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Thursday, August 2, 2018

फिल्म समीक्षा : मुल्क

फिल्म समीक्षा : मुल्क 
समस्या और समाधान के 140मिनट 
-अजय ब्रह्मात्मज 

मुख्यधारा की फिल्मों के कलाकार ऋषि कपूर को अनुभव सिन्हा ने बनारस की एक गली में जाकर रोपा और उन्हें मुराद अली बना दिया.ऋषि कपूर और प्रतिक स्मिता बब्बर ही इस फिल्म में मुबई के पले-बढे मुख्य कलाकार हैं.इन दोनों की तब्दीली की मुश्किलें हैं.दोनों ही अपने किरदार को ओढ़ते हैं.खास कर प्रतीक शहीद जैसे प्रमुख किरदार को निभा नहीं पाते.उनका लहजा और व्यवहार बनारस का तो बिल्कुल नहीं लगता.दिक्कतें ऋषि कपूर के साथ भी हैं,लेकिन लुक,मेकअप ,संवाद और किरदार पर फिल्म की टीम का पूरा ध्यान होने से वे मुराद अली से लगते हैं.ऋषि कपूर का निजी लहजा उनके हर किरदार पर हावी हो जाता है.अगर वे लेखक-निर्देशक की मदद से उसे छोड़ने की कोशिश करते हैं तो उनके किरदार की गति में व्यतिक्रम पड़ता है.वह 'मुल्क' में भी है. मनोज पाहवा और ऋषि कपूर के साथ के दृश्यों को देख लें तो अंतर पता चल जायेगा.मुख्य किरदारों को रहने दें.फिल्म के सहयोगी किरदारों में आये उत्तर भारतीय कलाकारों को देखें तो उनकी सहजता ही ऋषि कपूर की कृत्रिमता जाहिर कर देती है.
अनुभव सिन्हा की 'मुल्क' राजनीतिक और सामाजिक होने का एहसास देती है.वास्तव में यह भावनात्मक फिल्म है.हम और वो में तेज़ी से बंट रहे समाज के राजनीतिक पक्षों को खोजने और समझने की कोशिश नहीं है.किसी राजनीतिक पार्टी और विचार को अनेक कारणों से चिन्हित नहीं किया गया है.अपनी बहस के दौरान आरती मोहम्मद इस बंटवारे को लेकर चल रही हंसी और उदासी की तरफ इशारा तो करती है,लेकिन उसे रेखांकित नहीं करती.लेखक-निर्देशक ने सामाजिक चेतना और जागृति की सीमारेखा खींच रखी है.वे उससे बाहर नहीं जाते.यही वजह है कि सामाजिक यथार्थ को दिखाती यह फिल्म बनावटी और सुविधाजनक निष्कर्षों तक ले जाती प्रतीत होती है. आरती की मुल्क की परिभाषा स्पष्ट नहीं है.संवादों के प्रवाह में पता नहीं चलता,लेकिन जरा गौर से सुनें...वह कहती है मुल्क बंटता है रंग से भाषा से धर्म से जात से ...इस परिभाषा के आधार पर भारत,पाकिस्तान और बांग्लादेश को अलग-अलग मुल्क मानना ही मुश्किल हो जायेगा.मुल्क एक संप्रभुता सम्पन्न भौगोलिक ईकाई है,सरहदें उसे तय करती हैं.सामान रंग,भाषा,धर्म और जात होने पर भी देश अलग हो सकते हैं.देश बनने के राजनीतिक करण होते हैं इन सभी के साथ.
भावनात्मक स्तर पर एक फैमिली ड्रामा के रूप में यह इन्तेरेस्टिंग फिल्म है.भारत में बढ़ रहे अंतर्विरोध,साम्प्रदायिकता और वैमनस्य के सन्दर्भ में यह आज की समस्यायों को नहीं छूती.मुस्लमान परिवार में किसी एक युवक का भटक कर आतंकवादी हो जाना और बाकि हिन्दू समाज से उसके बहिष्कार की बातें करना थोड़ी पूरी घटना हो चुकी है. हिन्दू-मुसलमान यानी हम और वो की बातें बहुत आगे बढ़ चुकी हैं. पिछले 3-4 सालों में मामला लव जिहाद से आगे बढ़ कर मॉब लिंचिंग तक पहुँच चूका है.इन स्थितियों में सत् की ख़ामोशी सहमति के रूप में प्रकट हो रही है.'मुल्क' समय की विसंगतियों से पीछे की फिल्म है .
'मुल्क' की आरम्भिक दृश्य संरचना से आभास होता है कि बनारस मे 'नुक्कड़' चल रहा है.मध्यवर्गीय बस्ती है.पडोसी मिल-जुल कर रहते हैं.मजाक और पार्टियाँ करते हैं.एक-दुसरे के संग और साथ खाते-पीते हैं.चौबे जी तो मुराद अली के यहाँ कबाब भी चांपते हैं,जबकि उनकी पत्नी शाकाहारी खाने को भी हाथ नहीं लगातीं. कोई बुरा नहीं मानता.इलाहाबाद जा रही बस में आतंकवादी हमला होता है और मुराद अली की भाई बिलाल अली के बेटे पर संदेह होता है.यहाँ से स्थितियां और संबंधों के समीकरण बदल जाते हैं.अली के घर की दीवार पर लिख दिया जाता है कि पाकिस्तान जाओ.1992 में बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद से मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा और सीमित आक्रामकता घर करती है.दिशाहीन मुसलमान नौजवानों को गुमराह किया जाता है.निर्देशक तफसील में नहीं जाते कि उनका सरगना आया कहाँ से है?उन्हें जल्दी से अपनी कहानी पर आना है और उसे कोर्ट में ले जाना है.जहाँ अच्छे मुस्लमान और बुरे मुसलमान पर जिरह हो सके. हम और वो के हवाले से समाज में आई फांक को दिखाया जा सके.सिनेमाई आज़ादी रहती और मिलती है कि आप अपनी सुविधा से घटनाक्रम रखें और निहित लक्ष्य तक पहुंचे.लेखक-निर्देशक ने गंगा-जमुनी तहजीब के इस गुलदस्ते को मनमाफिक फूलों(घटना,संवाद और आक्षेप) से सजाया है.फिल्म आर्गेनिक तरीके से क्लाइमेक्स तक नहीं पहुँचती.फिल्म के अंत में जज साहेब सभी को सबक देते हैं.सबक के शब्द बहुत सावधानी से चुने गए हैं.
कलाकारों की शिद्दत और मेहनत का ज़िक्र ज़रूरी है.तापसी पन्नू ने आरती के किरदार को बखूबी निभाया है.वह मुस्लमान परिवार की बहू है.वह अपने ससुर के 65वें जन्मदिन में हिस्सा लेने आई है.वह एक सवाल के साथ घर में प्रवेश करती है कि बच्चे के जन्म के पहले उसका धर्म कैसे तय हो?मा हिन्दू है और पिता मुसलमान....लेखक-निर्देशक को नहीं मालूम किबगैर हिन्दू या मुस्लमान हुए भी बच्चे पल सकते हैं.हमारे आसपास ऐसे अनेक नागरिक मिल जायेंगे जो हिन्दू या मुसलमान परिवारों में जन्म लेने के बावजूद किसी धर्म का पालन नहीं करते.उनके बच्चे राजी-ख़ुशी बड़े होकर देश के ज़िम्मेदार नागरिक भी बने हैं.फिल्म में ऐसी अनेक खामियां हैं.मध्यवर्गीय परिवारों (हिन्दू या मुस्लमान) के सदस्यों की बॉडी लैंग्वेज अली परिवार के सदस्यों जैसी नहीं होती.खासकर जिनका उठाना-बैठना चौबे और सोनकर जैसे पड़ोसियों से हो.आशुतोष राणा ने कटु और अप्रिय संवादों से आरती के किरदार को जिरह का स्पेस दिया है.जज कुमुद मिश्रा प्रभावी हैं.भले ही उनमें 'जॉली एलएलबी' के सौरभ शुक्ल की झलक मिलती है.
यह फिल्म 'गर्म हवा' और 'नसीम' के धरातल पर उतरने की कोशिश करती है.इरादे में सही होने के बावजूद संवेदना और राजनीतिक चेतना की कमी से सुविधाजनक निष्कर्ष निक़ाल लेती है.
अवधि - 140 मिनट
*** तीन स्टार


