पुरानी बातचीत : हंसल मेहता

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
फिल्‍मों के इतिहास और फिल्‍मकारों के विकास के अध्‍ययन में रुचि रखने वाले चवन्‍नी के पाठकों के लिए हसंल मेहता का यह इंटरव्यू दिल पर मत ले यार के समय यह इंटरव्यू किया गया था। तब इतनी लंबी बातें कर लेना मुश्‍िकल नहीं था। अब न तो जवाब मिलते हैं और न सवाल सूझते हैं। पढ़ने के बाद फीडबैक अवश्‍य दें। यहां या मेल करें। chavannichap@gmail.com


-     'दिल पे मत ले यार' का आयडिया कब आया?
0     जब मैं 'जयते' बना रहा था उस वक्त बहुत सारी कहानियां दिमाग में थीं. हमारे कुछ लेखक कई सारे विषयों पर सोच रहे थे कि किस तरह की फिल्म बनाई जा सकती है. मुझे आर वी पंडित ने कहा था कि मैं कहानी चुनूं ,जो प्रासंगिक हो, ऐसी कहानी हो जो जिंदगी से जुड़ी हो. उस वक्त शहर की हालत गंभीर थी. खून-खराबा, गैंगवार जौसी चीजें अपने चरम पे थी. उसी वक्त एक आयडिया दिमाग में आया. और 'जयते' की कहानी उभरकर आई. और 'जयते' बना दिया. पर कहीं लगता था कि एक कहानी छूटी हुई है जो अच्छी है. एक समय ऐसा आया जब मैंने सोचा कि उसको लेकर टेलीविजन पर ही कुछ कर दिया जाए. लग रहा था कि टीवी पर जो सस्पेंस, थ्रीलर जौसे प्रोग्राम हैं उन्हीं के मुताबिक ये कहानी ढाल दूं. पर ये किसी में फीट नहीं हो रहा था. एक्शन, आपसी संबंध जौसे पहलुओं का मिश्रण था. सौभाग्यवश ऐसा हुआ नहीं. मैं 1998 में सौरभ शुक्ला के साथ रिश्ते कर रहा था सौरभ हमारे साथ पहली बार काम कर रहा था, पर एक-दूसरे के साथ काम करके मजा आया. हम दोनों ही एक-दूसरे की मानसिकता समझ रहे थे. एक रात जब हम शूट कर रहे थे तो मैंने सौरभ को एक लाइन की कहानी सुनाई और कहा कि मुझे इस पर छोटी फिल्म करने की इच्छा है. सौरभ ने कहा कि मैं लिखूंगा इस कहानी को और तुम्हारे लिए काम भी करूंगा. लेकिन शर्त ये होगी कि यह किरदार मैं करूंगा. मैंने कहा अगर तुम लिखते नहीं तब भी यह तुम्हारे लिए ही सोचा था. सौरभ ने कहा कि विषय तो अच्छा है पर इस पर बहुत काम करना पड़ेगा. और उत्साह में हमलोगों ने स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू कर दिया. एक छोटी फिल्म की स्क्रिप्ट तौयार हो गई,जिसे हमने पन्द्रह से बीस लाख में करने का सोचा था. पर हम किसी भी तरह से फिल्म शुरू नहीं कर पाए. धीरे-धीरे लगने लगा कि यह और भी बड़ी फिल्म हो सकती है. फिर मैंने अपने स्कूल के मित्र अजय तुली के साथ कहानी पर बातचीत की. उसने जब कहानी सुनी तो वो भी उत्साहित हो गया. उसने भी कहा कि इस पर बड़ी फिल्म बननी चाहिए. उसी वक्त 'सत्या' हिट हो गई. फिर सोचा कि मनोज और सौरभ को मुख्य किरदारों में रखकर एक अच्छी व बड़ी फिल्म बनाई जा सकती है. अजय ने ही प्रोत्साहित किया कि बड़ी फिल्म ही बनाई जाए. उस वक्त तक ये नहीं पता था कि अजय ही निर्माता होगा. लेकिन अजय की रूचि इस प्रोजेक्ट में बढ़ती चली गई. 98-99 में हमलोगों ने कई सारे निर्माताओं को यह कहानी सुनाई. पर कोई बात नहीं बनी. हम लगातार स्क्रिप्ट पर काम करते रहे. इस जुनून के साथ कि ये फिल्म तो हमें करनी है. पिछले साल मई में एक निर्माता ने अपनी रूचि दिखाई तब तक मनोज से बात नहीं की गई थी. हमने मनोज से भी बात की और उसे कहानी पसंद आई. मनोज ने पूछा इसका निर्माण कौन करेगा. मैंने कहा कि मेरे पास निर्माता है. परंतु आगे चलकर हमें लगने लगा कि जो हम कहना चाहते हैं वो बाहर का निर्माता नहीं समझ पाएगा. हम कुछ ऐसा करने की सोच  रहे थे जो आजतक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नहीं किया गया था. इस फिल्म को आप एक दायरे में बांध नहीं सकते. जब कोई निर्माता सुनता था कि थ्रीलर है और वो भी मनोज के साथ तो खुश हो जाता था. पर जब मैं कहता था कि इसमें ह्यूमर भी है तो समझ नहीं पाता था. थ्रीलर और ह्यूमर एक साथ कैसे हो सकता है. कभी मैं कहता था कि इसमें ह्यूमर है पर कॉमेडी नहीं है तो वो इस फर्क को भी नहीं समझ पाते थे. निर्माता पूछते थे कि इसमें रोमांस है, मैं कहता था कि इसमें रोमांस तो है पर 'कुछ कुछ होता है' वाला नहीं. लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि  विषय क्या है? पर हमें समझ में आ रही थी फिल्म, इसलिए हमने सोचा कि इसे हम ही बनाएंगे. हमने अपनी तरफ से कोशिशें शुरू की .पहले मनोज को साइन किया फिर तब्बू को. सौरभ साथ में थे ही. आदित्य श्रीवास्तव को जोड़ा. और इस तरह जनवरी 21 को हमने फिल्म शुरू की. ये एक अजूबा ही था. क्योंकि हमें लग रहा था कि हमारे पास पौसे नहीं हैं तो फिल्म कैसे बनाएंगे. लेकिन वह जनवरी 21 था और आज 1 जुलाई है. हमारी फिल्म तौयार होनेवाली है. शूटिंग और डबिंग पूरी हो गई है. मुझे अभी तक ऐसा लग रहा है जौसे मैं, अभी भी, सपने में जी रहा हूं. कुछ भी सच नहीं लगता.
-     'दिल पे मत ले यार' है क्या?
