमका बन के अमन का तारा' गीत भारत और उसके नेता जवाहरलाल के शांति के सन्देश को गाता है. एक अन्य बहुत लोकप्रिय गीत 'चली गोरी पी से मिलन को चली' इसी फ़िल्म का है जिसे हेमंत कुमार ने गाया है. 'सांवले सलोने आए दिन बहार के' एक अन्य सुंदर गीत है.

यह फ़िल्म उस साल की सफलतम फ़िल्मों में से थी और इसी के साथ बी आर फ़िल्म्स का बैनर की सफल यात्रा शुरू हो गयी. अगले साल चोपड़ा की नया दौर प्रदर्शित हुई जिसने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाला और आज तक की बेहतरीन फ़िल्मों में उसकी गिनती होती है.

(अगले हफ़्ते ज़ारी)

Monday, August 16, 2010

दरअसल : हिंदी सिनेमा में आम आदमी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

जिस देश में 77 प्रतिशत नागरिकों की रोजाना आमदनी 20 रुपए से कम हो, उस देश का सिनेमा निश्चित ही बाकी 23 प्रतिशत लोग ही देखते होंगे। 20 रुपए की आमदनी में परिवार चलाने वाले चोरी-छिपे कहीं टीवी या मेले में कोई फिल्म देख लें, तो देख लें। उनके लिए तो भजन-कीर्तन, माता जी का जागरण, मजारों पर होने वाली कव्वाली या फिर गांव में थके-हारे समूह के लोकगीत ही मनोरंजन का साधन बनते हैं। शहरों में सर्विस सेक्टर से जुड़े श्रमिकों की रिहाइश पर जाकर देखें, तो 14 इंच के टीवी के सामने मधुमक्खियों की तरह आंखें डोलती रहती हैं। कभी मूड बना, तो किसी वीडियो पार्लर में घुस गए और कोई नई फिल्म देख आए। मालूम नहीं, देश के आम आदमी का कितना प्रतिशत हिस्सा हमारे सुपर स्टारों को जानता है। निर्माता-निर्देशक-लेखकों को भी फुरसत नहीं है कि वे 77 प्रतिशत की जिंदगी में झांकेंऔर उनके सपनों, संघर्ष और द्वंद्व की कहानी लिखें या बताएं।

इस पृष्ठभूमि के बावजूद फिल्मों में आम आदमी आता रहता है। हाल ही में खट्टा मीठा में अक्षय कुमार ने आम आदमी की तकलीफों की एक झलक दी थी। इस फिल्मी झलक में पीड़ा से अधिक हंसी थी। एक आम आदमी रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ द इयर में भी दिखा था और उसके पहले रब ने बना दी जोड़ी में आदित्य चोपड़ा ने भी सुरिन्दर सूरी नामक आम आदमी को पेश किया था। इन तीनों आम आदमी को देखकर देश का आम आदमी ईष्र्या और घृणा ही कर सकता है, क्योंकि मनोरंजन के साथ ही ये आम आदमी उसकी ठिठोली करते नजर आते हैं। हिंदी फिल्मों के लेखक-निर्देशक जब आम आदमी की कल्पना करते हैं, तो उनके सामने सेल्समैन, क्लर्क, स्पॉट ब्वॉय और पत्रकार होते हैं। मुझे तो सुरिन्दर सूरी का लुक एक हिंदी पत्रकार से मिलता-जुलता लगता है।