Wednesday, August 1, 2018

सिनेमालोक : जब गीतों के बोल बनते हैं मुहावरा

सिनेमालोक

जब गीतों के बोल बनते हैं मुहावरा

-अजय ब्रह्मात्मज

दस दिनों पहले अतुल मांजरेकर  की फिल्म ‘फन्ने खान' का एक गाना जारी हुआ था.इस सवालिया गाने की पंक्तियाँ हैं,’
खुदा तुम्हें प्रणाम है सादर
पर तूने दी बस एक ही चादर
क्या ओढें क्या बिछायेंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे
दो रोटी और एक लंगोटी
एक लंगोटी और वो भी छोटी
इसमें क्या बदन छुपाएंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे अच्छे दिन कब आयेंगे?
गाना बेहद पोपुलर हुआ.इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया गया.यह देश के निराश नागरिकों का गाना बन गया.’अच्छे दिनों' के वाडे के साथ आई वर्तमान सरकार से लोग इसी गाने के बहाने सवाल करने लगे.सवाल का स्वर सम्मोहिक हुआ तो नुमैन्दों के कान खड़े हुए.कुछ तो हुआ कि जल्दी ही महज दस दिनों में इसी गाने की कुछ और पंक्तिया तैरने लगीं.अब उसी गाने का विस्तार है…
जो चाह था
हो ही गया वो
अब न कोई खुशियाँ रोको
सपनों ने पंख फैलाये रे
मेरे अच्छे दिन हैं आये रे.
ऐसा माना जा रहा है कि निर्माता-निर्देशक पर दबाव पड़ा तो उन्होंने इस गीत को बदल दिया.’अच्छे दिन कब आयेंगे?’ के सवाल को ‘अच्छे दिन आये रे' कर दिया और सपनों के पंख फैलाने की बात कही.निर्देशक अतुल मांजरेकर का बयान आया है कि इस गाने के अकारण राजनीतिकरण से बात बढ़ी और निर्माताओं के पास कॉल आये. किसी भी प्रकार के विवाद से बचने के लिए गीत का अगला हिस्सा डालना पड़ा.
इरशाद कामिल ने बताया कि मूल रूप में पूरा गाना यूँ ही लिखा गया है.किसी दबाव में पंक्तियाँ नहीं बदली गयी हैं.कुछ गानों में ख़ुशी और ग़म के वर्सन होते हैं,कुछ में आशा-निराशा के.इस गाने में आशा-निराशा को व्यक्त करते शब्द हैं.दोनों वर्सन आगे-पीछे ज़रूर आये हैं.लोगबाग जो मतलब निकाल रहे हैं,वैसा कुछ नहीं हुआ है.’ फिल्मों,फ़िल्मी गानों और संवादों में दर्शक अपनी उम्मीदें,गुस्सा और शिकायतें पा जाते हैं तो वे उसे सराहते हैं और उन्हें अपनी पंक्तिया बना लेते हैं.यह किसी गीतकार और संवाद लेखक की अप्रतिम सफलता होती है कि उसके बोल और संवाद मुहावरे बन जाएँ.इरशाद कामिल के गीतों में यह प्रभाव मिलता है.उनके गीत वर्तमान समय के भाव और मंशा को बहुत खूबसूरती के साथ बगैर आक्रामक हुए व्यक्त करते हैं.इस बार भी ऐसा ही हुआ है.
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस गीत के पहले बोलों ने समाज के नाखुश और निराश नागरिकों को वाणी दी.यही करण है कि वे अपने आम सवालों को इस गीत के बहाने पोस्ट करने लगे.सत्ताधारी शक्तियां हमेशा ऐसे मौकों पर अतिरिक्त तौर पर सावधान रहती हैं.अगर सत्ता निरकुंश हो तो ज्यादा सजग रहती है.वह बवंडर बनने के पहले ही हवा का रुख बदलती है.निश्चित ही निर्माताओं को फ़ोन आये होंगे.हो सकता है,उन्हें आग्रह के अंदाज में आदेश दिया गया हो.निर्माता डरपोक नहीं होते.उन्हें विवाद से संभावित हानि का व्यवसायिक डर रहता है.अगर अभिव्यक्ति का डर रहता तो इस गाने की रिकॉर्डिंग ही नहीं होती.हम जानते हैं कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा साहसी निर्माता-निर्देशक हैं.उनकी ‘रंग दे बसंती’ मिसाल है. लेकिन यह भी सच है कि इन दिनों ढेर सारे लेखक निजी अंकुश के साथ लेखन कर रहे हैं.यह प्री सेंसरशिप है.यह अभिव्यक्ति को सीमित और संकीर्ण कर रही है.
फिलहाल यह तो जाहिर हुआ कि सरकार और सत्ता गीत के बोलों से भी घबराती है.