0     कहानी के बारे में मैं कम बात करना चाहता हूं. कहानी के बारे मैं ये कह सकता हूं कि फिल्म आपका मनोरंजन करेगी. दिलचस्पी आपकी बनी रहेगी और आपको सोचने पर मजबूर भी करेगी. मैं कभी नहीं चाहता हूं कि माइंडलेस फिल्म कॉमेडी हो. वौसी फिल्म नहीं है ये. इसमें हमने कुछ कहने की भी कोशिश की है. इस फिल्म की कहानियत बेजोड़ है. मैंने भी कोशिश की है कि  कहानी ईमानदारी से दर्शकों को कही जाए. दर्शकों को कहानी समझ में आए. आप कई सालों से पाप्युलर सिनेमा देखते आ रहे हैं, लेकिन इसमें कुछ ऐसे तत्व भी डाले हैं जो हमारे सिनेमा में नहीं होता है. जौसे डार्क ह्यूमर है. और जो प्यार और रोमांस की आम धारणा है फिल्मों में, वो टूटेगी . थ्रीलर, रोमांस और कॉमेडी की जो आम धारणा है वो टूटेगी. अगर ये फिल्म दर्शकों को कह पाई जो ये कहना चाहती है तो मैं कह सकता हूं कि इस फिल्म से बहुत सारी नई चीजें देखने को मिलेगी. अगर सफल रही तो एक नया चलन शुरू हो जाएगा.
-     लेकिन आम दर्शकों को जोड़ने के लिए कोई तो बात होगी?
0     हर इंसान के अंदर अपने परिवेश से बाहर निकलने की प्रवृति होती है. कोई छोटे शहर से बड़े शहर को आता है. कोई बडे़ शहर से विदेश जाना चाहता है. हर इंसान ये महसूस करता है कि वो फंसा हुआ है. और वहां से निकलना चाहता है. हर इंसान को लगता है कि वो भंवर में फंसा हुआ है. आम जिंदगी के उतार-चढ़ाव से हर आदमी लड़ता हुआ दिखता है. कहानी हम सबकी है. मानसिक या सामाजिक भंवर को हमने कहानी का रूप दिया. एक प्रवासी की कहानी है. वो कैसे शहर में आता है उसके सपने क्या हैं, और उसके सपने उसे कहां तक ले जाते हैं. ये सीधा-सादा किरदार है जो बातों को बहुत जल्दी दिल पे ले लेता है. कहानी की खासियत ये है कि हर मोड़ पर आपको लगेगा कि अब आगे क्या होनेवाला है.? जौसे-जौसे फिल्म क्लाइमेक्स तक पहुंचेगी आप सोच भी नहीं पाएंगे कि ऐसा होनेवाला था. उत्साह का जो तत्व है वो बहुत मजबूत है इस फिल्म में. कहानी ऐसी है जो दर्शकों को पूरे समय तक बांधकर रखती है. कहानी कहीं भी बंद होती नहीं दिखाई देती.
-     मनोज के किरदार के बारे में कुछ बताइए.
0     वही जो मैंने अभी बताया. इस नायक का नाम रामसरन पांडे है. वो एक छोटे शहर जौनपूर से आया है. बहुत छोटे-छोटे सपने हैं उसके. गौराज में काम करता है. तो सोचता है कि वहां का सुपरवाइजर बन जाएगा. उसकी जिंदगी में एक लड़की आती है और उसे एक नया सपना दे जाती है. उस लड़की के साथ संबंध स्थापित होते-होते कुछ और सपने जुड़ जाते हैं. और उन सपनों का क्या होता है यही कहानी है इस फिल्म की.
-     मासूमियत खोनेवाली बात जो थी वो कहां है?
0     मासूमियत खोनेवाली बात है. मैं इसलिए इसके विषय में बात नहीं कर रहा हूं क्योंकि मैं कहानी के अंदर ज्यादा झांकना नहीं चाहता. मेरे लिए ये ऐसा सफर है जो हर इंसान तय करता है. मैं मुंबई छोड़कर कई सालों तक  बाहर रहा. वो मेरी जिंदगी का एक सफर था. शुरू में एक उमंग लेकर एक सपना लेकर गया. धीरे-धीरे अच्छा होता गया. मैं पौसे भी कमाने लगा. लेकिन फिर वो सपना टूट गया. और मैं वापस आ गया. मुझे लगने लगा कि ये सपना तो मैंने नहीं देखा था. ये अच्छा है, पर बुरा बहुत ज्यादा है. एक अजीब सी भावना थी इसलिए मैं लौट आया. रामसरन पांडे की कहानी भी ऐसी ही है. जो एक सपना लेकर आता है शहर में और वो सपना उसे कहां तक ले जाता है. कहानी में हमने समाज के अलग-अलग तबकों को भी दिखाने की कोशिश की है. मनोज का किरदार प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करता है. सौरभ इस शहर का कीड़ा है. जो इसी शहर में पला-बड़ा है. शहर की कमियों को और उससे उत्त्पन्न असमंजस की स्थितियों का वो प्रतिनिधित्व करता है. उसे लगता है कि ऐसा करूंगा तो गलत हो जाएगा, वौसा करूंगा तो भी गलत हो जाएगा. तब्बू उच्च मध्यवर्गीय समाज का प्रतिनिधित्व करती है. किशोर कदम शहर के निगेटिव पहलू का प्रतिनिधित्व करता है. वो गैंगस्टर है. शहर के अलग-अलग तबकों के बीच कैसे संबंध बनते हैं और समय के साथ कैसे उनमें बदलाव आता है उस पर आधारित ये कहानी है.
-     अंतत: आपका नायक कहां पहुंचता है.
0     उसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. मैं अभी उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता.
-     शहरो में पूंजीवाद के साथ आए अलगावाद(एलियनेशन)ो आपने कहानी का आधार बनाया है ...
0     नहीं ऐसा नहीं है. मैं जरूरत से ज्यादा बौद्धिक स्तर पर भी कहानी को नहीं ले जाना चाहता. मैं सिर्फ एक कहानी कहने की कोशिश कर रहा हूं. मेरे लिए किरदार के साथ जो समीकरण बनते हैं वो अहमियत रखते हैं. अलग-अलग तबके के लोग मिलकर जो समीकरण बनाते हैं वो जरूरी है. गोविंद निहलानी ने एक पार्टी में ही सबको दिखा दिया था. मैं पूरी फिल्म में दिखा रहा हूं. जब ये सारे लोग एकत्रित होते हैं तो अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से इनके बीच हर पल कुछ न कुछ बदलता रहता है. किसी की भावनात्मक जरूरत है तो किसी की नकारात्मक. समीकरण कैसे बनते हैं कैसे बदलते हैं मेरे लिए वो महत्वपूर्ण है. एलियनेशन, वर्गसंघर्ष जरूरी नहीं है. शहर में आकर वो खत्म हो जाता है.
