दरअसल : बिमल राय

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बिमल राय
    पिछली सदी के छठे-सातवें दशक को हिंदी फिल्मों का स्वर्ण युग माना जाता है। स्वर्ण युग में के आसिफ, महबूब खान,राज कपूर,वी शांताराम और गुरूदत्त जैसे दिग्गज फिल्मकारों के साथ बिमल राय का भी नाम लिया जाता है। बिमल राय ने कोलकाता के न्यू थिएटर के साथ फिल्मी करिअर आरंभ किया। वहां वे बतौर फोटोग्राफर और कैमरामैन फिल्मों के निर्माण में सहयोग देते रहे। पीसी बरुआ और नितिन बोस के सान्निध्य में वे फिल्म निर्माण से परिचित हुए और निजी अभ्यास से निर्देशन में निष्णात हुए। बंगाल में रहते हुए उन्होंने बंगाली फिल्म ‘उदयेर पाथे’ का निर्देशन किया। बाद में यही फिल्म हिंदी में ‘हमराही’ नाम से बनी थी। फिल्म का नायक लेखक था,जो अपने शोषण के खिलाफ जूझता है। फिल्मों में सामाजिक यथार्थ और किरदारों के वास्तविक चित्रण का यह आरंभिक दौर था।
    इस समय तक बंगाल विभाजन के प्रभाव में कोलकाता की फिल्म इंडस्ट्री टूट चुकी थी। आजादी के बाद लाहौर के पाकिस्तान में रह जाने और कोलकाता में फिल्म निर्माण कम होने से मुंबई में निर्माता-निर्देशको की जमघट और गतिविधियां बढ़ रही थीं। लाहौर से विस्थापित पंजाबी मूल के फिल्मकारों ने मुंबई को मुफीद समझा। बेहतर संभावनाओं की तलाश में बंगाल समेत देश के सभी राज्यों से विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाएं मुंबई कूच कर रही थीं। इसी दौर में अशोक कुमार ने बिमल राय को मुंबई आने और बांबे टाकीज के साथ काम करने का निमंत्रण दिया। मुंबई आने के पश्चात बिमल राय ने ‘मां’ का निर्देशन किया। इसमें भारत भूषण और लीला चिटणीस मुख्य भूमिकाओं में थे। बांबे टाकीज इस समय तक खस्ता हाल हो चुका था। चूंकि बिमल राय का अशोक कुमार ने ही मुंबई बुलाया था,इसलिए उन्होंने उनकी अगली फिल्म के निर्माण की जिम्मेदारी स्वयं ले ली। अशोक कुमार और मीना कुमारी के साथ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर बिमल राय ने इस फिल्म का निर्माण किया। इसमें भी बिमल राय ने यथार्थवादी शैली रखी। दशकों बाद प्रदीप सरकार ने ‘परिणीता’ के रिमेक में विद्या बालन को मौका दिया।
    इस समय तक बिमल राय का आत्मविश्वास काफी बढ़ चुका था। भारत में पहली बार आयेजित इंटरनेयानल फिल्म फेस्टिवल में इटली की यथार्थवादी फिल्में देख कर अनेक फिल्मकार प्रभावित हुए। उनमें सत्यजित राय और बिमल राय प्रमुख थे। बिमल राय ने दोस्तों के मना करने पर भी अपनी प्रोडक्शन कंपनी स्थापित की और ‘दो बीघा जमीन’ का निर्माण आरंभ किया। इस फिल्म की कहानी मशहूर संगीतकार सलिल चौधरी ने लिखी थी। फिल्म में उन्हीं का संगीत था। फिल्म की पटकथा और संपादन की जिम्मेदारी हृषिकेष मुखर्जी ने संभाली थीं। बलराज साहनी और निरुपा राय अभिनीत ‘दो बीघा जमीन’ आजादी के तुरंत अपनी जमीन से बेदखल होते किसान की व्यथा कथा है। गांव से विस्थापित होकर शहर आ रहे किसान आजीविका के चक्र में फंस कर किस दुखांत जिंदगी की ओर अग्रसर रहे हैं? बिमल राय ने किरदार,परिवेश और तत्कालीन स्थितियों को वास्तविक और विश्वसनीय तरीके से चित्रित किया था। ‘दो बीघा जमीन’ अपनी वास्तविकता के कारण सोवियत संघ और चीन में बेहद पसंद की गई थी। इस फिल्म की इंटरनेशनल ख्याति ने सभी को विस्मित कर दिया था।
    बिमल राय की 109वीं वर्षगांठ पर मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय में 7 जुलाई से एक प्रदर्शनी लगी है। पहली बार किसी फिल्मकार के कृतित्व और जीवन पर ऐसी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। इस प्रदर्शनी में बिमल राय की फिल्मों से संबंधित दुर्लभ सामग्रियां प्रदर्शित की जा रही हैं। बिमल राय की बेटी रिंकी राय भट्टाचार्य ने इस प्रदर्शनी के लिए दुर्लभ सामग्रियां मुहैया करवाई हैं। भारतीय सिनेमा के सौ साल हो गए। हर साल सैकड़ों फिल्में भी बनती हैं। उनसे हजारों करोड़ों की कमाई होती है। इन उपलब्धियों बावजूद फिल्मों और फिल्मकारों के लिए अभी तक देश में कोई म्यूजियम नहीं है। पुरानी फिल्मी हस्तियों से संबंधित सामग्रियां उचित रखरखाव के अभाव और उनके वंशजों की लापरवाही से बर्बाद हो रही हैं। भारत सरकार इस दिशा में पहल करे तो उसे फिल्म इंडस्ट्री और फिल्मप्रमियों का सहयोग मिल सकता है।
 (क्रमश:)


Comments

sanjeev5 said…
विमल रॉय के संग्रहालय में रखी कुछ वस्तुयों के चित्र तो आप प्रकाशित कर ही सकते थे. जो लोग मुंबई में नहीं रहते कम से कम वो भी तो ये देख पाते कि विमल दा कैसे कार्य करते थे?

धन्यवाद

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