Tuesday, July 24, 2018

सिनेमालोक जान्हवी और ईशान को लेकरT करण जौहर परेशान

सिनेमालोक
जान्हवी और ईशान को ्लेकर करण जौहर परेशान
- अजय ब्रह्मात्मज
शुक्रवार 19 जुलाई से आज तक सोशल मीडिया पर ‘धड़क’ के बारे में जितना लिखा गया है,उतना हाल-फिलहाल में किसी और फ़िल्म के लिए नहीं लिखा गया। कारण जौहर ने लीड ले रखा है। सिर्फ उनके ट्वीट हैंडल पर नज़र डालें तो पाएंगे कि चार दिनों में उन्होंने सबसे ज्यादा ट्वीट किए। उन्होंने फिल्म की छोटी और संक्षिप्त तारीफों को भी रिट्वीट कर बाद और विस्तृत बना दिया है। यूँ लग रहा है कि फिलहाल ‘धड़क’ के अलावा मनोरंजन जगत में कुछ नहीं हो रहा है। फ़िल्म पत्रकार,समीक्षक,डेस्क राइटर,कंटेंट क्रिएटर और फ़िल्म पंडित सभी तारीफ करने और जानकारी देने में एक-दूसरे को धकिया रहे हैं।कारण उनकी धकमपेल के मज़े ले रहे है। वे खुश और परेशान है। खुश इसलिए हैं कि फ़िल्म ध्येय और आशा के अनुरूप कमाई कर रही है। परेशान इसलिए हैं कि फ़िल्म की कमाई बढ़े। पहली ही फ़िल्म से जान्हवी और ईशान स्थापित हो जाएं।

करण जौहर कुशल संरक्षक और बेशर्म प्रचारक हैं। वे अपने कलाकारों से बेइंतहा प्यार करते हैं। उनका जम कर प्रचार करते हैं। उनकी आक्रामकता प्रभावित करती है। ‘धड़क’ और जान्हवी व ईशान का ही प्रसंग लें। इस फ़िल्म की घोषणा के समय से उन्होंने इसके बारे में लिखना और बोलना शुरू कर दिया। खुद की कोशिश और अपनी टीम की मदद से उन्होंने फिल्म और कलाकारों को निरंतर चर्चा में रखा। इसके पहले ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के समय वरुण धवन,आलिया भट्ट और सिद्धार्थ मल्होत्रा को भी उन्होंने ऐसे ही पेश किया था। सही मायने में वे स्टारमेकर हैं। इस बार भी वे अपने ध्येय में सफल दिख रहे हैं।
फ़िल्म का विधिवत प्रचार आरम्भ करने के पहले उन्होंने खुद जान्हवी का इंटरव्यू किया और हाई ब्रो पत्रिका ‘वोग’ में छपवा कर संभावित इंटरव्यू का टोन सेट कर दिया। उन्होंने सवाल भी दे दिए। लकीर के फकीर फ़िल्म पत्रकार को अलग और अतिरिक्त मेहनत करने की आदत और ज़रूरत समाप्त हो रही है। इन दिनों तो पीआर द्वारा भेजी गई खबरें और रपटें शब्दशः छाप दी जाती हैं और पत्रकार बायलाइन लेने में भी नहीं हिचकते। हमें यह बात भी मान लेना चाहिए कि जान्हवी की माँ श्रीदेवी के आकस्मिक निधन से उपजी सहानुभूति भी मिली। यहां तक की रिव्यू में में अनेक समीक्षकों ने एक पैराग्राफ माँ-बेटी के संबंधों के बारे लिखा। उनके अभिनय के बारे में बताते समय ग्रेस शब्द दिए गए। कमियों के ज़िक्र नहीं किया गया।
हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि बड़े बैनर की फिल्मों के प्रति सभी का रवैया पॉजिटिव और तारीफ का रहता है। गुण खोजे जाते हैं और नए विशेषणों के साथ उनके बारे में लिखा जाता है। ‘धड़क’ अपेक्षाकृत बेहतर व्यवसाय कर रही है। ट्रेड पंडित बात रहे हैं कि यह फ़िल्म कौन से नए रिकॉर्ड बना रही है। भक्त और श्रद्धालु उसे मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया पर दोहरा रहे हैं। फ़िल्म बिरादरी के सारे सदस्य कारण जौहर की विरुदावली में लगे हैं। उन्हें अपना और अपने बच्चों के भविष्य के लिए समर्थ पारखी और सारथी करण जौहर के रूप में दिख रहा है। मुमकिन है करण सब कुछ समझते हों और इस पाजिटिविटी का लाभ उठा रहे हों। यह भी संभव है कि वे धृतराष्ट की तरह सब कुछ स्वाभाविक मान रहे हों। अपनी अपेक्षाओं को पूरा होते देख इतरा रहे हों। भविष्य तय करेगा कि उन्होंने यह सब अच्छा किया या बुरा? फिलहाल सभी ‘धड़क’ के बारे में लिख रहे हैं।यह कॉलम भी तो इसी संबंध में है।