-     वह समय खत्म हो गया है या सोचने का तरीका बदल गया है?
0     समय भी खत्म हो गया है और सोचने का तरीका भी बदल गया है. तब्बू उच्च मध्य वर्गीय समाज की होते हुए भी जिस तरह से मनोज के साथ मिलती-जुलती है. हकीकत में मनोज उससे प्यार करने का सपना भी देख सकता है . आम व्यावसायिक फिल्मों में हकीकत से परे एक टैक्सी ड्राइवर प्यार भी कर सकता है, पर इसमें ऐसा कुछ नहीं है. इसमें हमने वास्तविकता से जुड़े रहकर बदलते हुए संबंधों को दिखाया है. ये सबसे बड़ी चुनौती भी थी. इसमें हमारे बदलते हुए आदर्श कहीं न कहीं दिखाई देते हैं.
-     कुछ ठोस कहने की कोशिश नहीं की है क्या?
0     मेरे लिए ये कोई वक्तव्य नहीं है. यह एक कहानी है,जिसका आप आनंद उठाएंगे. और जो आपको थोड़ा बहुत सोचने पर भी मजबूर करेगी. इसे देखने के बाद आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में झांकना जरूर चाहेंगे. लोग थिएटर अलग-अलग कारणों से जाते हैं. कोई मनोरंजन के लिए जाता है, कोई सूचना के लिए जाता है तो कोई सोचने के लिए जाता है. मेरी यह फिल्म सब के लिए है. मेरे लिए फिल्म एक ऐसा माध्यम है,जहां सारी कलाओं का मिलन होता है. मैंने कोशिश भी यही किया है. शहर की जो अपनी कविता होती है, जिस भाषा का इस्तेमाल शहर में होता है वह इस फिल्म में है. फिल्म में अगर कोई गाली भी देता है तो आपको अपनी बीवी के साथ बौठे फिल्म देखते समय सोचना नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह इस शहर के रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. जिसने कविता का रूप ले लिया है. यह फिल्म शहर की वास्तविक चित्रकारी है. साहित्यिक रूप रखते हुए भी सरल भाषा में कही गई कहानी है.
-     कहीं आम व्यवसायिक फिल्मों की तरह सबको खुश करने जौसी कोई बात तो नहीं?
0     मैं अपने आपको एक ऐसा फिल्मकार मानता हूं जो अपने काम को पूरी निष्ठा के साथ करता है. जब टेलीविजन के लिए काम करता था या जब पहली फिल्म बनाई तो एक बात मैंने सीखी कि दर्शकों से सीधा संपर्क स्थापित करना बहुत जरूरी है. खुश करने का जरिया भी एक तरह से दर्शकों से सीधे जुड़ने का जरिया है. इसलिए अगर आप चर्चित तत्वों के सहारे दर्शकों से जुड़ जाते हैं तो आप पूर्ण हैं. एक जेफरी आर्चर का उपन्यास जिसे ज्यादातर लोग समझते हैं और एक बड़े साहित्यिकार की रचना जिसे बहुत कम लोग समझ सकते हैं. उन दोनों को मिलाने की कोशिश की है. मैं जो कुछ भी कह रहा हूं, उसे थिएटर में सामने बौठे दर्शकों से लेकर पीछे बौठे दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है. मेरे लिए यह अलग माध्यम है लोगों से संपर्क स्थापित करने का. मैंने हमेशा माना है कि गाने हमारे फिल्म संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं. सत्यजीत रे ने भी इसे बखूबी साबित किया है. उन्होंने अपनी फिल्मों में भी गाने और नृत्य का अच्छा मेल रखा है. जबकि हमने उसे बहुत बुरा रूप दे रखा है. मतलब ये कि गाने चाहिए तो ठोक दो. जबकि गाना या गाने हमारे फिल्म को एक अलग रूप देते हैं. पिछले साल जब 'जयते' फिल्म फेस्टीवल में थी तो मैंने गौर किया कि विदेशी लोग फिल्म पौनोरमा की फिल्मों को छोड़कर 'कुछ कुछ होता है' देखने ज्यादा जा रहे थे. 'कुछ कुछ होता है' के चार शो थे,पर इसमें खड़े रहने की जगह भी नहीं थी. जबकि फिल्म हिट हो चुकी थी और लोगों ने देखी भी थी. इससे मुझे एहसास हुआ कि हमारी फिल्म संस्कृति विकसित है और यह लोगों से सीधा संपर्क स्थापित करती है. इस फिल्म ने लोगों को दिल को छुआ था. अगर मैं ऐसी फिल्म बनाऊं जो मुझे ही समझ में आए तो उसका कोई फायदा नहीं. फिल्म अगर लोगों तक पहुंचने का माध्यम है तो यह समझना जरूरी है कि उन तक कैसे पहुंचा जाए.
-     सब तक पहुंचने मेंे एक तरीका हावी होता है. आप एक लड़की और लड़के को दिखाते हैं तो दर्शकों को पता होता है कि आगे क्या होनेवाला है. ज्यादा से ज्यादा आप उनके संवाद बदल सकते हैं. एक तरह का मानकीकरण होता जा रहा है.
0     मैं इसी स्टंैडर्डाइजेशन या मानकीकरण से बचना चाह रहा हूं. वहीं निर्देशक की तौर पर मेरे लिए चुनौती है. दूसरी चुनौती यह है कि मैं अपने आपको दोहराऊं नहीं. और यह भी ध्यान रखना है कि अलग करते हुए भी ऐसा न हो कि दर्शकों को झटका लगे. मैं मणि कौल जौसी फिल्म नहीं बनाऊंगा. राजकपूर, गुरूदत्त से लेकर मनमोहन देसाई तक सबने हमें कुछ न कुछ दिया है. मैं उनकी बातों को अपनी कहानी में जोड़ने की कोशिश करता हूं. मैंने उन्हीं औजारों का इस्तेमाल करके एक नई चित्रकारी की है.
-     पिछले कुछ सालों में कॉमेडी फिल्मों की एक अलग पहचान बन गई है. हमारे समाज में ह्यूमर निहित है, फिर भी हम उसे फिल्मों तक नहीं ला पा रहे हैं.