आठवें-नौवें दशक में पैरेलल सिनेमा और बीच के सिनेमा के दौर में सर्वहारा से लेकर मिडिल क्लास तक के आम आदमी के दर्शन सेल्युलाइड पर हो जाते थे। एक तरफ श्याम बेनेगल देहातों के आम आदमी की कहानी कह रहे थे, तो दूसरी तरफ सईद मिर्जा मुंबई की गलियों-मोहल्लों के आम आदमी की दास्तान दिखा रहे थे। गुलजार, बासु चटर्जी और हृषिकेश मुखर्जी मिडिल क्लास के संघर्षरत युवकों और परिवारों के जरिए हंसी-खुशी के हल्के पलों से कटाक्ष और चोट करने के साथ मनोरंजन कर रहे थे। धीरे-धीरे यह सब खो गया है। हिंदी फिल्मों का पर्दा इतना चटख और चमकदार हो गया है कि उसमें आम आदमी की गुंजाइश कम से कमतर होती गई।

मेनस्ट्रीम सिनेमा में राज कपूर ने आम आदमी के प्रतिनिधि चरित्र के तौर पर राजू को गढ़ा। फिल्म-दर-फिल्म विभिन्न पृष्ठभूमियों और परिस्थितियों में वे राजू की दुविधाओं, कमियों और सपनों को दिखाते रहे। उस राजू में एक मासूमियत थी। अपनी कमियों और बुराइयों के बावजूद वह निश्छल था। बाद में वही राजू बिगड़ते समाज में अपनी जगह और अधिकार के लिए विजय के रूप में सामने आया। सलीम-जावेद ने विजय के मार्फत वंचितों की पूरी पीढ़ी के असंतोष, आक्रोश और आक्रामक स्वभाव को अभिव्यक्त किया। कालांतर में यह विजय धीरे-धीरे सुस्त और सिस्टम का हिस्सा बन गया। इस प्रकार आम आदमी लुप्त होता गया।

देश में आए आर्थिक उदारीकरण ने नया सपना दिया। अमीर बनने का सपना। मौके तो अधिक नहीं थे, लेकिन इसी में कुछ लोग तेजी से अमीर हो रहे थे। उनके लिए एक बाजार भी तैयार हो रहा था। इस बाजार के बिजनेस के लिए आवश्यक था कि जीवन मूल्यों को दरकिनार कर जीवनशैली की बात की जाए। लाइफ स्टाइल आज का सर्वाधिक बिकाऊ विचार है। हर तरफ इसी की मांग है। आम आदमी आज भी फिल्मों में नजर आता है, लेकिन वह स्टाइलिश हो गया है। वह सड़क पर नहीं दिखता। सिर्फ पर्दे के लिए गढ़ा जाता है। हां, कभी-कभी पीपली लाइव का नत्था एक अपवाद के तौर पर नजर आता है, जो सभी को मुंह चिढ़ाकर निकल जाता है।

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Friday, August 13, 2010

फिल्‍म समीक्षा : पीपली लाइव

- अजय ब्रह्मात्‍मज

अनुषा रिजवी की जिद्दी धुन और आमिर खान की साहसी संगत से पीपली लाइव साकार हुई है। दोनों बधाई के पात्र हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तौर-तरीके से अपरिचित अनुषा और फिल्म इंडस्ट्री के उतने ही सधे जानकार आमिर... दोनों के परस्पर विश्वास से बगैर किसी दावे की बनी ईमानदार पीपली लाइव शुद्ध मनोरंजक फिल्म है। अब यह हमारी संवेदना पर निर्भर करता है किहम फिल्म में कितना गहरे उतरते हैं और कथा-उपकथा की कितनी परतों को परख पाते हैं। अगर हिंदी फिल्मों के फार्मूले ने मानसिक तौर पर कुंद कर दिया है तो भी पीपली लाइव निराश नहीं करती। हिंदी फिल्मों के प्रचलित फार्मूले, ढांचों और खांकों का पालन नहीं करने पर भी यह फिल्म हिंदी समाज के मनोरंजक प्रतिमानों को समाहित कर बांधती है।