कास्टिंग : कांटेक्ट,कांटेस्ट,काउच,कम्प्रोमाइज़ और क्राउन

फिल्म लॉन्ड्री

कास्टिंग : कांटेक्ट,कांटेस्ट,काउच,कम्प्रोमाइज़ और क्राउन

-अजय ब्रह्मात्मज

प्रसंग एक - 2015 में 20वीं सदी के मशहूर डायरेक्टर ए आर कारदार के दफ्तर की कुछ तस्वीरें अचानक वायरल हुई थीं.सभी ने खूब चुस्की लेकर उसे ‘कास्टिंग काउच' से जोड़ा था.सच्चाई यह थी कि कारदार 1951 में अपनी नयी फिल्म ‘दिल-ए-नादां’ के लिए दो लड़कियों का चुनाव कर रहे थे.इस फिल्म के लिए आखिरकार पीस कँवल और चाँद उस्मानी चुनी गयी थीं.लाइफ मैगज़ीन के फोटोग्राफर ने ये तस्वीरें कारदार साहेब के दफ्तर में उतारी थीं.मुमकिन है,उन दिनों किरदारों के मुआफिक कलाकारों के चुनाव के लिए ऑडिशन का यही तरीका अपनाया जाता हो. ए आर कारदार लाहौर के एक्टर और फिल्मकार थे.जो निजी कारणों से विभाजन के पहले ही लाहौर से कोलकाता और फिर मुंबई आ गए थे.
प्रसंग दो - मधुर भंडारकर की फिल्म ‘पेज 3’ में महानगरों के पेज 3 कल्चर को एक्स्पोज करने के लिए फिल्म और फैशन इंडस्ट्री के कुछ अंदरूनी सीन रखे गए थे.एक खास सीन में अंग्रेजी की फिल्म जर्नलिस्ट माधवी (कोंकणा सेन) फिल्म स्टार रोहित(विक्रम सलूजा) से स्ट्रगलिंग एक्टर गायत्री (तारा शर्मा) को मिलवाती है और फिल्म में काम दिलवाने की सिफारिश करती है.रोहित उन्हें निर्देशक चारू मोहंथी के पास भेजता है.चारू जब गायत्री से मिलते हैं तो वे उसके शरीर को जहाँ-तहां छूते हैं.यह स्थापित किया गया है कि वे काम देने के एवज में शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश करते हैं.इसे ही ‘कास्टिंग काउच' कहा जाता है.
प्रसंग तीन - अँधेरी पश्चिम में स्थित रामगोपाल वर्मा का दफ्तर ‘फैक्ट्री'.’सत्या’ और ‘शूल' की कामयाबी के बाद रामगोपाल वर्मा की ‘फैक्ट्री' फिल्मों में एक मौके की तलाश में भटकते कलाकारों के लिए उम्मीद बन गयी थी.यहाँ वर्मा के दफ्तर आने के समय कलाकारों की भीड़ और कतार लग जाती थी.सबकी आस रहती थी कि उनकी एक नज़र पड़ जाये. और कुछ नहीं तो तस्वीरें जमा करने का सिलसिला थमता ही नहीं था.कुछ कलाकारों पर उनकी नज़रें पड़ीं और कुछ उन तस्वीरों से चुने गए.कुछ सालों पहले तक महेश भट्ट नए कलाकारों का बड़ा आसरा थे.इन दिनों ऐसा कोई प्रोलिफिक डायरेक्टर नहीं है,जो हर फिल्म में नए चेहरे को मौका दे रहा हो.
प्रसंग तीन,चार.पांच …. - आये दिन किसी नामालूम कलाकारों के हवाले से खबर आती है कि कास्टिंग के बहाने उनसे छेडछाड हुई.सभी मानते हैं कि दबे-ढके तौर पर ‘कास्टिंग काउच' का सिलसिला दशकों स चला आ रहा है.केवल तरीके बदलते रहते हैं.पहले इसकी भनक तक नहीं लगती थी.अब तो चर्चित और स्थापित अभिनेत्रियाँ और अभिनेता ‘मी टू’ के प्रभाव में अपने बुरे अनुभव शेयर कर रहे हैं.फिल्म लॉन्ड्री के इंटरव्यू में रिचा चड्ढा ने बताया ही था कि कैसे एक कास्टिंग डायरेक्टर ने उन्हें सलाह दी थी कि जरा खुलो और घूमने-फिरने जाया करो.
इन किस्सों की वजह से यह धरना बनती है कि फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग के पीछे एक रहस्य है.इस रहस्य का एक सिरा लड़कियों के जिस्म से गुजरता है.लम्बे समय तक फिल्म इंडस्ट्री के पति और पिता अपनी बीवियों को और बेटियों को फिल्मों से दूर रखते थे.कपूर खानदान की तीसरी पीढ़ी की करिश्मा कपूर को माँ बबिता का समर्थन मिला,लेकिन परिवार के पुरुष सदस्यों का विरोध झेलना पड़ा.संजय दत्त नहीं कहते की उनकी बेटी त्रिशाला फिल्मों में काम करें.वे अपने पुराने इंटरव्यू में बार-बार इस पर जोर देते रहे हैं.अब अगर उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘संजू' में 350 लड़कियों के साथ सोने के उनके आत्मस्वीकार के दृश्य को याद करें तो बेशक उन 350 में कुछ अभिनेत्रियां भी रही होंगी.अभी अमिताभ बच्चन और श्वेता बच्चन के एक विज्ञापन में साथ आने पर पर बिग बी के भावुक होने की खबरें छप रही हैं.