फिल्‍म समीक्षा : रण

मध्यवर्गीय मूल्यों की जीत है रण


-अजय ब्रह्मात्‍मज

राम गोपाल वर्मा उर्फ रामू की रण एक साथ पश्चाताप और तमाचे की तरह है, जो मीडिया केएक जिम्मेदार माध्यम की कमियों और अंतर्विरोधों को उजागर करती है। रामू समय-समय पर शहरी जीवन को प्रभावित कर रहे मुद्दों को अपनी फिल्म का विषय बनाते हैं। पिछले कुछ सालों से इलेक्ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव और उसमें फैल रहे भ्रष्टाचार पर विमर्श चल रहा है। रामू ने रण में उसी विमर्श को एकांगी तरीके से पेश किया है। फिल्म का निष्कर्ष है कि मीडिया मुनाफे के लोभ और टीआरपी के दबाव में भ्रष्ट होने को अभिशप्त है, लेकिन आखिर में विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक और पूरब शास्त्री के विवेक और ईमानदारी से सुधरने की संभावना बाकी दिखती है।

मुख्य रूप से इंडिया 24-7 चैनल के सरवाइवल का सवाल है। इसके मालिक और प्रमुख एंकर विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक अपनी जिम्मेदारी और मीडिया के महत्व को समझते हैं। सच्ची और वस्तुनिष्ठ खबरों में उनका यकीन है। उनके चैनल से निकला अंबरीष कक्कड़ एक नया चैनल आरंभ करता है और मसालेदार खबरों से जल्दी ही टाप पर पहुंच जाता है। विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक के बेटे जय मलिक की चिंता है कि टीआरपी की लड़ाई में कैसे चैनल को आगे लाया जाए? वह अपने उद्योगपति बहनोई नवीन और विरोधी पार्टी के नेता मोहन पांडे के साथ मिल कर खबरों की साजिश रचते हैं। बेटे के विश्वास में मलिक से खबर चल जाती है और सत्तापलट हो जाती है। मोहन पांडे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन जाते हैं। इंडिया 24-7 चैनल टाप पर आ जाता है। उद्योगपति नवीन को नए अनुबंध मिल जाते हैं। इन सब के बीच भ्रष्टाचार की इस जीत के आड़े आ जाता है मध्यवर्गीय मूल्यों और नैतिकताओं का पक्षधर पूरब शास्त्री।

रण वास्तव में मध्यवर्गीय नैतिकता और मूल्यों की प्रासंगिकता और विजय की कहानी है। भारतीय समाज में हर निर्णायक आंदोलन और अभियान में मध्यवर्ग की खास भूमिका रही है। भ्रष्ट हो रहे मीडिया तंत्र में आदर्शो और मूल्यों के साथ आए पूरब शास्त्री की हताशा ही विजय हर्षव‌र्द्धन मलिक को पश्चाताप और ग्लानि के लिए विवश करती है। अपने दर्शकों से किया विजय का अंतिम संवाद मीडिया की हकीकत को तार-तार कर देता है। मीडिया में आए भटकाव की वजहों को हम समझ पाते हैं।

लगता है कि रामू ने पहले फिल्म का क्लाइमेक्स और निष्कर्ष तय कर लिया था और फिर किरदारों और घटनाओं को उस निष्कर्ष के लिए जोड़ा गया है। इस जल्दबाजी में फिल्म की संरचना और पटकथा कमजोर पड़ गई है। मीडिया का तंत्र वैसा नहीं है, जो फिल्म में दिखाया गया है, लेकिन मीडिया के लक्ष्य, साधन, स्रोत और विचार को रामू ने सही तरीके से पिरोया है। थोड़े और रिसर्च और गंभीरता से काम लिया गया होता तो रण मीडिया के ऊपर बनी सार्थक फिल्म होती। अभी यह सतह को खरोंचती हुई निकल जाती है। गहरे उतरने पर च्यादा प्रदूषण, भष्टाचार और उसके कारण दिखाई पड़ते।

अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर साबित किया है कि अभिनय में भाव और भाषा का कैसे सुंदर उपयोग किया जा सकता है। कांपती उंगलियों की वजह से हथेलियां जुड़ नहीं पातीं। पश्चाताप की पीड़ा शब्दों में निकलती है और आंखें नम हो जाती हैं। फिल्म के अंतिम संवाद को अमिताभ बच्चन ने मर्मस्पर्शी बना दिया है। सुदीप ने जय मलिक के द्वंद्व को अच्छी तरह व्यक्त किया है, लेकिन क्या उन्हें हर तनाव के दृश्य में सिगरेट पीते दिखाना जरूरी था? मोहनिश बहल और राजपाल यादव की मौजूदगी उल्लेखनीय है। फिल्म में महिला पात्रों पर फोकस नहीं है, फिर भी नीतू चंद्रा और गुल पनाग अपने हिस्से का उचित निर्वाह करती हैं। क्लाइमेक्स में नीतू चंद्रा की बेबसी प्रभावित करती है।

पुन:श्च - अमेरिकी समाजशास्त्री और चिंतक नोम चोमस्की ने 1989 में पहली बार सहमति का निर्माण- मीडिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र व्याख्यान दिया था। बाद में 1992 में इसी पर एक डाक्यूमेंट्री - मैन्युफैक्चरिंग कंसेट नाम से बनी थी। रण के संदर्भ में ये लेख और फिल्म प्रासंगिक हैं।

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*** तीन स्टार

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Comments

मीडिया को लेकर जब भी आलोचकों ने लिखा,मीडिया में शामिल लोगों ने कहना शुरु किया कि ये जिनलोगों के विहाफ पर बात कर रहे हैं वो वैक्यूम में हैं। ये अपनी तरह से बात कर रहे हैं। ये आरोप रामू पर भी लगाने शुरु किए हैं। स्टार न्यूज ने आज रामू की भड़ास स्टोरीलाइन चलायी है। लेकिन इतना तो हमें मानना ही होगा कि इस फिल्म के जरिए बिखरे-बिखरे और टुकड़ों में फैले विचारों को एक अवधारणा की शक्ल देने की कोशिश की गयी है। अब ये कितनी सही और कितना जरुरी है,ये अलग से बहस का विष्य है।..
बहुत अच्‍छी जानकारी। धन्‍यवाद।

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