Search This Blog

Tuesday, June 30, 2009

दो तस्वीरें:माई नेम इज खान में काजोल और शाहरुख़




यह फ़िल्म अभी बन रही है.करण जौहर अपने कलाकारों के साथ अमेरिका में इस फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं.मन जा रहा है की करण पहली बार अपनी ज़मीन से अलग जाकर कुछ कर रहे हैं.हमें उम्मीद है कि काजोल और शाहरुख़ के साथ वे कुछ नया करेंगे...

Monday, June 29, 2009

हिन्दी टाकीज:तीन घंटे की फ़िल्म का नशा तीस दिनों तक रहता था-दुर्गेश उपाध्याय


हिन्दी टाकीज-४१

दुर्गेश में गंवई सहजता है। मालूम नहीं उन्होंने कैसे इसे बचा लिया है? बातचीत में हमेशा हँसी की चाशनी रहती है और चवन्नी ने कभी किसी की बुराई नहीं सुनी उनसे.ईर्ष्या होती है उनकी सादगी से...उनका परिचय उनके ही शब्दों में...नाम दुर्गेश उपाध्याय, पेशा- बीबीसी पत्रकार,मुंबई में कार्यरत..पढ़ाई लिखाई कुछ गांव में बाकी की लखनऊ में..लखनऊ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर्स ..कैरिएर की शुरुआत मुंबई में की और पिछले कुछ सालों से फिल्मी और राजनैतिक पत्रकारिता में सक्रिय हैं..अच्छा खाना,बौद्दिक लोगों के साथ उठना बैठना,फिल्में देखना और पढ़ना खास शौक हैं..व्यक्तिगत तौर पर काफी भावुक हैं और गूढ विषयों जैसे ईश्वर का अस्तित्व,मानव विकास का इतिहास में गहरी दिलचस्पी,ओशो को पढ़ना पसंद है...
मेरा मानना है कि अपनी कहानी कहना हमेशा थोड़ा कठिन काम होता है।आपको लगता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया॥फिल्मी दुनिया में रिपोर्टिंग का मेरा अनुभव भले ही ज्यादा ना हो लेकिन इस दौरान काफी दिलचस्प अनुभव हुए हैं..मसलन अमिताभ बच्चन के साथ इंटरव्यू और बिना चिप लगी मशीन से प्रीति जिंटा का आधा इंटरव्यू करना और बाद में शर्मिंदगी झेलना..चलिए एक छोटी कोशिश करता हूं याद करने की...फिल्मों में अपने शौक की बात करुं तो ठीक से याद तो नहीं है लेकिन इतना कह सकता हूं कि जब से खुद को जाना है तब से फिल्मों की तरफ जबरदस्त रुझान है..मुझे अभी भी याद है कि किस तरह से पहली बार मैंने वीडियो पर नगीना फिल्म देखी थी और उसमें श्रीदेवी का वो नागिन बनना,आज भी जब वो दृश्य याद आता है तो मन में विचित्र तरह का भाव उभरता है..हम उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले से आते हैं.वहां पर एक गांव है शेरपुर कलां.काफी नामी गांव है,इलाके में ही नहीं पूरे जिले में लोग इस गांव से परिचित हैं.वहीं पर मेरा जन्म हुआ..मेरे बाबा (दादा जी) और आजी ( दादी) वहीं पर रहते थे.मेरे पिता जी की नौकरी लखनऊ में होने की वजह से हमें गर्मियों की छुट्टियों में शहर आने का मौका मिलता था.
नब्बे के दशक की शुरुआत में टीवी ने गांवों की तरफ भी रुख करना शुरु कर दिया था।हमारे मोहल्ले में भी टीवी आया.उन दिनों टीवी के साथ एंटिना लगाने अनिवार्य होता था ताकि पिक्चर साफ आए.मुझे याद है कि किस तरह से हमारे एक पड़ोसी के घर जब बुश का छोटा टीवी सेट आया था और हम बांस की लंबी बल्ली में एंटिना टांगने के लिए मार पसीने से लथपथ हो गए थे.आखिरकार हम लंबी बल्ली में एंटिना टांगने में कामयाब रहे ये अलग बात है कि पिक्चर फिर भी साफ नहीं हो पायी॥
उन दिनों एक ही चैनल दूरदर्शन आया करता था और रविवार के दिन शाम को एक फिल्म आती थी॥हम सारे मोहल्ले के बच्चे जिनमें मेरे भाई बहन भी शामिल थे पूरे हफ्ते उस फिल्म का इंतजार करते थे..और आपको तो पता ही है गांवों में बिजली का हाल..फिल्म के बीच में जैसे ही लाइट जाती थी तो लगता था मानो किसी ने प्राण हर लिए हों..मैं तब छोटा था और सोचता था ये कौन है जो लाइट काटता है,अगर मुझे मिल जाए तो साले की गर्दन मरोड़ दूं।हमारे मोहल्ले में एक नंद कुमार नाम के व्यक्ति थे,बड़े ही बातूनी..हांलाकि पढ़े लिखे सज्जन थे लेकिन अगर एक बार बोलना शुरु कर दें तो अच्छे अच्छों को पानी पिला दें..उन्होंने अपनी पढ़ाई बीएचयू यानि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से की थी और जनाब ने पढ़ाई के दौरान काफी फिल्में देखीं हुईं थी,वो अक्सर उन फिल्मों का जिक्र किया करते थे..उनमें से प्रमुख थी नील कमल और गाइड,,उन्हें इन फिल्मों के एक एक सीन बखूबी याद थे..जब वो वहीदा रहमान और देवानंद के बारे में चर्चा करना शुरु करते थे तो यकीन जानिए हमें भी लगता था कि कौन सा ऐसा दिन होगा जब हमें सितारों के दर्शन होंगे..नंद कुमार जी गाते भी थे,अब कैसा गाते थे ये नाही पूछिए तो बेहतर है..खैर,फिल्मों में मेरी दिलचस्पी वहीं से होनी शुरु हुई थी..
टीवी पर हमने काफी फिल्में देखीं।फिल्म देखने के लिए हमें जमीन पर और कई बार तो गंदगी के बीच बैठने में भी कोई ऐतराज नहीं होता था॥जब भी कोई हीरो या हिरोईन फिल्मों में गाना गाते थै तो हमें लगता था कि मैं भी बिल्कुल उसी अंदाज में कुछ कर रहा हूं.तीन घंटे की फिल्म देखने के बाद नशा तीस दिन तक रहता था..सन 1987 में मेरे लखनऊ वाले सरकारी मकान में पिता जी छोटा टीवी का सेट खरीद कर लाए थे उनदिनों रामायण आया करती थी,रविवार की सुबह नौ बजे ही हम नहा धोकर पूरा परिवार ये सीरियल देखता था,और बीच में मेरी मां खाने का भी इंतजाम कर देतीं थीं..वैसे यहां ये भी बता दूं कि फिल्मों में मेरी रूचि के पीछे मूल कारण मेरी मां ही रही हैं,उन्हें फिल्मों का जबरदस्त शौक रहा है और आज भी वो कोई भी फिल्म बड़े चाव से देखती हैं,हां ये बात अलग है कि बाद में इन फिल्मों में दिखाई जा रहे अंग प्रदर्शन को लेकर अपने गुस्से का इज़हार भी करती हैं
बचपन में ही मुझे मेरा दोस्त मिला॥हमारे गांव के बाहर एक स्कूल है जिसका नाम है निराला विद्या मंदिर..कक्षा 8 तक की पढ़ाई वहीं पर हुई..वहीं कक्षा 2 में मेरी दोस्ती उपेंद्र नाम के एक लड़के से हुई..वो भी अपने तरह का बिंदास लड़का था जिस पर क्लास की कुछ लड़कियां लट्टू थीं और गाना भी बेहतरीन गाता था..खूबसूरत था उसके होंठ बिल्कुल लाल थे,और पढ़ने में भी अच्छा था..उपेंद्र से मेरी जल्दी ही बनने लगी और मुझे याद है पहली बार वो मेरे घर बेर खाने के लिए आया था..मेरे घर के पिछवाड़े बेर का पेड़ था और उसे मैंने घर पर इसीलिए बुलाया था..फिर धीरे धीरे हमारी दोस्ती काफी गहरी होती गई..हम दोनों की दोस्ती के गहराने के पीछे एक मजबूत वजह जो बनी वो था मेरा फिल्मी ज्ञान..गर्मी की छुट्टियों में जब मैं लखनऊ जाता था और ढेर सारी फिल्में देखकर आता था तो क्लास के दौरान ही मैँ अपने कुछ दोस्तों का फिल्मों की कहानियां और डॉयलाग्स सुनाता था और वो मुझसे काफी प्रभावित रहते थे..वैसे मेरी क्लास में कुछ ऐसे भी लड़के थे जिन्हें फिल्मों में इतनी दिलचस्पी थी कि आसपास के इलाके में कहीं भी वीडियो आ जाए वो वहां पहुंचते ही पहुंचते थे..संदीप और लक्ष्मण का नाम मैं यहां लेना चाहूंगा..दोनों का ही जवाब नहीं था..वैसे उपेंद्र भी इसमें पीछे नहीं रहता था और कई बार तो मैं भी रात के अंधेरे में वीडियो देखने जाता था..मैं आपको बता नहीं सकता उस एहसास के बारे में जब वीडियो शुरु होता था और उसमें झिलमिल आवाजें आनी शुरु होंती थीं हम उत्साह से भर जाते थे..उपेंद्र की चर्चा थोड़ी और..उन दिनों फिल्मों के डॉयलाग्स की किताबें भी खूब बिकती थीं..उपेंद्र के पास इन किताबों का पिटारा था..उसका एक चेला था जिसका नाम था पेठा..जैसा नाम वैसा काम..पेठा जी,उपेंद्र के भक्त थे और उनके इशारे पर किताबों को इधर से उधर पहुंचाते थे..और कई बार लड़कियों की चिट्ठियां भी..हम क्लास में लड़कियों पर रुआब झाड़ने के लिए फिल्मी गाने भी खूब गाते थे..लेकिन मेरी छवि थोड़ी सी अलग थी और दुर्भाग्य से किसी लड़की का दिल मुझपे नहीं आ सका...लेकिन मेरा दोस्त लकी रहा...खैर,मुझे ये सौभाग्य हासिल था कि मैं इन किताबों को घर भी पढ़ने के लिए ले जाता था..क्लास में भी सबको पता था कि दुर्गेश और उपेंद्र की जमती है इसीलिए सब मेरी इज्जत भी करते थे क्यों कि उपेंद्र किसी को पीटने में जरा भी वक्त नहीं लगाता था और अकेला मैं ही था जिसकी किसी बात का वो बुरा नहीं मानता था..उसने मेरा हमेशा ख्याल रखा...और मेरे लिए भी वो हमेशा खास रहा..और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हमने कक्षा 2 से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई एक साथ की और आज भी तमाम थपेड़ों को सहते हुए हमारा रिश्ता बदस्तूर जारी है..हां इतना जरूर है कि समय के साथ साथ इसमें परिपक्वता जरुर आ गई है..लेकिन एक दूसरे से दोस्ती और लगाव उतना ही है...
नब्बे का दशक ऐसा रहा है जिसमें कई ऐसी फिल्में आईं जिनका संगीत लाजववाब था।खासकर ऐसी फिल्में जिनमें नदीम श्रवण का संगीत हो॥आशिकी,साजन वगैरह और कई नाम हैं लेकिन अभी ज़ेहन में नाम नहीं आरहा है.हमने ये सारी फिल्में वीडियो पर देखीं और आज भी जब ये फिल्में या इनका कोई गाना कहीं सुनाई देता है तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं...संजय दत्त को मैं उन्हीं दिनों से काफी पसंद करता हूं..उनकी फिल्में साजन,आतिश,खलनायक वगैरह ने दिमाग पर काफी असर छोड़ा..आज जब इन सितारों को नजदीक से मिलने और जानने का मौका मिला तो हंसी आती है अपनी उन दिनों के सोच पर..
वक्त के साथ सिनेमा बदल गया है॥लोगों का नजरिया बदल गया है,लेकिन एक बात जो नहीं बदली है वो फिल्मों की तरफ मेरा रुझान..बढ़ते हुए दिनों की तरह ही फिल्मों की तरफ मेरा झुकाव भी बढ़ता ही जा रहा है..
पसंदीदा फिल्में 11
1.नगीना
२.साजन
३.आशिकी
४.खलनायक
५.राम लखन
६.तारे ज़मीन पर
७.जो जीता वो ही सिकंदर
८.बाजीगर
९.दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे
१०.हम आपके हैं कौन
5