क्या अभिनय करने की श्वेता की ख्वाहिश का जवानी में दम घोंटा गया था या अचानक उन्हें अभिनय का वायरस काट गया? जद्दन बाई,शोभना समर्थ और बबिता जैसी अभिनेत्रियों ने अपने परिवार और समाज से बगावत कर बेटियों को फिल्मों के लिए प्रेरित किया.उन्हें सहयोग दिया.स्थितियां और धारणाएं बदली हैं.फिल्म इंडस्ट्री के भीतर और बाहर की सोच में बदलाव आया है.अब फिल्म बिरादरी से लेकर सामान्य परिवारों तक की बेतिया फिल्मों को करियर के तौर पर चुन रही हैं.फिल्मों में लड़कियों के लिए अभिनय के साथ दूसरे फील्ड भी खुल गए हैं.
हिंदी फिल्मों में कास्टिंग का तौर-तरीका बिलकुल बदल चुका है.अभी निर्माता-निर्देशक मुख्य कलाकारों के चुनाव में भी कास्टिंग डायरेक्टर की मदद ले रहे हैं.इन दिनों लोकप्रिय बड़े सितारों से ही कोई फिल्म प्रोजेक्ट आरम्भ होता है.उनके नामों का फैसला लेने के बाद बाकी जिम्मेदारी कास्टिंग डायरेक्टर को सौंप दी जाती है.पिछले 10 सालों में कास्टिंग डायरेक्टर की प्रभुता बढ़ी है.एक सिस्टम डेवलप हो चूका है.अब स्ट्रगलर की भीड़ निर्माता-निर्देशक के बजाय कास्टिंग डायरेक्टर के दफ्तर में लगने लगी है.ज्यादा कलाकारों को काम मिल रहा है.उन्हें पहले की तरह दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़तीं.निराशा आज भी है,लेकिन उसकी मात्रा और शक्ल में फर्क आ गया है.
बीते दशकों में कास्टिंग
कांटेक्ट - दादा साहेब फाल्के के ज़माने में फिल्मों के लिए कलाकार जुटा पाना मुश्किल काम था. उन्होंने कुछ तो परिजनों को राजी किया और महिला किरदारों के लिए पुरुष साथियों को मनाया। उन दिनों ज्यादातर कलाकारों का चुनाव ‘कांटेक्ट’ से ही होता था।दायर छोटा था और फिल्मों में अभिनय करने के लिए उत्सुक कलाकारों की कमी थी।शक्ल-ओ-सूरत और कद-काठी के आधार पर ही उन्हें भूमिकाएं सौंपी जाती थीं। महिला कलाकारों का घोर अभाव था। कथित सभ्य परिवार की लड़कियां फिल्मों में नहीं जाती थीं। उन दिनों के अखबारों और पत्रिकाओं में फिल्मी खबरों और पोस्टर में कलाकारों की पूरी शैक्षणिक डिग्री नाम के साथ छपी जाती थी। अभिनेत्रियों के बारे में बताया जाता था कि फलां अभिनेत्री पढ़े-लिखे और सुसंस्कृत परिवार की हैं। ज्यादातर अभिनेत्रियां पारसी,मुस्लिम और ईसाई परिवारों से ही आती थीं। निर्माता-निर्देशक तवायफों और स्टेज पर एक्टिव अभिनेत्रियों से कांटेक्ट करते थे और उन्हें भाषा और अभिनय की ट्रेनिंग देकर फिल्मों के लिए तैयार करते थे। सीमित संपर्क और कॉन्टैक्ट से ही आरंभिक हिंदी फिल्मों की कास्टिंग होती रही। हिंदी फिल्मों के पहले स्टारत्रयी दिलीप कुमार,राज कपूर और देव आनंद को फिल्मों में ऐसे ही कॉन्टैक्ट से काम मिल।
कॉन्टेस्ट - आज़ादी के बाद यह देखने को मिलता है कि शहरी नागरिकों के बीच फिल्में पहले जैसी वर्जित नहीं रह गईं। शहरी आबादी के इच्छुक युवक-युवती फिल्मों को कैरियर बनाने लगे। अब निर्माता-निर्देशकों के पास किसी भी फ़िल्म के लिए इतने अभ्यर्थी हो जाते थे कि उन्हें कई बार सही कलाकार के चुनाव के लिए ऑडिशन और कॉन्टेस्ट के अवसर मिल जाते थे। पांचवे-छठे दशक में यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स जैसे समूह के सम्मिलित कॉन्टेस्ट के आयोजन होते थे। पत्रिकाओं के प्लेटफार्म का भी इस्तेमाल होता था। इस प्रक्रिया से चुने गए कलाकारों को बेहतरीन बैनर मिल जाते थे। उनकी लॉन्चिंग अपेक्षाकृत बड़ी और चर्चित रहती थी। धर्मेंद्र और राजेश खन्ना जैसे दमदार कलाकार कॉन्टेस्ट से ही आये और फ़िल्म इंडस्ट्री में छा गए। इस दौर में फ़िल्म इंडस्ट्री में देश के अन्य शहरों से कई कलाकर आये। कुछ बड़ी फिल्मों के मुख्य कलाकारों के चुनाव के लिए अखिल भारतीय कॉन्टेस्ट भी रखे गए। निर्माता कॉन्टैक्ट के दायरे से निकलकर बाहरी नई प्रतिभावों को मौके देने लगे। इसी के तुरंत बाद पुणे के एफटीआईआई से कलाकारों का एक जखीरा हिंदी फिल्मों में आया। थोड़े कलाकार एनएसडी से भी आये। इन संस्थानों में इनका एडमिशन कॉन्टेस्ट और कॉम्पिटिशन के जरिये हुआ था। फिर अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण पाकर यहां के निकले छात्र सधे कलाकार के रूप में फिल्मों में सफल पारी खेल सके।
