हिन्दी टाकीज:सिनेमा देखने चलना है - श्याम दिवाकर

हिन्दी टाकीज-१३
इस बार श्याम दिवाकर ने हिन्दी टाकीज की अगली कड़ी लिखी है.चवन्नी के विशेष आग्रह को उन्होंने स्वीकार किया और बिल्कुल अलग अंदाज़ में यह संस्मरणात्मक लेख लिखा.श्याम दिवाकर पेशे से हिन्दी के प्रोफ़ेसर और स्वभाव से कवि हैं.'इस सदी का प्रेमपत्र' नाम से उनका काव्य संग्रह आ चुका है.उन्होंने छिटपुट कहानियाँ लिखी हैं और यदा-कदा समीक्षात्मक लेख लिखते हैं.उन्होंने ख़ुद जितना लिखा है,उस से ज्यादा लोगों को लिखने के लिए प्रेरित किया है.बिहार के जमालपुर निवासी श्याम दिवाकर फिलहाल आरडीएनडीजे कॉलेज ,मुंगेर में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं।

'सिनेमा' शब्द से मेरा पहला परिचय संभवत: 1958-59 के आसपास हुआ। अक्टूबर का महीना था। मां ने कहा - आज स्कूल नहीं जाना है। स्कूल जाने के लिए कमोबेश रोज डांट खाने वाले के लिए इससे बड़ी खुशी दूसरी हो ही नहींसकती थी। मैं अभी इस आश्चर्य से उबर भी नहीं पाया था कि घर से निकलने की मनाही करते हुए दीदी ने नहा-धोकर तैयार हो जाने का फरमान जारी कर दिया। पता चला आज घर के अधिकांश लोग सिनेमा देखने जाएंगे।
मैं बिहार के मुंगेर जनपद के हवेली खडग़पुर तहसील का निवासी हूं। इस तहसील के अंदर घनी आबादी वाला एक गांव है 'प्रसन्नडो'। ठाकुरों की इस बस्ती में अन्य जातियों के घर खुशियां दबे-छुपे ढंग से आती हैं। पिता की हिदायत के बावजूद कि शोर नहीं सलीके से चलना है, हम उछलते-कूदते घर से निकले थे। गांव से खडग़पुर तक की पांच किलोमीटर की दूरी कैसे तय हो गयी, पता ही नहीं चला। खेत की मेड़ पर चलते हुए हम बच्चों ने धान के दाने को दबा-दबा कर अपने माथे पर टीका लगा लिया था। बीच-बीच में खेत में जमे पानी में झांककर हम देख भी लेते थे कि किसके माथे पर टीका कैसा बना है। हमारी यह यात्रा दिन के तकरीबन दो बजे 'केशरी सिनेमा' के प्रांगण में समाप्त हुई थी।
पर यहां पहुंचकर हमारी खुशी मुरझा गई थी।पता चला कि केवल शनिवार और रविवार को ही तीन, छह एवं नौ - सिनेमा का तीन शो हुआ करता है। बाकी पांच दिनों में मैटिनी शो नहीं होता, सिर्फ इवनिंग और नाइट शो ही होता है। दुर्भाग्य से वह दिन बुधवार था। हम लोग निराश हो घर लौटने ही वाले थे कि माइक से घोषणा होने लगी कि आज मैटिनी का विशेष शो होगा। खबर थी कि सिनेमा मालिक की बेटी मैके आयी है और वह अभी ही सिनेमा देखना चाहती है।
हमारे मुरझाए चेहरे पर रौनक लौट भी नहीं पाई थी कि दूसरी समस्या आ खड़ी हुई - किस क्लास का टिकट लिया जाए। फोर्थ क्लास छह आना, थर्ड क्लास बारह आना, सेकंड क्लास अठारह आना, फस्र्ट क्लास डेढ़ रुपया, रिजर्व क्लास एक रुपया चौदह आना और डीसी दो रुपये चार आना। लेडीज के लिए एक अलग से क्लास था,जिसका टिकट था पांच आना। सेकंड और फस्र्ट क्लास के बीच एक तरफ घेर कर यह क्लास बनाया गया था। औरतें तो लेडीज का टिकट लेकर निश्चिंत हो गयी। पिताजी ने सेकंड क्लास का टिकट लिया। हम बच्चों ने फोर्थ क्लास में बैठने का निर्णय लिया ताकि सब कुछ नजदीक से साफ-साफ दिखे। भैया हमलोगों के साथ रहे। वे हमलोगों के बीच बैठे ताकि हमें बता सकें कि राष्ट्रगान के समय खड़ा होना है। उन्होंने हमें काफी डरा रखा था कि अभी सांप निकलेगा, पैर सीट पर ऊपर कर बैठना।