0     शुरू से लेकर अब तक हमलोगों ने ह्यूमर का एक फॉर्मूला बनाया है. उस हिसाब से ह्यूमर हमेशा लाउड रहा है. किसी की चड्ढी गिर रही है, कोई नंगा भाग रहा है, कोई चिल्ला रहा है. ... ऐसी चीजों को ह्यूमर कहा जाता है. दुर्भाग्यवश हमलोगों में भी ह्यूमर की कमी है. इतनी दुख भरी जिंदगी जीते हैं कि उसमें ह्यूमर को सम्मिलित नहीं कर पाते हैं. हम जब दारू पीते हैं तो जोर से हंसते हैं. यह एक तरह से अपनी परेशानी को कम करने का तरीका है. पर इसे ही ह्यूमर समझा जाता है. और यही हम दिखाते भी हैं. मैंने तो यहां तक सुना है कि दादा कांेडके अपने सहायकों के साथ खूब दारू पीते थे और बाद में टेपरिकार्डर चालू कर देते थे. दारू के नशे में कही गई बातों को फिल्मों में डाल देते थे. हालांकि यह सुनी हुई बात है. पर इसमें सच्चाई लगती है. क्योंकि जब हम आप शराब के नशे में होते हैं. तो ऐसे ही फालतू की बातें करते हैं. सही ह्यूमर को हम देख ही नहीं पाते. हमने कोशिश की है कि इस फिल्म से आपको कॉमेडी और ह्यूमर के बीच का फर्क समझ आए. फिल्म में आप पेट पकड़कर नहीं हंसेंगे. पर आपके चेहरे पर मुस्कान बनी रहेगी. मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे लोग इसे भी अपना लेगें. क्योंकि एक वास्तविक स्थिति में ह्यूमर को कैसे दिखाया जाए ये निर्देशक के लिए भी कठिन होता है और लेखक के लिए भी. इस फिल्म की सबसे बड़ी बात यही है.
-     ह्यूमर को ध्यान में रखते हुए हिंदी फिल्मों में कौन सी ऐसी फिल्में हैं,जिसने आपको प्रेरित किया हो?
0     मैं सिर्फ दो फिल्मों का नाम लूंगा - 'जाने भी दो यारो' और 'अमर अकबर एंथनी'. 'अमर अकबर एंथनी' एक मसाला फिल्म थी पर उसका हास्य समय के परे हैं. हालांकि कहना ठीक नहीं होगा पर मुझे राजकपूर की फिल्मों का हास्य थोपा हुआ लगता है. लेकिन फिल्म को इतनी अच्छी तरह से वे समझते थे कि थोपा हुआ हास्य भी खटकता नहीं था. 'चुपके-चुपके' और 'अंगूर' भी अपने आप में कमाल की फिल्म थी. दोनोें ही फिल्मों में हास्य को एक मुकाम पर दिखाया गया है. 'अंगूर' शेक्सपीयर के नाटक का हिंदी रूपांतर था. पर उसमें इतना मजा आएगा यह मौंने सोचा भी नहीं था.
-     क्या आपको यह नहीं लगता कि आप जोखिम मोल ले रहे हैं?
0     ऐसा कुछ नहीं है. मैं मूलत: एक कहानी कह रहा हूं. हास्य जिसका अभिन्न अंग है. मेरा ध्यान न ही रोमांस पर है, न ही थ्रीलर पर है. मैं न तो हीरो पर फोकस कर रहा हूं , न ही हिरोइन पर. क्योंकि ये परंपरागत हीरो-हिरोइन भी नहीं हैं. ये किरदार की कहानी है. और मेरा पूरा ध्यान कहानी को कहने में है.
-     वो क्या चीजें थीं जिसने आपको व्यवस्थित और सुरक्षित जिंदगी से उठाकर यहां ले आया?
0     मुझे आज तक नहीं मालूम कि मैं कैसे यहां आया हूं. मैंने किसी से विधिवत निर्देशन सीखा भी नहीं है. लेकिन जिस दिन पहली बार एक्शन बोला था सेट पर,मुझे लगा था कि मुझे यहीं होना चाहिए था. कह सकता हूं कि मैं भटका हुआ था और अब अपनी दुनिया में हूं. मुझे हमेशा यही लगता रहा कि ये सारी चीजें तो मुझे मालूम है. फिल्में देखता था लोगों से बातें करता था. फिल्मों की प्रशंसा भी करता था. मुझे किताबें पढ़ने की आदत थी. यहां जब आया तो फिल्मों से संबंधित किताबें पढ़ने लगा. शुरू में मेरे सिर के ऊपर से चीजें गुजर जाती थी. सौभाग्यवश यहां जो मेरे मित्र बने उन्होंने मुझे बताया कि मुझे क्या पढ़ना चाहिए. मैं उनसे किताबें लेता था पढ़ता था. पर फिर भी कुछ समझ में नहीं आता था. 'तारकोवस्की' कौन था, मुझे मालूम भी नहीं था. उसकी बातें भी समझ में नहीं आती थी. पर जब सेट पर काम करता था तो मुझे लगता कि मैं सब ठीक कर रहा हूं. धीरे-धीरे काम करते-करते ही विकसित हुआ हूं. पर कह नहीं सकता कि मैं यहां कैसे आया. मेरे उस जिंदगी के दोस्त और परिवार वालोंें ने इस बदलाव के लिए मुझे माफ नहीं किया अभी तक.
-     अभिव्यक्ति के किसी और माध्यम से आप पहले जुड़े हुए थे क्या?
0     नहीं, बिल्कुल नहीं. मुझे सिर्फ एक शौक था कहानी लिखने का. मैं छोटी-छोटी कहानियां लिखता था. मेरे अंदर एक कला थी चीजों को शब्दों में ढालने की. अंग्रेजी में जो कहानियां लिखता था,उससे लोग बहुत प्रभावित होते थे. मैंने अंग्रेजी में कविताएं भी लिखने की कोशिश की थी जिसे आज देखकर बहुत शर्म आती है.मैंने कुछ वर्ष तक शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश की थी. उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान से. लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के चक्कर में वह भी पूरा नहीं कर पाया. लेकिन जब कभी भी फिल्म देखता था तो मुझे लगता था कि मैं गलत जगह बौठा हूं. अपनी दुनिया से दूर. मैं आज भी असुरक्षित हूं, क्योंकि टेलीविजन में काम करके भी मैंने आर्थिक रूप से अपने आपको सुरक्षित नहीं किया है. लेकिन रचनात्मक तौर पर मैं सुरक्षित महसूस करता हूं. मैं खुश हूं. मैं आज भी अपने पुराने कामों को देखकर भावुक हो जाता हूं.
-     ऐसा कौन सा पड़ाव था,जहां आपने फैसला कर लिया कि अब आपको फिल्मी दुनिया में आ ही जाना है? कोई ऐसी घटना या खास बात?