ऊपरी तौर पर यह आत्महत्या की स्थिति में पहुंचे नत्था की कहानी है, जो एक अनमने फैसले से खबरों के केंद्र में आ गया है। फिल्म में टिड्डों की तरह खबरों की फसल चुगने को आतुर मीडिया की आक्रामकता हमें बाजार में आगे रहने के लिए आवश्यक तात्कालिकता के बारे में सचेत करती है। पीपली लाइव मीडिया, पालिटिक्स, महानगर और प्रशासन को निशाना नहीं बनाती। यह सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए परेशान सभी सामाजिक घटकों द्वारा ओढ़ ली गई जिम्मेदारी की चादर को खींच देती है। उन्हें और उनकी गतिविधियों को अनावृत्त कर देती है। अब हम उनकी विसंगति पर रोएं या हंसे... यह हमारी समझ और आउटलुक का मामला है। वास्तव में यह छोटे अखबार के प्रिंट पत्रकार राकेश के द्वंद्व और विवेक की फिल्म है। हर फिल्म में लेखक और निर्देशक किसी न किसी पात्र में मौजूद रहते हैं। पीपली लाइव में राकेश ही लेखक-निर्देशक की सोच, जिज्ञासा, मजबूरी और दुखद आकस्मिक अंत का संवाहक है।

पीपली लाइव समाज की विडंबनाओं और विद्रूपताओं को उजागर करती हुई नत्था, बुधिया, झुनिया, बूढ़ी मां, होरी के जीवन का परिचय देती है। आजादी की चौसठवीं सालगिरह का जश्न मना रहे दर्शकों को यह फिल्म एक बार यह सोचने के लिए अवश्य मजबूर करेगी कि अधिक आराम और अधिक जगह पाने की लालसा में विकास की छलांगे लगाते समय हमने कैसे गरीबी रेखा के नीचे (बिलो पोवर्टी लाइन) जी रहे लोगों को भुला दिया है। नत्था की आत्महत्या की घोषणा खबर है, लेकिन होरी की गुमनाम मौत का कोई गवाह नहीं है। निश्चित ही अनुषा के मानस में प्रेमचंद की गोदान का नायक होरी जिंदा रहा होगा।

पीपली लाइव पूरी तरह से वैचारिक और राजनीतिक फिल्म है। अनुषा रिजवी ने अपने नजरिए को छुपाया नहीं है। कथित ह्यूमनिस्ट फिल्मकारों की तरह अनुषा रिजवी फिल्म का खुला अंत नहीं करतीं और न ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से डरती हैं। हर साल खेती छोड़कर लाखों किसान आजीविका और अस्तित्व के लिए शहरों में मजदूर बनने को मजबूर लाखों किसानों की यह सिनेमाई दास्तान है। निरीह नत्था का व‌र्त्तमान हमें झकझोर देता है।

इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी कलाकारों का चयन है। एक रघुवीर यादव के अलावा कोई भी परिचित अभिनेता नहीं है, लेकिन फिल्म शुरू होने के बाद किरदार अपरिचित नहीं रह जाते। हिंदी फिल्मों के नायक के रूप में नत्था और राकेश जैसे नायक दुर्लभ हैं। ओंकार दास माणिकपुरी और नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने उम्दा तरीके से किरदारों को जीवंत किया है। वे अभिनय करते नजर नहीं आते। टीवी रिपोर्टर मलाइका शिनॉय और विशाल शर्मा, नत्था की बीवी की भूमिका में शालिनी वत्स एवं सपोर्टिग कास्ट में आया हर कलाकार फिल्म के प्रभाव को बढ़ाता है। हिंदी फिल्मों में ग्रामीण लैंडस्केप सालों बाद लौटा है। पीपली लाइव अपने कथ्य, शिल्प और प्रभाव के लिए याद रखी जाएगी।

रेटिंग- ****1/2 साढ़े चार स्टार

Sunday, August 8, 2010

आमिर लाइव!

