सलाम! शबाना आजमी...दस कहानियाँ

-अजय ब्रह्मात्मज

एक साथ अनेक कहानियों की फिल्मों की यह विधा चल सकती है, लेकिन उसकी प्रस्तुति का नया तरीका खोजना होगा। एक के बाद एक चल रही कहानियां एक-दूसरे के प्रभाव को बाधित करती हैं। संभव है भविष्य के फिल्मकार कोई कारगर तरीका खोजें। दस कहानियां में सिर्फ तीन याद रहने काबिल हैं। बाकी सात कहानियां चालू किस्म का मनोरंजन देती हैं।
दस कहानियां के गुलदस्ते में पांच कहानियों के निर्देशक संजय गुप्ता हैं। ये हैं मैट्रीमोनी, गुब्बारे, स्ट्रेंजर्स इन द नाइट, जाहिर और राइज एंड फाल। इनमें केवल जाहिर अपने ट्विस्ट से चौंकाती है। फिल्म की सभी कहानियों में ट्विस्ट इन द टेल की शैली अपनायी गई है।
जाहिर में मनोज बाजपेयी और दीया मिर्जा सिर्फ दो ही किरदार हैं। यह कहानी बहुत खूबसूरती से कई स्तरों पर प्रभावित करती है। मेघना गुलजार की पूर्णमासी का ट्विस्ट झकझोर देता है। मां-बेटी की इस कहानी में बेटी की आत्महत्या सिहरा देती है। रोहित राय की राइस प्लेट को शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह के सधे अभिनय ने प्रभावशाली बना दिया है। दक्षिण भारतीय बुजुर्ग महिला की भूमिका में शबाना की चाल-ढाल और संवाद अदायगी उल्लेखनीय है। सलाम! शबाना आजमी ़ ़ ़आप की संजीदगी बताती है कि रोल छोटा हो या बड़ा, कलाकार की भागीदारी पूरी होनी चाहिए। स्ट्रेंजर्स इन द नाइट का कथ्य अच्छा है, लेकिन कृत्रिम लगता है। शेष कहानियां चालू किस्म की हैं। यों लगता है कि किसी फिल्म के कुछ सिक्वेंस शूट कर लिए गए हों। हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों को फिल्मों की ऐसी प्रस्तुति को एक्सप्लोर करना चाहिए। हर कहानी के लिए दो घंटे की दरकार नहीं होती। इस विधा में निर्देशक रोचक फिल्में बना सकते हैं और दर्शकों को भी विविधता मिल सकती है।

Comments

सोलह ऑने सही बात जी....
Sajeev said…
बिल्कुल अच्छा प्रयोग है, पर कभी कभी हो तो अच्छा है यहाँ तो भेड़चाल है न ..... कहीं सारी फिल्में ही ऐसी न बनने लग जाए
तो शबाना जी और नसीर जी के लिए देख आते हैं फिल्म. वैसे आपकी यह बात बहुत बुरी लगती है साफ साफ नहीं बताते कि फिल्म देखें या नहीं.
Unknown said…
अगली बार से नोट डाल दिया करेंगे.देखने या न देखने का.वैसे संकेत तो रहता है.
ALOK PURANIK said…
ना जी, संकेत से काम ना चलेगा।
साफ साफ बता दो जी कि जायें कि ना जायें।

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