काउच - ‘कास्टिंग काउच’ बहुत अधिक चर्चित शब्द युगम है। इसका सीधा अर्थ होता है,’फिल्मों में काम या अवसर देने के लिए शारीरिक शोषण करना’। फिल्मी और गैरफिल्मी परिवेश के लोगों के बीच आम दहरण है कि फ़िल्म इंडस्ट्री में काम पाने के लिए अधिकांश लड़कियों और अब तो लड़कों को भी ‘कास्टिंग काउच’ की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। पुरानी पत्रिकाओं की रिपोर्ट और एडिट आर्टिकल में भी इस बात का हवाला मिलता है कि निर्माता बने बागरी पूंजीपतियों के एक ध्येय फिल्मी तारिकाओं के साथ ऐश करना होता है। किसी समय स्थिति इतनी बदतर हो गयी थी कि मुम्बई में एक अधिवेशन इसी बात पर की गयी थी कि क्या फिल्मों से लड़कियों से दूर नहीं रख जा सकता? इस अतिवादी सोच पर अमल होना मुश्किल था। फिर भी जेनुइन निर्माता-निर्देशक इस मुसीबत और तोहमत से परेशान रहते हैं। जब-तब कुछ किस्से और आरोप सुनाई पड़ते हैं। ऐसा भी बताया जाता है कि सीधे न सही, लेकिन अप्रत्यक्ष तरीके से लगभग सभी लड़कियों को इस लांछित प्रकिया का शिकार होना पड़ता है। फ़िल्म इंडस्ट्री के नामी और मशहूर चेहरे भी इस लांछन से बरी नहीं हैं। कई बार ऐसा हुआ है कि आरंभिक शोषण के बाद लड़कियां इतनी बड़ी और चर्चित होने के साथ लोकप्रिय हो गयी हैं कि सारे सच्चे किस्से अफवाहों की शक्ल में हवा हो गए हैं। फिल्मी गलियारे में ऐसे अनेक किस्से कहे और सुनाए जाते हैं। फ़िल्म पत्रिकाओं और अब तो दैनिक अखबातों के पन्नों के गॉसिप और ब्लाइंड कॉलम ऐसी सनसनी खबरों और कानाफूसियों से भरे होते हैं। कुछ महीनों पहले सरोज खान के विवादित जवाब में यह सच्चाई बेलाग तरीके से सामने आ गयी थी। किसी भी तरीके से इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता,लेकिन यह अनुचित सत्य दशकों से जारी है रूप और स्वरूप बदल कर।
कम्प्रोमाईज़ - यह एक अलग किस्म का कास्टिंग शोषण है। ऊपरी तौर पर यह मेल-मिलाप और सामाजिक व्यवहार के रूप में नज़र आता है। कि बार इसमें शारीरिक शोषण नहीं भी होता है,लेकिन पसंद और प्रिय बने रहने के नजदीकी बनाये रखनी पड़ती है। कम्प्रोमाईज़ करना पड़ता है। दस साल पहले आज लगभग रिटायर हो चुकी अभिनेत्रियां जब शीर्ष पर आने के लिए संघर्ष कर रही थीं तो एक नए दूसरे के बारे में बताया था कि वह तो फलां डायरेक्टर के घाट का किचन संभालती है और शॉपिंग के लिए विदेशी शहरों में साथ जाती है। कुछ अभिनेत्रियां और अभिनेता लोकप्रियता के पायदान पर चढ़ते समय मजबूरी में कम्प्रोमाईज़ करती/करते हैं। ऐसी अभिनेत्रियां भी हैं,जिन्होंने मामूली कम्प्रोमाईज़ के बाद गैरमामूली कामयाबी पाई। उनके मशहूर होते ही इसे कुछ और नाम दे दिया जाता है। एक-दो बार ऐसा भी हुआ है कि कुछ ने पलट कर वार किया है। गंभीर आरोप लगाए हैं। सभी मामलों में ताकतवर की बात समझी और मानी जाती है। इन दिनों कुछ वाचाल और समझदार अभिनेत्रियां कम्प्रोमाईज़ नहीं करने की वजह से मेनस्ट्रीम में नहीं आ पा रही हैं।
क्राउन - क्राउन कास्टिंग भी होती है। जैसे ‘धड़क’ में जान्हवी कपूर की हुई है। पहले आलिया भट्ट की हो चुकी है। इसमें लड़कियों और लड़कों को पहले से चुन लिया जाता है। सौंदर्य प्रतियोगिता य्य नामी परिवार की लड़कियों की क्राउन कास्टिंग होती है। स्टारसन की लॉन्चिंग भी इसी श्रेणी में आती है। इन दिनों मानुषी छिब्बर को लेकर चर्चा चल रही है। ऐसी क्राउन कास्टिंग फ़िल्म और बैनर के लिए लाभदायक होती है। लॉन्चिंग स्टार की स्वीकृति की ज़मीन पहले से तैयार रहती है।