0     मेरी निजी जिंदगी में एक ऐसा दर्दनाक मोड़ आया था,जिसकी वजह से मैं बाहर पढ़ने चला गया था.वहां टेलीविजन के लिए काम किया और बाकी समय में शादी-ब्याह की शूटिंग करता था. मैंने छोटे-छोटे कदम बढ़ाने शुरू कर दिए थे. मैं अपने मां-बाप से बहुत ज्यादा जुड़ा हुआ था. एक वक्त ऐसा आया जब मुझे लगा कि मैं ऐसा करके उन्हें कष्ट दे रहा हूं. एक जिम्मेवारी का भी एहसास हुआ कि वहां वेे अकेले हैं और यहां मैं फकीरों की जिंदगी जी रहा हूं. जिम्मेवारी के एहसास तले मैंने फैसला किया कि कम्प्यूटर की जिंदगी फिर से शुरू करनी होगी. पर जब यहां आया तो जीटीवी जौसे चौनल आ चुके थे. मैंने बहुत छोटे से कार्यक्रम'खाना-खजाना'से अपनी शुरूआत की. मैंने उस वक्त भी नहीं सोचा था कि मैं एक दिन फिल्म करूंगा. उस दौरान किसी ने सुझाया कि मैं म्यूजिक वीडियो करूं . मैं शायद पहला व्यक्ति था,जिसने म्यूजिक वीडियो बनाया था. हालांकि वह दिखाया नहीं गया. फिर 'यूल लवस्टोरी' आई. लोगों ने काफी प्रशंसा की. इस तरह मैं धीरे-धीरे ऊपर उठता रहा और अपनी महत्वाकांक्षाओं को उसी अनुपात में बढ़ाता रहा.
-     अब जब आ गए हैं. आप किसकी तरह बनना चाहेंगे या कैसी फिल्में करना चाहेंगे?
0     मैं किसी का शिष्य बनना नहीं चाहूंगा. वौसे जब मैं इस इंडस्ट्री में नहीं था,तब भी मुझे गुरूदत्त, गुलजार साहब, महेश भट्ट जौसे लोगों ने प्रेरणा दी है. गुरूदत्त साहब की फिल्मों ने मेरी जिंदगी को झकझोर दिया था. और इस वजह से भी मैं मुंबई से भाग गया. जब बाहर था तो गुलजार साहब की फिल्में वीडियो पर देखता था. उन्होंने मुझे संबंधों को जीना सिखाया है. 'सारांश' ने मुझे जिंदगी का मकसद दिया है. मैं इन सबसे प्रेरित होता रहा हूं, पर प्रभावित किसी से नहीं हुआ. एक पोलिस फिल्मकार हैं किसलोस्की .. उनकी फिल्मों ने भी मुझे वौसे ही छुआ है, प्रेरित किया है.म्ैंने उनकी फिल्म ब्लू कई बार देखी है.
-     कभी ऐसा लगा कि अगर आप सीखकर आए होते इस इडस्ट्री में तो कहीं और से शुरूआत की होती आप ने?
0     नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता. यदि सीख कर आया होता तो फिर मैं ऐसा नहीं होता,जौसा हूं. मेरे काम में एक अलग तरह की ताजगी है, एक मासूमियत है. मेरे काम में जो मासूमियत है उसने मुझे अलग पहचान दी है. और मैं कह सकता हूं कि मुझे दूसरी जिंदगी नहीं चाहिए. जिस तरह की जिंदगी जी रहा हूं,उससे मैं बहुत ज्यादा खुश हूं.
-     किसी फिल्मकार ने कहा था कि हर निर्देशक को अपना विषय खुद चुनना चाहिए. आप क्या सोचते हैं?
0     इससे जुड़ी और भी बात होती है ---- जब कोई निर्देशक बाहर के लेखक के साथ काम करता है तो वह विषय उसका हो जाता है. विजय आनंद ने आर. के. नारायण की 'गाइड' को अपने अंदाज में बनाया. उसी तरह मैं भी अपने आपको मानता हूं. अगर मेरी कहानी है तो अच्छी बात है. अगर किसी और कि कहानी पर मैं फिल्म बनाऊं तो यह यकीनन वह मेरी कहानी बन जाती है. वह हम सब की कहानी बन जाती है. मेरी या उसकी नहीं रह जाती. कोरोसावा ने यहां तक कहा था कि एक निर्देशक को लेखक होना बहुत जरूरी है. पटकथा उसे स्वयंं लिखनी चाहिए. इसलिए निर्देशन बहुत सारे आयामों को इकट्ठा करने का भी नाम है. बिल गेट्स ने विंडोज नहीं बनाया था. उसने हूनर को परखकर उसको एक अभिव्यक्ति की दिशा दे दी थी. वहे लोगों तक पहुंचा. निर्देशक का काम भी ऐसा ही होता है. अलग-अलग कलाओं को एक साथ लाकर उन्हें एक दिशा देना यह काम है निर्देशक का. फिल्मकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. मेरा इसमें भरपूर विश्वास है.
-     सत्यजीत राय ने अपनी बाद की फिल्मोें में सारा काम ख्ुद किया. फिल्म से जुड़े जितने भी विभाग हैं, कैमरा, संगीत, संकलन .. सब कुछ ख्ुद किया. लगभग सारे बड़े निर्देशक के साथ रहा है. ऐसा कितना जरूरी है?
-     मेरा मानना है कि तकनीकी बातों को समझना बहुत जरूरी है. उसमें पटकथा भी है. इसलिए फिल्म के हर भाग को जानना और उसकी बारीकी को समझना बहुत जरूरी है. मैं जब किताबें प़ढ़ता हूं तो निर्देशन से संबंधित कम पढ़ता हूं. सिनेमेटोग्राफी की किताबें ज्यादा पढ़ता हूं. उसके मौेनुअल से सारी चीजें एकत्रित करता हूं.नई मशीन आती है, उसके विषय में पढ़ता हूं. इसलिए मैं हमेशा पूरी तरह से तौयार रहता हूं. मैंने सबसे पहले संपादक(एडीटर) के रूप में काम की शुरूआत की थी. हालांकि मौं झूठ बोला था कि मौं संपादक था,क्योंकि मैं वहां शादी के वीडियो शूट करके ही देता था. फिर भी मुझे संपादन का काम मिलने लगा और मैं उसमें रमता गया. चूंकि इंजीनियर्रिग की पढ़ाई की थी. इसलिए मशीनों से लगाव है. एक बच्चे सा उत्साह मन में उठता है,जब भी नई मशीन देखत हूं.
-     मैंने यह सवाल इसलिए किया कि जौसे-जौसे सत्यजित राय सारा विभाग खुद देखने लगे, वौसे-वौसे उनकी फिल्में कमजोर होती गई. इसलिए लगता है कि यह बहुत जरूरी नहीं है.