अभिनेता, निर्माता और निर्देशक की त्रिमूर्ति आमिर खान अभी निर्माता के रूप में मुखर हैं। वे इन दिनों अपनी फिल्म पीपली लाइव के प्रमोशन को देश-विदेश की यात्राएं कर रहे हैं। अपने स्पर्श से उन्होंने अनुषा रिजवी निर्देशित इस फिल्म के प्रति उम्मीदें बहुत बढ़ा दी हैं। फिल्म के एक गीत 'महंगाई डायन' ने दर्शकों को राजनीतिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर छुआ है। आमिर खान से यह खास बातचीत उनके दफ्तर में हुई। बातचीत करते समय वे एक साथ सचेत और अनौपचारिक रहते हैं। कुछ जवाब तो रेडीमेड होते हैं, लेकिन कुछ सवालों में वे जिज्ञासाओं को एक्सप्लोर करते हैं। कोई नई बात सूझने-समझने पर कृतज्ञता भी जाहिर करते हैं और उनका प्रिय एक्सपेशन है 'अरे हां!'
[लगभग नौ महीनों के बाद मुलाकात हो रही है आपसे। नया क्या सीखा इस बीच?]
मराठी सीख रहा हूं। हम चारों मराठी सीख रहे हैं। स्कूल में मराठी नहीं सीख पाया। तब मैं लैंग्वेज का वैल्यू नहीं समझ पाया था। भाषा के रूट्स में ही हमारा फ्यूचर है। मेरी पहली भाषा अंग्रेजी हो गई है। अब समझ में आया तो सुधार ला रहा हूं। बच्चों से कहता हूं कि मैंने अम्मी की बात पर ध्यान नहीं दिया। आप तो ध्यान दो। अभी तक वे मेरी बात मान रहे हैं। अपनी मातृभाषा और स्टेट की भाषा समझ में आनी चाहिए। हर भाषा को मूल लिपि में पढ़ें तो मजा आता है। मैं आज भी अपने संवाद हिंदी में मंगवाता हूं। अगर वह रोमन में लिखा होता है तो उसे हिंदी में लिख लेता हूं। पियानो सीख रहा हूं। बच्चों के साथ थोड़ा-बहुत बजा लेता हूं। अम्मी से मुझे कुकिंग सीखनी है। सिंगिंग भी सीखना है।
[आप सुर में हैं क्या?]
मैं सुर में नहीं हूं, लेकिन इतना बुरा भी नहीं हूं। बीच में कहीं हूं, सिंगर के लेवल का नहीं हूं।
[पीपली लाइव का एक्सपीरिएंस कैसा रहा?]
बहुत उम्दा। अनुषा ने बहुत अच्छी स्क्रिप्ट लिखी है। उनकी रायटिंग में लेयर्ड अंदाज है। फिल्म के अंत में कुछ चीजें महसूस होती हैं। कैरेक्टर्स बहुत अच्छे लिखे हैं। आम तौर पर लेखक अलग-अलग किरदारों को अपने रंग में ढाल देते हैं, लेकिन अच्छे लेखक में काबिलियत होती है कि वह अलग-अलग कैरेक्टर में अलग-अलग रंग चढ़ाता है। उनके बोलने के ढंग अलग होते हैं। इस फिल्म का फ‌र्स्टकट देख कर मैं खुश हुआ। खास बात यह है कि अनुषा न तो फिल्म स्कूल गई है और न किसी को असिस्ट किया है। अभी तक जर्नलिस्ट थी।
