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पवन श्रीवास्तव की 'लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट'

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भारत में इंडी सिनेमा ,अब पहले के मुकाबले अधिक मज़बूत हुआ है .बेहतर कहानी ,बिना किसी दबाव के कहने की चाहत रखने वाले तमाम फिल्ममेकर्स इंडी सिनेमा के माध्यम से अपनी कहानियां, दर्शकों तक पहुंचा पाने में सफल हो रहे हैं .भारत में बनने वाला बहुसंख्यक इंडी सिनेमा, शहरी कहानियों और शहर के दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाया जाता है . गांव अभी भी इंडी सिनेमा की कहानियों में जगह कम बना पा रहे हैं .असल मायने में सिनेमा स्वतंत्र और लोकतांत्रिक तभी हो पायेगा जब हर भौगोलिक क्षेत्र से बहुतायत में कहानियां ,पर्दे पर आना शुरू हों, उनका अपना दर्शक वर्ग हो . इस कोशिश में स्टूडियो सर्वहारा ,दलित मुद्दे पर केंद्रित फिल्म ”लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट” बना रहा है . पवन श्रीवास्तव इस फिल्म के निर्देशक हैं .उत्तर प्रदेश के दलित व्यक्ति के जीवन के तीस साल को इस फिल्म में दिखाया गया है . इस फिल्म का शूट पूरा किया जा चुका है . ये फिल्म अभी पोस्ट प्रोडक्शन फेज़ में है .फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन को पूरा करने के लिए स्टूडियो सर्वहारा ने मजदूर दिवस के दिन ,क्राउड फंडिंग कैंपेन की शुरुआत की थी .इस फिल्म को दस भाषाओं में सबटा

रोज़ाना : झकास अनिल कपूर

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रोज़ाना झकास अनिल कपू -अजय ब्रह्मात्‍मज अनीस बज्‍मी की ‘ मुबारकां ’ के ट्रेलर लांच के मौके पर अनिल कपूर मौजूद थे। मंच पर उनकी उर्जा देख कर सभी खुश थे। उन्‍हें इस उम्र(61 वर्ष) में भी उर्जावान देख कर हैरानी नहीं होती। वे अपने समकालीनों में सबसे चुस्‍त-दुरुस्‍त हैं। वे लगातार काम कर रहे हैं। उन्‍होंने अभी तक अपने जूते नहीं टांगे हैं। इसकी कोई संीाावना भी नहीं है। इसी ट्रेलर लांच में जब आतिया शेट्टी और इलियाना डिक्रूज उन्‍हें बार-बार ‘ सर ’ संबोधित कर रही थीं तो उन्‍होंने बिफर कर कहा,क्‍या कभी मैंने तुम दोनों को मैथ्‍स या साइंस पढ़ाया है या मुझे ब्रिटेन की महारनी ने ‘ सर ’ का खिताब दिया है। प्‍लीज मुझे ‘ सर ’ न कहो। अनिल कपूर की यही झकास अदा है। वे जवानों के बीच उनसे भी अधिक जवान दिखते हैं। वे नहीं चाहते कि उन्‍हें बुजुर्ग बता कर दरकिनार कर दिया जाए। डेनी डेंजोग्‍पा उनके नियमित कसरत की तारीफ करते हैं। शूटिंग की व्‍यस्‍तता के बीच भी वे वाक और रन के लिए समय निकाल लेते हैं। अड़तीस साल हो गए। सन् 1979 में अनिल कपूर ने उमेश मेहरा की फिल्‍म ‘ हमारे तुम्‍हारे ’ में एक छोटी

रोज़ाना : फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय

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रोज़ाना फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय -अजय ब्रह्मात्‍मज गौर किया होगा...इम्तियाज अली ने अपनी फिल्‍म 'जब हैरी मेट सेजल' के पहले लुक और नाम की घोषणा दो पोस्‍टरों के साथ की थी। बाद में दोनों पोस्‍टर को एक पोस्‍टर में डाल कर पूरा नाम लिखा गया। इस फिल्‍म के नाम की चर्चा अभी तक नहीं थमी है। कुछ इसे इम्तियाज अली की पुरानी फिल्‍म से प्रेरित मानते हैं तो कुछ इसे लेखक-निर्देशक(इम्तियाज स्‍वयं) की सोच और कल्‍पना का दिवालियापन समझ रहे हैं। यह नाम चल तो रहा है,लेकिन गति नहीं पकड़ सका है। ‘ जब हैरी मेट सेजल ’ की संपूर्णता टुकड़ों में ही अपनी प्रेम कथा परोसेगी। हाल ही में ‘ जब हैरी मेट सेजल ’ के मिनी ट्रेलर जारी किए गए। इस ट्रेलर को जारी करने के दो दिन पहले इम्तियाज अली और शाह रूख खान मीडिया से मिले थे। उन्‍होंने प्रायवेट स्‍क्रीनिंग के दौरान अपनी बातें रखी थं और बताया था कि वे ऐसा क्‍यों कर रहे हैं। दो-तीन छोटी झलकियों के बाद एक गाना जारी किया जाएगा। कोशिश यह है कि दर्शक फिल्‍म के फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय के लिए तैयार हो सकें। इम्तियाज अली इसे नए मिजाज की फिल्‍म मानते हैं,इसलिए पारंपरिक

