दरअसल : जरूरी है यह चेतावनी


-अजय ब्रह्मात्मज
    इन दिनों देश भर के सिनेमाघरों में फिल्म आरंभ होने के पहले वैधानिक चेतावनी आती है। इस चेतावनी में बताया जाता है कि तंबाकू सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस से कर्क रोग (कैंसर) हो सकता है। साथ में एक कैंसर रोगी का फुटेज भी दिखाया जाता है। बताया जाता है कि वह बच नहीं सका। इसके साथ ही प्रदर्शित फिल्म मेंजहां भी कोई किरदार सिगरेट पीने या तंबाकू सेवन करते नजर आता है, वहां पर्दे पर यही वैधानिक चेतावनी लिखी हुई नजर आती है। फिल्म में इस चेतावनी की अपरिहार्यता से फिल्मकार खुश नहीं हैं। मैंने फिल्मों के प्रिव्यू शो में देखा है कि क्रिटिक भी इस चेतावनी पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। सही-सही नहीं मालूम कि दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया होती है? शायद उन्हें भी अच्छा नहीं लगता हो।
    दबे स्वर में फिल्मकार इसके खिलाफ फुसफुसाते रहे हैं। उन्हें लगता है कि इस चेतावनी से फिल्म का मजा खराब होता है। दृश्य का प्रभाव कम होता है। उन्हें इस चेतावनी के साथ दिखाई जाने वाली फिल्म पर भी आपत्ति है कि वह अप्रिय और असुंदर है। उनकी राय में अधिक संवेदनशील और सुंदर चेतावनी फिल्म बनायी जा सकती है। आपत्ति के बावजूद अभी तक फिल्म इंडस्ट्री ने कोई विकल्प नहीं दिया है। क्रिएटिव व्यक्तियों की जमात को शिकायत है, लेकिन निदान नहीं है। उनमें से कोई एक प्रभावशाली फिल्म बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है। ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ के समय एक निष्फल कोशिश हो पाई है।
    हाल ही में हालीवुड के फिल्मकार वुडी एलेन ने इस वैधानिक चेतावनी की वजह से अपनी फिल्म ‘ब्लू जैस्मीन’ वापस ले ली। उन्हें भारत सरकार की वैधानिक चेतावनी पसंद नहीं थी। उन्होंने अपनी फिल्म भारत में प्रदर्शित नहीं होने दी। वुडी एलेन के इस फैसले का देश के कई फिल्मकार ने सराहा और तालियां बजाईं। तालियां बजाने और गालियां देने का काम आजकल ट्विटर से होता है। अगर किसी से सहमति या नाराजगी हो तो लोग समर्थन या विरोध में ट्विट करने लगते हैं। ऐसा लगा कि वुडी एलेन ने सभी के आहत मन को सहला दिया और उन्हें अभिव्यक्ति दे दी। अफसोस है कि भारतीय फिल्मकारों ने इस वैधानिक चेतावनी के भारतीय संदर्भ और महत्व पर ढंग से ध्यान नहीं दिया।
    तंबाकू सेवन और सिगरेट पीने का शौक किसी भी महामारी से अधिक तेजी से फैल रहा है। हर साल इसकी वजह से लाखों व्यक्ति कैंसर की चपेट में आते हैं और उनमें से अधिकांश अपनी जिंदगी गंवा बैठते हैं। सिगरेट के डब्बों और खैनी की पुडिय़ा पर भी यह वैधानिक चेतावनी लिखी रहती है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि अगर सरकार को आम नागरिक के सेहत की इतनी चिंता है तो सिगरेट की बिक्री पर रोक लगा दी जानी चाहिए। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। इस अति के अलावा भी तो उपाय हो सकते हैं। सरकार की अपनी मजबूरियां और सिगरेट कंपनियों की लॉबिंग भी कारण हो सकती हैं। बेहतर तो यही होगा कि सिगरेट और तंबाकू पर पूर्ण प्रतिबंध लग जाए। तंबाकू सेवन के लंबे निजी अनुभव और दुष्प्रभाव के बाद यह लिख रहा हूं।
    वुडी एलेन के फैसले और भारतीय फिल्मकारों के समर्थन के प्रसंग में टाटा कैंसर हॉस्पिटल के कैंसर सर्जन पंकज चतुर्वेदी ने उन्हें एक खुला पत्र लिखा है। वुडी एलेन को संबोधित इस पत्र में उन्होंने दस पाइंट दिए हैं। सबसे पहले उन्होंने वुडी की सराहना की है कि उनकी फिल्म भारत में रिलीज नहीं हो रही है। रिलीज होती तो सिगरेट पीने वालों की संख्या में और कुछ हजार जुड़ जाते। उन्होंने वैधानिक चेतावनी के पक्ष में तर्क दिए हैं। लंबी बहसों के बाद इस फैसले पर सभी सहमत हो सके हैं। भारत जैसे अद्र्धशिक्षित देश में यह बहुत जरूरी है, क्योंकि सिनेमा एक सस्ता मनोरंजक माध्यम है। देश के अधिकांश नागरिक सिनेमा के सक्रिय दर्शक हैं। वे फिल्मों से प्रभावित होकर सिगरेट पीना आरंभ करते हैं। जवानी की दहलीज पर खड़े मेरे जैसे अनेक युवक होंगे जो फिल्मों के किरदार से प्रेरित होकर उंगलियों के बीच सिगरेट फंसाते हैं। ‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाने’ का संदेश हमारी फिल्मों ने ही दिया है। भारत में फिल्म स्टार किसी देवी-देवता से कम महत्व नहीं रखते। दर्शक उनके किरदारों से एक रिश्ता बनाते हैं और अपनी जिंदगी में उन्हें उतारने की कोशिश करते हैं। यह कुतर्क बेमानी है कि सिनेमा अच्छी बातें और अच्छे किरदार भी तो दिखाता है, उन से समाज क्यों नहीं प्रभावित होता?
    मेरी राय में फिल्मों में तंबाकू सेवन से संबंधित वैधानिक चेतावनी अवश्य चलनी चाहिए। मुंबई में यह चेतावनी दृश्यों में अंग्रेजी में लिखी आती है। अगर यह हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में भी आती है तो ठीक है। अन्यथा भारतीय भाषाओं मे यथाशीघ्र यह चेतावनी लिखी जानी चाहिए। तंबाकू सेवन से होने वाले कैंसर से बचा सकता है। फिर क्यों न हम बचाव के कदम उठाएं। कहते हैं इलाज से बेहतर परहेज होता है। यह परहेज व्यक्ति और देश की जिंदगी के लिए जरूरी है।

Comments

saurabh bhatt said…
जी हाँ ये चेतावनी चलानी चाहिए हर फिल्म से पहले और बीच में भी जहाँ पर ऐसे दृश्य हो। फिल्मकार इसे अपनी रचनात्मक स्वतंत्र ता में बाधक माने तो मानें।

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