[जिस फिल्म में आप स्वयं अभिनय नहीं कर रहे हैं, उसके प्रमोशन के लिए कोई अलग स्ट्रैटजी और इनवाल्वमेंट रहती है क्या?]
पीपली लाइव के रेफरेंस में बात करें तो इसमें कोई जाना-पहचाना स्टार नहीं है। जब आर्टिस्ट और डायरेक्टर नए होते हैं तो मार्केटिंग और अवेयरनेस में थोड़ी दिक्कत जरूर होती है। मैं निर्माता के तौर पर पूरी तरह इन्वॉल्व हूं तो उसका असर होता है। मेरे होने से लोग तवज्जो देते हैं। फिल्म काफी फनी और हार्टब्रेकिंग है। फिल्म के ह्यूमर के बारे में अभी लोगों को पता नहीं है। हमलोग फिल्म के मैटेरियल और कैरेक्टर को ही प्रोमोज में इस्तेमाल कर रहे हैं।
[खुद होने पर अपना कॅरिअर भी दांव पर रहता है। क्या औरों की फिल्म के प्रति भी वही लगाव रहता है?]
पीपली लाइव मेरी उतनी ही फिल्म है, जितनी 3 इडियट या तारे जमीन पर थी। काम करने का फाउंडेशन एक ही रहता है। जिस तरह मैंने 3 इडियट चुनी, वैसे ही मैंने पीपली लाइव चुनी। मेरी क्रिएटिव इंस्टिक्ट वही है। इमोशनल लगाव उतना ही है। फर्क यही है कि मेरा कंट्रीब्यूशन एक्टर के तौर पर न होकर प्रोड्यूसर के तौर पर है। यह आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म है। अपने नाम की वजह से जिम्मेदारी ज्यादा हो जाती है।
[शायद इस साल किसी फिल्म में अभिनय नहीं करने का फैसला भी आप को समय दे रहा है कि आप अपने प्रोडक्शन की फिल्मों पर पूरा ध्यान दे सके?]
तीनों मेरी ही फिल्में हैं। 3 इडियट पूरी होने के बाद मैंने पीपली लाइव पर ध्यान दिया। इसके बाद धोबी घाट और फिर देहली बेली होगी। मैं एक समय में एक ही काम कर पाता हूं। अगर मैं ट्रेडिशनल प्रोडयूसर होता तो तीन और फिल्में बनाता। ऐसी फिल्में तो कतई नहीं बनाता। मैं प्रॉफिट के लिए फिल्में नहीं बनाता। लगान से लेकर अभी तक रिस्क लेता रहा हूं।
[अभी जो दर्शकों का बंटवारा शहरों-देहातों, मल्टीप्लेक्स और सिंगल थिएटर में हुआ है, उसे हिंदी फिल्मों के विकास के लिए आप कितना उचित मानते हैं?]
यह अच्छा नहीं है। हमारी फिल्म इसी के बारे में है। शहर और देहात के इस बंटवारे पर ही है पीपली लाइव। जो सुविधाओं में हैं, वे गांव पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। गांव में अनेक दिक्कतें हैं। वहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। सेहत, शिक्षा, पानी, हर तरह की मुश्किलें हैं।