Saturday, June 27, 2009

फ़िल्म समीक्षा:न्यूयार्क

-अजय ब्रह्मात्मज
कबीर खान सजग फिल्मकार हैं। पहले काबुल एक्सप्रेस और अब न्यूयार्क में उन्होंने आतंकवाद के प्रभाव और पृष्ठभूमि में कुछ व्यक्तियों की कथा बुनी है। हर बड़ी घटना-दुर्घटना कुछ व्यक्तियों की जिंदगी को गहरे रूप में प्रभावित करती है। न्यूयार्क में 9/11 की पृष्ठभूमि और घटना है। इस हादसे की पृष्ठभूमि में हम कुछ किरदारों की बदलती जिंदगी की मुश्किलों को देखते हैं।
उमर (नील नितिन मुकेश) पहली बार न्यूयार्क पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात पहले माया (कैटरीना कैफ) और फिर सैम (जान अब्राहम) से होती है। तीनों की दोस्ती में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। उमर को लगता है कि माया उससे प्रेम करती है, जबकि माया का प्रेम सैम के प्रति जाहिर होता है। हिंदी फिल्मों की ऐसी स्थितियों में दूसरा हीरो त्याग की मूर्ति बन जाता है। यहां भी वही होता है, लेकिन बीच में थोड़ा एक्शन और आतंकवाद आता है। आतंकवाद की वजह से फिल्म का निर्वाह बदल जाता है। स्पष्ट है कि उमर और सैम यानी समीर मजहब से मुसलमान हैं। उन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को शक होता है। कहते हैं 9/11 के बाद अमेरिका में 1,200 मुसलमानों को शक के घेरे में लिया गया। समीर उनमें से एक है। नौ महीने की हिरासत में पुलिस यातना सहने के बाद वह मुक्त होता है तो उसके दिल में एफबीआई के लिए घोर नफरत है। एफबीआई को उस पर फिर से शक है, लेकिन इस बार वह समीर के दोस्त उमर को अपना एजेंट बना लेती है। पक्के सुबूत के लिए उमर का इस्तेमाल किया जाता है। एफबीआई में मुसलमान अधिकारी रोशन है, जो 9/11 के बाद मुसलमानों के प्रति फैले रोष और संदेह को मिटाना चाहता है। उसका मानना है कि इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा।
दोस्ती, प्यार, रिश्ते और इज्जत जैसी भावनाओं को घोल कर न्यूयार्क तैयार की गई है। ऊपरी तौर पर रियलिस्टक और हार्ड हिटिंग लग रही यह फिल्म हिंदी फिल्मों के फार्मूले से बाहर नहीं निकल पाती। कबीर खान कहीं न कहीं यशराज फिल्म्स के प्रचलित ढांचे में खुद को ढालते नजर आते हैं। प्रसंग और स्थितियां वास्तविक होने के बावजूद गहराई से इसलिए नहीं छू पातीं क्योंकि उनमें बनावटीपन दिखाई पड़ता है। कबीर की छटपटाहट दिखाई पड़ती है। वह प्रचलित ढांचे से बार-बार निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी कोशिशों को कतर दिया जा रहा है।
कबीर खान ने अमेरिकी समाज के सोच और राजनीति की आलोचना की है, लेकिन उस धारणा को ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी समाज में हर नागरिक को मौलिक स्वतंत्रता हासिल है। 9/11 के बाद भी आतंकवाद के संदेह में आए मुसलमान व्यक्तियों का मामला एक मुसलमान अधिकारी को सौंपा जाता है। एक मुसलमान, आतंकवादी के बेटे को अमेरिकी समाज अपना हीरो बनाने को तैयार है। अमेरिका के इस स्वच्छ, लोकतांत्रिक और आदर्शवादी सोच को लेकर कई सवाल मन में उठते हैं। न्यूयार्क अमेरिका के प्रति भरोसा रखने और जगाने का प्रयास करती है।
कलाकारों की बात करें तो पहली बार ग्लैमरहीन भूमिका में कैटरीना कैफ दिखी हैं। कुछ दृश्यों में वे जंचती हैं तो कुछ में संघर्ष करती नजर आती हैं। कबीर खान ने माया की भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की रखी है। वह कारक नहीं है। फिल्म मुख्य रूप से नील नितिन मुकेश, जान अब्राहम और इरफान खान की है। इरफान दिए गए दृश्यों में ही अभिनय के पल चुरा लेते हैं। हां, नील नितिन मुकेश फिर से साबित करते हैं कि अगर उन्हें सही चरित्र मिले तो वह निराश नहीं करेंगे। जान अब्राहम के अभिनय में अपेक्षाकृत विकास है। यातना और रोष के दृश्यों में वे अपनी सीमित भंगिमाओं से बाहर आते हैं। फिल्म में गीत-संगीत लगभग अप्रासंगिक है। न्यूयार्क को फिल्माने में निर्देशक ने कैमरामैन का सही उपयोग किया है। फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि यह हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में रहते हुए इश्क-मुहब्बत से परे जाकर रिश्तों और राजनीति की बात करती है।
रेटिंग : ***