0     बिल्कुल सही. एक समय के बाद फिल्मकार का अहम् उससे ज्यादा बड़ा हो जाता है. दिक्कत तकनीक की नहीं है, अहम् की है. उसे लगने लगता है कि सारी चीजें वह खुद ही कर सकता है. अगर ऐसा होता तो आप ही दर्शक भी होते. अगर आप सब कुछ कर सकते हैं तो फिल्म भी देखिए. वास्तविक्ता खत्म हो जाती है और काम में नयापन नहीं रह जाता. मैं जानता हूं कि लाइट कहां रखनी है. पर मैं अपने कैमरामौेन से कभी नहीं कहता. हो सकता है कि वह लाइट कहीं और रखे और मुझे कुछ नया सीखने को मिल जाए. आधी जानकारी खतरनाक होती है. वौसे कैमरा के विषय में मेरी जानकारी को देखते हुए विशाल भारद्वाज ने कहा था कि जब वह काम शुरू करेगा तो मैं कैमरामौन रहूंगा. मैंने उससे कहा था कि काम मत बिगाड़ो,क्योंकि मैं अपने काम से और पढ़-पढ़कर सीखता हूं.
-     सिनेमा की जो स्थिति है, उसे आप किस रूप में देखते हैं? दो-तीन चीजें एकदम साफ दिख रही है.हिंदी फिल्मों के अंतर्राष्ट्रीय बाजार की खेाज चल रही है,इस खेाज में  बड़े मेकर भी शामिल हैं, दूसरी तरफ एक अलग दर्शक है जो कि 'जानवर' और 'जंगल' जौसी फिल्मों को पसंद करता है. कहीं-कहीं बहुत बड़ा दर्शक 'डाकू हसीना' फिल्म को पसंद कर रहा है. इन सबको लेकर एक फिल्मकार के लिए कितनी चुनौती है? कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकते हैं?
0     मेरे लिए एक चीज बहुत जरूरी है.स्पष्ट संकेत मिल रहा है. दो सालों में दर्शकों की संवेदनशीलता नहीं बदलती.हमने उनकी संवेदनशीलता को बहुत आहत किया है. बहुत चोट पहुंचाई है. अब वो दिन नहीं रहे. मतलब हमारे दर्शक चीजों को समझने लगे हैं.े हैं. 'डाकू हसीना' देखनेवाले दर्शकोें का प्रतिशत बहुत कम है. जिसकों हम एक्सपोर्ट या एनआरआई ओरियेंटेड फिल्म बोल रहे हैं, वो यहां भी अच्छी चल रही है. इसलिए चल रही है कि उसमें संवेदना नाम की चीज है.'कुछ कुछ होता है' मेरे लिए आधुनिक परिदृश्य की महत्त्वपूर्ण फिल्म हैै. 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' 'कुछ कुछ होता है' से  बहुत ज्यादा आधुनिक परिदृश्य की प्रतिनिधि फिल्म है.वह आज की क्लासिक फिल्म है.मैं मानता हूं कि इस फिल्म में हमारी संस्कृति का सही प्रतिनिधित्व हुआ है. मैं इसे लौंडमार्क फिल्म मानता हूं . हमारे पारिवारिक सबंध,मां-बेटी के संबंध, रोमांस, हमारे मूल्यों को किस प्रकार अच्छी तरह कहानी में नौरेट किया जाता है, मेरे लिए 'दिलवाले दुलहनिया जाएंगे' उसका एक प्राइम उदाहरण है.और वह बदलती संवेदना की शुरूआत थी. . 'हम आपके कौन!' 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' हमारी बदलती संवेदना के परिचायक हैं. 'कुछ कुछ होता है' उसी चीज को ज्यादा विज्ञापित करते हुए.. .. च्यूंगगम,लॉली पॉप, पेप्सी जेनरेशन- जेनरेशन नेक्स्ट को लेकर ,उनके वौल्यू सिस्टम को लेकर एक कहानी दे दी. लेकिन समस्या क्या है हमारी फिल्म इंडस्ट्री में  कि हम हर सफल चीज को एक फामर््ाूला बना लेते हैं. हम सोचते हैं कि यही है सफलता का फार्मूला. और हर हफ्ते सफलता का नया फार्मूला बनता है और अगले हफ्ते वह टूटता है. तो मेरा सवाल ये है कि फार्मूला क्यों बनाते हो? आप फिल्में बनाइए.अपनी संवेदना को प्रोजेक्ट करते हुए फिल्म बनाइए.जिन चीजों में विश्वास करते हैं, उनको फिल्मों में ढालिए और फिर लोगों को फैसला करने दीजिए कि वह सही है या नहीं है. ईमानदारी से फिल्में बनाइए. फार्मूला का अनुसरण मत करिए. मेरी यह लड़ाई जबसे मैं टेलीविजन में हूं, तब से है. टेलीविजन में भी एक फार्मूला हो गया है. मतलब फार्मूला ड्राइविंग बहुत ज्यादा है. हॉलीवूड में ये बीमारी एक हद तक है लेकिन उनमें जब आप ग्रीन मौन जौसी फिल्में देखते हैं. तो आपको लगता है कि नहीं उम्मीद है. मतलब वेे पूरी तरह से फार्मूला में नहीं घुस गए हैं. हर साल एक फार्मूला टाइप फिल्म आती है और तीन-चार ऐसी फिल्में आती हैं,जो आपको उत्साहित करती है कि हम ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते हैं. अभी एक फिल्म आई थी सिगरेट लॉबी पर क्या नाम था उसका ... तो हमलोग काफी फार्मूलाबाज हैं. दो साल से यह मिथ टूटता जा रहा कि फार्मूला फिल्म नहीं चलती है. फार्मूला मत बनाओ, फिल्में बनाओ. कोई भी फार्मूला नहीं चलता है. 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' चलना चाहिए. लोगों ने कहा कि डेविड धवन की जो ब्रांड है,,वह कॉमेडी है वो एक तरह की फिल्में बनाता है. अब उनकी 'दीवाना मस्ताना' के बाद कौन सी फिल्में इतनी चली है. आप मुझे बताइए. फार्मूला से दूर हटना पड़ेगा. मेरे लिए संकेत ये है कि फार्मूला से दूर हटो. 'डाकू हसीना'.. हॉरर और सेक्स जो बना रहे उनको भी हमारी सुझाव है कि आप अपना फार्मूला चेंज करो नहीं तो जौसे मिथुन दा की फिल्में एक साल चली थी, अभी वे गायब हो गए. उसी तरह से 'डाकू हसीना' का फार्मूला भी बंद हो जाएगा. हर सेक्सन के लिए फार्मूला बना के रखे हैं वो. थोड़ा दिन तक चलेगा, फिर अपने आप बंद हो जाएगा.