[पिछले दिनों मैं एक सेमिनार में गया था। वहां बहस चली कि हिंदी फिल्मों के नायक दलित और मुसलमान नहीं होते। लगान का भुवन गांव का था, लेकिन वह अलग जमीन का था। इस संबंध में क्या कहेंगे?]
(सोचते हुए) राजा हिंदुस्तानी के राजा के बारे में क्या कहेंगे। उसके मां-बाप तक का पता नहीं है। उसकी जाति का क्या है? वह टैक्सी ड्राइवर है। रंगीला का मुन्ना टपोरी है। सड़कछाप है। मुझे ऐसा नहीं लगता कि यह ट्रेंड पहले था, अब नही है। दरअसल, मैं ऐसी चीजों के बारे में सोचता भी नहीं। पीपली लाइव का हीरो नत्था किसान है। उसकी जाति की मुझे जानकारी नहीं है।
[पीपली लाइव को फेस्टिवल सर्किट में ले जाने की कोई खास वजह है क्या?]
व‌र्ल्ड सिनेमा के दर्शकों की तसल्ली बहुत मदद करती है। सनडांस में चुना जाना, फिर बर्लिन जाना ़ ़ ़ उसके बाद कई फेस्टिवल से होती हुई यह फिल्म मेलबर्न पहुंची। फेस्टिवल जाने का मकसद था कि हम हिंदुस्तानी दर्शकों के बाहर भी पहुंच सकें। नए दर्शकों की तलाश है।
[कहते हैं कि आमिर का बिजनेस सेंस जबरदस्त है। वे अपने आडिएंस को समझते हैं, इसलिए फेल नहीं होते ़ ़ ़]
कोई ऊपर वाला है, जो मेरे बारे में सोच रहा है। एक इंग्लिश फिल्म है न समबडी आउट देअर लव्स मी ़ ़ ़ आप मेरा कॅरिअर देखें तो मैंने सारी चीजें वही कीं, जिसके लिए लोगों ने मना किया, फिर भी मुझे कामयाबी मिली। कभी-कभी अकेले में सोचता हूं कि ऐसा हुआ कैसे? आप देखें कि 22 साल के कॅरिअर में मैंने 16 सालों तक फिल्म मीडिया के साथ बात ही नहीं की। मैं स्वयं ही उनसे कटा हुआ था। बाद में मेनस्ट्रीम जर्नलिस्ट बातें करने लगे तो मैं भी मुखर हुआ। मैंने कभी फायदेमंद कदम नहीं उठाया। मैंने उसी फिल्म और काम के लिए कदम उठाया, जिसे करने में मुझे मजा आयेगा। अब चूंकि कामयाब हो गया इसलिए ऐसा नहीं कह सकता कि यही एक तरीका है काम करने का। हर आदमी की अपनी प्रायरिटी होती है।
[अपने अनुभव से दूसरों को कुछ बताने-समझाने का मन करता है कि नहीं?]
नजदीकी दोस्त मेरी राय लेते हैं तो जो मुझे सही लगता है, वही बताता हूं। जहाँ तक अपनी बात है, मैं दूसरों की आलोचना सुनता हूं। फिल्मों की टेस्ट स्क्रीनिंग करता हूं। उसमें गैरफिल्मी लोगों को बुलाते हैं। अपनी गलतियों को सुधारता हूं। यह लर्निग प्रोसेस है। मुझे लगता है कि 22 सालों में मेरे अंदर इसी वजह से ग्रोथ आई है। मेरे दर्शक मुझे सिखाते हैं। मैं अपनी फिल्में उनके साथ देखता हूं। उनके वाइब्रेशन से पता चल जाता है फिल्म का इंपैक्ट!