Friday, June 26, 2009

दरअसल:कई परतें थीं बाबू मोशाय संबोधन में

-अजय ब्रह्मात्मज
अमिताभ बच्चन के सुपर स्टार बनने से पहले के सुपर स्टार भी मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में उपस्थित थे। फिल्म इंडस्ट्री में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए सम्मानित किया गया। उन्होंने भगवा रंग के कपड़े पहन रखे थे। चाल में पहले जैसी चपलता नहीं थी, लेकिन कदम डगमगा भी नहीं रहे थे। वे बड़े आराम और सधे पांव से मंच पर चढ़े। सम्मान में मिली ट्राफी ग्रहण की, फिर अमिताभ बच्चन को बाबू मोशाय संबोधित करते हुए अपनी बात कही। मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में हम सुपर स्टार राजेश खन्ना को सुन रहे थे।
अपने अभिभाषण में उन्होंने एक बार भी अमिताभ बच्चन के नाम से संबोधित नहीं किया। बाबू मोशाय ही कहते रहे। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की फिल्म आनंद देख चुके दर्शकों को अच्छी तरह याद होगा कि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन को राजेश खन्ना बाबू मोशाय ही कहते हैं। मकाऊ में मंच पर राजेश खन्ना के बाबू मोशाय संबोधन में लाड़, प्यार, दुलार, शिकायत, आशंका, प्रशंसा, मनमुटाव, अपेक्षा, उपेक्षा आदि भाव थे।
हर दो पंक्ति के बाद बाबू मोशाय को अलग अंदाज में उच्चरित कर राजेश खन्ना कुछ नया जोड़ते रहे। थोड़ा पीछे हटकर उनकी तरफ देखते हुए अमिताभ बच्चन के चेहरे पर हर बाबू मोशाय उच्चारण के बाद एक नए रंग की लहर दौड़ जाती थी। जो सभी ने सुना और समझा, राजेश खन्ना उससे कुछ ज्यादा कह रहे थे और पूरा यकीन है कि अमिताभ बच्चन उनके हर शब्द और उच्चारण के भेद और मर्म को समझ रहे थे। राजेश खन्ना ने स्पष्ट कहा कि वह भी एक दौर था, यह भी एक दौर है। पहले कोई और था, आज कोई और है..। राजेश खन्ना जिस तरफ इशारा कर रहे थे या मुट्ठी से फिसल चुकी लोकप्रियता को याद कर कसमसा रहे थे, उसे सभी ने देखा और समझा। ऐसे द्वंद्व और दंश से अधिक सहानुभूति नहीं हो पाती, क्योंकि बदलते वक्त के साथ हर शय बदलती है। हालांकि अमिताभ बच्चन ने अपने परिचय में राजेश खन्ना की अप्रतिम लोकप्रियता का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी कार के टायर की धूल को लड़कियां अपनी मांगों में भरती थीं.., राजेश खन्ना जैसी लोकप्रियता कभी देव आनंद ने भी देखी थी। कहते हैं राजेश खन्ना की पलकें झपकती थीं, तो लड़कियां सिनेमाघरों में सीटों पर उछल पड़ती थीं। समय ने वह लोकप्रियता किसी और को दे दी है। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना ने दो फिल्मों आनंद और नमक हराम में साथ काम किया। यह वही दौर था, जब एक स्टार का अस्त हो रहा था और दूसरे का उदय..।
आईफा अवार्ड में हर साल इस विशेष पुरस्कार से अपनी बिरादरी के किसी समकालीन या सीनियर कलाकार को सम्मानित करने के बाद अमिताभ बच्चन को ताने सुनने पड़ते हैं। फिरोज खान और धर्मेद्र ने भी अपने संबोधनों में शिकायतें रखी थीं। शायद यह अमिताभ बच्चन की लंबी पारी का साइड इफेक्ट हो! दूसरों को अपनी असफलता खलती है, लेकिन उसकी वजह जरूरी तो नहीं कि अमिताभ बच्चन ही हों। राजेश खन्ना ने अपने संबोधन में अमिताभ बच्चन से इशारे में कई सवाल किए। जाहिर है, हमें उम्मीद होगी ही कि वे अपने ब्लॉग पर इस प्रसंग और राजेश खन्ना के संबोधन के बारे में कुछ लिखें! तब शायद कुछ नए भेद खुलें। परतों से धूल छंटे और हम सब स्टारों के संबंधों को नए सिरे से समझें!