रोज़ाना : क्‍या ‘कन्‍हैया’ मिल पाएगा प्रधानमंत्री से

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रोज़ाना क्‍या ‘ कन्‍हैया ’ मिल पाएगा प्रधानमंत्री से -अजय ब्रह्मात्‍मज चौंके नहीं, कन्‍हैया राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आगामी फिल्‍म ‘ मेरे प्रिय प्रधान मंत्री ’ का बाल नायक है। वह मुंबई के गांधीनगर(कल्पित) चाल में रहता है। अपनी मां के लिए व‍ि चिंतित है। चाल में शौखलय का इंतजाम न होने से उसकी मां को खुले में शौच के लिए जाना होता है। वह अपनी मां के लिए शौचालय बनवाना चाहता ह। इस कोशिश में उसे पता चलता है कि देश के प्रधान मंत्री उसकी मदद कर सकते हैं। वे स्‍वच्‍छ भारत भारत अभियान में शौच पर बहुत जोर देते हैं। यहां तक कि लाल किले के प्राचीर से भी उन्‍होंने देशवासियों का आह्वान किया था। कन्‍हैया उन्‍हें चिट्ठी लिखता है। वह उनसे मिलने की कोशिश करता है,लेकिन... राकेश ओमप्रकाश मेहरा को इस फिल्‍म का आयडिया पसंद आया। लगभग चार साल पहले वाया दिल्‍ली बिहार से मुंबई आए मनोज मैरता ने इस फिल्‍म के आयडिया पर काम किया। उन्‍हें इस फिल्‍म का आयडिया जमुनापार के इलाके में में दिल्‍ली मैट्रो से सफर के दौरान हुआ। उन्‍होने जमुना के किनारे झ़ग्‍गी-झोंपड़ी के औरतों और मर्दो को डब्‍बा उठाए शौच के ल

बेवकूफ हैं जंग के पैरोकार – सलमान खान

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जंग के पैरोकारों को लगता है, वे बच जाएंगे ! ...हाहाहा – सलमान खान हॉलीवुड में सुपरमैन और स्‍पाइडरमैन जैसे सुपरहीरो, जिन्‍हें देखने के लिए दुनिया के अधिकांश देशों के दर्शक इंतजार करते होंगे। भारत में खास कर हिंदी दर्शकों को तो सलमान( Sal Man ) का इंतजार रहता है। पिछले कुछ सालों से वे अपनी फिल्‍मों की ईदी लेकर दर्शकों के बीच मनोरंजन बांटने आ जाते हैं। उन्‍होंने धीरे-धीरे एक फार्मूला तैयार किया है। वे इस फार्मूले के दायरे के बाहर नहीं जाते। उन्‍होंने अपनी सीमाओं के अंदर ही खूबियां खोज ली हैं और दर्शकों के चहेते बने हुए हैं। इस साल ईद के मौके पर उनकी फिल्‍म ‘ ट्यूबलाइट ’ आ रही है। कबीर खान के साथ तीसरी बार उनकी जुगलबंदी नजर आएगी। ‘ एक था टाइगर ’ और ‘ बजरंगी भाईजान ’ की कामयाबी और तारीफ के बाद ‘ ट्यूबलाइट ’ में उनकी जोड़ी फिर से दर्शकों को हंसाने और रुलाने आ रही है। सलमान खान ने झंकार के पाठकों के लिए अजय ब्रह्मात्‍मज से बातें कीं। - ‘ ट्यूबलाइट ’ की रिलीज के मौके पर हिंदी प्रदेशों के दर्शकों को क्‍या बताना चाहेंगे ? 0 आप ने नोटिस किया होगा कि पिछले कुछ सालों से मैं वैसी

रोज़ाना : अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है एक किरदार

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रोज़ाना अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है एक किरदार -अजय ब्रह्मात्‍मज फिल्‍म रिलीज होने के पहले या बाद में हम लेखकों से बातें नहीं करते। सभी मानते हें कि किसी जमाने में सलीम-जावेद अत्‍यंत लोकप्रिय और मंहगे लेखक थे। उस जमाने में भी फिल्‍मों की रिलीज के समय उनके इंटरव्‍यू नहीं दपते थे। उन्‍होंने बाद में भी विस्‍तार से नहीं बताया कि ‘ जंजीर ’ के विजय को कैसे सोचा और गढ़ा। कुछ मोटीज जानकारियां आज तक मीडिया में तैर रही हैं। अमिताभ बच्‍चन स्‍वयं अपने किरदारों के बारे में अधिक बातें नहीं करते। वे लेखकों और निर्देशकों को सारा श्रेय देकर खुद छिप जाते हैं। अगर हिंदी फिल्‍मों के किरदारों को लेकर विश्‍लेषणात्‍मक बातें की जाएं तो कई रोचक जानकारियां मिलेंगी। क्‍यों कोई किरदार दर्शकों का चहेता बन जाता है और उसे पर्दे पर जी रहा कलाकार भी उन्‍हें भा जाता है ? इसे खोल पाना या डिकोड कर पाना मुश्किल काम है। अगर फिल्‍म किसी खास चरित्र पर नहीं है या बॉयोपिक नहीं है तो हमेशा प्रमुख चरित्र अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है। जीवन में ऐसे वास्‍तविक चरित्रों का मिलना मुश्किल है। सबसे पहले लेखक