Friday, August 6, 2010

फिल्‍म समीक्षा :आयशा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सोनम कपूर सुंदर हैं और स्टाइलिश परिधानों में वह निखर जाती हैं। समकालीन अभिनेत्रियों में वह अधिक संवरी नजर आती हैं। उनके इस कौशल का राजश्री ओझा ने आयशा में समुचित उपयोग किया है। आयशा इस दौर की एक कैरेक्टर है, जिसकी बनावट से अधिक सजावट पर ध्यान दिया गया है। हम एक ऐसे उपभोक्ता समाज में जी रहे हैं, जहां साधन और उपकरण से अधिक महत्वपूर्ण उनके ब्रांड हो गए हैं।

आयशा में एक मशहूर सौंदर्य प्रसाधन कंपनी का अश्लील प्रदर्शन किया गया है। कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि सिर्फ प्रोडक्ट का नाम दिखाने केउद्देश्य से कैमरा चल रहा है। इस फिल्म का नाम आयशा की जगह वह ब्रांड होता तो शायद सोनम कपूर की प्रतिभा नजर आती। अभी तो ब्रांड, फैशन और स्टाइल ही दिख रहा है।

जेन आस्टिन ने 200 साल पहले एमा की कल्पना की थी। राजश्री ओझा और देविका भगत ने उसे 2010 की दिल्ली में स्थापित किया है। जरूरत के हिसाब से मूल कृति की उपकथाएं छोड़ दी गई हैं और किरदारों को दिल्ली का रंग दिया गया है। देश के दर्शकों को आयशा देख कर पता चलेगा कि महानगरों में लड़कियों और लड़कों का ऐसा झुंड रहता है, जो सिर्फ शादी, डेटिंग, पार्टी और पिकनिक के बारे में सोचता है। हर मौके पर स्टाइलिश कपड़े पहनता है। बागवानी भी करता है तो हाथ में दस्ताने होते हैं। ऐसे समाज का यूथ इमोशनली कंफ्यूज है। वह अपने बारे में सही वक्त पर सही फैसला नहीं ले पाता। सारी आजादी और सुविधा के बावजूद उसे सीढ़ी पर चढ़कर बालकनी में खड़ी लड़की से प्यार का इजहार करना पड़ता है। हम रोमांचित होते हैं- हाउ रोमांटिक। दूसरे तरीके से सोचें और देखें तो सब बकवास जान पड़ेगा। क्या संभ्रांत और अमीरों की दुनिया सचमुच इतनी खोखली और नकली हो चुकी हैं? इमोशन तक कृत्रिम हैं। आयशा एक लव स्टोरी है, लेकिन फिल्म में प्यार के क्षण ही नहीं आ पाते।

फिल्म की पटकथा ढीली है। घटनाएं इतनी कम हैं कि दृश्य लंबे और खींचे हुए लगते हैं। इंटरवल के पहले कहानी आगे ही नहीं बढ़ती। इंटरवल के बाद जोडि़यां बननी शुरू होती हैं तो कहानी धीमी रफ्तार से आगे खिसकती है। इसके अलावा प्रोडक्ट ब्रांड और स्टाइल दिखाने पर जोर होने की वजह से किरदारों के विकास और निर्वाह पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। पूरी फिल्म रैंप शो का विस्तार लगती है। लगे हाथ मिडिल क्लास पर तरस भी खा लिया गया है। सोनम कपूर और अभय देओल पटकथा की सीमाओं के बावजूद उम्दा प्रदर्शन करते हैं। सहयोगी कलाकार भी सक्षम हैं। शेफाली की भूमिका में अमृता पुरी की मिडिल क्लास हरकतें और बातें नैचुरल लगती हैं। फिल्म का गीत-संगीत अवश्य ही मधुर और उपयुक्त है। अमित त्रिवेदी हमेशा की तरह कुछ नई ध्वनियां लेकर आए हैं।

रेटिंग- ढाई स्टार


Thursday, August 5, 2010

दरअसल:एक निर्देशक के बहाने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

काशी का अस्सी के स्क्रिप्ट लेखन में जुटे डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी से पिछले दिनों काफी लंबी बातचीत हुई। हिंदी के वर्तमान सिनेमा की स्थिति से खिन्न डॉ. द्विवेदी अपनी कोशिशों में लगे हैं। टीवी सीरियल चाणक्य और फिर फीचर फिल्म पिंजर के निर्माण के बाद उनकी कोई नई कृति दर्शकों के सामने नहीं आ पाई है। उन्होंने बताया कि इस अंतराल में वे रुके नहीं हैं। लगातार काम कर रहे हैं।

उन्होंने उपनिषदों के आधार पर 52 एपिसोड में उपनिषद गंगा का लेखन और निर्देशन किया है। अपने इस कार्य से वे पूरी तरह संतुष्ट हैं और उन्हें विश्वास है कि चाणक्य की तरह ही दर्शक इसे भी सराहेंगे। संस्कृति और इतिहास में विशेष रुचि रखने की वजह से डॉ. द्विवेदी ने हमेशा सृजन के लिए ऐसे विषयों को चुना, जो सारगर्भित और स्थायी प्रभाव के हों। वे हिंदी फिल्मों के फैशन में कभी नहीं आ सके। यही कारण है कि श्रेष्ठ योग्यता के बावजूद उनकी कम कृतियां ही सामने आ पाई हैं।