-     तब्बू के बारे में क्या कहना है? तब्बू का रोल और तब्बू का अपना परफार्मेंस और तब्बू कैसी अभिनेत्री हैा?
0 मौ माचिस से जुड़ा हुआ था. माचिस का ट्रेलर और प्रोमो बनाया था. आर बी पंडित और गुलजार साहब के वजह से मैं माचिस के साथ बड़े नजदीक से साथ जुड़ा हुआ था. मैं तब्बू को जानता नहीं था तब, लेकिन मैं तब्बू के काम से बहुत प्रभावित हुआ था. मुझे लगा कि इस अभिनेत्री के साथ काम करना चाहिए. बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ था. मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी अच्छी अभिनेत्री इस पीढ़ी में है. इस फिल्म में कामिया का जो चरित्र बन रहा था.मुझे लगा कि इस देश में और कोई अभिनेत्री इस चरित्र को नहीं समझ पाएगी. समझने के बाद उसे अभिनीत करने के लिए भी प्रतिभा चाहिए. उसके लिए एक समझदारी भी चाहिए. आम फिल्मों में हिरोइन की जो धारणा है यह वौसी हिरोइन नहीं है. तब्बू ने इस चरित्र को कमाल तरीके से निभाया है. इस भूमिका को समझा है. मैंने  अभिनय के जिस स्तर के उम्मीद भी नहीं की थी वह किया है.पता नहीं इस फिल्म के लिए उसे अवार्ड मिले या न मिले लेकिन उसने साबित किया है कि वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अभिनेत्री है. एक जमाने में  शबाना आजमी थीं. गॉडमदर से पहले. तब्बू उस स्तर की अभिनेत्री है. वह किसी भी फिल्ममेकर के लिए स्वपन है. मेरे लिए खुशी की बात यह है कि तब्बू न केवल एक अच्छी अभिनेत्री है बल्कि बेहतर इंसान भी है. उसके साथ काम करना बड़ा आसान है. सेट पर कोई तकलीफ नहीं देती है अपने काम के प्रति समर्पित है. सबसे घुलमिल कर काम करती है. मेरे लिए एक अच्छी दोस्ती की शुरूआत भी है. यह मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरे टीम में न केवल एक अच्छी अभिनेत्री मिल गई बल्कि एक दोस्त भी मिल गई.
-     मनोज के बारे में बताएं?
0     हमदोनों एक-दूसरे को सात सालों से जानते हैं. हमदोनों ने बुरे दिन देखे हैैं. मनोज के पास काम नहीं था , मेरे पास भी काम नहीं था. मैं 'खाना खजाना' करता था. मनोज उसकी शूटिंग पर आता था खाना खाता था, बौठा रहता था और चला जाता था. हमलोगों ने साथ में बहुत बुरे दिन देखे हैं. एक-दूसरे को पौसे दिए हैं. एक-दूसरे के कपड़े पहने हैं. मेरे कपड़े बड़े होते थे लेकिन वह पहनकर चला जाता था. हमारा ऐसा रिस्ता बना था. हमने सोचा था कि कभी साथ में फिल्म बनाएंगे. हम सपने देखते थे. हर महत्वाकांक्षा आदमी सपना देखता है. हमारे सपने पूरे हो रहे हैं इस फिल्म से. ऐसा नहीं है कि इस फिल्म के लिए मनोज को अलग से लिया कि वह स्टार है. उसके स्टार होने के वजह से ही यह फिल्म बनी है. मनोज के स्टार होने से इसकी मांग बढ़ी है. मैं रामगोपाल वर्मा का आभारी हूं. उन्होंने एक अच्छे अभिनेता को बाजार में बिकने लायक बना दिया. इसकी  वजह से दो दोस्त साथ में फिल्म बना सके. मेरे लिए मनोज के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था. अपनी पीढ़ी में मनोज से अच्छा अभिनेता इस देश में नहीं है. होगा तो कहीं कोने में छिपा होगा. आज की तारीख में मनोज में सारे अभिनेताओं की खूबियां शामिल हैं. मनोज बाहर और भीतर दोनों तरफ से तौयारी करता है. वह चरित्र को व्याखायित करता है. वह सिनेमा के व्याकरण को अच्छी तरह समझ गया है. 'सत्या' के बाद वह सिनेमा का एक्टर हो गया है. सिनेमा के कला और शिल्प दोनों को उसने खूबसूरती से मिला लिया है.
-     फिल्म के संगीत के बारे मेें बताएं?
0     विशाल भी उन्हीं दिनों का मेरा दोस्त है. जब वह 'माचिस' का संगीत तौयार कर रहा था तब मैं उसके साथ था. एक छोटे से कमरे में बौठकर वे संगीत तौयार करते थे. मैं भी उसका हिस्सा था. संगीत तौयार करने के बाद वे मुझे सुनाते थे. गुलजार साहब को सुनाने के पहले तीसरे आदमी के तौर पर मेरी राय लेते थे. विशाल जहां संगीत रचना करते थे वह जगह बहुत दूर थी. तब उनकी पत्त्नी रेखा गर्भवती थी. तब विशाल के पास गाड़ी नहीं थी. मैं ड्राइवर की तरह उसे छोड़ने जाता था और लाने जाता था. हमारे भावनात्मक संबंध रहे हैं. उस समय विशाल के पास स्टिरियो सिस्टम नहीं था. दो गाने तौयार हो गए थे 'छोड़ आए हम वो गलियां' और चपा-चपा. निर्देशकों को उन गीतों को सुनाने के लिए मैं अपना स्टियरियो सिस्टम लेकर विशाल के म्यूजिक रूम में जाता था. यह तो तय ही था कि इस फिल्म का संगीत विशाल ही देगा. विशाल के संगीत के प्रति मेरे मन में आदर भी है. कई बातों पर हमलोगों की असहमति है, लेकिन वह अपने विश्वास पर टिका रहता है. जिद्दी है वह. उसकी जिद से लोगों को तकलीफ भी होती है. लेकिन मुझे इस बात का फकर है कि विशाल अपने विश्वास को लेकर हिलता नहीं है. उसके लिए वह लड़ भी लेता है. ऐसा संबंध मेरे लिए सृजनात्मक रूप से आदर्श है.
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0     इस फिल्म का संगीत विशाल के कैरिअर को नई दिशा देगा. 'माचिस' के बाद अगर विशाल ने किसी कमर्शियल फिल्म का संगीत दिया है तो वह इसी में है. इस फिल्म के गानों को जब भी मैं किसी को सुनाता हूं, हर आदमी एक नई पसंद लेकर आता है. अब मैं ऐसा भम्रित हो गया हूं कि अपनी पसंद तय नहीं कर पा रहा हूं. उसका मतलब यह है कि उसने सबकी पसंद का संगीत तौयार किया है. इस फिल्म का संगीत अगर लोकप्रिय हुआ तो बतौर संगीतकार विशाल के कैरिअर में एक नया मोड़ होगा.