Monday, May 18, 2009

हिन्दी टाकीज:मेरा फ़िल्म प्रेम-अनुज खरे



हिन्दी टाकीज-३६

अनुज खरे फिल्मों के भारी शौकीन हैं.चवन्नी को लगता है की अगर वे फिल्मों पर लिखें तो बहुत अच्छा रहे.उनसे यही आग्रह है की समय-समय पर अपनी प्रतिक्रियाएं ही लिख दिया करें.आजकल इतने मध्यम और साधन हैं अभिव्यक्ति के.बहरहाल अनुज अपने बारे में लिखते हैं...बुंदेलखंड के छतरपुर में जन्म। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर। घाट-घाट का पानी पीया। समस्त स्थलों से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान देने का मौका आने पर मनुष्य प्रजाति ने लेने से इनकार किया खूब लिखकर कसर निकाली।
पत्रकारिता जीविका, अध्यापन शौकिया तो लेखन प्रारब्ध के वशीभूत लोगों को जबर्दस्ती ज्ञान देने का जरिया। अपने बल्ले के बल पर जबर्दस्ती टीम में घुसकर क्रिकेट खेलने के शौकीन। फिल्मी क्षेत्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने की गलतफहमी। कुल मिलाकर जो हैं वो नहीं होते तो अद्भुत प्रतिभाशाली होने का दावा।जनसंचार, इतिहास-पुरातत्व में स्नातकोत्तर। शुरुआत में कुछ अखबारों में सेवाएं। प्रतियोगी परीक्षाओं के सरकारी-प्राइवेट संस्थानों में अध्यापन। यूजीसी की जूनियर रिसर्च फैलोशिप।पत्रकारिता की विशिष्ठ सेवा के लिए सरस्वती-पुत्र सम्मान। व्यंज्य पर एक पुस्तक प्र्काशित। मप्र की संस्कृति-जनजीवन पर पूर्व में किताब का प्रकाशन। विभिन्न समाचार पत्रों में दर्जनों लेखों का प्रकाशित। विगत दस वर्षो से दैनिक भास्कर पत्र समूह में, भास्कर पत्रकारिता अकादमी में उपनिदेशक रहने के पश्चात कई स्थानों पर कार्य किया। संप्रति-भास्कर डॉट कॉम पोर्टल में संपादक।
अपने फिल्म प्रेम की कहानी पूरी फिल्मी अंदाजे की ही है। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर होता रहता था। बाद में खुद भी ट्रांसफर को प्राप्त होते रहे सो, पूरा फिल्म प्रेम बुंदेलखंड से लेकर जयपुर, भोपाल और ना जाने कितने शहरों की विस्तृत लोकेशनों पर शूट हुआ है। कई बार तो मुझे ऐसा लगता था कि एक साथ दो फिल्में चल रही हैं। एक मेरे जीवन की रीयल लाइफ फिल्म। जिसमें मुख्य पात्रों में मैं खुद हूं, सपोर्टिग एक्टर देशकाल के हिसाब से दोस्तों, सहकर्मियों सेलेकर श्रीमती जी तक रहे हैं। जबकि दूसरी रील लाइफ में चलती फिल्म है जिसमें मुख्य पात्रों में अधिकतर अमिताभ बच्चन और उनके सहयोगी कलाकार ही रहे। क भी कभार धर्मेद्र से लेकर जीतेंद्र तक, सहूलियत से जिनकी भी फिल्में हमारे शहर में उपलब्ध हो गईं वे मुख्य पात्र बन जाते थे। बचपन में देखी गईं इन फिल्मों का मेरे जीवन पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। चूंकि सेल्यूलाइड हमेशा आपको आकर्षित करता रहता है। हमेशा आपको चमत्कृत करता है। सो बहुत आश्चर्य नहीं कि फिल्में किसी भी भारतीय के अंतस में गहरे धंसी रहती हैं। गाहेबगाहे वे उसे प्रेरणा देती हैं। तो अपने अंतर्मन में खास तौर पर फिट कर दी गईं इन फिल्मों ने बाद में मेरी बड़ी मदद की। खूब जमकर इन फिल्मों पर लिखा।
खैर मेरी कहानी की शुरूआत बुंदेलखंड के एक छोटे से शहर छतरपुर से होती है। जहां कि मेरा बचपन बीता, कुछ नाले -नालियों के बैकग्राउंड में कुछ दोस्त थे। सारे के सारे फिल्मों के विकट प्रेमी। इन्हीं नाले-नालियों पर रखे बड़े-बड़े सीमेंट के पाइपों पर बैठकर सभी का फिल्म प्रेम एक साथ परवान चढ़ा। इन्हीं पर बैठकर सभी एक दूसरे को अपनी देखी गई फिल्मों की कहानियां एक खास ध्वनि ट्रेक ढेन॥र्ट्रेन ड्रैन..को बार-बार निकालते हुए सुनाते थे। मूलत: यह ध्वनि यह बताने के लिए निकाली जाती थी कि हीरो कहीं विलेनों में घिर गया है या उस पर कोई मुसीबत आ गई है। यानि कुल मिलाकर बताया जाता था कि मुकाम गंभीर है। इसी ध्वनि के माध्यम से पूरे मित्रों को सिनेमा हाल का मजा दिया जाता था। बुंदेलखंड में लगभग प्रत्येक शहर में तब मेरा मानना है कि फि ल्म देखकर आने के बाद मित्रों की उसका सस्वर बैकग्राउंड म्यूजिक सहित स्टोरी सुनाने की बड़ी विशिष्ट परंपरा पाई जाती थी। तब अमिताभ अद्भुत रूप से फेमस थे। उनकी हर फिल्म को तब जोरदार शुरूआत मिलती थी । मुझे उनकी एक फिल्म की याद है। मुकद्दर का सिकंदर। शायद अस्सी के दशक का कोई वर्ष रहा होगा। फिल्म लगी थी महेश टॉकीज में। क्या भीड़ थी। क्या लोग उमड़े थे। वो नजारा आज भी आंखों में जवां है। पहली-पहली बार टिकट ब्लैक कैसे होते हैं वहीं देखा था। कैसे रिक्शेवाले धीरे से टिकट निकाल कर साइड में ले जाकर धीरे से तौलमोल करके टिकट खिसकाते।
एक बात भी अक्सर याद आती है। तब हम सुबह से ही टॉकीज में फिल्म की पब्लिसिटी देखने पहुंच जाया करते थे। फिर धीरे से माहौल बनाया जाता था कि फिल्म कैसे देखें। हालांकि फिल्म देखने पर कोई ज्यादा प्रतिबंध नहीं था। फिर भी फिल्म बड़ों के साथ ही देखी जाती थी। वे ही तय करते थे कि किसफिल्म को देखा जाना है। फिल्म देखने के सामूहिक आयोजन अकसर ही होते थे। फिल्म देखने तब एक उत्सव बन जाता था। अड़ोस-पड़ोस के कई परिवार से कुछ दीदीयां, हम लोग। जिस दिन फिल्म जाना होता था। दोस्तों को पूरे जोर-शोर से बताया जाता था कि हम आज फिल्म देखने जा रहे हैं। सुबह से ही नए कपड़े पहनकर घूमना शुरू कर दिया जाता था। कुल मिलाकर मोहल्ले में शायद ही कोई बचता हो जिसे पता न चल जाता हो कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं। फिल्म देखने के दौरान तब अमिताभ के आने पर कैसे चीख-पुकार मचती थी वो अपने आप में अलग ही अनुभूति थी। आज सोचते हैं तो लगता है कि इस कलाकार में क्या रहा होगा जिसने पूरा एक जमाना प्रभावित रहा। फिरअमिताभ का अभिनय, अत्यंत अतार्किक पात्र भी कितनी गंभीरता और शिद्दत से निभाते थे वे कि महसूस ही नहीं होता था। हालांकि एक बात है हिरोइनें तब हमारी श्रृद्धा का उतना पात्र नहीं होती थीं। रेखा की बात की जाती थी, जया बच्चन की मजबूरी पर कई बार कोई ज्ञानी मित्र प्रकाश डाल देता था बस। हिरोइनों से ज्यादा चर्चा खलनायकों की होती थी। अमजद खान को जितना कोसा जा सकता था कोसा जाता था। सारी मित्र मंडली इस बात पर सहमत थी कि अमिताभ की सारी मुसीबतों की जड़ यही दुष्ट है। बरसात की एक रात, सत्ते पे सत्ता और शोले की नफरत का विस्तार तब याराना की दोस्ती देखकर कम हुआ था। जिस पर इतना चिंतन जरूर किया गया था कि यार, अमिताभ को इसका दोस्त नहीं बनना था।
एक्टिंग से ज्यादा चर्चा का केंद्र फाइटिंग होती थी। चूंकि उसी से हम अपने लड़ने के तरीकों में नवाचार करते थे, तो अमिताभ या धर्मेंद्र ने किस तरह से बदमाशों को कूटा, कैसी गाली दी या कैसे बदमाशों को ललकारा कि जिसके बाप में दम हो चाबी मुझसे छीनकर दरवाजा खोल लो। हमारी आपसी लड़ाइयों में भी तेरे बाप में दम हो तो छूकर दिखाओ जैसे डॉयलाग सहजता से निकलते थे। जिस पर तटस्थ दोस्त दूसरे दोस्त को भी बढ़ावा देते थे कि तू भी कुछ बोल कि बेटा डर गया। जिस पर उसे भी कोई मौलिक किस्म का डॉयलाग लाना पड़ता था। यानी फिल्मों का कुछ यूं भी होता था वास्तविक जीवन में भरपूर इस्तेमाल। जितनी उत्सुकता से फिल्म देखी जाती थी उसी उत्साह से फिर फिल्म देखकर लौटने पर दोस्तों से कहानी शेयर की जाती थी। दोस्त भी पट्ठे नाली वाली जगह पर जमे मिलते थे। कोई औपचारिकता नहीं सीधे कहानी सुनाओ। बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं निकाला तो नाराजगी जताई जाती थी कि -क्यों बे जल्दी भगना चाहता है, पूरी सुना, ढंग से सुना। अबे, अमिताभ ने डांस किया था कि नहीं। वोई पुराना वाला डांस किया होगा। फिर एक हाथ कमर पर रखकर दूसरा हाथ हवा में लहराते हुए अमिताभ का ट्रेडमार्का डांस भी थोड़ बहुत करके दिखाना होता था। अमिताभ तब की पीढ़ी के सबकुछ होते थे। स्टाइल उन्हीं से सीखी जाती थी। अमिताभ की देखा-देखी कुछ दोस्त तो बाएं हाथ से लिखने या खेलने तक लगे थे। कुली के दौरान तो पुनीत इस्सर हम सबके गुस्से के एकमात्र पात्र थे। रोज कोई न कोई अमिताभ की दुर्घटना की किसी अलग ही एंगल से कहानी ले आता था। सब रस लेकर उसे सुनते। तब उसमें बहुत कुछ हमारी कल्पना का मिश्रण भी होता था लेकिन सुनाने का ढंग इतना जोरदार होता था कि उसे सही माना जाता था। फिर किसी भी तथ्य को सही माने जाने का तब एक ही पैमाना होता था कि उसे दो -तीन दोस्तों का समर्थन प्राप्त हो जाए। तो कहानियां ऐसे गढ़ी जाती थीं कि बहुमत उस पर विश्वास कर ले। तब मनोरंजन के ज्यादा साधन नहीं थे मुझे लगता है कि तब शायद ऐसे ही स्टोरी टेलिंग से लोगों की रचनात्मकता बढ़ती होगी।
तब शहर में तीन टॉकीजें थीं। महेश, गोवर्धन, छत्रसाल। इनमें से छत्रसाल टॉकीज तालाब के किनारे थी। उसकी छत नहीं थी। एकदम ओपनएयर थियेटर था वो। फिल्म चलती तो हवाएं भी साथ चलतीं। कभी तालाब भर जाता तो टॉकीज बंद हो जाती। फिल्में वहां हमेशा अच्छी ही लगती थी। गोवर्धन और महेश टॉकीज वैसी थीं जब कि किसी कस्बे में तब टॉकीजों को होना चाहिए था। लाल-पीली पतंगी कागजों वाली टिकटें। गेटकीपरनुमा कुछ लोग। कुछ चौथी-पांचवीं बार फिल्म देखने वाले भयंकर फिल्म प्रेमी, जो पूरी फिल्म की कहानी लगातार अपने दोस्तों को सुनाते रहने का पुनीत कत्र्तव्य भी निरंतर निभाते थे। पटिये वाली कुर्सियां। टॉर्च लेकर पूरी फिल्म के दौरान लोगों को बैठाने वाले गेटकीपर। गाने के दौरान बाहर निकलने वाले कुछ व्यक्तित्व। छोटे बच्चों को लगातार बाहर खिलाने वाले कुछ पति। ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ दर्शक। जबर्दस्त सीटियां। फिल्म की रील कटने पर भारी पैमाने पर होने वाला गाली-गलौज से भरपूर आग्रह। इंटरवल में समोसे-मूंगफली। फिल्म खत्म होने पर रिक्शे के लिए की जाने वाली भागदौड़। ये वो यादें हैं जिन्हें आज ढूंढ़ों तो कहीं नहीं दिखेंगी। मल्टी प्लेक्स के शानदार संसार में इनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। एक फिल्म की याद है मुझे तब गोवर्धन टॉकीज में लगी थी सरगम। ऋषि कपूर और जयाप्रदा। शायद जयाप्रदा की पहली हिन्दी फिल्म थी। गोवर्धन टॉकीज बाजार और मंडी के पास थी। लाइनें इतनी लंबी लगीं थी कि बाजार तक पहुंच रही थीं। आज इस दृश्य की कल्पना कठिन है।
फिल्मों से जुड़ा मेरा एक बड़ा रोचक अनुभव है। फिल्म थी काला पत्थर। तब मुझे फिल्म जाना था और घर से अनुमति नहीं मिल रही थी। मेरी मां तब आकाशवाणी में सिंगर थीं। एक बार वे गईं गाना गाने के लिए , पिताजी तब शहर से बाहर पोस्टेड थे,सो अपनी निकल पड़ी। धीरे से दोपहर घर से ऊपर छत से कूदे, फिर कुछ दोस्तों के साथ निकल लिए महेश टॉकीज। फिल्म देखी। बीच-बीच में घर पर पड़ने वाली डांट के डर से कुछ मजा भी खराब हुआ। फिल्म खत्म हुई बाद में डरते-डरते घर पहुंचा। दोस्त तो बाहर से ही खिसक लिए कि बेटा झेलो तुम क्यों गए थे बिना बताए फिल्म। अंदर पहुंचा तो मां ने कुछ नहीं कहा। फिर पूछा कुछ खालो। मैं भूखा तो था ही फटाफट खाने लगा। धीरे से मां ने बात शुरू की केैसी थी फिल्म। इधर मैेने स्टोरी बताना चालू कर दी। उन्होंने धीरे-धीरे समझाना शुरू कर दिया। अपन ने भी उस दिन के बाद हाथ जोड़े कि कोई कितना भी कहे अकेले तो नहीं ही जाएंगे। फिल्मों के साथ तब फिल्मी गाने बेहद प्रभावित करते थे। दोस्तों में से तब अधिकतर लोग किशोर कुमार के फैन थे। उनकी क मेडी और गायन पर अकसर चर्चा छिड़ती थी। पड़ोसन एक ऐसी फिल्म थी जिसे कई बार देखने के बाद भी उसका जादू कम नहीं हुआ। अमिताभ और राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार ने जो गाने गाए हैं उन्हें हम अकसर ही लाइट जाने या गमियों की दोपहर खेली जाने वाली में अंत्यक्षरी चीख-चीख कर गाते थे। चू्ंकि मम्मी सिंगर थीं तो बाद में कुछ गाने की तमीज भी आ गई तब गाने के म ौके नहीं रहे। इस तरह आज सोचता हूं तो लगता है कि वे भी क्या दिन रहे होंगे। एकदम निश्चिंत-बेपरवाही से भरपूर। हालांकि अकसर इस बात पर सोचता हूं कैसे अभी तक देश में लोगों के जीवन को इतना प्रभावित करने वाली फिल्मों के अध्ययन का कोई पाठ्यक्रम शुरू नहीं किया जा सका है। खैर, बचपन की गलियों से गुजरकर अपना फिल्म प्रेम बड़े शहरों में भी उसी शिद्दत से बना रहा। लेकिन एक बात जो हमेशा लगती रही कि फिल्मों ने भले ही तकनीकी तौर पर बेहद तरक्की कर ली हो लेकिन लोगों का वैसा जुड़ाव कम हुआ है जैसा हमारे बचपन में पाया जाता था।
दस पसंदीदा फिल्में
1। सत्ते पे सत्ता
2। शोले
३. हाफ टिकट
४. पड़ोसन
५. दीवार
६.रंग दे बसंती
७. गजनी
८. अंदाज अपना-अपना
९. हेराफेरी
१०. हीरो न. वन

