कॉमेडी, थ्रिलर और एक्शन यानी संडे

-अजय ब्रह्मात्मज

कॉमेडी, थ्रिलर और एक्शन तीनों को उचित मात्रा में मिला कर रोहित शेट्टी ने अपने किरदारों के साथ ऐसा घोला कि एक मनोरंजक फिल्म तैयार हो गई है। रोहित ने पारंपरिक तरीके से एक-एक कर अपने प्रमुख किरदारों को पेश किया है। किरदारों को स्थापित करने के बाद उनके ट्रैक आपस में मिलना शुरू करते हैं। शुरू में एक कंफ्यूजन बनता है, जो इंटरवल तक सस्पेंस में तब्दील हो जाता है।

फिल्म के शुरू में चेजिंग होती है। उस समय हीरो राजवीर चांदनी चौक की गलियों, मुंडेरों और छतों पर दौड़ता-छलांग लगाता दिखाई पड़ता है। फिल्म के अंत में भी चेज है, लेकिन वह कारों में हैं। कारें नाचती हुई पलटती हैं। कारों को उड़ाने, पलटाने और ध्वस्त कराने में रोहित को आनंद आता है।
सहर (आयशा टाकिया) और राजवीर (अजय देवगन) की इस प्रेम कहानी में कुमार (इरफान खान) और बल्लू (अरशद वारसी) भी आते हैं। सहर की जिंदगी से एक संडे मिसिंग है और फिल्म का सस्पेंस इसी संडे से जुड़ा है। इरफान खान ने स्ट्रगलिंग एक्टर का सुंदर काम किया है। आखिरकार वे भोजपुरी फिल्मों के सिंगिंग स्टार बन जाते हैं, लेकिन इस उपलब्धि को छोटी नजर से पेश किया गया है। फिल्म का सस्पेंस कहानी में धीरे से घुस जाता है और सारे किरदारों को अपनी ओर मोड़ लेता है। फिर सस्पेंस को खोलने और सुलझाने में राजवीर और उसके सहयोगी अनवर (मुकेश तिवारी) की तरकीबें रोचक तरीके से सामने आती हैं।

इरफान खान के किरदार में और भी संभावनाएं थीं। उनकी कॉमिक प्रतिभा का और सुंदर इस्तेमाल हो सकता था। फिर भी जितने दृश्य उन्हें मिले हैं, उनमें इरफान अपनी मसखरी से संतुष्ट करते हैं। अरशद वारसी इस बार कभी लाउड तो कभी किरदार से अलग होते से दिखे। अजय देवगन कॉमिक दृश्यों में फबते हैं। आयशा टाकिया को उलझनों से भरी एक लड़की का किरदार निभाना था। वह इसे निभा ले जाती हैं।

गीत-संगीत कहानी के अनुरूप है। थोड़ी मौज-मस्ती और चुहलबाजी गानों में दिखाई पड़ती है। हां, आयटम सौंग में तुषार कपूर और ईशा देओल कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। फिल्म के अंत में जोड़ी गई मेकिंग की फुटेज भी रोचक है।

चवन्नी की सलाह :देख सकते हैं

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