खबरों को लेकर मची जंग है रण-रामगोपाल

एक समय था कि राम गोपाल वर्मा की फैक्ट्री का स्टांप लगने मात्र से नए एक्टर, डायरेक्टर और टेक्नीशियन को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री और आईडेंटिटी मिल जाती थी। वे आज भी यही कर रहे हैं, लेकिन राम गोपाल वर्मा की आग के बाद उनकी क्रिएटिव लपटों में थोड़ा कम ताप महसूस किया जा रहा है। अपनी ताजा फिल्म रण में उन्होंने इलेक्ट्रानिक मीडिया के माहौल को समझने की कोशिश की है। वे इस फिल्म को महत्वपूर्ण मानते हैं और यह है भी-

[मीडिया पर फिल्म बनाने की बात कैसे सूझी?]

न्यूज चैनलों में आए विस्फोट के बाद से ही मेरी जिज्ञासा थी कि अचानक लोगों की रुचि समाचारों में बढ़ गयी है या फिर न्यूज चैनलों का अपना कोई स्वार्थ है? मैं इसे समझने की कोशिश में लगा था। दो साल पहले एक चैनल पर समाचार देखते हुए मुझे लगा कि अभी तो किसी भी रिपोर्ट को एडिट से विश्वसनीय बनाया जा सकता है। न्यूज मेकिंग लगभग फिल्म मेकिंग की तरह हो गयी है। वास्तविक तथ्यों और फुटेज को जोड़कर आप किसी भी घटना का फोकस बदल सकते हैं। सवाल है कि खबरें बनती हैं या बनायी जाती है? ऐसी बातों और घटनाओं ने मुझे रण बनाने के लिए प्रेरित किया।

[आपने फिल्म बनायी है, इसलिए इस स्थिति के कारणों पर भी गौर किया होगा। आप क्या सोचते और समझते हैं?]

वास्तव में चैनलों को 24 घंटे समाचार चाहिए। दूसरे सैकड़ों चैनलों से आपकी होड़ है। आपको लगातार दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींचना है। उसके लिए नाटक, लाउडनेस और एक्शन जरूरी है। यह आसान काम नहीं है। चैनलों के इस दबाव को समझने पर मीडियाकर्मियों से मेरी सहानुभूति है।

[क्या सचमुच मीडिया प्रभावित कर रहा है समाज को। क्या आप भी प्रभावित होते हैं?]

यह मीडिया का असर ही है कि मैं रण फिल्म बना रहा हूं। मीडिया जागरूकता बढ़ाने के काम आता है। यह संबंधित लोगों को सोचने पर विवश करता है। उन पर दबाव पड़ता है कि जब सारा देश इस मुद्दे को जानता है तो उन्हें कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। यह दबाव सरकार पर भी पड़ता है। मीडिया पर सरकारी नियंत्रण न होना अच्छी बात है। अगर नियंत्रण हो जाए तो वह समाज के लिए अधिक खतरनाक हो जाएगा। मेरा सवाल फिल्म में विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक रखते हैं कि 'तमाम सिस्टम हम बनाते हैं, तो मीडिया के सिस्टम में आई खराबी कौन दूर करेगा?' इस मामले में हम सभी को सोचना होगा।

['रण' के किरदारों को किस तरह तय किया? उन किरदारों को निभाने वाले कलाकारों के चुनाव के बारे में कुछ बताएं?]

मेरी कोशिश रही है कि मीडिया में प्रचलित सभी दृष्टिकोण फिल्म के किरदारों द्वारा अभिव्यक्त हों। अंबरीष और विजय हर्षव‌र्द्धन (अमिताभ बच्चन)विरोधी सोच के हैं। दूसरी तरफ मोहन पांडेय (परेश रावल) जैसे नेता हैं। आनंद प्रकाश त्रिपाठी (राजपाल यादव) जैसा किरदार है। पूरब शास्त्री (रीतेश देशमुख) और जय (सुदीप) हैं। इनके अलावा नंदिता शर्मा, नलिनी कश्यप, यास्मीन हुसैन और प्रिया मलिक हैं।

[इन सभी में किस ने आप को सरप्राइज किया?]

रीतेश और सुदीप ने चौंकाया। रीतेश को दर्शक इधर ज्यादा कामिक किरदारों में देखते रहे हैं। उनसे ऐसी गंभीर भूमिका की उम्मीद नहीं की होगी। सुदीप अच्छे परफॉर्मर हैं। वे अमिताभ बच्चन के बेटे की भूमिका निभा रहे हैं।

[अमिताभ बच्चन का उल्लेख नहीं कर रहे हैं आप?]

वे टेरिफिक रोल में हैं और उन्होंने उसे अचीव किया है। बच्चन बुरा काम करें तो आप चौंक सकते हैं। अमिताभ बच्चन ने अच्छा काम किया है ़ ़ ़ यह बहुत पुराना वाक्य हो गया है।




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