करें...anuj.khr@gmail.com" onclick="return top.js.OpenExtLink(window,event,this)" href="mailto:mailto:करें...anuj.khr@gmail.com

Saturday, May 16, 2009

दरअसल:फिल्म बिरादरी के बोल-वचन

-अजय ब्रह्मात्मज
चुनाव समाप्त होने को आए। अगले हफ्तों में नई सरकार चुन ली जाएगी। सत्ता के समीकरण से अभी हम वाकिफ नहीं हैं, लेकिन यकीन रखें, देश का लोकतंत्र डावांडोल नहीं होगा। जो भी सरकार बनेगी, वह चलेगी। फिल्मों के स्तंभ में राजनीति की बात अजीब-सी लग सकती है। दरअसल, चुनाव की घोषणा के बाद फिल्मी हस्तियों ने वोट के लिए मतदाताओं को जागरूक करने के अभियान में आगे बढ़ कर हिस्सा लिया। आमिर खान ने कहा, अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें। दूसरी तरफ करण जौहर के नेतृत्व में अभिषेक बच्चन, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, रितेश देशमुख, रणवीर कपूर, असिन, इमरान खान, शाहिद कपूर, सोनम कपूर, जेनिलिया और फरहान अख्तर यह बताते नजर आए कि देश का बदलाव जनता के हाथ में है।
करण जौहर का अभियान फिल्म स्टारों के उदास चेहरों से आरंभ होता है। सभी कह रहे हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। देश का कुछ क्यों नहीं हो सकता, क्योंकि सड़कों पर कचरा है, देश में प्रदूषण है, पुलिस रिश्वत लेती है और राजनीतिज्ञ अपराधी हैं। देश में आतंकवादी आकर हंगामा मचा देते हैं। इन सभी से निराश हमारे फिल्म स्टारों को लगता है कि कुछ नहीं हो सकता इस देश का.., फिर खुद ही कहते हैं कि हो सकता है, अगर हम वोट दें। यहीं एक फिल्मी संवाद आता है, शायद यह सभी समस्याओं का हल नहीं है, लेकिन एक शुरुआत है। शुरुआत क्या है, वोट देना। इस अभियान में निराशा के जो संदर्भ दिए गए हैं, वे देश की मूलभूत समस्याएं नहीं हैं। वास्तव में इस अभियान के स्क्रिप्ट लेखक और निर्देशक मूलभूत समस्याओं से परिचित ही नहीं हैं। बीच में एक उदाहरण दिया जाता है कि फिल्म और खेल बिरादरी में जात-पात या धर्म का भेदभाव नहीं है। फिल्म इंडस्ट्री और खेल जगत पर नजर रखनेवाले आसानी से बता सकते हैं कि यहां किस प्रकार का भेदभाव जारी है।
रोचक तथ्य यह है कि इस अभियान फिल्म में शामिल फिल्म कलाकारों में से अधिकांश ने वोट ही नहीं दिया। मुंबई में एक शब्द प्रचारित है बोल-वचन। बोलने और करने में अंतर दिखे, तो इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादातर फिल्म स्टारों की चिंता और चुनाव की जागरूकता में उनकी भागीदारी बोल-वचन ही रही। उन्होंने जागरूकता अभियान को भी फिल्म प्रचार या उत्पादों के एंडोर्समेंट के रूप में लिया। खुद उपयोग करें या न करें, लेकिन यह बोलते नजर आएंगे कि फलां उत्पाद कैसे बेहतर, उपयोगी और जरूरी है। वोट देने के लिए प्रेरित करने तक ही बात सीमित नहीं थी। वे यह भी बता रहे थे किप्रत्याशियों के चुनाव में सावधानी बरतें। सावधानी सिर्फ इस बात की रखें कि प्रत्याशी अपराधी नहीं हो। यह महज अराजनीतिक सावधानी है। कुछ मामलों में ही चंद राजनीतिज्ञों के अपराधी होने की बात सही हो सकती है। अपराध के आरोप राजनीति से प्रेरित भी तो हो सकते हैं। मतदाताओं ने फिल्म स्टारों की एक नहीं सुनी। मुंबई और देश में फिल्म स्टारों की संलग्नता और हिस्सेदारी के बावजूद मतदान का प्रतिशत नहीं बढ़ा। नतीजे आने पर पता चलेगा कि अपराधियों को न चुनने की उनकी सलाह पर मतदाताओं ने कितना अमल किया। वास्तव में इन अभियानों में किसी स्टार की राजनीति स्पष्ट नहीं हुई। विशेष समस्याओं की बात तो दूर उनके बयानों और बातों से यह भी नहीं पता चलता कि वे राजनीति के किस पक्ष में यकीन करते हैं। राजनीति से परहेज करते हुए मतदान की अपील करना वैसा ही है, जैसा फिल्म में किसी किरदार को निभाना। एक तरह से हमारी फिल्मी हस्तियां इस अभियान में अभिनय ही कर रही थीं। उन्होंने इसे अभिनय और विज्ञापन बना दिया। अब उनकी समझ में आ रहा होगा कि उनका प्रयास निष्फल रहा। या फिर जैसा कि फिल्म फ्लॉप होने पर होता है। हमेशा की तरह वे जनता को कोस रहे होंगे कि इनका कुछ नहीं हो सकता, इस देश का कुछ नहीं हो सकता।