पिंजर के बाद उन्होंने पृथ्वीराज चौहान पर एक फिल्म की अवधारणा विकसित की, उसमें सनी देओल मुख्य भूमिका निभाने वाले थे। तभी राज कुमार संतोषी ने अजय देवगन के साथ पृथ्वीराज पर ही एक फिल्म की घोषणा कर दी। डॉ. द्विवेदी की फिल्म अटक गई और संतोषी की फिल्म भी नहीं बन सकी। ऐसी घटनाओं से आहत होने के बावजूद डॉ. द्विवेदी शिकायत नहीं करते। वे दूसरे कार्य में लग जाते हैं। उन्होंने सम्राट अशोक के बेटे कुणाल के जीवन के प्रेरक प्रसंग को लेकर कुणाल की कल्पना की। इसमें अमिताभ बच्चन, तब्बू, अर्जुन रामपाल और अमृता राव का नाम फाइनल हो चुका था। रिलायंस का बिग सिनेमा इसे प्रोड्यूस कर रहा था। तभी मंदी की मार पड़ी और रिलायंस की यह योजना खटाई में पड़ गई। इस झटके के बावजूद डॉ. द्विवेदी को उम्मीद है कि कुणाल फिल्म बनेगी। भले ही उसमें थोड़ी देर हो। हां, अमिताभ बच्चन चाहें, तो फिल्म को पटरी पर लाने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। वैसे जया बच्चन भी चाहती हैं कि कुणाल बने, क्योंकि सम्राट अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन को इंटरनेशनल ख्याति मिलेगी।

कम लोगों को मालूम है कि जी टीवी के सुभाष चंद्रा से लेकर बी के मोदी तक ने डॉ. द्विवेदी के साथ बुद्ध के निर्माण की बात सोची, लेकिन विभिन्न कारणों से बुद्ध की योजना में डॉ. द्विवेदी नहीं रह सके। इस बीच स्टार प्लस के लिए बॉबी बेदी ने महाभारत सीरियल के निर्माण की घोषणा की। उसके निर्देशक डॉ. द्विवेदी ही थे। कुछ महीनों की तैयारी के बाद विवादों और मतभेदों की वजह से डॉ. द्विवेदी महाभारत की टीम से अलग हो गए। उनके बगैर यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

इन दिनों डॉ. द्विवेदी काशीनाथ सिंह की कृति काशी का अस्सी की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। उन्होंने तय किया है कि फिलहाल इतिहास और संस्कृति की दुनिया से बाहर निकल कर वर्तमान समाज को फिल्म में उकेरा जाए। उन्हें काशीनाथ सिंह की पुस्तक बेहद पसंद आई है। वे इसकी छविभाषा गढ़ने में लगे हैं। उनकी कोशिश है कि सीमित बजट में उम्दा कलाकारों के साथ यह फिल्म बनाई जाए।

मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में स्टार की ताकत बढ़ने की प्रवृत्ति को वे सिनेमा के विकास के लिए उचित नहीं मानते। उनकी राय में निर्माता और निवेशक कंटेंट से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि आप किस सुपरस्टार को लेकर आ रहे हैं। अब हर फिल्म किसी न किसी सुपरस्टार के साथ तो नहीं बनाई जा सकती। निर्माण से पहले ही मुनाफा सुनिश्चित करने की कॉरपोरेट सोच से भी फिल्मों का स्वतंत्र निर्माण बाधित हो रहा है। नतीजे में एक ही तरह की फिल्में आ रही हैं। आशा की किरण के तौर पर छमाही में किसी छोटी फिल्म की कामयाबी भरोसा दे जाती है, लेकिन डॉ. द्विवेदी मानते हैं कि हिंदी सिनेमा निश्चित रूप से संकट के दौर से गुजर रहा है।