कास्टिंग के रूप-स्वरूप में समय के साथ परिवर्तन आता रहा है,लेकिन सभी श्रेणियां किसी न किसी रूप में साथ चलती रहती हैं। अभी कास्टिंग डायरेक्टर की महत्ता बढ़ने से यह अधिक लोकतांत्रिक और पारदर्शी हुआ है। पर्दे पर दमदार कलाकारों की तादाद बढ़ी है। सहयोगी भूमिकाओं में नए कलाकारों को बेहतरीन मौके मिल रहे हैं। फिर भी केंद्रीय और लीड भूमिकाओं के कलाकारों के चुनाव में आज भी पुराने तौर-तरीके अपनाए जाते हैं। कहने के लिए  तो यह भी कहा जाता है कि कास्टिंग और कामयाबी के लिए इस शोषण का हिस्सेदार बनती या बनते कलाकार स्वयं जिम्मेदार होते हैं।

Friday, July 20, 2018

दरअसल : ‘धड़क’ में ‘सैराट’ की धड़कन



दरअसल
धड़कमेंसैराटकी धड़कन
- अजय ब्रह्मात्मज

दो साल पहले नागराज मंजुले की मराठी फिल्मसैराटआई थी.किसी आम मराठी फिल्म की तरह रिलीज हुई सैराट कुछ ही दिनों में खास फिल्म बन गई. विशेष कर मुंबई में  इसकी बेहद चर्चा हुई. फिल्म बिरादरी और फिल्म प्रेमी समाज में  उन दिनों एक ही जिज्ञासा थी किआपने सैराट देखी क्या?’ फिल्म की सराहना और कमाई से अभिभूत गैरमराठी दर्शकों ने भी यह फिल्म देखी. हर साल एक-दो ऐसी मराठी फिल्में आ ही जाती हैं,जिनकी राष्ट्रीय चर्चा होती है. सिनेमा के भारतीय  परिदृश्य में मराठी सिनेमा की कलात्मक धमक महसूस की जा रही है. सैराट कलात्मक होने के साथ व्यावसायिक सफलता हासिल कर सभी को चौंकाया. यह अधिकतम व्यवसाय करने वाली मराठी फिल्म है.
सैराटकी लोकप्रियता और स्वीकृति से प्रभावित निर्माताओं ने इसे अन्य भारतीय भाषाओं में रीमेक किया.यहा अभी तक कन्नड़,उड़िया, पंजाबी और बंगाली में बन चुकी है. हिंदी में यहधड़कनाम से रिलीज हो रही है.धड़कके निर्माता  करण जोंहर हैं. इसके निर्देशक शशांक खेतान हैं,जिन्होंने करण जौहर के लिए दुल्हनिया सीरीज  में दो सफल लव स्टोरी फिल्में निर्देशित की हैं. उन्हें लव स्टोरी रोमांटिक फिल्मों का नया उस्ताद माना जा रहा है.
शशांक की अपनी खूबियां हैं जो उन्हें पिछली संगतों और पढ़ाई से मिली है. आदित्य चोपड़ा कीदिलवाले  दुल्हनिया ले जाएंगेके मुरीद शशांक खेतान की सिनेमाई समझ मैं सुभाष घई, नसीरुद्दीन शाह और करण जौहर की सीख और शैली का स्पष्ट असर है. इस अवसर में उनकी फिल्में मेनस्ट्रीम ढांचे में रहते हुए रियलिस्ट फील देती हैं.निश्चित ही उनकी इस खूबी को ध्यान में रखकर ही करण जौहर ने उन्हेंसैराटको हिंदी में लिखने और बनाने की मंजूरी दी होगी.
करण जौहर खास किस्म के फिल्मकार हैं.कुछ कुछ होता हैसे लेकरऐ दिल है मुश्किलमें अपने विषयों के चुनाव और निर्वाह  उनकी अलग रूमानी छवि बनी है.  उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में  रूमानियत झलकती है. ऐसा  लग सकता है और लगता  भी है  कि जिंदगी की कठोर सच्चाइयों से करण जौहर का कोई वास्ता नहीं है इसलिए उनकी फिल्मों में वास्तविकता की गुंजाइश नहीं बनती है.किन्तु गौर करें तो बतौर निर्माता  करण जौहर नई कथाभूमियों की तलाश में दिखते हैं. हिंदी में सरकार बनाने का फैसला इसी तलाश का सबूत है. वे भिन्न सोच के निर्देशकों को मौके देते रहे हैं.धड़ककी घोषणा के समय से ही या आशंका व्यक्त की जा रही है की क्या उसमें  सैराटकी धड़कन होगी?
इस फिल्म के ट्रेलर पर मिक्स रिएक्शन आए.सैराटखोज रहे प्रशंसकों को घोर निराशा हुई, लेकिन नई फिल्म के तौर परधड़क' को देख रहे दर्शकों ने तारीफ की. इसके ट्रेलर और गानों को उन्होंने खूब पसंद किया. दरअसल,हम भारतीय किसी भी प्रकार की तुलना में गहरी रुचि और आनंद लेते हैं. पहले और पुराने की तुलना में नए की निंदा और आलोचना करना हमारा प्रिय शगल है. धोने,गिराने और कूटने में हमें मज़ा आता है.हमें आशंका रहती है कि नई फिल्म में पुरानी फिल्म जैसी  बात हो ही नहीं सकती.और फिर सैराट ने तो सफलता और सराहना का कीर्तिमान रचा है. भलाधड़कउसे दोहरा पाएगी?
हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर पांच-आठ सालों के बाद आई लव स्टोरी  ने नया ट्रेंड शुरू किया है.बॉबी'(1973),’लव स्टोरी'(1981),’एक दूजे के लिए'(1981),’क़यामत से कयामत तक'(1988) औरमैंने प्यार किया’(1989) का उदहारण हमारे सामने है.इधर लम्बे समय से कपि प्रेमकहानी नहीं आई है,खासकर टीनएज उम्र की लव स्टोरी.इस बार तो ईशान खट्टर और जान्हवी कपूर दो नए चेहरे इस फिल्म के साथ लांच हो रहे हैं.मुझे लगता है किधड़क' देखते समयसैराटका चश्मा नहीं लगाना होगा.फिर हमेंधड़क' की धड़कन सुनाई देगी.