फ़िल्म समीक्षा:९९


-अजय ब्रह्मात्मज

कहते हैं देश का हर आदमी 99 के फेर में पड़ा है। बस, एक और मिल जाए, हो जाए या पा जाए तो सभी की सेंचुरी लग जाए। आम जीवन के इसी थीम को निर्देशकद्वय राज और डीके ने अपनी फिल्म का विषय बनाया है। उन्होंने मशहूर कामिक किरदार लारेल और हार्डी की तर्ज पर एक मोटा और एक दुबला-पतला किरदार चुना है। यहां सायरस भरूचा और कुणाल खेमू इन भूमिकाओं में हैं।
मुंबई के दो छोटे जालसाज डुप्लीकेट सिम के धंधे में पकड़े जाने से बचने के लिए भागते हैं तो अपराध के दूसरे कुचक्र में शामिल हो जाते हैं। वे बुकी एजीएम का काम करने लगते हैं। उसी के पैसों की वसूली के लिए वे दिल्ली पहुंचते हैं। दिल्ली में उनका सामना विचित्र किरदारों से होता है। 99 नए किस्म की कामेडी है। पिछले कुछ समय से दर्शक एक ही किस्म की कामेडी देख कर ऊब चुके हैं, वैसे में 99 राहत की तरह है।
निर्देशकद्वय ब्लैक कामेडी और ह्यूमर के बीच में अपने किरदारों को रख पाए हैं। इस फिल्म में मजेदार ब्लैक कामेडी की संभावना थी। फिल्म बीच में स्लो हो जाती है। कामेडी फिल्मों में घटनाएं तेजी से नहीं घटे तो कोफ्त होने लगती है। मुख्य किरदार सचिन [कुणाल खेमू] और जरामुड़ [सायरस भरूचा] के बीच अच्छी केमिस्ट्री है, लेकिन लेखक और निर्देश्क ने जरामुड़ पर विशेष काम नहीं किया है। सायरस नेचुरल किस्म के एक्टर हैं, उन्हें कुछ और दृश्य एवं संवाद मिले होते तो फिल्म की रोचकता बढ़ती। कुणाल निराश तो नहीं करते, लेकिन उन्हें और अभ्यास की जरूरत है।
यह फिल्म बोमन ईरानी और राज मिस्त्री के लिए देखी जा सकती है। राज मिस्त्री के रूप में हिंदी फिल्मों को एक नया एक्टर मिला है। उनकी कामिक टाइमिंग और अभिव्यक्ति फिल्म के दृश्यों के लिए सटीक है। बोमन ऐसी फिल्मों में लाजवाब होते हैं। उनकी पत्नी के रूप में सिमोन सिंह ने किरदार के भाव को अच्छी तरह समझा और व्यक्त किया है।
भोजपुरी फिल्म के माहौल को लेकर किए गए कटाक्ष भोजपुरीभाषी दर्शकों को चुभ सकते हैं। लेखकों को ऐसे मजाक से बचना चाहिए, जो किसी भाषा विशेष को निशाना बना कर हंसाने की कोशिश करता हो। फिल्म के संवाद चुटीले और प्रासंगिक हैं। छोटे ओर सहयोगी किरदारों को गढ़ने में निर्देशक ने मेहनत की है। उनकी मौजूदगी से स्क्रिप्ट में आई फांक भरती है। पहली फिल्म के संदर्भ में निर्देशकद्वय राज निदिमोरू और कृष्णा डीके उम्मीद जगाते हैं।

Thursday, May 14, 2009

एहसास:समाज को जरूरत है गांधीगिरी की -महेश भट्ट


देवताओं के देखने लायक था वह नजसरा। किसी ने उम्मीद नहीं की होगी कि न्यूयार्क में स्थित संयुक्त राष्ट्र की खामोश इमारत तालियों और हंसी से इस कदर गुंजायमान हो उठेगी। संयुक्त राष्ट्र केडैग हैम्सर्क गोल्ड ऑडिटोरियम में राज कुमार हिरानी की लगे रहो मुन्ना भाई देखने के बाद पूरा हॉल खिलखिलाहट और तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा।
फिल्म के निर्देशक राज कुमार हिरानी और इस शो के लिए विशेष तौर पर गए फिल्म के स्टार यकीन नहीं कर पा रहे थे कि मुन्ना और सर्किट के कारनामों को देख कर दर्शकों के रूप में मौजूद गंभीर स्वभाव के राजनयिक इस प्रकार दिल खोल कर हंसेंगे और तालियां बजाएंगे। इस फिल्म में संजय दत्त और अरशद वारसी ने मुन्ना और सर्किट के रोल में अपने खास अंदाज में गांधीगिरी की थी। तालियों की गूंज थमने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसी प्रतिक्रिया से फिल्म के निर्देशक का खुश होना स्वाभाविक और वाजिब है। इस सिनेमाई कौशल के लिए वाहवाही लूटने का उन्हें पूरा हक है, लेकिन उनके साथ हमारे लिए भी यह सोचना-समझना ज्यादा जरूरी है कि इस फिल्म को कुलीन और आम दर्शकों की ऐसी प्रतिक्रिया क्यों मिली? क्या यह गांधी का प्रभाव है, जिनकी शब्दावली को लेकर संयुक्त राष्ट्र का घोषणापत्र तैयार किया गया है या मनुष्य की चेतना में बसे किसी मूलभूत गुण के प्रति दर्शक अपना भाव प्रकट कर रहे थे। हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन में समान रूप से महत्वपूर्ण यह मूलभूत गुण अहिंसा है।
अहिंसा परमो धर्म:
अहिंसा का सीधा अर्थ है हिंसारहित। अहिंसा का पाठ सदियों से ऋषि, मुनि और महात्मा बताते-पढाते रहे हैं। स्कूल की किताबों और शिक्षकों ने सालों की मेहनत के बाद भी जो सफलता हासिल नहीं की होगी, उससे अधिक प्रभावी तरीके से इस फिल्म ने अहिंसा का पाठ पढा दिया। अपना देश अभी ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति की गिरफ्त में है, जिसमें गांधी देश के नागरिकों की चेतना से गायब हो रहे हैं। ऐसे माहौल में मुन्ना भाई ने विचारों की सामाजिक-राजनीतिक शून्यता को भर दिया और सभी उम्र के लोगों के लिए गांधी को फैशन में ला दिया। गांधी के करिश्माई नेतृत्व में जिनकी रुचि नहीं के बराबर थी, उन्होंने भी गांधी के बारे में सोचना आरंभ कर दिया। इस फिल्म की रिलीज के बाद बापू की जीवनी की बिक्री बढ गई। गौर करें तो हर देश को आदर्श और प्रेरणा के लिए एक विभूति की जरूरत होती है। निश्चित रूप से गांधी भारतीय जीवन मूल्यों के श्रेष्ठ प्रतीक हैं। गांधी जी इस कारण भी विलक्षण हैं कि वे कम से कम शब्दों में ज्ञान की बातें करते थे। गांधी को फिर से खोजने की कोशिश में मुन्ना भाई ने भी यही किया। उसने गांधी को नए अंदाज में दुनिया के सामने रखा।
फिल्मों में गांधी दर्शन
अहिंसा और गांधी हिंदी फिल्मों के लिए नए विषय नहीं हैं। राज कपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है से मेरा परिचय गांधी दर्शन से हुआ था। राज कपूर की इस फिल्म का नायक एक साधारण व्यक्ति है। वह अहिंसा के विचार में ऐसा डूबा हुआ है कि किसी के चपत लगाने पर दूसरा गाल आगे कर देता है। इस फिल्म ने हम बचों का मनोरंजन तो किया ही था, साथ ही गांधी का संदेश भी दिया था कि जो गोलियों से जिंदा रहता है, वह गोलियों से ही मरता है। इस फिल्म की यही कहानी थी कि कैसे एक साधारण व्यक्ति खूंखार डाकुओं को हथियार फेंकने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोडता है। राज कपूर की इस फिल्म का विषय आज भी कितना प्रासंगिक है? इस फिल्म का एक संवाद मुझे आज भी याद है। डाकुओं के सरदार राका की भूमिका निभा रहे प्राण से राज कपूर कहते हैं, फेंक दे, ये दोनाली राका.. इसने गांधी को नहीं पहचाना, ये तुझे क्या पहचानेगी?
इस फिल्म का प्रभाव इतना जबरदस्त था कि सालों बाद जिस देश में गंगा बहती है से प्रेरित होकर मैंने सर का निर्माण और निर्देशन किया। सर मेरी उन फिल्मों में से है, जिन पर मैं गर्व करता हूं। इसमें नसीरुद्दीन शाह ने एक सामान्य प्रोफेसर की भूमिका निभाई थी। प्रोफेसर खतरनाक गैंगस्टर वेलजीभाई को प्रेरित करते हैं कि हथियार फेंक कर अहिंसा का मार्ग अपना लो। वेलजी की भूमिका परेश रावल ने निभाई थी। यह फिल्म भी कामयाब रही थी। सचमुच, अगर अहिंसा के विषय को नाटकीय ढंग से चित्रित किया जाए तो उसे दर्शक हर समय स्वीकार करेंगे।
अहिंसा बनाम हिंसा
हिंदी फिल्मों में एक दौर ऐसा भी आया था, जब हिंदी फिल्मों में हिंसा पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाने लगा था। समस्या सुलझाने का एक ही तरीका था-बदला और प्रतिशोध। इस दौर में फालतू किस्म की एक्शन फिल्में बनीं और सिनेमा का रुपहला पर्दा खून के छींटों से लाल होता गया। ये फिल्में शायद भारतीय समाज में गहराई से कुछ गलत लक्षणों के तौर पर उभरी थीं। भारत ने गांधीवादी मूल्यों को छोड दिया था। इसी वजह से एंग्री यंग मैन और ताकतवर हीरो का जन्म हुआ, जो अपने हाथों से दुश्मनों की लुगदी बना देता था। इस तरह के सिनेमा के हीरो धर्मेद्र, अमिताभ बचन, विनोद खन्ना और सनी देओल जैसे कलाकार थे। इस खूनी दौर में सुनील दत्त ने रेशमा और शेरा जैसी अहिंसावादी फिल्म बनाने का साहस किया था, क्योंकि वे भीतर से गांधीवादी थे। सुनील दत्त को अपने प्रयास की भारी कीमत चुकानी पडी थी। उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। बतौर निर्माता उनके करियर पर लगभग पूर्णविराम लग गया था। उन्हें लंबी लडाई लडनी पडी। खुद को जिंदा रखने के लिए उन्हें हिंसात्मक और एक्शन फिल्मों का सहारा लेना पडा।
गांधी के प्रतीक नेल्सन मंडेला
डायरेक्टर के तौर पर मेरी अंतिम फिल्मों में से एक कारतूस थी। यह फिल्म एक खास वजह से मुझे याद है। कारतूस की शूटिंग के लिए मैं दक्षिण अफ्रीका गया था। वहां मुझे गांधी की साक्षात प्रतिमूर्ति नेल्सन मंडेला से मिलने का अवसर मिला। मंडेला जैसी जीवित किंवदंती से मुलाकात की हर बात मुझे याद है। मेरे खयाल में वे अकेले ऐसे नेता हैं, जो दुनिया को इस भयानक दौर से सुरक्षित निकलने का उपाय बता सकते हैं। संजय दत्त, मनीषा कोइराला और अपनी टीम के कुछ तकनीशियन सदस्यों के साथ मैं उनसे मिलने गया था। वे गर्मजोशी के साथ हमसे मिले। उन दिनों भारत अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था। इंद्र कुमार गुजराल देश के प्रधानमंत्री थे। भारतीय राजनीति और समाज की बुरी हालत थी। मैंने मंडेला से पूछा, भारत की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का क्या समाधान हो सकता है? उनका जवाब मुझे आज तक याद है। उन्होंने कहा, लगता है भारत ने अपने गौरवशाली सपूत गांधी को भुला दिया है, जिसने बगैर खून बहाए आपके देश को आजादी दिलाई थी। जरूरत है कि आप लोग गांधी और अहिंसा के उनके संदेश को अपने जीवन के केंद्र में ले आएं। गांधी के विचारों के बिना आज दुनिया की शक्ल कुछ और होती। वे बोल रहे थे और हम सुन रहे थे।
मुन्ना भाई की गांधीगिरी
लगे रहो मुन्ना भाई जैसी पॉपुलर फिल्म से गांधी फिर जीवित हुए हैं, लेकिन गांधीवाद या गांधी का दर्शन गहन विषय है। गांधी के दर्शन, विचारों या अहिंसा के पाठ को किसी पॉपुलर फिल्म के जरिये याद करने में बुराई नहीं है, लेकिन उस पाठ को दैनिक जीवन में उतार पाना असल चुनौती है। कांग्रेस दल ने गांधी को हर सडक-चौराहे में मूर्ति के रूप में स्थापित किया है, लेकिन गांधी को लेकर कांग्रेस में पुनर्जागरण की जरूरत है। देश के लिए जानना जरूरी है कि गांधी किन विचारों के लिए जिंदा रहे और मरे। सरल शब्दों में कहूं तो आज देशभक्त या शुद्ध गांधीवादी या अहिंसा का समर्थक होने के लिए जरूरी है कि हम अपने पडोसियों से खुद की तरह प्यार करें। भारत ने ऐसा नहीं करने का अपराध किया है। अगर हमने ऐसा किया होता तो सुविधाप्राप्त और सुविधाहीन लोगों के बीच इतनी बडी खाई नहीं होती।