अंतत: तीन बजकर पन्द्रह मिनट पर लुई बुऩवेल का माया लोक शुरू हुआ। सिनेमा का नाम था 'नागपंचमीÓ। डर का यह आलम था कि हम बच्चे भैया को कसकर पकड़े हुए थे। सबके पैर सीट पर थे। लगता था परदे से निकलकर नाग गोद में आ गिरेगा। भैया ने कहा था, आस्तीक मुनि का नाम लेते रहो, कुछ नहीं होगा। इंटरवल में जब हॉल की बत्ती जली थी तो सबका चेहरा देखने लायक था। इंटरभ्वल में संभवत: सबों ने मूढ़ी मसाला (झाल मूढ़ी) खाया था। मैं इतना डर गया था कि बाकी समय पिता की गोद से उतरा ही नहीं। फिल्म की धुंधली सी तस्वीर आंखों के सामने है पर उसके गीतों की कुछ पंक्तियां आज भी मेरे मानस-पटल पर कौंधती रहती है - 'धरती से गगन तक धुंध उड़े, मेरे पिया गए तो कहां गए' और 'मेरे नाग कहीं जा बसियो रे, मेरे पिया को न डसियो रे'। यह सिनेमा ही मेरे जीवन का पहला सिनेमा क्यों हुआ? संभवत: कृषक सभ्यता और ग्राम्य जीवन का सांपों से अटूट संबंध ही इसका कारण रहा हो।
दूसरी फिल्म मैंने उसी सिनेमा हॉल में 1965 में देखी। अशोक कुमार, लीला चिटणीस की 'अछूत कन्या' । 'मैं बन कर पंछी वन-वन घूमूं रे' यह गीत उस समय बेकार लगा था, पर आज इसका दर्द मैं समझता हूं।
1967 का मार्च महीना, जब मैंने तीसरी फिल्म देखी। मैट्रिक बोर्ड की परीक्षा समाप्त हो चुकी थी। परीक्षा केन्द्र जिला मुख्यालय था। मुंगेर का 'नीलम टॉकीज' नामवर सिनेमा हॉल था। संभवत: वह इस जनपद का पहला हॉल था,जिसमें दो प्रोजेक्टर थे और रील बदलने के लिए बीच में फिल्म रोकनी नहीं पड़ती थी। यहां एक नये क्लास से मेरा साबका पड़ा था जिसे बी सी कहा जाता था। खडग़पुर के सिनेमा हॉल के सभी क्लास नीचे थे, पर यहां बीसी और डीसी दोनों ऊपर थे। बीसी तीन रुपये पच्चीस पैसे और डी सी तीन रुपये पचहत्तर पैसे। टिकट लेने की जिम्मेदारी मजबूत कद-काठी वाले शिवकुमार सिंह ने इस शत्र्त पर उठायी थी कि उसके टिकट का पैसा हमलोग देंगे। ( यदि जनपदीय सिनेमा से आपका साबका नहीं तो टिकट लेने के जद्दोजहद को आप नहीं समझ सकते।) फिल्म थी 'नया दौर'। दिलीप कुमार-वैजयंती माला अभिनीत इस फिल्म ने हमारे किशोर मन को प्रभावित किया था। 'रेशमी सलवार कुर्ता जाली का, रूप कहा न जाए नखरे वाली का', 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, इस देश का यारों क्या कहना'। इन गीतों में बंधा मन बहुत दिनों तक भटका था।
1969 के बाद ग्रामीण परिवेश से नाता लगभग टूट सा गया। प्री बोर्ड में नामांकन के लिए रांची आया हुआ था। यहां मैंने एक ऐसी फिल्म देखी जिसकी याद आज भी ज्यों-की-त्यों है। बलराज साहनी-पांडरा बाई अभिनीत फिल्म थी 'भाभी'। 'चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना, यहां न तेरा संगी-साथी, यहां न तेरा ठिकाना' ये पंक्तियां मुझे आज भी बेचैन करती हैं। संयुक्त परिवार के तनाव और त्याग की कसमकस ने मुझे आज भी उलझाए रखा है।