Wednesday, July 18, 2018

सिनेमालोक : कहाँ गए सिनेमाघर?


सिनेमालोक
कहाँ गए सिनेमाघर?
-अजय ब्रह्मात्मज  

मधुबनी के जिस होटल में ठहरा हूं,उसके मैनेजर से मैंने पूछा कि क्या उन्होंने संजू देखी है? उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,'जी देखी है।पिछले हफ्ते जमशेदपुर गया था तो वहां प्रकाश झा के नए मल्टीप्लेक्स में मैंने राजकुमार हिरानी की 'संजू' देखी।' इस सामान्य से जवाब से मैं थोड़ा हैरान हुआ। मेरा अगला सवाल था, 'क्यों,मधुबनी में देखने का मौका नहीं मिला या यहां यह फ़िल्म नहीं लगी है?' उनका जवाब था, 'फिल्म लगने के लिए सिनेमाघर चाहिए। मधुबनी का आखिरी सिनेमाघर शंकर टॉकीज अभी पिछले दिनों बंद हो गया। कभी इस शहर में तीन सिनेमाघर थे। सभी में भीड़ उमड़ती थी। अभी तीनों सिनेमाघर बंद पड़े हैं।सुना है जल्दी ही एक मल्टीप्लेक्स बनने वाला है।

मधुबनी शहर में चार मॉल आ गए हैं। इनमें पॉपुलर ब्रांड के कपड़े और दूसरे उपभोक्ता सामान मिलते हैं। मैंने शहर के कुछ युवकों से बात की कि आखिर वे फिल्में कैसे देखते हैं? उनसे पता चला कि शहर के सिनेमा प्रेमियों का सहारा स्मार्टफोन है। कोई भी फिल्म रिलीज हो। वह गैरकानूनी तरीके से बाजार में आ ही जाती है। चंद रुपयों में वह मोबाइल में लोड कर ली जाती है और फिर दोस्तों के बीच बंटती है। जिन शहरों और कस्बों में सिनेमाघर नहीं हैं,वहां यही तरीका अपनाया जा रहा है। थिएटर सम्पन्न शहरों के दर्शकों की तरह सिनेमाघरों से वंचित शहरों के दर्शकों भी पहले हफ्ते में ही फ़िल्म देखने का तरीका खोज चुके हैं। क्या वितरक और प्रदर्शक इस तरफ ध्यान दे रहे हैं? निर्माताओं की यह चिंता रहती है कि वे कैसे देश के अधिकांश दर्शकों तक पहुंचें? उन्हें मालूम तो है कि देश उनकी फिल्में देख रहा है,लेकिन पैसे उन तक नहीं पहुंच रहे हैं।

छोटे शहरों और कस्बों से आये 40 से अधिक उम्र के पाठक बता सकते हैं कि उनके बचपन को चलती-फिरती तस्वीरों से मुग्ध करने के ठिकानों पर अब कोई चहल-पहल नहीं है। ना तो समाजशास्त्रियों और ना फ़िल्म व्यवसाय से जुड़े व्यक्तियों ने कम और खत्म होते सिनेमाघरों के कारणों का अध्ययन किया और ना कहीं यह चिंता है कि देश के तमाम दर्शकों तक फिल्में कैसे पहुंचे? लगातार आंकड़े आ रहे हैं कि जिस तेजी से सिनेमाघर बैंड हो रहे हैं,उसी रफ्तार से मल्टीप्लेक्स नहीं खुल रहे हैं। पहले फिल्मों देखने के लिए आसपास के कस्बों और शहरों की यात्रा होती थी। कोई फ़िल्म लोकप्रिय हो जाती थी तो पूरा परिवार फिल्में देखने जय करता था।

 मधुबनी शहर में ही 'नदिया के पार' देखने के लिए आसपास के गांवों से परिवार बैलगाड़ियों में लद कर आये थे। आठवें दशक के आरंभ में फारबिसगंज के वार्षिक मेले ऐसे पारिवारिक जत्थों को मैंने टेंट सिनेमा में फिल्में देखते देखा है। अभी दर्शकों का प्रोफाइल और मिजाज बदल गया है। पहले वीडियो और फिर सीडी-डीवीडी ने दर्शकों को सुविधा दी कि वे बगैर सिनेमाघर गए फिल्मों का आनद टीवी या कंप्यूटर पर  उठा सकते हैं। उसके बाद स्मार्ट फोन और पेन ड्राइव व यूएसबी ने ऐसी सहूलियत दी कि रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गयी। सिनेमाघरों के दर्शक कम होने और सिनेमाघर खत्म होने की प्रक्रिया लगभग साथ चली। 

फिलहाल ज्यादातर सिंगल स्क्रीन बंद हो चुके हैं या बंद होने की कगार पर हैं। उनकी जगह भरने के लिए मल्टीप्लेक्स का विकल्प लागत,प्रचलन और मुनाफे के लिहाज से कस्बों के लिए मुनासिब नहीं है। एक रास्ता छोटे सिंगल स्क्रीन का है। उस तरफ उद्यमियों का ध्यान नहीं है। बीच में सुगबुगाहट हुई थी। कुछ नए वेंचर उभर रहे थे कि वर्तमान सरकार के आर्थिक फैसलों और अधिकतम कर बटोरने की मंशा ने योजनाओं का बंटाधार कर दिया। फ़िल्म इंडस्ट्री इस साल लाभ दिखा रही है। उसी अनुपात में सरकार भी फायदे में रहेगी,लेकिन मनोरंजन कर के रूप में वसूली गयी रकम भी सिनेमा के वितरण और प्रदर्शन को दर्शकों के अनुरूप करने का प्रयास नहीं दिखता। नतीजतन सिनेमाघर निरंतर गायब होते जा रहे हैं।