Wednesday, May 13, 2009

हिन्दी टाकीज:काश! हकीकत बन सकता गुजरा जमाना-विजय कुमार झा


हिन्दी टाकीज-३५

हिन्दी टाकीज कोशिश है अपने बचपन और कैशोर्य की गलियों में लौटने की.इन गलियों में भटकते हर हम सभी ने सिनेमा के संस्कार हासिल किए.जीवन में ज़रूरी तमाम विषयों की शिक्षा दी जाती है,लेकिन फ़िल्म देखना हमें कोई नहीं सिखाता.हम ख़ुद सीखते हैं और सिनेमा के प्रति सहृदय और सुसंस्कृत होते हैं.अगर आप अपने संस्मरण से इस कड़ी को मजबूत करें तो खुशी होगी.अपने संस्मरण पोस्ट करें ...chavannichap@gmail.com


इस बार युवा पत्रकार विजय कुमार झा। विजय से चवन्नी की संक्षिप्त मुलाक़ात है.हाँ,बातें कई बार हुई हैं.कभी फ़ोन पर तो कभी चैट पर। विजय कम बोलते हैं,लेकिन संतुलित और सारगर्भित बोलते हैं.सचेत किस्म के नौजवान हैं। अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर उन्होंने लिखा.इस संस्मरण के सन्दर्भ में उन्होंने लिखा है...यादें हसीन हों तो उनमें जीना अच्‍छा लगता है, पर उस पेशे में हूं जहां कल की बात आज बासी हो जाती है। सो आज में ही जीने वाला पत्रकार वि‍जय बन कर रह गया हूं। हिन्दी टाकीज का शुक्रि‍या कि‍ उसने अतीत में झांकने को प्रेरि‍त कि‍या और मैं कुछ देर के लि‍ए बीते जमाने में लौट गया। मुश्‍कि‍ल तो हुई, पर मजा भी खूब आया। जो समेट पाया, वह लेकर एक बार फि‍र आज में लौट आया हूं।
आप उनसे vijay.bgp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

जब से महानगर (दि‍ल्‍ली) में मशीनी जिंदगी जीने के लि‍ए मजबूर हुआ और टीवी, कंप्‍यूटर, इंटरनेट आदि‍ की सुवि‍धा सुलभ हो गई, बड़े पर्दे पर सि‍नेमा देखने के कम ही मौके मि‍लते हैं। महीनों बाद, कभी-कभार। वैसे, सच कहें तो अब देखने लायक फि‍ल्‍में भी तो कभी-कभार ही बनती हैं। शायद महीनों नहीं, बल्‍कि‍ सालों बाद। बहरहाल, जब कभी भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स की लि‍फ्ट चढ़ने का मौका मि‍लता है, गुजरा जमाना याद आता है। स्‍कूल-कालेज वाले दि‍न।

अचानक फि‍ल्‍म देखने का प्रोगाम बनता तो चौकड़ी में पहला सवाल यही उठता था- टि‍कट मि‍ल जाएगा? मैं जि‍स शहर (भागलपुर) में पला-बढ़ा, वहां अभी भी फोन या इंटरनेट से बुकिंग की सुवि‍धा नहीं है। बॉक्‍स ऑफि‍स पर चमकी हुई फि‍ल्‍म के शो के टि‍कट लेना फल पाने (फि‍ल्‍म देखने) से पहले तपस्‍या करने के बराबर था। यह बात अलग थी कि‍ अक्‍सर यह तपस्‍या मेरा कोई दोस्‍त कि‍या करता था और पूरे तीन घंटे ‘फल’ का आनंद हम सब मि‍ल कर लेते थे।

हमारे लि‍ए उन दि‍नों फि‍ल्‍म देखना एक गोपनीय अभि‍यान हुआ करता था। सि‍नेमा हॉल जाने और वहां से नि‍कलने तक इस बात की पूरी कोशि‍श की जाती थी कि‍ कहीं कोई जान-पहचान वाला नहीं दि‍ख जाए, जो घर तक खबर पहुंचा दे। दरअसल, पि‍‍ताजी फि‍ल्‍मों के प्रति‍ दीवानगी को सीधे बच्‍चे की बर्बादी से जोड़ कर देखते थे। यह फि‍ल्‍मों के प्रति‍ समाज के एक तबके में प्रचलि‍त हेय दृष्‍टि‍कोण का नतीजा था। यह तबका फि‍ल्‍म कलाकारों को नाचने-गाने वाले और फि‍ल्‍म को समाज को गलत दि‍शा दि‍खाने वाले माध्‍यम के रूप में लेता था। ऐसी धारणा फि‍ल्‍मों और फि‍ल्‍मी दुनि‍या को देखे-जाने-समझे बि‍ना ही बनी हुई थी कि‍ फि‍ल्‍में भावी पीढ़ी को बि‍गाड़ने का सबसे अच्‍छा जरि‍या हैं। लगभग सभी दोस्‍तों की यही समस्‍या थी, सो सामूहि‍क प्रयास से हम अपने ‘अभि‍यान’ को गोपनीय रखने में अक्‍सर कामयाब हो जाते थे। बहरहाल, आज जब इसका सकारात्‍मक पहलू ढूंढता हूं तो यही लगता है कि‍ चोरी चुपके फि‍ल्‍म देखने का हमारा अभि‍यान कहीं न कहीं हम दोस्‍तों की दोस्‍ती के बंधन को मजबूती ही देता था। स्‍कूल में प्रेमरंजन से मेरी और रूपेश की दोस्‍ती ही फि‍ल्‍म देखने के क्रम में हुई थी। उन लोगों ने क्‍लास बंक कर फि‍ल्‍म देखने का प्रोग्राम बनाया था और उसमें हम दोनों को भी शामि‍ल कर लि‍या था। वहीं से हमारी दोस्‍ती की शुरुआत हुई थी।

