क्या अपनी फिल्में देखते हैं यश चोपड़ा?


-अजय ब्रह्मात्मज


फिल्म टशन की रिलीज और बॉक्स ऑफिस पर उसके बुरे हश्र के बाद यही सवाल उठ रहा है कि क्या यश चोपड़ा अपनी फिल्में देखते हैं? चूंकि वे स्वयं प्रतिष्ठित निर्देशक हैं और धूल का फूल से लेकर वीर जारा तक उन्होंने विभिन्न किस्म की सफल फिल्में दर्शकों को दी हैं, इसलिए माना जाता है कि वे भारतीय दर्शकों की रुचि अच्छी तरह समझते हैं। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि यशराज फिल्म्स की पांच फिल्मों में से चार औसत से नीचे और सिर्फ एक औसत या औसत से बेहतर फिल्म हो पा रही है। ऐसा तो नहीं हो सकता कि रिलीज के पहले ये फिल्में उनकी नजरों से नहीं गुजरी हों! क्या यश चोपड़ा की सहमति से इतनी बेकार फिल्में बन रही हैं?
नील एन निक्की, झूम बराबर झूम जैसी फिल्मों को देखकर कोई भी अनुभवी निर्देशक उनका भविष्य बता सकता है? खास कर यश चोपड़ा जैसे निर्देशक के लिए तो यह सामान्य बात है, क्योंकि पिछले 60 सालों में उन्होंने दर्शकों की बदलती रुचि के अनुकूल कामयाब फिल्में दी हैं। वीर जारा उनकी कमजोर फिल्म मानी जाती है, लेकिन टशन और झूम बराबर झूम के साथ उसे देखें, तो कहना पड़ेगा कि वह क्लासिक है।
दिल तो पागल है के समय यश चोपड़ा ने अपने बेटे के दबाव और प्रभाव में आकर अपनी शैली बदली। फिर भी हिंदी फिल्मों की पारंपरिक संवेदना यश चोपड़ा निर्देशित फिल्मों में बनी रही। यहां तक कि आदित्य की फिल्में भी नवीनता के आग्रह के बावजूद पारंपरिक ढांचे में ही बनी हैं। उनकी प्रस्तुति में आधुनिकता है। शिल्प पुराने अंदाज का ही है। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि आदित्य की देख-रेख में बनी फिल्म बेकार साबित हो रही हैं?
जबरदस्त प्रचार, सितारों की भीड़ और टशन टीम के अहंकार से लग रहा था कि यशराज फिल्म्स की नायाब फिल्म आ रही है। इस फिल्म के निर्देशक ने रिलीज से पहले मीडिया से कोई बात नहीं की और अब उनसे मीडिया यह पूछने के लिए भी तैयार नहीं है कि उन्होंने इतनी खराब फिल्म क्यों बनाई? यशराज फिल्म्स ने अपने हिसाब से मनोरंजन का महल खड़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन पहले ही दिन दर्शकों के पांव रखते यह महल ढह गया। फिल्म की इस नियति की कल्पना निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य, निर्माता आदित्य चोपड़ा और यश चोपड़ा ने नहीं की होगी।
अगर यशराज फिल्म्स से आ रही खबरों पर यकीन करें, तो फिल्मों के चुनाव और प्रस्तुति के मामले पर पिता यश चोपड़ा और पुत्र आदित्य के बीच लंबे समय से मनमुटाव चल रहा है। यश चोपड़ा की हर सलाह अनसुनी हो जाती है। यहां तक कि उनके सुझाए ऐक्टर और सब्जेक्ट भी आदित्य की टीम के लिए मायने नहीं रखते। उन पर विचार ही नहीं किया जाता। आदित्य यशराज फिल्म्स के क्रिएटिव कमांडर हैं। केवल उनके ही आदेश पर अमल होता है। यश चोपड़ा अपने प्रोडक्शन हाउस के सिग्नेचर मात्र रह गए हैं। न ही उनसे कुछ पूछा जाता है और न ही राय पर गौर किया जाता है।
दरअसल.., टशन की असफलता वह खतरे की घंटी है, जिसकी गूंज यशराज फिल्म्स के हर कोने में सुनाई पड़ी है। गहरा मंथन और विचार चल रहा है कि आखिर यशराज फिल्म्स किस प्रकार की फिल्में लेकर आए? इस साल रोडसाइड रोमियो एनिमेशन फिल्म और कुणाल कोहली की थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक रिलीज होगी। साल के अंत तक आदित्य चोपड़ा निर्देशित फिल्म रब ने बना दी जोड़ी आएगी। उम्मीद रखनी चाहिए कि आदित्य फिर से यशराज फिल्म्स को मनोरंजन की पटरी पर ले आएंगे, लेकिन अभी तो यशराज की गाड़ी पटरी से उतरी दिख रही है!

Comments

bhuvnesh sharma said…
ऐसे अहंकारी और फार्मूला सिनेमा मे डूबे रहने वाले चोपड़ाओं से क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है.
Anonymous said…
हा हा ............ क्या नाम रखा है अपने ब्लॉग का ........... चवन्नी छाप .................. मान गए :-)
mamta said…
ठीक फरमाया है आपने।

टशन देख कर यकीन नही हुआ कि यश राज बैनर की फ़िल्म है। जितनी घटिया फ़िल्म उतनी ही घटिया एक्टिंग ।

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