कला निर्देशक समीर चंदा-रवि शेखर


समीर चंदा
हैदराबाद फिल्म स्टूडियो.श्याम बेनेगल की पूरी यूनिट पहुंच चुकी है। यंहा एक महीना रह कर हम लोग -हरी भरी फिल्‍म की शूटिंग करने वाले हैं।यहीं सबसे पहले मिलता हूं मैं कला निर्देशक समीर चंदा से.
मैं नया था,पर मैंने समीर चंदा को दोस्त मान लिया था। वे अपने काम में पूरी तरह समर्पित.और दोस्तों के दोस्त।
हम एक महीने लगभग साथ रहे। वे दूसरी फिल्मों का काम देखने के लिए बीच-बीच मैं गायब भी हो जाते थे। फिर वापस आ जाते थे।
उनके पास लोकेशन खोजने के किस्से होते थे जिसे वे दोस्तों को सुनाते थे।
मुझे याद है जब उन्होंने 'दिल से' के छैया छैयां गाने के लिए ट्रेन रूट खोजने का किस्सा सुनाया था। अनेक ट्रेन यात्राएं कीं। ड्राइवर के साथ बैठ कर उन्होंने विडियो शूट किया था।
फिल्म के दर्शक ज्यादातर अभिनेताओं को ही जानते हैं. पर फिल्म प्रेमी जानते हैं की फिल्म के बनाने में निर्देशक और कैमरा मैन का पूरा सहारा होता है कला निर्देशक। यह कला निर्देशक ही है जो फिल्म का वह दृश्य तैयार करता है जिसे कैमरा शूट करता है। दीवार का रंग परदे का रंग भवन निर्माण तक का सारा काम कला निर्देशक के ही देख रेख में उसकी टीम करती है।
याद कीजिये 'दिल से ' के दृश्य। ज्यादातर दर्शक अभिनेता-अभिनेत्रियों को ही याद रखते हैं. पर फिल्म के फिल्म के फ्रेम में जो भी दिखाई पड़ता है उसको डिजाइन कराना या उसे वहां ला के रखना - सारा काम कला निर्देशक का ही होता है।
आइये इस बहाने कुछ फिल्मों की चर्चा करते हैं- जिसके कला निर्देशक थे समीर चंदा.
याद कीजिये - श्‍याम बेनेगल की फिल्म 'मंडी' जिसमे शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल का घर था एक कोठा । 1983 में बनी इस फिल्म में समीर चंदा एक सहायक के रूप में अपने काम की शुरुआत की थी।
इसके बाद काम का जो सिलसिला शुरू हुआ वो लगभग 55 फिल्मों तक चला।

'रावण' ,' कमीने', 'दिल्ली-६', 'ओमकारा', 'कृष', 'गजनी', 'वेल्‍कमे टू सज्जन पुर' , जैसी फिल्म की लम्बी लिस्ट है।
इन सारी फिल्मों के दृश्यों का अपना रंग है। चाहे वो बड़े स्टार वाली फिल्म हो या छोटे कलाकारों वाली फिल्म। कलानिर्देशक के रूप में उनकी जिम्मेदारी हमेशा महत्वपूर्ण होती थी।
अभिनेता समय पर आये या न आये सेट तो तैयार होना ही चाहिए। इस के चलते काम का गहरा दबाव होता है कला निर्देशक पर और लगातार काम मिलने के लिए जरुरी है की आप समय के पाबंद हों.
किसी भी फिल्म के लुक में कला निर्देशक की जबरदस्त भूमिका होती है. और समीर अपने काम में माहिर थे।
बाद में उनसे मेरी मुलाकात हुई श्याम बेनेगल की ही फिल्म 'बोस' के सेट पर. फिल्मसिटी में शूट था। गाँधी जी के आश्रम का सेट लगा था।
इसके भी कला निर्देशक समीर ही थ,. पर आज समीर के हाथ में एक बहुत बड़ा कैमरा था..और वे शूट कर रहे थे.. फिल्म नहीं..अपना सेट.
हम लोग उनकी इस हरकत पर हंस रहे थे क्यों कि कैमरा वो था जिस से उस ज़माने में सीरियल शूट किया जाता था। फिल्मे के छायाकार राजन कोठारी भी उनकी टांग खीच रहे थे।.
इसके अलावा मेरी उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई। आने वाली बड़ी बड़ी फिल्मो में उनका नाम देख मैं खुश हो जाता था .
इस उद्योग में अगर आप साथ काम नहीं कर रहे होते तो मिलना - जुलना मुश्किल होता है- यह मैं अच्छी तरह समझता हूँ.
पर जब भी मेरे किसी चित्रकार मित्र को काम की जरूरत होती - मैं उसे समीर चंदा का नंबर दे देता. और उसे काम मिल भी जाता.
आज खबर मिली। समीर चले गए ..ऐसे समझदार कला निर्देशक की कमी को फिल्म वाले महसूस करेंगे और उनके वे सारे साथी भी जो कभी न कभी उनके साथ काम कर चुके हैं।

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Lekh Padha.

Mithilesh Aditya.

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