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Thursday, August 16, 2018

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते 

सत्य की जीत 
-अजय ब्रह्मात्मज

शब्दों को ढंग से संवाद में पिरोया जाये तो उनसे निकली ध्वनि सिनेमाघर में ताली बन जाती है.मिलाप मिलन जावेरी की फिल्म 'सत्यमेव जयते' देखते समय यह एहसास होता है कि लेखक की मंशा संवादों से तालियाँ बटोरने की है.मिलाप को 10 में से 5 मौकों पर सफलता मिलती है.

पिछले दिनों एक निर्देशक बता रहे थे कि हिंदी फिल्मों के संवादों से हिंदीपन गायब हो गया है.लेखकों से मांग रहती  है कि वे संवादों में आम बोलचाल की भाषा लिखें.कुछ फिल्मों के लिए यह मांग उचित हो सकती है,लेकिन फिल्में इक किस्म का ड्रामा हैं.उनके किरदार अगर अडोस-पड़ोस के नहीं हैं तो संवादों में नाटकीयता रखने में क्या हर्ज है. 'सत्यमेव जयते' संवादों के साथ ही चरित्र चित्रण और प्रस्तुति में भी नौवें दशक की याद दिलाती है. यह वह समय था,जब खानत्रयी का हिंदी सिनेमा के परदे पर उदय नहीं हुआ था और हिंदी सिनेमा घिसी-पिटी एकरसता से गर्त में जा रही थी. इस फिल्म के प्रीव्यू शो से निकलती एक फिल्म पत्रकार की टिपण्णी थी - बचपन याद आ गया.

'सत्यमेव जयते' हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा की दशकों पुराणी तलछट पर बचे कर्कटों को जुटा कर बनायी गयी फिल्म है.इस फिल्म को देखना किसी नॉसटेलजिक फीलिंग से भर जाना है.थोड़े उम्रदराज दर्शकों को यह उनकी किशोरावस्था और जवानी के दिनों में ले जाएगी तो मिलेनिअल पीढ़ी को पुराने स्वाद से परिचित कराएगी. वे अपने दोस्तों के साथ इस फिल्म का मजाक उड़ाते हुए भी मज़े ले सकते हैं.फिल्म का शिल्प इतना साधारण है कि वह रस देने लगता है.

फिल्म में कानून के साथ और कानून अपने हाथ में लेकर चलने वाले दो किरदार हैं. दोनों आमने-सामने हैं.हम किसी एक को विलेन भी नहीं कह सकते.फिल्म की टैग लाइन 'बेईमान पिटेगा,भ्रष्टाचार मिटेगा' के अनुसार दोनों का मकसद एक ही है लेकिन उनके रास्ते अलग हैं.फिल्म रोचक तरीके से आगे बढती है.लेखक ने दोनों प्रमुख किरदारों की तनातनी को अलग अंदाज में पेश भी किया है,लेकिन जैसे ही उनके रिश्ते की जानकारी मिलती है...कहानी कमज़ोर पड़ जाती है. उसके बाद की कहानी के मोड़ दर्शक भी लिख सकते हैं.हां,यह फिल्म इतनी प्रेडिक्टेबल है. फिर भी दर्शक बंधे हुए बैठे रहेंगे,क्योंकि उनके सामने परदे पर अभिनेता मनोज बाजपेयी हैं.वे अपनी अदाकारी से हिलने नहीं देते.

कई दृश्यों में निर्देशक यूँ लिप्त हुए हैं कि सीन का उद्देश्य पूरा होने के बाद भी कैमरा बंद नहीं करते,उधर दर्शक को होने लगता है कि अब हो न गया...हम समझ गए,अगले सीन पर चलो..और एक्टर को उस सीन में हर कुछ सेकंड के बाद पूरी ऊर्जा से इमोशन के अगले पायदान पर चढ़ना होता है.थक गए होंगे मनोज बाजपेयी. इस फिल्म में  'शूल' के समर प्रताप सिंह की भी याद आती है.

अब तो जॉन अब्राहम भी एक्टिंग करते दिखने लगे हैं. 

अच्छा एक सवाल है कि हिंदी फिल्मों के ईमानदार पुलिस अधिकारी राठोड़ या प्रताप सिंह ही क्यों होते हैं? क्या उस सरनेम से ईमानदारी टपकती है,जो चौधरी,यादव या पासवान सरनेम रखने से नहीं टपकेगी?

अवधि 140 मिनट 
*** तीन स्टार 

1 comment:

मन मलंगा said...

हा ज वो तो गंगाजल का मंगनी राम या लगान का कचरा ही होगा😊 । jokes apart ,Moral value and ethics are the duty generally uphold by middle class Upper caste ,so depiction is very true