-     फिल्म के गीत
0     गुलजार साहब के साथ काम करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. जिन्हें आप भगवान मानते हैं उनके साथ काम करना या उनके साथ लड़ना मुश्किल होता है. मैं इस चीज से कतराता हूं. मैं गुलजार साहब से कैसे कह सकता हूं कि कुछ गलत जा रहा है. मुझे डर लगता है. गुलजार साहब से मिलता हूं तो मेरी आवाज नहीं निकलती है. मेरी बोलती बंद हो जाती है. हालांकि एक सपना भी है उनके साथ काम करना. इस फिल्म में अलग गीत चाहिए था क्योंकि संगीत फिल्म का हिस्सा है. हमने कई संगीतकारों के साथ काम करने की कोशिश की. इस फिल्म को देखते हुए कुछ पता ही नहीं चलता कि गाने कब चले गए. हमेशा गाने फिल्म के कहानी को आगे ले जाते हैं. एक नया मोड़ देते हैं. इस फिल्म के गीतों के लिए कहानी और गीत के प्रसंग को समझना बहुत जरूरी है. विशाल अब्बास टायरवाला को लेकर आए. उसने पहला गाना लिखा तो मैंने कहा कि कहां थे अभी तक. उसका पहला गीत था 'चल पड़ी' मेरे लिए वह खोज के समान था. अब्बास को मैं इस फिल्म का अतिरिक्त लेखक मानता हूं. उसके गाने फिल्म के हिस्से हैं.
-     टॉकिंग पिक्चर्स
0     टॉकिंग पिक्चर्स हमने एक जरूरत के तौर पर स्थापित किया. यह फिल्म कोई और नहीं बना सकता था. दोस्तों ने मिलकर यह कंपनी शुरू की. हमलोग समान उद्देश्य से प्रेरित हैं. हम अच्छे लोगों के साथ अच्छी फिल्में बनाना चाहते हैं. हम अपनी फिल्मों में कुछ कहना चाहते हैं. हम फार्मूला फिल्मों के बीच अपनी फिल्में बनाना चाहते हैं और उस सफल भी देखना चाहते हैं. आजकल फिल्म बनाने के साथ-साथ उसकी मार्केटिंग, उसका प्रचार पूरी पेकेजिंग पर ध्यान देना पड़ता है. एक खास दृष्टि से हमलोग काम कर रहे हैं. 'दिल पे मत ले यार' सफल हो या न हो हमलोग इसी तरह से फिल्में बनाते रहेंगे.
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अजय तुली स्कूल में मेरे साथ थे. मैं जब से इस इंडस्ट्री में हूं तब से वह मेरा समर्थक और प्रशंसक रहा है. हमेशा मेरे साथ रहा है. हमेशा मेरी मदद करता रहा है. मेरे ऊपर उसका विश्वास था. अनीश से मैं मनोज बाजपेयी के जरिए मिला. हमलोग समान सोच के हैं. कभी-कभी अनीश की सोच समझ में नहीं आती. वह अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं. हमलोग शहरी होने के कारण इन चीजों से हमेशा दूर रहे हैं. हमें अपने जड़ों के बारे में अधिक पता नहीं है. हमें थोड़ा पता है. अजय को बिल्कुल पता नहीं है. अनीश ने आकर हमें संतुलित कर दिया. उसने मिट्टी और सोना में फर्क बताया. अनीश हमारे लिए पिता के समान है. हालांकि उनकी उम्र हमसे ज्यादा नहीं है.
-     नई योजनाएं?
0     नई योजनाओं पर अभी चर्चा करना जल्दबाजी होगी. इसके बाद हमलोग 'नेटुआ' बना रहे हैं. उसके बाद एक फिल्म सौरभ शुक्ला निर्देशित करेंगे. 'डाकू' इस साल के अंत तक दोनों शुरू हो जाएंगे. कनिका और विक्रम तुली हमारे लिए फिल्म निर्देशित करेंगे. हम फिल्म से पौसे कमाकर फिल्मों में डालनेवाले हैं. साल में चार-पांच अच्छी फिल्में बनाने की योजना है.
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आदित्य श्रीवास्तव का जिक्र मैं नहीं कर पाया वे इस फिल्म में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. वे उत्प्रेरक हैं. वह रामसरन के सपनों का उत्प्रेरक हैं. वह उसके पतन का भी कारण बनता है. आदित्य श्रीवास्तव ने हम सबको चौका दिया. उसे लोगों ने अभी तक 'सत्या' में इंस्पेक्टर खाडिलकर के रूप में देखा है. इस फिल्म के बाद उसे बहुत सारी फिल्में मिली. लेकिन सभी में पुलिस इंस्पेक्टर का ही रोल था. उसने सबको मना किया. इस फिल्म के जरिए लोगों को पता चलेगा कि आप अभिनेता को कभी इमेज में नहीं बांध सकते हैं. मेरे लिए वह फिल्म की खास बात है. सौरभ को भी देखकर आप चौकेंगे. मैं मानता हूं कि सौरभ अंतर्राष्टीय स्तर का अभिनेता है. वह भारत का डैनी दवितो है. और मनोज रॉवर्ट डिनोरा है. किशोर कदम मेरे पुराने प्रिय अभिनेता हैं. 'जयते' में मैंने उन्हें रखा था. परेश रावल की भूमिका मैंने उसे सौंपी थी. किशोर ने कभी कहा भी जो लोग मुझे वर्षो से जानते हैं उन्होंने कभी काम नहीं दिया. हंसल मुझे नहीं जानता मगर उसने हमेशा काम दिया. हमारे संबंध बन गए हैं. मेरे लिए किशोर ऐसी प्रतिभा है जिसका अभी उपयोग नहीं हुआ है. मैं उसे यही कहता हूं कि तुम शिक्षित अभिनेता हो लेकिन यह शिक्षा पर्दे पर नहीं दिखना चाहिए. वह कोशिश कर रहा है. किशोर कदम को कला फिल्मों का अभिनेता माना जाता है. उसने 'समर' किया उसने 'कल का आदमी' किया. इस फिल्म में वह इस छवि को तोड़ेगा.
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बाहर की फिल्मों की बातें चल रही है. अगर निर्देशक के तौर पर मुझे विकास करना है तो सिर्फ अपनी कंपनी के काम नहीं कर सकता. मुझे बाहर का काम करना होगा.














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