उन दि‍नों सि‍नेमा को लेकर समाज का नजरि‍या, समाज को लेकर सि‍नेमा जगत की सोच और बनने वाली फि‍ल्‍में ही अलग नहीं थीं, बल्‍कि‍ फि‍ल्‍में देखने का अंदाज भी अलग था। तीन घंटे की फि‍ल्‍म देखने का मतलब पूरे तीन घंटे मनोरंजन, मनोरंजन और केवल मनोरंजन। हर कोई अपने-अपने अंदाज में ‘पैसा वसूल’ मनोरंजन करता था। कोई सीटी बजा कर, कोई नायकों के कारनामे देखकर, कोई हीरो-हीरोइन का रोमांस देख कर तो कोई कहानी और कि‍रदारों में डूब कर। दर्शक पर्दे पर नायकों के कारनामे से उत्‍साहि‍त होते और खलनायकों पर गुस्‍सा भी करते थे। फि‍ल्‍मों को वास्‍तवि‍कता के काफी करीब रख कर देखा जाता था। फि‍ल्‍में बनाने वाले शायद उसे हकीकत के इतना करीब लाने की कोशि‍श नहीं करते थे, पर दर्शक उसे वास्‍तवि‍कता से जोड़ लेते थे। आज फि‍ल्‍मकार अपनी तरफ से कोशि‍श कर भी दर्शकों को वास्‍तवि‍कता के करीब ले जाने में सफल नहीं हो पाते। शायद इसलि‍ए कि‍ फि‍ल्‍में तकनीकी रूप से वास्‍तवि‍कता के करीब आई हैं, पर कहानी और कि‍रदारों के मोर्चे पर यह करीबी नहीं आई है। यही वजह है कि‍ आज फि‍ल्‍म बनाने वालों को प्रचार पर भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है और प्रचार के नए-नए तरीके भी खोजने पड़ रहे हैं। इस दौरान फि‍ल्‍मों का व्‍यावसायीकरण (कॉरपोरेटाइजेशन ऑफ फि‍ल्‍म्‍स) जि‍तना बढ़ा है, उतना कुछ नहीं। इसलि‍ए रील लाइफ की सभी रि‍यल चीजें बनावटी लगती हैं।

‘हि‍न्‍दी टाकीज’ की बात गानों की चर्चा के बि‍ना अधूरी रहेगी। यह इसलि‍ए भी क्‍योंकि‍ फि‍ल्‍मों के प्रति‍ मेरी रुचि‍ वि‍कसि‍त होने में गानों की अहम भूमि‍का रही। गाने सुनने के लि‍ए रेडि‍यो एक मात्र सर्वाधि‍क लोकप्रि‍य और सस्‍ता साधन था। घर में ‘डेक’ (आडि‍यो प्‍लेयर) और टीवी आ जाने के बाद भी मैं रेडि‍यो पर ही गाने सुनने का मजा लेता था। वजह यह थी कि‍ हर दौर और मूड के गाने आसानी से सुनने को मि‍ल जाते थे। सुरैया से लेकर यशुदास तक और पंकज उधास से कुमार शानू तक। सुबह बीबीसी सुनने के बाद पि‍ताजी रामचरि‍त मानस का पाठ सुना करते थे। उसके बाद श्रीलंका ब्राडकास्‍टिंग कारपोरेशन के वि‍देश वि‍भाग (सीलोन) से फि‍ल्‍मी गाने सुनने का मेरा दौर शुरू होता था। आठ से नौ तक हर मूड के गाने सुनने के बाद नौ बजे से आधे घंटे तक स्‍थानीय भागलपुर रेडि‍यो स्‍टेशन से ‘गीत र्नि‍झर’ बहा करता था। पौने दस से सवा दस बजे तक पटना स्‍टेशन से गाने आते थे। सुबह के इस सत्र का जहां तक संभव हो सके, मैं पूरा लाभ उठाता था। फि‍र रात को रेडि‍यो नेपाल। इनसे इतर, बेवक्‍त गाने सुनना हो तो वि‍वि‍ध भारती था ही। अब ये सोचने में पसीना मत बहाइए कि‍ मैं पढ़ाई कब करता था। वह मैं कर लि‍या करता था। बहरहाल, गाने सुन कर मैं बालीवुड की वि‍वि‍धता के बारे में सोचने लगता था और मेरा दि‍माग चकरा जाता था। असल जिंदगी की कि‍सी भी स्‍थि‍ति‍ (सि‍चुएशन) की कल्‍पना कीजि‍ए और उससे संबंधि‍त गाना सोचि‍ए, मि‍ल जाएगा। हालांकि‍ अगर सिर्फ बीते दस-बीस साल के गाने तलाशे जाएं तो संभवत: ऐसा नहीं हो, पर पुराने जमाने के गाने वि‍वि‍धता और वास्‍तवि‍कता की इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। बालीवुड के प्रति‍ मेरी सकारात्‍मक सोच वि‍कसि‍त होने में इस सच्‍चाई का काफी योगदान रहा। फि‍र नई आने वाली फि‍ल्‍मों के गाने सुन कर ही हम प्रथमदृष्‍टया यह तय करते थे कि‍ फि‍ल्‍म देखने चलना है या नहीं। अगर चलना है तो मंडली में वि‍चार होता था और फि‍र कार्यक्रम बन जाता था। उन दि‍नों गाने नई फि‍ल्‍मों के प्रचार का भी बड़ा हथि‍यार होते थे। प्रचार मुख्‍य रूप से गली-मोहल्‍लों में लाउडस्‍पीकरों से अनाउंस करवा कर और पोस्‍टर चि‍पका कर कि‍ए जाते थे। लाउडस्‍पीकरों से फि‍ल्‍म के गाने सुनाए जाते थे और बीच-बीच में प्रचार करने वाला शख्‍स फि‍ल्‍म के कलाकारों के बारे में बताता था। पता नहीं, मेरे शहर में अब भी फि‍ल्‍मों का प्रचार ऐसे ही होता है या इसकी जरूरत ही नहीं रह गई है। अब तो साल या दो साल में एक बार जाना होता है और वह भी कुछ दि‍नों के लि‍ए। काश! बीते जमाने को यादों से इतर, हकीकत में जीना मुमकि‍न हो पाता।

दस पसंदीदा फि‍ल्‍में

बातों बातों में

बावर्ची

तीसरी कसम

गाइड

मेरा नाम जोकर

श्री ४२०

दोस्ती

उमराव जान

लगान

तारे ज़मीन पर

Saturday, May 9, 2009

फ़िल्म समीक्षा:फ्रोजेन


-अजय ब्रह्मात्मज

शिवाजी चंद्रभूषण की पहली फिल्म फ्रोजेन की ख्याति इतनी फैल चुकी है कि इसके बारे में संतुलित और वस्तुनिष्ठ राय व्यक्त करना मुश्किल है। कहते हैं कि तीस फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी इस फिल्म को 18 पुरस्कार मिल चुके हैं। इस फिल्म के प्रचार में पुरस्कारों का निरंतर उल्लेख किया जा रहा है। कहीं न कहीं दर्शकों पर दबाव डाला जा रहा है कि आप इसे देखें या न देखें, इसकी महत्ता स्वीकार कर लें। शिवाजी चंद्रभूषण की फ्रोजेन की कई विशेषताएं हैं,
मसलन:-चालीस सालों के अंतराल के बाद कोई ब्लैक एंड ह्वाइट हिंदी फिल्म रिलीज हो रही है। शिवाजी के इस क्रिएटिव साहस और उसके सुंदर परिणाम की तारीफ उचित है।
समुद्र तल से 12,000 से 20,000 फीट की ऊंचाई पर इस फिल्म की शूटिंग हुई। यह मुश्किल काम था।
-लंबे समय के बाद डैनी शीर्ष भूमिका में दिखे। उनकी योग्यता और क्षमता का शिवाजी ने सही इस्तेमाल किया।
-फ्रोजेन में हिमालय की वादियों की एकांत खूबसूरती छलकती है।
कहना मुश्किल है कि विदेशी फिल्म फेस्टिवल में फ्रोजेन को किस आधार पर पुरस्कार दिए गए हैं। सवाल पूछने का मतलब यह कतई नहीं निकालें कि फिल्म इन पुरस्कारों के योग्य नहीं है। फ्रोजेन हिंदी के फार्मूला फिल्मों से अलग है। इसकी कहानी कई स्तरों पर चलती है। हिंदी फि ल्मों में कथा निर्वाह की एकरेखीय पद्धति होती है। उसकी आदत पड़ जाने के कारण जटिल कहानी एकबारगी समझ में नहीं आती। लास्या का काल्पनिक भाई, लास्या का एकाकीपन, लास्या के पिता कर्मा का संघर्ष, कर्मा का शोक और संताप, विस्थापन की समस्या, शांत माहौल में खंजर की तरह चुभती सड़कें, दैत्यों की तरह गुजरते वाहन, निष्कपट लोगों के बीच सक्रिय कपटी शहरी, उपभोक्तावाद का प्रभाव..जाने-अनजाने शिवाजी चंद्रभूषण ने भावनाओं और कथ्यों का अंतरजाल बुना है। फिल्म में एक उदासी है, जो श्वेत-श्याम फिल्मांकन से और गहरी हो जाती है। कभी-कभी बोझिल भी महसूस होती है।
नियमित फिल्मों के जरिये मनोरंजन के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म काफी अलग अनुभव देगी। इस नए और अलग स्वाद के लिए उन्हें तैयार रहना होगा। डैनी और आनचुक का अभिनय सधा और किरदार के अनुरूप है। लास्या की भूमिका में गौरी खरी नहीं उतर पातीं। छोटी भूमिकाओं में यशपाल शर्मा और राज जुत्शी फिल्म को रोचक बनाते हैं।
रेटिंग ***