पारिवारिक माहौल में देखी गयी मेरी अंतिम फिल्म है ' जय संतोषी मां'। अंतिम इसलिए कि इसके बाद नौकरी के साथ परिवार के सभी सदस्यों ने एक साथ कोई फिल्म नहीं देखी। जमालपुर के रेलवे सिनेमा का हॉल, हॉल के बाहर संतोषी माता की आदम कद प्रतिमा। प्रतिमा के पास बताये लड्डू की दुकान। सभी बच्चों को हिदायत थी कि एक-एक रुपये का प्रसाद इंटरवल में संतोषी मां को चढ़ाना है। पड़ोस का एक परिवार भी हमलोगों के साथ। उनके साथ उनका पांच-छह वर्षीय पुत्र पंकज भी था। सभी बच्चों ने प्रसाद चढ़ाया, पर वह अपना लोभ संवरण नहीं कर पाया। अपने दोने के बताशे को चढ़ाने के पहले ही उसने खा लिया। फलत: उसकी जमकर पिटायी हो गई। उसका रोदन और उसकी मां का गले में आंचल डाल संतोषी मां से बार-बार की गई क्षमा याचना, दोनों बिम्बों का अक्स आज भी ताजा है।
बाद के वर्षों में मैंने कितनी फिल्में देखी उसका लेखा-जोखा देना असंभव सा है। पर कुछ फिल्में कुछ खास कारणों से याद रह गयी हैं उसका जिक्र करना चाहूंगा। 'जिस देश में गंगा बहती है' (धुआंधार वाटरफॉल के कारण) 'आन' (प्रथम टेकनीकलर फिल्म), 'आर पार' (र्डेजी इरानी की पहली फिल्म), 'आलम आरा' (पहली बोलती फिल्म), 'हकीकत' (चीनी आक्रमण) जैसी फिल्में कोष्ठक में दिए गए कारणों से खास कर देखी गयीं। इसी तरह की एक और फिल्म 'दाग' जिसमें दिलीप कुमार और निम्मी को प्रथम फिल्मफेअर अवार्ड दिया गया था। 'महल' और 'गुमनाम' भी मेरी पसंदीदा फिल्म है। प्रेम-संबंधों पर आधारित 'मुगलेआजम', 'देवदास', 'मेला' और 'बॉबी' ऐसी फिल्में हैं,जो अलग-अलग कारणों से महत्वपूर्ण हैं। 'मेला' संभवत: पहली ऐसी फिल्म है,जिसमें समाज की बेरूखी से तंग आकर नायक-नायिका दोनों ने आत्महत्या कर ली थी। प्रेम के प्रति समाज की बेरूखी और बेरूखी के कारणों-स्तरों को समझना हो तो इन चारों फिल्मों को अवश्य देखना चाहिए।
सिनेमा ने आज काफी तरक्की कर लिया है। पर सिनेमा से मिलने वाला मजा कम हो गया है। वह मूंगफली, वह झाल-मूढ़ी, वह पापड़, वह आइसक्रीम, दोस्तों के साथ वह धौल-धप्पड़ कहां है आज। कहां है सिनेमा देखने की महीनों की वह तैयारी। प्रचार विभाग के परदे पर गांवों में दिखाए जाने से लेकर सिनेमा आज मल्टीप्लेक्स के रेड लाउंज तक आ पहुंचा है, पर कहां है वह उत्साह, जो 'सिनेमा देखने चलना है' से होता था।

Comments

Unknown said…
नाग पंचमी देखते समय पैरों को सीट पर रख लेने वाला संस्मरण वाकई दिलचस्प है। परदे पर शेर के आते ही सीटों के बीच में छिप जाने की बचपन की यादें मेरे साथ भी हैं। अजय जी, हिंदी टाकीज़ में विविधता आ रही है, साधुवाद।
- पंकज शुक्ल
http://thenewsididnotdo.blogspot.com/
पुरानी यादें ताजा करने वाला संस्मरण....
वाह सिनेमा...
बहुत बढ़िया विश्लेषण ..चवन्नी की रेल काफ़ी लम्बी जाने वाली है...

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